पाठ – 7
In this post we have given the detailed notes of class 9 Social Science chapter 7 Elections in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के सामाजिक विज्ञान के पाठ 7 चुनाव के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Understanding Society, India and Beyond Part I (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Social Science |
| Chapter no. | Chapter 7 |
| Chapter Name | चुनाव (Elections) |
| Category | Class 9 Social Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
चुनाव लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रयोग की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में से एक हैं। नियमित और समय-समय पर होने वाले चुनाव ही लोकतंत्र के केंद्र में होते हैं। सार्वजनिक पदों के प्रतिनिधियों को प्रत्यक्ष (Direct) या अप्रत्यक्ष (Indirect) चुनावों के माध्यम से चुना जा सकता है।
प्रत्यक्ष चुनाव (Direct Elections): ऐसे चुनाव जिनमें नागरिक सीधे अपने प्रतिनिधियों या नेताओं को चुनने के लिए मतदान करते हैं।
अप्रत्यक्ष चुनाव (Indirect Elections): ऐसे चुनाव जिनमें नागरिक ऐसे प्रतिनिधियों को वोट देते हैं जो बाद में स्वयं नेताओं को चुनते/निर्वाचित करते हैं।
भारत में केंद्रीय स्तर पर लोकसभा के सदस्य, राज्य स्तर पर विधानसभा (Vidhan Sabha) के सदस्य, तथा स्थानीय निकायों (जैसे पंचायत, नगर निगम आदि) के सदस्य हर पांच वर्ष में प्रत्यक्ष चुनावों द्वारा चुने जाते हैं। इसके विपरीत, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सदस्य अप्रत्यक्ष चुनावों द्वारा चुने जाते हैं।
क्या कोई प्रतिनिधि बिना नए चुनाव का सामना किए अपने पद पर बना रह सकता है? क्या सरकार बिना जनता का जनादेश (mandate) दोबारा प्राप्त किए अपने निर्धारित कार्यकाल से आगे बनी रह सकती है? क्या केवल एक ही राजनीतिक दल के चुनाव लड़ने पर हम अपनी पसंद का प्रयोग कर सकते हैं? इन सभी प्रश्नों का उत्तर है — नहीं। इसका कारण यह है कि लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण तत्व यही है कि हमारी ओर से निर्णय लेने वाले प्रतिनिधियों का चुनाव समय-समय पर होता रहे। निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह (accountable) होते हैं। हमारे प्रतिनिधियों को चुनने और उन्हें जवाबदेह ठहराने का अधिकार आवधिक (periodic) चुनावों के माध्यम से ही सुनिश्चित होता है, और हमारा वोट इस अधिकार के प्रयोग का प्रमुख साधन है।
चुनाव एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम मतदान के अधिकार का प्रयोग करते हैं और नागरिक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। लोकतंत्र में चुनावों का महत्व चार बातों से जुड़ा है — जवाबदेही (Accountability), प्रतिनिधित्व (Representation), वैधता (Legitimacy) और समानता (Equality)।
‘साइकोलॉजी’ नहीं, ‘साइकेफोलॉजी’ (Psephology):
चुनावों के वैज्ञानिक अध्ययन को ‘साइकेफोलॉजी (Psephology)’ कहा जाता है। यह शब्द ग्रीक भाषा के शब्द ‘psēphos’ (जिसका अर्थ है कंकड़/पत्थर) और ‘logy’ (जिसका अर्थ है व्यवस्थित अध्ययन) से बना है। प्राचीन ग्रीस में मतदान के लिए कंकड़ों का प्रयोग किया जाता था, जिससे इस शब्द की उत्पत्ति हुई।
