पाठ – 3
क्रियाशील ऊतक
In this post we have given the detailed notes of class 9 Science chapter 3 Tissues in Action in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के विज्ञान के पाठ 3 क्रियाशील ऊतक के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Exploration / अन्वेषण (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Science |
| Chapter no. | Chapter 3 |
| Chapter Name | क्रियाशील ऊतक (Tissues in Action) |
| Category | Class 9 Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 3, क्रियाशील ऊतक
ऊतक (Tissue) क्या है?
ऊतक (Tissue): समान संरचना वाली कोशिकाओं का वह समूह जो मिलकर एक विशिष्ट कार्य (function) को संपन्न करता है, ऊतक कहलाता है। एककोशिकीय जीवों (जैसे अमीबा) में एक ही कोशिका जीवन के सभी कार्य करती है, जबकि बहुकोशिकीय जीवों (जैसे पादप और जंतु) में विभिन्न समूहों की कोशिकाएँ अलग-अलग कार्य करती हैं।
बहुकोशिकीय जीवों में संगठन का एक पदानुक्रम (hierarchy) होता है —
- समान प्रकार की कोशिकाएँ मिलकर ऊतक (tissue) बनाती हैं।
- एक से अधिक प्रकार के ऊतक मिलकर अंग (organ) बनाते हैं।
- विभिन्न अंग मिलकर अंग तंत्र (organ system) बनाते हैं।
- अंग तंत्रों से मिलकर एक जीव (organism) बनता है।
विभिन्न प्रकार के ऊतकों के निर्माण से श्रम विभाजन (division of labour) होता है, जिससे शरीर की कार्यक्षमता बढ़ती है। उदाहरण के लिए — जंतुओं में पेशीय ऊतक गति को संभव बनाते हैं और तंत्रिका ऊतक संदेश पहुँचाते हैं। पादपों में जाइलम जल और खनिजों का, तथा फ्लोएम भोजन का परिवहन करता है।
पादप और जंतु ऊतक भिन्न क्यों हैं?
- अधिकांश पादप एक ही स्थान पर स्थिर रहते हैं, जबकि जंतु गतिशील होते हैं। पादप कोशिकाओं में कोशिका भित्ति होती है जो दृढ़ता व अवलंब (सहारा) देती है। दृढ़ कोशिका भित्ति के अभाव में जंतु कोशिकाएँ सरलता से आकार बदल सकती हैं, जिससे उनका शरीर गति के लिए उपयुक्त बनता है।
- पोषण की विधि भी भिन्न है — जंतुओं में पाचन तंत्र संबंधी ऊतक होते हैं, जबकि पादपों में प्रकाश-संश्लेषण के लिए विशेष ऊतक होते हैं।
- पादपों और जंतुओं में भोजन और जल के परिवहन के लिए भी अलग-अलग ऊतक होते हैं तथा वृद्धि के पैटर्न भी भिन्न होते हैं, क्योंकि वृद्धि के लिए उत्तरदायी ऊतकों की संरचना अलग होती है।
पादपों में वृद्धि के लिए ऊतक
पादप मुख्यतः तीन प्रकार से वृद्धि करते हैं —
- लंबाई में वृद्धि (तने की ऊँचाई और जड़ों की गहराई)
- तने की मोटाई (परिधि) में वृद्धि
- शाखाओं को काटने या जंतुओं द्वारा चरने के पश्चात पुनः वृद्धि
इस वृद्धि के लिए सक्रिय रूप से विभाजित होने वाली कोशिकाओं की आवश्यकता होती है, जो मिलकर एक विशेष ऊतक बनाती हैं जिसे विभज्योतक (Meristematic) ऊतक कहा जाता है।
विभज्योतकी ऊतक की विशेषताएँ:
- कोशिकाएँ छोटी होती हैं, कोशिका भित्ति पतली होती है।
- केंद्रक बड़ा और सुस्पष्ट होता है, कोशिकाद्रव्य सघन होता है जिसमें अनेक कोशिकांग होते हैं।
