पाठ – 4
राजनीतिक दल
In this post we have given the detailed notes of class 10 Social Science (Political Science) chapter 4 Political Parties in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (राजनीति विज्ञान) के पाठ 4 राजनीतिक दल के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है। नोट: यह अध्याय पहले पुरानी किताब में अध्याय 6 था, नई किताब (2026-27) में यह अध्याय 4 है।
| Board | CBSE Board, JAC Board, RBSE Board, MPBSE Board, UBSE Board |
| Textbook | NCERT — Democratic Politics-II (Reprint 2026-27) |
| Class | Class 10 |
| Subject | Social Science (Political Science) |
| Chapter no. | Chapter 4 |
| Chapter Name | राजनीतिक दल (Political Parties) |
| Category | Class 10 SST Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 4, राजनीतिक दल
राजनीतिक दल क्यों आवश्यक हैं?
आधुनिक लोकतंत्र में करोड़ों नागरिक होते हैं, जिनमें से हर एक अपनी अलग राय और आवश्यकताएँ रखता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति चुनाव में अलग-अलग उम्मीदवार के रूप में खड़ा हो और सरकार बनाने के बाद स्वतंत्र रूप से निर्णय ले, तो शासन-व्यवस्था चलाना असंभव हो जाएगा। इसी कठिनाई को हल करने के लिए राजनीतिक दलों का जन्म हुआ। राजनीतिक दल समान विचारधारा वाले लोगों को एक मंच पर लाते हैं, ताकि वे संगठित रूप से सत्ता प्राप्त कर सकें और नीतियाँ लागू कर सकें।
राजनीतिक दल (Political Party): राजनीतिक दल लोगों का एक समूह है जो चुनाव लड़ने और सरकार में सत्ता प्राप्त करने के लिए एक साथ आते हैं। ये लोग कुछ नीतियों और कार्यक्रमों पर सहमत होते हैं, जो समाज के लिए अच्छे हैं, तथा सामूहिक रूप से इन नीतियों को जनता के समर्थन से लागू करने का प्रयास करते हैं।
हर राजनीतिक दल तीन घटकों से मिलकर बनता है —
- नेता (Leaders): वे लोग जो दल का नेतृत्व करते हैं और महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं।
- सक्रिय सदस्य (Active Members): वे लोग जो दल के दैनिक कार्यों में भाग लेते हैं, चुनाव प्रचार करते हैं और नीतियाँ बनाने में सहायता करते हैं।
- अनुयायी/समर्थक (Followers): वे लोग जो दल की विचारधारा से सहमत होते हैं और उसे अपना समर्थन देते हैं, यद्यपि वे दल के दैनिक कार्यकलाप में सक्रिय रूप से शामिल नहीं होते।
इस प्रकार एक राजनीतिक दल में मत (opinion) रखने वाले लोगों का एक समूह होता है, जो संगठित होकर चुनाव के माध्यम से सत्ता प्राप्त करने और अपनी नीतियों को लागू करने का प्रयास करते हैं।
राजनीतिक दलों के कार्य (Functions of Political Parties)
लोकतंत्र में राजनीतिक दल अनेक महत्वपूर्ण कार्य करते हैं, जिनके बिना शासन-व्यवस्था चलाना कठिन हो जाता है —
अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में वास्तविक चुनावी मुकाबला राजनीतिक दलों के बीच ही होता है। भारत में दल अपने उम्मीदवार खड़े करते हैं और मतदाता इन्हीं में से चुनाव करते हैं।
2. नीतियाँ और कार्यक्रम प्रस्तुत करना
दल अपनी अलग-अलग नीतियाँ और कार्यक्रम मतदाताओं के सामने रखते हैं, तथा मतदाता उस दल को चुनते हैं जिसकी नीतियाँ और कार्यक्रम उन्हें सबसे अधिक पसंद आते हैं।
3. कानून बनाने में निर्णायक भूमिका
औपचारिक रूप से कानून विधायिका (Legislature) द्वारा बनाए और पारित किए जाते हैं, परंतु चूँकि विधायिका के अधिकांश सदस्य किसी न किसी दल से जुड़े होते हैं, इसलिए दल ही यह तय करते हैं कि कोई कानून पारित होगा या नहीं। दल अपने सदस्यों को निर्देश देते हैं कि वे दल की नीति के अनुसार मतदान करें।