लोकतंत्र को साकार करने के लिए चुनावों का स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी (transparent) ढंग से संचालन आवश्यक है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहां हजारों निर्वाचन क्षेत्रों में करोड़ों लोग मतदान करते हैं, वहां कानूनों, राष्ट्रीय-राज्य-स्थानीय — सभी स्तरों पर एक सुव्यवस्थित एवं समन्वित प्रणाली, तथा एक सुदृढ़ मशीनरी की आवश्यकता होती है। यहीं पर चुनाव प्रणाली और विभिन्न हितधारक (stakeholders) — जैसे भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India — ECI), विभिन्न राजनीतिक दल, नागरिक समाज (civil society), मीडिया और मतदाता — अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। हमारा संविधान और विभिन्न संसदीय कानून इन सभी हितधारकों के कार्यों और शक्तियों का प्रावधान करते हैं।
चुनाव सफलतापूर्वक संचालित करने का पहला कदम यह तय करना है कि डाले गए वोटों को विधायिका (legislature) की सीटों में कैसे परिवर्तित किया जाए। एक चुनाव प्रणाली सीटों का बंटवारा किस तरीके से करती है, यही बात उसे दूसरी प्रणालियों से अलग करती है। हमारे संविधान निर्माताओं ने दो सबसे प्रचलित चुनाव प्रणालियों पर विचार किया और अंततः बहुलता प्रणाली (Plurality System), जिसे ‘प्रथम-आगत-प्रथम-प्राप्त’ प्रणाली (First-Past-The-Post — FPTP) भी कहा जाता है, को अपनाया।
लोकसभा और विधानसभा के सदस्य FPTP प्रणाली से चुने जाते हैं, जबकि राज्यसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation — PR) से होते हैं।
विधानसभाएं प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित निकाय हैं जो अपने-अपने राज्यों और कुछ केंद्रशासित प्रदेशों के लिए कानून बनाती हैं। विधानसभा के चुनाव भी लोकसभा की तरह FPTP प्रणाली से ही होते हैं। छह राज्यों — आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश — में विधायिका द्विसदनीय (bicameral) है, अर्थात इसके दो सदन होते हैं: ऊपरी सदन ‘विधान परिषद (Vidhan Parishad)’ और निचला सदन ‘विधानसभा (Vidhan Sabha)’। विधान परिषद में विधानसभा और स्थानीय निकायों के सदस्यों द्वारा, तथा उस राज्य के स्नातकों (graduates) और शिक्षकों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं। इसके अलावा राज्यपाल कला, विज्ञान, समाज सेवा, साहित्य और सहकारिता जैसे क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने के लिए कुछ सदस्यों को मनोनीत (nominate) करते हैं। विधान परिषद के चुनाव ‘एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote)’ के माध्यम से आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत होते हैं।
| विशेषता | FPTP (First Past The Post) | बहुमत प्रणाली (Majority System) | आनुपातिक प्रतिनिधित्व (PR) |
| मतदान कैसे होता है? | हर मतदाता अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक उम्मीदवार को वोट देता है। सबसे अधिक वोट पाने वाला उम्मीदवार जीतता है, भले ही उसे कुल वोटों के 50% से कम वोट मिले हों। | हर मतदाता एक उम्मीदवार को वोट देता है। जीतने के लिए उम्मीदवार को 50% से अधिक वोट चाहिए। यदि किसी को नहीं मिलते, तो शीर्ष दो उम्मीदवारों के बीच दूसरे दौर में मुकाबला होता है। | मतदाता किसी दल को वोट देते हैं, व्यक्ति को नहीं। संसद में सीटें प्रत्येक दल को मिले कुल वोटों के अनुपात में आवंटित होती हैं। |
| भारत में प्रयोग | लोकसभा और विधानसभा के चुनाव | प्रयोग नहीं होता (उदाहरण के लिए समझाया गया है) | राज्यसभा, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और विधान परिषद के चुनाव (एकल संक्रमणीय मत द्वारा) |