- रसधानियाँ (vacuoles) सामान्यतः अनुपस्थित होती हैं।
- कोशिकाएँ कम या बिना अंतःकोशिकीय अंतराल के संहत रूप से (tightly) व्यवस्थित होती हैं।
- इन विशेषताओं के कारण इनमें निरंतर और तीव्रता से कोशिका विभाजन होता है।
विभज्योतकी ऊतक तीन प्रकार के होते हैं — शीर्षस्थ (apical), पार्श्व (lateral) और अंतर्वेशी (intercalary) विभज्योतक।
1. शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical Meristem):
प्याज के शल्क कंद (bulb) की जड़ों की वृद्धि से संबंधित एक प्रयोग में देखा गया कि जब जड़ के मूलाग्र (सिरे) को काट दिया जाता है तो जड़ की वृद्धि रुक जाती है, जबकि बिना काटी गई जड़ें बढ़ती रहती हैं। इससे सिद्ध होता है कि जड़ें केवल अपने मूलाग्रों से वृद्धि करती हैं, क्योंकि मूलाग्रों में सक्रिय रूप से विभाजित होने वाली कोशिकाएँ (जिनमें समसूत्री विभाजन/mitosis होता है) पाई जाती हैं।
- जड़ और प्ररोह (शाखा) के अग्रभाग (सिरों) पर स्थित वृद्धि क्षेत्रों को शीर्षस्थ विभज्योतक (apical meristem) कहते हैं।
- यह पौधों की लंबाई में वृद्धि के लिए उत्तरदायी है (जड़ शीर्षस्थ विभज्योतक व प्ररोह शीर्षस्थ विभज्योतक)।
2. पार्श्व विभज्योतक (Lateral Meristem):
द्विबीजपत्री (dicot) पौधों के तने न केवल लंबाई में, बल्कि व्यास या परिधि में भी वृद्धि करते हैं। किसी पेड़ के कटे हुए तने पर कई वलयाकार पैटर्न (वार्षिक वृद्धि वलय / annual growth rings) दिखते हैं — कुछ चौड़े, कुछ संकरे, जो अनुकूल या प्रतिकूल वृद्धि परिस्थितियों को दर्शाते हैं। इन वलयों को गिनकर वृक्ष की आयु का अनुमान लगाया जा सकता है।
- तने में एक वलय के रूप में व्यवस्थित सक्रिय रूप से विभाजित होने वाली कोशिकाओं को पार्श्व विभज्योतक (lateral meristem) कहते हैं।
- ये कोशिकाएँ विभाजित होकर संकेंद्री रूप (concentric manner) से भीतर और बाहर की ओर नई कोशिकाएँ बनाती हैं, जिससे तने के व्यास/परिधि में वृद्धि होती है।
3. अंतर्वेशी विभज्योतक (Intercalary Meristem):
यदि किसी युवा तने का अग्रभाग काट दिया जाए तो तना लंबाई में वृद्धि करना बंद कर देता है, किंतु तने की पर्वसंधि (node) से नई शाखाएँ निकलती हैं। जैसे उद्यान की बाड़ की छँटाई करने पर या घास काटने/चरने के पश्चात भी घास पुनः उग जाती है।
- पर्वसंधि (node): तने का वह बिंदु जहाँ से शाखाएँ या पत्तियाँ निकलती हैं।
- पर्व (internode): तने की दो पर्वसंधियों के मध्य का भाग।
- अंतर्वेशी विभज्योतक पर्व के आधार पर या पर्वसंधि के ठीक ऊपर स्थित होता है और घास जैसे पौधों को कटने के बाद पुनरुद्भवन (regeneration) में सहायता करता है।
| विभज्योतक का प्रकार | स्थान | कार्य |
| शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical) | जड़ और तने (प्ररोह) के अग्रभाग/सिरों पर | लंबाई में वृद्धि |
| पार्श्व विभज्योतक (Lateral) | तने की परिधि के अनुदिश (वलय के रूप में) | परिधि/मोटाई (girth) में वृद्धि |