4. सरकार बनाना और चलाना
दल सरकार बनाते हैं और उसे चलाते हैं। बड़े दल जो अकेले बहुमत प्राप्त करते हैं, सरकार बनाते हैं। जब कोई भी दल अकेले बहुमत नहीं पाता, तो कई दल मिलकर गठबंधन (coalition) सरकार बना सकते हैं।
5. विपक्ष की भूमिका निभाना
जो दल चुनाव हार जाते हैं, वे विपक्ष (opposition) की भूमिका निभाते हैं। वे सरकार की नीतियों की आलोचना करते हैं और उसकी गलत नीतियों तथा कुशासन के विरुद्ध जनमत तैयार करते हैं।
6. जनमत को आकार देना
दल जनमत (public opinion) को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे विभिन्न मुद्दों पर आंदोलन चला सकते हैं, दबाव समूहों (pressure groups) और आंदोलनों से जुड़े संगठनों को समर्थन दे सकते हैं।
7. सरकारी तंत्र और कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच
सामान्य नागरिकों के लिए सरकारी अधिकारियों और कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँचना कठिन होता है। स्थानीय दल-नेता ही उनके लिए यह पहुँच सुगम बनाते हैं, इसलिए उन्हें सरकार और नागरिकों के बीच की कड़ी माना जाता है।
क्या लोकतंत्र राजनीतिक दलों के बिना चल सकता है?
यह कल्पना करना कठिन है कि आज कोई लोकतंत्र राजनीतिक दलों के बिना कार्य कर सके। यदि राजनीतिक दल न हों, तो प्रत्येक उम्मीदवार को स्वतंत्र (Independent) रूप से चुनाव लड़ना होगा और किसी को भी जनता के प्रति स्पष्ट रूप से जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकेगा। सरकार बन तो सकती है, परंतु उसकी जवाबदेही स्थायी नहीं होगी। इसीलिए आधुनिक प्रतिनिधि लोकतंत्र (representative democracy) में राजनीतिक दल एक अनिवार्य आवश्यकता बन गए हैं।
लोकतंत्र के लिए कितने दल अच्छे हैं?
विभिन्न लोकतांत्रिक देशों में अलग-अलग प्रकार की दलीय व्यवस्थाएँ (party systems) पाई जाती हैं —
एक-दलीय व्यवस्था (One-Party System)
कुछ देशों में केवल एक ही दल को सरकार बनाने और चलाने की अनुमति होती है। यह लोकतांत्रिक विकल्प नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र में कम-से-कम दो दलों के बीच प्रतिस्पर्धा आवश्यक मानी जाती है। उदाहरण: चीन (China), जहाँ केवल कम्युनिस्ट पार्टी को ही सत्ता में रहने की अनुमति है।
द्विदलीय व्यवस्था (Two-Party System)
कुछ देशों में सत्ता प्रायः दो प्रमुख दलों के बीच ही घूमती रहती है। छोटे दल भी हो सकते हैं, परंतु सरकार आमतौर पर इन दो प्रमुख दलों में से किसी एक की ही बनती है। उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) — रिपब्लिकन (Republican) व डेमोक्रेटिक (Democratic) पार्टी; यूनाइटेड किंगडम (UK) — कंज़र्वेटिव (Conservative) व लेबर (Labour) पार्टी।
बहुदलीय व्यवस्था (Multi-Party System)
यदि कई दल सत्ता के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, तथा सरकार बनाने के लिए दो या अधिक दलों को गठबंधन (alliance/coalition) करना पड़ता है, तो उसे बहुदलीय व्यवस्था कहते हैं। भारत बहुदलीय व्यवस्था का सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय अनेक दल मिलकर गठबंधन/मोर्चा (alliance/front) बनाते हैं, जैसे — राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA — National Democratic Alliance) और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA — United Progressive Alliance)।
बहुदलीय व्यवस्था कभी-कभी अस्थिर और भ्रमित करने वाली प्रतीत होती है, परंतु यह भारत जैसे बड़े और विविधतापूर्ण देश के लिए उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि यह समाज के विभिन्न क्षेत्रीय, सामाजिक और धार्मिक समूहों के हितों को प्रतिनिधित्व देने का अवसर प्रदान करती है।