पाठ में दिए गए काल्पनिक उदाहरण (Haritbhumi, Ratnadweep और Swarnalok नामक काल्पनिक देश) से स्पष्ट होता है कि FPTP में सबसे अधिक वोट पाने वाला दल सरकार बनाता है, भले ही उसे 50% से कम वोट मिले हों; बहुमत प्रणाली में यदि पहले दौर में किसी को 50% वोट न मिलें तो दूसरे दौर का चुनाव होता है; और PR में सीटें दलों के बीच उनके वोट प्रतिशत के अनुपात में बंटती हैं, जिससे सत्ता आनुपातिक रूप से साझा होती है।
एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote System):
इस प्रणाली में जीतने के लिए न्यूनतम आवश्यक वोटों को ‘कोटा (Quota)’ कहा जाता है, जिसकी गणना इस सूत्र से होती है:
कोटा = [कुल वैध मतों की संख्या ÷ (भरी जाने वाली सीटें + 1)] + 1
मतों की गणना और स्थानांतरण (Counting and Transfer of Votes):
| 1. | मतदाता अपनी प्राथमिकता (preference) अंकित करते हैं। |
| 2. | सभी उम्मीदवारों के लिए प्रथम प्राथमिकता के मतों की गिनती की जाती है। जिन उम्मीदवारों को जीत के लिए आवश्यक न्यूनतम मत (कोटा) मिल जाते हैं, उन्हें निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। |
| 3. | सबसे कम मत पाने वाले उम्मीदवार को हटा दिया जाता है। उसके मत उन उम्मीदवारों को स्थानांतरित कर दिए जाते हैं जिन्हें उन मतपत्रों पर दूसरी प्राथमिकता के रूप में अंकित किया गया था। |
| 4. | यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक आवश्यक संख्या में उम्मीदवार निर्वाचित नहीं हो जाते। |
भारत में चुनावों के संचालन को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कानून निम्नलिखित हैं:
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of the People Act, 1950 — RPA 1950): यह मुख्यतः सीटों के आवंटन और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन (delimitation), मतदाता सूचियों की तैयारी और संशोधन, तथा यह सुनिश्चित करने से संबंधित है कि 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के हर नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकार प्राप्त हो।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951 — RPA 1951): यह चुनावों के संचालन और चुनाव-पश्चात विवादों (post-election disputes) के अन्य सभी पहलुओं से संबंधित है। यह उम्मीदवारों के नामांकन, चुनाव अभियानों (campaigns), मतदान प्रक्रियाओं और विवादों के समाधान के नियम निर्धारित करता है।
इसके अतिरिक्त ‘राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति चुनाव अधिनियम, 1952 (The Presidential and Vice-Presidential Elections Act, 1952)’ भी है। ये सभी अधिनियम मिलकर भारत की चुनावी प्रक्रिया की सत्यनिष्ठा (integrity), पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं।
- किसी उम्मीदवार द्वारा (या उसकी सहमति से) किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने, नाम वापस लेने, वोट देने या वोट न देने के लिए कोई उपहार, प्रस्ताव या वादा देना।
- धर्म, जाति, नस्ल, समुदाय या भाषा के आधार पर लोगों से वोट देने या न देने की अपील करना।
- उम्मीदवारों या उनकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति का सरकारी कर्मचारियों — जैसे राजपत्रित अधिकारी (gazetted officers), न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट, सशस्त्र बल कर्मी, पुलिस कर्मी और उत्पाद शुल्क अधिकारी — से किसी उम्मीदवार के पक्ष में सहायता लेना निषिद्ध है।
परिसीमन आयोग (Delimitation Commission)