| अंतर्वेशी विभज्योतक (Intercalary) | पर्व के आधार पर या पर्वसंधि के ठीक ऊपर | कटने/चरने के बाद पुनः वृद्धि |
विभेदन (Differentiation):
निरंतर कोशिका विभाजन के कारण विभज्योतकी ऊतक पादप काया में नई कोशिकाएँ जोड़ता है। नई बनी कुछ कोशिकाएँ विभज्योतक बनी रहती हैं, जबकि अन्य कोशिकाओं में विभाजन की क्षमता समाप्त हो जाती है। ऐसी कोशिकाओं की संरचना और कार्यों में परिवर्तन होता है और वे अवलंब, परिवहन या भंडारण जैसे विशिष्ट कार्यों के लिए विशेषीकृत होकर स्थायी ऊतक (permanent tissue) में बदल जाती हैं। यह प्रक्रिया विभेदन (differentiation) कहलाती है।
स्थायी ऊतक (Permanent Tissue)
सूरजमुखी के तने की अनुप्रस्थ काट (T.S.) में विभिन्न प्रकार की कोशिकाएँ और ऊतक दिखते हैं और प्रत्येक ऊतक एक विशिष्ट कार्य करने के लिए विशेषीकृत होता है — ये स्थायी ऊतक कहलाते हैं। स्थायी ऊतक दो प्रकार के होते हैं —
- सरल स्थायी ऊतक (Simple permanent tissue): केवल एक प्रकार की कोशिकाओं से बने — मृदूतक, श्लेषोतक और दृढ़ोतक।
- जटिल स्थायी ऊतक (Complex permanent tissue): एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से बने — जाइलम और फ्लोएम।
(i) सुरक्षात्मक ऊतक — बाह्यत्वचा (Epidermis):
बाह्यत्वचा (Epidermis): पादप काया की सबसे बाहरी परत, जो संहत, चपटी और आयताकार कोशिकाओं की एकल परत से बनी होती है। यह पौधे को यांत्रिक क्षति, जल की हानि, हानिकारक सूक्ष्मजीवों और चरम पर्यावरणीय परिस्थितियों से सुरक्षा देती है।
- ये कोशिकाएँ क्यूटिन नामक मोमी परत से ढकी होती हैं जिसे उपत्वचा (cuticle) कहते हैं। अत्यंत शुष्क पर्यावास वाले पौधों में यह परत मोटी होती है, जिससे वाष्पोत्सर्जन द्वारा जल हानि कम होती है।
- मूलरोम (root hair): जड़ों की बाह्यत्वचा से निकलने वाले बाल जैसे उभार, जो मृदा से जल और खनिजों के अवशोषण के लिए सतह क्षेत्रफल बढ़ाते हैं।
- रंध्र (stomata): पत्तियों की बाह्यत्वचा में छिद्र, जो गैसीय विनिमय के साथ-साथ वाष्पोत्सर्जन (transpiration) — अर्थात रंध्रों के माध्यम से जल का वाष्पन — में सहायता करते हैं। वाष्पोत्सर्जन जाइलम में एक वाष्पोत्सर्जन अभिकर्ष (transpiration pull) उत्पन्न कर जल परिवहन में सहायता करता है और पादप शरीर से अपशिष्ट पदार्थों के निष्कासन में भी सहायक है।
(ii) सहायक ऊतक / सरल स्थायी ऊतक:
पादप को सीधा रखना, टहनी का मुड़ना, बीजों के आवरण का कठोर होना जैसे कार्य सहायक ऊतकों द्वारा किए जाते हैं। सहायक ऊतक तीन प्रकार के होते हैं —
क. मृदूतक (Parenchyma):
- पतली भित्तियों वाली सजीव कोशिकाएँ, जो विरल रूप से (loosely) व्यवस्थित होती हैं तथा इनमें अंतराकोशिकीय अवकाश (intercellular spaces) होते हैं।
- मुख्यतः भोजन का भंडारण करता है, साथ ही पौधों के हरित भागों में प्रकाश-संश्लेषण भी करता है।
- जलीय पादपों में विशेषीकृत मृदूतक वायु गुहिकाएँ (air spaces) बनाता है, जो उन्हें तैरने में सहायता करती हैं।