भारत में राष्ट्रीय और राज्य दल (National and State Parties)
भारत का चुनाव आयोग (Election Commission of India) दलों को राष्ट्रीय दल (National Party) और राज्य दल (State/Regional Party) के रूप में मान्यता देता है, जो कुछ निर्धारित मापदंडों (criteria) पर आधारित होती है — जैसे प्राप्त वोटों का प्रतिशत और जीती गई सीटों की संख्या (राष्ट्रीय स्तर पर या किसी विशेष राज्य में)। इस मान्यता के आधार पर ही दलों को विशेष चुनाव-चिह्न (Election Symbol) दिया जाता है।
भारत के प्रमुख राष्ट्रीय दल
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress — INC)
- भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party — BJP)
- बहुजन समाज पार्टी (Bahujan Samaj Party — BSP)
- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party of India — CPI)
- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (Communist Party of India — Marxist — CPI-M)
- राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (Nationalist Congress Party — NCP) एवं अन्य
राज्य/क्षेत्रीय दल (State/Regional Parties)
ये दल किसी विशेष राज्य में मज़बूत जनाधार रखते हैं और वहाँ की क्षेत्रीय आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। उदाहरण के लिए — बीजू जनता दल (ओडिशा), तेलुगु देशम पार्टी व YSR कांग्रेस (आंध्र प्रदेश), शिवसेना (महाराष्ट्र), द्रविड़ मुनेत्र कषगम्/DMK व AIADMK (तमिलनाडु), अकाली दल (पंजाब), समाजवादी पार्टी व राष्ट्रीय लोक दल (उत्तर प्रदेश) आदि। ऐसे क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन सरकारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
राजनीतिक दलों के समक्ष चुनौतियाँ (Challenges to Political Parties)
यद्यपि राजनीतिक दल लोकतंत्र के लिए अनिवार्य हैं, फिर भी विश्वभर में वे अनेक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं —
1. आंतरिक लोकतंत्र का अभाव (Lack of Internal Democracy)
अधिकांश दलों में सत्ता कुछ ही व्यक्तियों के हाथों में केंद्रित हो जाती है। साधारण सदस्यों को दल की नीतियों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिलती और न ही उन्हें निर्णय लेने में शामिल किया जाता है। परिणामस्वरूप दल के भीतर मनमानी और गुटबाज़ी बढ़ जाती है।
2. वंशवाद (Dynastic Succession)
कई दलों में शीर्ष पदों पर एक ही परिवार के सदस्यों को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे योग्य और समर्पित कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिल पाता।
3. धन और बाहुबल की बढ़ती भूमिका (Money and Muscle Power)
चुनाव जीतने के लिए दल केवल धनी व्यक्तियों या ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देते हैं जो चुनाव खर्च वहन कर सकें अथवा बाहुबल का प्रयोग कर सकें। इससे आम और ईमानदार नागरिकों के लिए चुनाव लड़ना कठिन हो जाता है।
4. राजनीति का अपराधीकरण (Criminalisation of Politics)
आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को भी दल टिकट देते हैं, क्योंकि वे चुनाव जीतने में सक्षम माने जाते हैं। इससे विधायिका में अपराधी छवि के प्रतिनिधि पहुँच जाते हैं, जो लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।
5. मतदाताओं को सार्थक विकल्प न देना
कई बार विभिन्न दलों की नीतियों और कार्यक्रमों में बहुत अंतर नहीं होता, जिससे मतदाताओं को वास्तविक और सार्थक विकल्प (meaningful choice) नहीं मिल पाता।
राजनीतिक दलों में सुधार कैसे किया जा सकता है? (How can Parties be Reformed?)
राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए समय-समय पर अनेक कदम उठाए गए हैं —
1. दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law)
संविधान में संशोधन कर यह प्रावधान किया गया है कि यदि कोई निर्वाचित सदस्य दल बदलता है (एक दल छोड़कर दूसरे दल में शामिल होता है), तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है। इससे बार-बार दल बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगती है।
2. शपथ-पत्र के माध्यम से जानकारी अनिवार्य
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर अब प्रत्येक उम्मीदवार को चुनाव आयोग के समक्ष एक कानूनी शपथ-पत्र (affidavit) दाखिल करना अनिवार्य है, जिसमें उसे निम्न जानकारी देनी होती है —
- उम्मीदवार के विरुद्ध लंबित आपराधिक मामले (यदि कोई हों)
- उम्मीदवार तथा उसके परिवार की संपत्ति और देनदारियाँ (assets and liabilities)
- उम्मीदवार की शैक्षणिक योग्यता (educational qualification)
3. महिलाओं के लिए न्यूनतम स्थान
कुछ कानूनों के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि दल चुनाव में महिला उम्मीदवारों को न्यूनतम संख्या में टिकट दें, ताकि विधायिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ सके।
4. दल की आंतरिक कार्यप्रणाली और फंडिंग का विनियमन
चुनाव आयोग ने यह अनिवार्य किया है कि दल कम-से-कम प्रत्येक कुछ वर्षों में अपना संगठनात्मक चुनाव (organisational election) कराएँ तथा आयकर लाभ (income tax benefits) प्राप्त करने के लिए अपनी आय का लेखा-जोखा (accounts of income) प्रस्तुत करें।
5. आगे के रास्ते (Ways Forward)
- चुनावों का सार्वजनिक वित्त-पोषण (Public Funding of Elections) — सरकार द्वारा दलों को चुनाव लड़ने के लिए धन/संसाधन उपलब्ध कराना, ताकि निजी और अवैध धन पर निर्भरता कम हो।
- दल की आंतरिक कार्यप्रणाली को नियमित करने के लिए विधिक प्रावधान (Legal Regulation) — जिससे प्रत्येक दल में आंतरिक लोकतंत्र सुनिश्चित हो सके।
- यह कानूनी रूप से अनिवार्य करना कि प्रत्येक दल महिलाओं को एक निश्चित न्यूनतम संख्या में टिकट अवश्य दे।
- नागरिकों, दबाव समूहों तथा जागरूक मीडिया द्वारा दलों की गतिविधियों पर निरंतर निगरानी।
अंततः यह ध्यान रखना आवश्यक है कि दलों में सुधार केवल कानून बनाने से नहीं होगा — इसके लिए दलों में शामिल लोगों, कार्यकर्ताओं और नेताओं की इच्छाशक्ति (willingness) भी उतनी ही आवश्यक है।
मुख्य बिंदु (Key Points to Remember)
- राजनीतिक दल लोगों का ऐसा समूह है जो चुनाव लड़ने और सत्ता प्राप्त करने के लिए एक साथ आता है।
- प्रत्येक दल के तीन घटक होते हैं — नेता, सक्रिय सदस्य और अनुयायी।
- दल चुनाव लड़ते हैं, नीतियाँ बनाते हैं, सरकार चलाते हैं या विपक्ष की भूमिका निभाते हैं, जनमत को आकार देते हैं तथा नागरिकों को सरकारी तंत्र से जोड़ते हैं।
- लोकतंत्र में दलों के बिना शासन-व्यवस्था चलाना असंभव-सा है।
- एक-दलीय व्यवस्था अलोकतांत्रिक मानी जाती है (उदाहरण — चीन); USA व UK में द्विदलीय व्यवस्था है; भारत में बहुदलीय व्यवस्था है, जहाँ NDA व UPA जैसे गठबंधन बनते हैं।
- चुनाव आयोग दलों को राष्ट्रीय और राज्य दलों के रूप में मान्यता देता है।
- दलों के समक्ष चुनौतियाँ — आंतरिक लोकतंत्र का अभाव, वंशवाद, धन-बल का प्रभाव, राजनीति का अपराधीकरण, तथा मतदाताओं को सार्थक विकल्प न मिलना।
- सुधार के उपाय — दल-बदल विरोधी कानून, शपथ-पत्र में आपराधिक मामलों/संपत्ति/शिक्षा की जानकारी अनिवार्य, महिलाओं के लिए न्यूनतम टिकट, चुनावों का सार्वजनिक वित्त-पोषण, तथा दलों की आंतरिक कार्यप्रणाली का विनियमन।
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