आपके संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं स्थायी रूप से निश्चित नहीं होतीं। जनसंख्या घनत्व में बदलाव के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं समय-समय पर बदलती हैं। परिसीमन के बिना, एक संसद सदस्य (MP) पांच लाख लोगों का प्रतिनिधित्व कर सकता है, जबकि दूसरा पच्चीस लाख लोगों का — जिससे समान प्रतिनिधित्व का उद्देश्य ही विफल हो जाता है।
परिसीमन (Delimitation): लोकसभा और विधानसभा के चुनावों के लिए प्रत्येक राज्य में सीटों की संख्या तय करने और क्षेत्रीय सीमाएं निर्धारित करने की प्रक्रिया को परिसीमन कहते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में सीट और जनसंख्या का अनुपात यथासंभव समान रहे।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 82 परिसीमन आयोग की स्थापना अनिवार्य करता है। भारत में अब तक चार परिसीमन आयोग बन चुके हैं — 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India — ECI)
भारत के संविधान ने चुनावों के संचालन की पूरी प्रक्रिया के अधीक्षण (superintendence), निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) में निहित की है।
ECI एक स्वायत्त (autonomous) स्थायी संवैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई थी। यह लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधान परिषद, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति — सभी के चुनाव संचालित करता है। संविधान के अनुच्छेद 324 से 329 तक ECI की स्थापना का प्रावधान करते हैं और इसकी शक्तियों तथा कर्तव्यों को परिभाषित करते हैं।
राज्य स्तर पर चुनाव कार्य की देखरेख राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (Chief Electoral Officer) करते हैं, जिन्हें ECI संबंधित राज्य सरकार के परामर्श से सिविल सेवकों में से नियुक्त करता है। विभिन्न राज्य सरकारी अधिकारी — जैसे जिला मजिस्ट्रेट, उपमंडल मजिस्ट्रेट और तहसीलदार — को भी जिला निर्वाचन अधिकारी (District Election Officer), निर्वाचन अधिकारी (Returning Officer), निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (Electoral Registration Officer) आदि नामित करके चुनाव संबंधी कार्य सौंपे जाते हैं।
ECI के प्रमुख कार्य:
1. मतदाता सूची तैयार करना (Creating the Electoral Roll):
ECI हर घर में आधिकारिक गणनाकार (enumerators) भेजकर पात्र मतदाताओं का डेटा एकत्र करता है। एकत्रित जानकारी के आधार पर हर निर्वाचन क्षेत्र के लिए, मतदान केंद्र-वार व्यवस्थित मतदाता सूचियां तैयार की जाती हैं। केवल वही व्यक्ति मतदान कर सकते हैं जिनका नाम सूची में शामिल है। ECI ‘विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision — SIR)’ भी करवाता है, जिसमें मतदाता सूचियों को अद्यतन, सत्यापित और सही किया जाता है। SIR के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि कोई भी पात्र नागरिक छूट न जाए और कोई अपात्र व्यक्ति सूची में शामिल न रहे — विशेषकर वे युवा मतदाता जो अभी 18 वर्ष के हुए हैं और जागरूकता की कमी या किसी अन्य कारण से छूट सकते हैं। SIR मतदाता की मृत्यु, निवास परिवर्तन, दोहरे पंजीकरण, या स्थायी रूप से अनुपलब्ध (untraceable) होने के आधार पर नाम हटाने का काम भी करता है। अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने से पहले ECI संशोधित सूची पर दावे या आपत्तियां (claims or objections) उठाने का समय भी देता है और उनका निपटारा करता है।