ख. श्लेषोतक (Collenchyma):
- सजीव कोशिकाओं से बना, जिनके कोने पेक्टिन (रबर जैसा लचीलापन देने वाला रसायन) के जमाव के कारण असमान रूप से मोटे (स्थूलित) होते हैं।
- पौधे को सहारा और लचीलापन प्रदान करता है, जिससे तने और प्रतान (tendril) जैसे भाग बिना टूटे झुक सकते हैं।
ग. दृढ़ोतक (Sclerenchyma):
- लिग्निन के जमाव के कारण मोटी भित्ति वाली कोशिकाएँ, जो कठोर और सुदृढ़ (काष्ठीय संरचनाएँ बनाने वाली) होती हैं। इनमें से अधिकांश कोशिकाएँ मृत होती हैं।
- तनों, पर्ण शिराओं (leaf veins) तथा बीजों और गिरियों के कठोर आवरणों, जैसे नारियल के रेशे और अखरोट के छिलके में पाया जाता है।
| सरल स्थायी ऊतक | कोशिकाएँ | विशेषता | कार्य |
| मृदूतक (Parenchyma) | सजीव, पतली भित्ति | विरल रूप से व्यवस्थित, अंतराकोशिकीय अवकाश | भोजन भंडारण, प्रकाश-संश्लेषण, जलीय पौधों में उत्प्लावन |
| श्लेषोतक (Collenchyma) | सजीव, कोनों पर पेक्टिन-मोटी भित्ति | असमान रूप से मोटी भित्ति | सहारा व लचीलापन |
| दृढ़ोतक (Sclerenchyma) | मृत, लिग्निन-मोटी भित्ति | कठोर व सुदृढ़ | यांत्रिक दृढ़ता/मजबूती |
(iii) संवहन ऊतक / जटिल स्थायी ऊतक:
जाइलम (xylem) और फ्लोएम (phloem) को साथ में जटिल स्थायी ऊतक कहा जाता है, क्योंकि ये विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बनते हैं जो साथ मिलकर कार्य करती हैं।
जाइलम (Xylem):
- जड़ों से जल और खनिजों को पौधे के अन्य भागों तक परिवहन करता है, तथा पौधे को दृढ़ता भी प्रदान करता है।
- इसके घटक हैं — वाहिनिकाएँ (tracheids), वाहिकाएँ (vessels), जाइलम मृदूतक और जाइलम तंतु (xylem fibres)।
- वाहिनिकाएँ और वाहिकाएँ नलिकाकार व मोटी भित्ति वाली होती हैं। जाइलम मृदूतक ही जाइलम का एकमात्र जीवित घटक है, जबकि वाहिनिकाएँ, वाहिकाएँ और जाइलम तंतु प्रायः दृढ़ोतकीय (मृत) होते हैं।
फ्लोएम (Phloem):
- जाइलम के विपरीत, फ्लोएम अधिकांशतः सजीव कोशिकाओं से बना होता है।
- इसके घटक हैं — चालनी नलिकाएँ (sieve tubes), सहचर कोशिकाएँ (companion cells), फ्लोएम मृदूतक और फ्लोएम तंतु।
- लंबी नलिकाकार कोशिकाएँ छिद्रित भित्तियों द्वारा जुड़कर चालनी नलिकाएँ बनाती हैं, जो पत्तियों से पौधे के अन्य भागों तक भोजन का परिवहन करती हैं।
- सहचर कोशिकाएँ विशेषीकृत मृदूतक कोशिकाएँ हैं, जिनका मुख्य कार्य चालनी नलिकाओं में शर्करा के भारण और अभारण (loading-unloading) का अनुवीक्षण करना है।
- फ्लोएम मृदूतक खाद्य पदार्थ, राल, टैनिन और रबड़क्षीर (latex) संग्रहीत करता है। फ्लोएम तंतु (प्रायः दृढ़ोतकीय) चालनी नलिकाओं को सहारा और दृढ़ता प्रदान करते हैं।
| जटिल स्थायी ऊतक | घटक कोशिकाएँ | प्रकृति | कार्य |
| जाइलम (Xylem) | वाहिनिका, वाहिका, जाइलम मृदूतक, जाइलम तंतु | अधिकांशतः मृत (मृदूतक को छोड़कर) | जल व खनिजों का परिवहन, दृढ़ता |
| फ्लोएम (Phloem) | चालनी नलिका, सहचर कोशिका, फ्लोएम मृदूतक, फ्लोएम तंतु | अधिकांशतः सजीव | भोजन (खाद्य पदार्थ) का परिवहन |
पादप ऊतक तंत्र (Tissue Systems in Plants):
पादप शरीर में ऊतक अकेले कार्य नहीं करते; ये मिलकर बड़े समूहों — ऊतक तंत्रों — में संगठित होते हैं। पादप ऊतक तीन ऊतक तंत्रों में संगठित होते हैं —
- त्वचीय ऊतक तंत्र (Dermal tissue system): पौधे का बाहरी आवरण बनाता है, आंतरिक भागों की रक्षा करता है और जल-हानि को कम करता है।
- भरण ऊतक तंत्र (Ground tissue system): त्वचीय और संवहन ऊतकों के मध्य पौधे की मुख्य काया बनाता है; इसमें मृदूतक, श्लेषोतक और दृढ़ोतक शामिल हैं।
- संवहन ऊतक तंत्र (Vascular tissue system): इसमें संवहन ऊतक — जाइलम और फ्लोएम — शामिल हैं।
जंतु ऊतक (Animal Tissues)
पौधों के समान, जंतु कोशिकाएँ भी एक साथ समूहित होकर विशेषीकृत होती हैं और विभिन्न कार्य करती हैं। जंतु ऊतक मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं — उपकला ऊतक, संयोजी ऊतक, पेशीय ऊतक और तंत्रिका ऊतक।
उपकला ऊतक (Epithelial Tissue) — संरचना और प्रकार्य:
उपकला ऊतक: शरीर के बाहरी आवरण (त्वचा) का निर्माण करता है और आंतरिक अंगों, जैसे मुँह, फेफड़ों, रक्त वाहिकाओं और आँत का आस्तर (lining) भी बनाता है। यह बहुत कम अंतराल वाली संहत रूप से व्यवस्थित कोशिकाओं से बना होता है। यह संरचना रोगाणुओं के प्रवेश को रोकती है, जल-हानि कम करती है और पदार्थों के अवशोषण, स्रवण व गति में सहायता करती है।
| प्रकार्य (Function) | संरचना (Structure) | शरीर में स्थान (Location) |
| विनिमय — द्रवों और गैसों के द्रुत विसरण में सहायता | पतली, चपटी कोशिकाओं की एकल परत | रक्त वाहिकाओं और फेफड़ों के ऊतकों का आस्तर |
| सुरक्षा — अंतर्निहित ऊतकों को यांत्रिक क्षति, घर्षण और सूक्ष्मजीवों के प्रवेश से बचाना | कोशिकाओं की अनेक परतें; बाहरी कोशिकाएँ चपटी और संहत | त्वचा, मुँह और ग्रासनली |
| स्रवण — श्लेष्म, एंजाइम, हार्मोन, स्वेद, लार का उत्पादन व स्रवण | पदार्थों के उत्पादन व मोचन के लिए विशेषीकृत, घनाकार या स्तंभाकार कोशिकाएँ | लार ग्रंथियाँ, स्वेद ग्रंथियाँ और आमाशय का आस्तर |
| संवेदी प्रकार्य — गंध, स्वाद, ध्वनि और संतुलन | रोम जैसे पक्ष्माभ (cilia) वाली विशेषीकृत ग्राही कोशिकाएँ | नासाछिद्र, स्वाद-कलिकाएँ और आंतर कर्ण |
| अवशोषण — पोषक तत्वों, जल आदि का प्रभावी उद्ग्रहण | लंबी, स्तंभ जैसी कोशिकाओं की एकल परत, प्रायः रोम जैसी संरचना सहित | छोटी आँत का आस्तर |
संयोजी ऊतक (Connective Tissue):
संयोजी ऊतक: वह ऊतक जो अन्य ऊतकों को जोड़ता और सहारा देता है। रक्त और अस्थियाँ दोनों संयोजी ऊतक हैं, परंतु ये संगतता में भिन्न होते हैं — रक्त तरल है जबकि अस्थि कठोर है। यह अंतर आधात्री (matrix) के कारण है — रक्त में यह जलीय, मृदु और जेली जैसी होती है, जबकि अस्थियों में कठोर, ठोस और दृढ़ होती है।
रक्त (Blood):
- रक्त का प्लाज्मा (55%) तरल भाग है और निर्मित तत्व (45%) में RBC, WBC व प्लेटलेट्स शामिल हैं।