जब विधायिका का संवैधानिक रूप से निर्धारित कार्यकाल (पांच वर्ष) समाप्त होता है, या समय से पहले विधायिका भंग कर दी जाती है, तब ECI चुनाव कराने के लिए आवश्यक मशीनरी सक्रिय करता है। भारत जैसे विशाल और विविध देश के लिए चुनाव कार्यक्रम तय करते समय ECI मौसम की स्थिति, कृषि चक्र, स्कूल-विश्वविद्यालय की परीक्षाओं के कार्यक्रम, त्योहारों आदि जैसे कई कारकों पर विचार करता है।
केवल ECI में पंजीकृत राजनीतिक दल ही चुनाव लड़ सकते हैं। राजनीतिक दलों से जुड़े उम्मीदवारों के अलावा, स्वतंत्र (independent) उम्मीदवार — जो किसी दल से संबद्ध नहीं होते — भी चुनाव लड़ सकते हैं। ECI राजनीतिक दलों को अपने संगठनात्मक चुनाव समय-समय पर करवाने पर बल देकर ‘आंतरिक दलीय लोकतंत्र (inner party democracy)’ सुनिश्चित करता है। ECI राजनीतिक दलों को मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या राज्य/क्षेत्रीय दल, या पंजीकृत-अमान्यता प्राप्त दल (Registered-Unrecognised Parties) के रूप में वर्गीकृत भी करता है। राष्ट्रीय और राज्य दलों को चुनाव चिह्न आवंटित किए जाते हैं। ECI राजनीतिक दलों की मान्यता और चिह्नों के आवंटन से जुड़े विवादों में अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) निकाय के रूप में भी कार्य करता है।
हर वर्ष 25 जनवरी को ‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस (National Voters’ Day)’ मनाया जाता है, और इस अवसर पर एक मतदाता शपथ भी ली जाती है, जिसमें नागरिक धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय, भाषा या किसी प्रलोभन से प्रभावित हुए बिना, निर्भीक होकर हर चुनाव में मतदान करने का संकल्प लेते हैं।
चुनावों को सार्थक बनाने के लिए पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से संचालित होनी चाहिए। यदि निष्पक्षता सुनिश्चित न हो, तो चुनावी संस्थाओं पर जनता का विश्वास धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकता है — जैसे यदि उम्मीदवार व्यक्तिगत लाभ से प्रभावित हों, वोटों की गिनती सही ढंग से न हो, या कुछ मतदाताओं को पहुंच (accessibility) संबंधी दिक्कतों के कारण मतदान के अधिकार का प्रयोग करने में कठिनाई हो। ऐसी स्थितियों में भले ही चुनाव कराए जाएं, उनका लोकतांत्रिक मूल्य कम हो जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने में भी है कि चुनावी प्रक्रिया समावेशी (inclusive), निष्पक्ष और भरोसेमंद हो।
ECI ने चुनाव प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाने के लिए कई पहल की हैं, जो दिव्यांगजन (Persons with Disabilities — PwDs), वरिष्ठ नागरिकों, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों और विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूहों (Particularly Vulnerable Tribal Groups — PVTGs) के लिए बुनियादी ढांचे की पहुंच के साथ-साथ प्रौद्योगिकी-सहायता प्राप्त समावेशन पर केंद्रित हैं। 2024 के आम चुनावों में पहली बार पूरे भारत में 85 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों और 40% या उससे अधिक बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए ‘घर से मतदान (Voting from Home)’ की सुविधा दी गई।
- सुविधा (Suvidha): चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के लिए विशेष ऐप, जहां नामांकन से संबंधित सभी फॉर्म और अपडेट मिलते हैं तथा बैठक, रैली, वाहन, लाउडस्पीकर जैसी अनुमतियों के लिए आवेदन किया जा सकता है।