- रक्त का लाल रंग हीमोग्लोबिन (लौह-समृद्ध प्रोटीन) के कारण होता है, जो लाल रक्त कोशिकाओं (RBC) में पाया जाता है। RBC लगभग 4 महीने जीवित रहती हैं और नियमित रूप से प्रतिस्थापित होती हैं।
- बिंबाणु/प्लेटलेट्स (Platelets): चोट के स्थान पर रक्त का थक्का (clot) बनाने में सहायता करते हैं।
- श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBC): संक्रमित क्षेत्रों में एकत्र होकर मवाद (pus) व शोथ (सूजन) उत्पन्न करती हैं।
अस्थि (Bone), उपास्थि (Cartilage), कंडरा (Tendon), स्नायु (Ligament):
| क्रिया | अनुभव | प्रकार्य | पहचाना गया ऊतक |
| कोहनी को स्पर्श करना | कठोर और दृढ़ संरचना | सुदृढ़ता, अवलंब और सुरक्षा | अस्थि (Bone) |
| कान/नाक को दबाना | नरम, लचीली संरचना जो पुनः आकार प्राप्त कर लेती है | लचीलापन देती है, अस्थियों के सिरों को गद्दीदार (आघात-अवशोषण हेतु) बनाती है | उपास्थि (Cartilage) |
| अग्रबाहु स्पर्श कर अँगुलियाँ हिलाना | दूर होने पर भी अग्रबाहु में गति का अनुभव | माँसपेशी को अस्थि से जोड़ती है, गति संभव बनाती है | कंडरा (Tendon) |
| घुटने की सीमा तक पैर उठाना | संधि एक सीमा से आगे नहीं जाती | अस्थि को अस्थि से जोड़ता है, स्थिरता देता है, गति सीमित कर विस्थापन रोकता है | स्नायु (Ligament) |
- अस्थियों में कैल्सियम और फॉस्फोरस यौगिकों से युक्त एक दृढ़ आधात्री होती है, जो दृढ़ता और अनम्यता (rigidity) देती है।
- उपास्थि में मृदु, जेली जैसी आधात्री होती है, जो लचीलापन और गद्दीदार प्रभाव (cushioning) देती है।
- कंडरा (Tendon) माँसपेशियों को अस्थियों से जोड़ती है, जबकि स्नायु (Ligament) अस्थियों को अस्थियों से जोड़ता है और अत्यधिक गति को नियंत्रित करता है।
पेशीय ऊतक (Muscular Tissue):
कुछ गतियाँ हमारे सचेत नियंत्रण में होती हैं — जैसे दौड़ना, लिखना — इन्हें ऐच्छिक गतियाँ (voluntary movements) कहते हैं। कुछ गतियाँ सचेत नियंत्रण के बिना स्वचालित रूप से होती हैं — जैसे आँत में भोजन की गति, हृदय स्पंदन — इन्हें अनैच्छिक गतियाँ (involuntary movements) कहते हैं।
| पेशी का प्रकार | कोशिकाओं की संरचना | स्थान | गति का प्रकार |
| कंकाल पेशी (Skeletal muscle) | लंबे, बेलनाकार, अशाखित, बहुकेंद्रकी (बहु-नाभिकीय) और रेखित (striated) पेशी तंतु | कंकाल से जुड़ी | ऐच्छिक (voluntary) |
| चिकनी पेशी (Smooth muscle) | तर्कु रूप (spindle-shaped), एकल केंद्रक, बिना धारियों (unstriated) के | आमाशय और आँत जैसे अंगों में | अनैच्छिक, धीमी व सतत गति (जैसे पाचन) |
| हृद पेशी (Cardiac muscle) | बेलनाकार, शाखित, एकल केंद्रक, हल्की धारियाँ | केवल हृदय में | अनैच्छिक, अथक व लयबद्ध (rhythmic) — जीवनपर्यन्त बिना थके |
तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue):
तंत्रिका ऊतक शरीर का नियंत्रण और समन्वय (control and coordination) संजाल (network) बनाता है। मस्तिष्क नियंत्रण केंद्र के रूप में कार्य करता है, जो पूर्ण शरीर में क्रियाओं, स्मृति और अनुक्रियाओं का समन्वय करता है। ऐच्छिक और अनैच्छिक दोनों माँसपेशियाँ तंत्रिका ऊतक से अनुदेश (निर्देश) प्राप्त करके ही कार्य करती हैं।