- ERONET: फॉर्म प्रोसेसिंग और डेटाबेस के आसान प्रबंधन को सुगम बनाने वाली प्रणाली, जो कुशल फॉर्म-प्रोसेसिंग, सरलीकृत डैशबोर्ड, भूमिका-आधारित पहुंच और ई-रोल्स के रखरखाव में मदद करती है।
- सुगम (Sugam): चुनाव कार्य के लिए अन्य विभागों से मांगे/डायवर्ट किए गए वाहनों के प्रबंधन हेतु वेब-आधारित ऐप्लीकेशन।
- वोटर हेल्पलाइन ऐप (Voter Helpline App): पंजीकरण, स्थानांतरण (transposition), सत्यापन जैसी विभिन्न मतदाता सेवाओं के लिए बहुउद्देशीय ऐप, जो चुनाव संबंधी जानकारी और समाचार भी उपलब्ध कराता है।
- सक्षम ऐप (Saksham App): दिव्यांगजनों (PwDs) के लिए मतदाता पहचान और पंजीकरण प्रक्रिया को आसान बनाने वाला ऐप, जो पंजीकरण, मतदान केंद्र खोजने जैसी सुविधाएं प्रदान करता है।
- cVIGIL ऐप: इसकी मदद से मतदाता आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) के उल्लंघन और चुनावी कदाचार की शिकायत घटना देखने के कुछ ही मिनटों में कर सकते हैं। शिकायत पर तुरंत कार्रवाई के लिए फ्लाइंग स्क्वॉड घटनास्थल पर पहुंचता है।
- ETPBS (Electronically Transmitted Postal Ballot System): ‘सेवा मतदाताओं (Service Voters)’ के लिए विकसित, जिससे वे अपने निर्वाचन क्षेत्र से बाहर किसी भी स्थान से इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्राप्त डाक मतपत्र के जरिए मतदान कर सकते हैं।
भारत का चुनावी अभ्यास अद्वितीय है — यहां 96.8 करोड़ से अधिक पात्र मतदाता विविध क्षेत्रों और भौगोलिक भू-भागों में फैले हुए हैं। ECI इस विशाल अभ्यास का स्वायत्त रूप से संचालन करता है और देशभर में स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करता है। मतदाता सूची अद्यतन करने, उम्मीदवारों के नामांकन, अभियानों के नियमन, कानून प्रवर्तन, राज्यों के बीच समन्वय, व्यापक सुरक्षा व्यवस्था, मतों की गिनती, चुनाव परिणामों की घोषणा और विवाद समाधान जैसे कार्यों के लिए ECI सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) और ई-गवर्नेंस का व्यापक उपयोग करता है।
ECI का ‘अंतर्राष्ट्रीय चुनाव पर्यवेक्षक कार्यक्रम (International Election Visitors’ Programme — IEVP)’ अन्य देशों की चुनाव प्रबंधन संस्थाओं (Election Management Bodies) और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोग का एक प्रमुख कार्यक्रम है। ECI ने 28 चुनाव प्रबंधन संस्थाओं और तीन अंतर्राष्ट्रीय संगठनों — International Foundation for Electoral Systems (IFES), International IDEA और संयुक्त राष्ट्र — के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं।
राजनीतिक दल (Political Parties)
हर निर्वाचन क्षेत्र में अक्सर दर्जनों उम्मीदवार होते हैं। अधिकांश उम्मीदवार किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं, हालांकि कुछ स्वतंत्र रूप से भी चुनाव लड़ते हैं। मतदाता उम्मीदवारों, उनकी नीतियों, विकास के दृष्टिकोण, तथा सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों पर उनके रुख के बारे में मुख्यतः राजनीतिक दलों के माध्यम से ही जानते हैं।
राजनीतिक दल लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक हैं क्योंकि वे जमीनी स्तर पर सीधे कार्य करते हैं। वे शासन (governance), जवाबदेही, प्रतिनिधित्व और जनभागीदारी प्रदान करके लोकतंत्र को प्रभावी ढंग से कार्य करने में मदद करते हैं। राजनीतिक दलों की भूमिकाएं इस प्रकार हैं:
- जनमत का संगठन करना (Organise public opinion)।
- विशिष्ट मुद्दों पर अभियान चलाना (Campaign on specific issues)।
- मतदाताओं को सार्थक विकल्प देना (Offer voters meaningful choices)।
- मतदाताओं को चुनावों के दौरान सूचित निर्णय लेने में सक्षम बनाना (Enable informed decisions)।
राजनीतिक दल चुनाव अभियानों में अपने एजेंडे प्रस्तुत करते हैं, रैलियों में अपने वादों को विस्तार से बताते हैं, और विभिन्न मीडिया मंचों के माध्यम से स्थानीय, राज्य, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय चिंता के मुद्दों पर चर्चा-बहस करते हैं।
भारत में बहुदलीय व्यवस्था (Multi-party System) है, अर्थात यहां कई राजनीतिक दल अस्तित्व में हैं और चुनाव लड़ते हैं। यह व्यवस्था देश की भाषाओं, संस्कृतियों, धर्मों और क्षेत्रों की समृद्ध विविधता को दर्शाती है। राजनीतिक दल — जनमत संगठित करते हैं — चुनाव लड़ते हैं (अभियान की योजना बनाते और घोषणापत्र तैयार करते हैं) — जीतने वाला दल सरकार बनाता है और नीतियां तैयार व लागू करता है, जबकि विपक्षी दल जवाबदेही सुनिश्चित करता है और बहसों/समितियों में भागीदारी करता है।
दल-बदल (Defection):
क्या कोई व्यक्ति जब चाहे एक दल छोड़कर दूसरे में शामिल हो सकता है? हां, हो सकता है। लेकिन एक बार जब कोई व्यक्ति किसी दल के चुनाव चिह्न पर निर्वाचित हो जाता है, तो उस दल को छोड़ना ‘दल-बदल (Defection)’ माना जाता है। दल-बदल का अर्थ है उस राजनीतिक दल को छोड़ना या बदलना जिसके बैनर तले उम्मीदवार निर्वाचित हुआ था — इसमें किसी अन्य दल में शामिल होना, या विशेष रूप से विधायिका में मतदान जैसे मामलों में दल के निर्णयों से स्वतंत्र होकर कार्य करना शामिल हो सकता है। दल अनुशासन और राजनीतिक स्थिरता के संदर्भ में देखा जाए तो ऐसे कार्यों को ‘राजनीतिक अवसरवाद (political opportunism)’ माना जाता है। दूसरी ओर, दल-बदल को अंतरात्मा (conscience) कायम रखने या बदलती जनअपेक्षाओं के प्रति प्रतिक्रिया देने के तरीके के रूप में भी देखा जा सकता है।
दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law): भारत में यह कानून 1985 में 52वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से पारित हुआ था। इस कानून का उद्देश्य दल-बदल को रोककर निर्वाचित सरकार को स्थिरता प्रदान करना है। इस कानून के अनुसार, यदि संसद या किसी राज्य विधानसभा का कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी दलीय सदस्यता छोड़ देता है, या दल के निर्देश (व्हिप — whip) के विरुद्ध मतदान करता है, तो उसे संबंधित सदन से अयोग्य घोषित किया जा सकता है। ऐसे मामलों में क्या किया जाना है, इसका निर्णय सदन के अध्यक्ष (Speaker) या सभापति (Chairman) करते हैं।
राष्ट्रीय और राज्य दल की मान्यता के मानदंड (Criteria for Recognition):
| राष्ट्रीय दल की मान्यता के लिए मानदंड (इनमें से कोई एक शर्त पूरी होनी चाहिए) | राज्य दल की मान्यता के लिए मानदंड (इनमें से कोई एक शर्त पूरी होनी चाहिए) |
| चार या अधिक राज्यों में लोकसभा या विधानसभा के आम चुनाव में डाले गए वैध मतों का कम-से-कम 6% प्राप्त करना, और साथ ही एक या अधिक राज्यों से लोकसभा की चार सीटें जीतना। | संबंधित राज्य की विधानसभा के आम चुनाव में डाले गए वैध मतों का कम-से-कम 6% प्राप्त करना, और साथ ही उस राज्य की विधानसभा की कम-से-कम दो सीटें जीतना। |
| लोकसभा की कम-से-कम 2% सीटें जीतना, जिनके उम्मीदवार कम-से-कम तीन राज्यों से निर्वाचित हुए हों। | संबंधित राज्य से लोकसभा के आम चुनाव में डाले गए वैध मतों का कम-से-कम 6% प्राप्त करना, और साथ ही उस राज्य से लोकसभा की कम-से-कम एक सीट जीतना। |
| कम-से-कम चार राज्यों में राज्य दल के रूप में मान्यता प्राप्त होना। | राज्य की विधानसभा के आम चुनाव में कम-से-कम 3% सीटें या विधानसभा की कम-से-कम तीन सीटें (जो भी अधिक हो) जीतना। |
| संबंधित राज्य से लोकसभा के आम चुनाव में राज्य को आवंटित प्रत्येक 25 सीटों (या उसके किसी भाग) पर कम-से-कम 1 सीट जीतना। | |
| राज्य में लोकसभा या विधानसभा के आम चुनाव में डाले गए वैध मतों का कम-से-कम 8% प्राप्त करना। |
पंजीकृत-अमान्यता प्राप्त राजनीतिक दल (Registered Unrecognised Political Parties — RUPP): वे दल जिन्होंने विधानसभा या आम चुनावों में पर्याप्त प्रतिशत मत प्राप्त नहीं किए हैं, अथवा जिन्होंने पंजीकरण के बाद से कभी चुनाव ही नहीं लड़ा है, उन्हें RUPP कहा जाता है।
1967 का वर्ष भारत में एकल-दल प्रभुत्व वाले चुनावों के युग का अंत और गठबंधन (alliance) राजनीति के युग की शुरुआत माना जाता है। 1977 में राष्ट्रीय आपातकाल (1975-1977) की पृष्ठभूमि में विभिन्न राजनीतिक दलों ने मिलकर जनता पार्टी के रूप में गठबंधन बनाया, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर पहली गठबंधन सरकार (जनता सरकार) बनाई। 1990 के दशक के अंत से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के नेतृत्व वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) — जिसका 2023 में विघटन होकर पुनर्गठन ‘भारतीय राष्ट्रीय विकासशील समावेशी गठबंधन’ के रूप में हुआ — भारतीय चुनावों में प्रमुख राजनीतिक गठबंधन रहे हैं।
भारत में 96.8 करोड़ (2024 में) मतदाताओं, हजारों मतदान केंद्रों और सैकड़ों राजनीतिक दलों के लिए, विविध क्षेत्रों और सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं में फैलकर चुनाव कराना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। चुनावों के समक्ष प्रमुख चुनौतियां हैं:
- गलत सूचना (Misinformation)
- फर्जी खबरें (Fake News)
- धमकी/डराना-धमकाना (Intimidation)
इन चुनौतियों से निपटने के लिए ECI, RPA 1950 और RPA 1951, आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct), इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM), वोटर वेरिफाइबल पेपर ऑडिट ट्रेल (Voter Verifiable Paper Audit Trail — VVPAT), मतदाता जागरूकता अभियानों और अन्य उपायों का सहारा लेता है। निरंतर सतर्कता (vigilance) और सक्रिय नागरिक भागीदारी से चुनाव अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और लोकतंत्र अधिक मजबूत बन सकता है।
मुख्य बिंदु (आगे बढ़ने से पहले)
- मतदान करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार भी है और कर्तव्य भी।
- चुनाव लोकतंत्र की आत्मा हैं क्योंकि वे सरकार के गठन में हर नागरिक को समान आवाज देते हैं।
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और 1951 जैसे कानून, तथा परिसीमन आयोग और ECI जैसी संस्थाएं यह सुनिश्चित करती हैं कि चुनाव की पूरी प्रक्रिया स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे।
- राजनीतिक दल कार्यक्रमों और नीतियों के संदर्भ में विविध दृष्टिकोण प्रस्तुत कर मतदाताओं को सूचित विकल्प चुनने में मदद करके एक बुनियादी भूमिका निभाते हैं।
- स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की अनेक चुनौतियों के बावजूद, ECI विभिन्न स्तरों पर चुनाव निष्पक्ष ढंग से कराने का प्रयास करता है।
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