न्यूरॉन (Neuron): तंत्रिका ऊतक की कोशिकाओं को न्यूरॉन या तंत्रिका कोशिका कहते हैं, जो संदेशों को ग्रहण करने, संसाधित करने और प्रेषित करने के लिए विशेषीकृत होती हैं। प्रत्येक न्यूरॉन के तीन मुख्य भाग होते हैं —
- कोशिका-काय (Cell body): जिसमें केंद्रक होता है और यह कोशिकीय गतिविधियों को नियंत्रित करता है।
- द्रुमिका (Dendrites): जो अन्य न्यूरॉन से संकेत/सिग्नल प्राप्त करती हैं।
- तंत्रिकाक्ष/एक्सॉन (Axon): एक लंबा तंतु जो कोशिका से संदेश ले जाता है और एक्सॉन टर्मिनल पर समाप्त होता है, जो अन्य कोशिकाओं तक संदेश पहुँचाता है।
| जंतु ऊतक | मुख्य कार्य | उदाहरण/उप-प्रकार |
| उपकला ऊतक (Epithelial) | बाहरी आवरण, सुरक्षा, विनिमय, स्रवण, संवेदन, अवशोषण | चपटी, स्तरित, स्रावी, संवेदी, स्तंभाकार उपकला |
| संयोजी ऊतक (Connective) | जोड़ना और सहारा देना | रक्त, अस्थि, उपास्थि, कंडरा, स्नायु |
| पेशीय ऊतक (Muscular) | गति उत्पन्न करना | कंकाल, चिकनी, हृद पेशी |
| तंत्रिका ऊतक (Nervous) | नियंत्रण व समन्वय, संकेतों का संचरण | न्यूरॉन |
पेशी-कंकाल तंत्र (Musculoskeletal System)
पेशी-कंकाल तंत्र अस्थियों, पेशियों, संधियों, उपास्थियों, कंडराओं और स्नायुओं से मिलकर बना होता है। यह तंत्र हमें सीधे खड़े होने, गति करने, मुद्रा बनाए रखने और कोमल अंगों की रक्षा करने में सहायता करता है, और यह तंत्रिका तंत्र के नियंत्रण में कार्य करता है।
- माँसपेशियाँ गति उत्पन्न करने के लिए अस्थियों को खींचती हैं। वे कंडरा नामक सुदृढ़, लचीली पट्टियों द्वारा अस्थियों से जुड़ी होती हैं।
- जब कोई माँसपेशी संकुचित होती है, तो कंडरा इस बल को अस्थि तक पहुँचाती है, जिससे संधि पर गति होती है।
- औसतन वयस्क मानव कंकाल शरीर के भार का लगभग 12–15 प्रतिशत होता है (आयु, लिंग और शारीरिक संरचना के अनुसार भिन्न हो सकता है)।
संधियों के प्रकार (Types of Joints)
संधि (Joint): दो या अधिक अस्थियों के बीच का जोड़, जो गति को संभव बनाती है, किंतु स्वयं अस्थियों को गति प्रदान नहीं कर सकती।
1. कंदुक-खल्लिका संधि (Ball and Socket Joint):
ऊपरी भुजा की अस्थि का गोलाकार शीर्ष कंधे की अस्थि के एक उथले गड्ढे में फिट होकर यह संधि बनाता है। कंधा जत्रुकास्थि (collarbone) के साथ मिलकर कंधे की मेखला (shoulder girdle) बनाता है। यह संधि अग्र, पश्च, पार्श्व और गोलाकार (circular) गति संभव बनाती है — जैसे कंधे की संधि।
2. कोर संधि (Hinge Joint):
कोहनी एक दरवाजे के कब्जे (hinge) की तरह केवल एक दिशा में मुड़ती और सीधी होती है। घुटने में भी इसी प्रकार की कोर संधि होती है, जहाँ जानुफलक (kneecap/patella) नामक एक छोटी अस्थि संधि की रक्षा करती है।
3. धुराग्र संधि (Pivot Joint):
खोपड़ी मेरुदंड से एक धुराग्र (pivot) संधि के माध्यम से जुड़ी होती है, जो सिर की ऊपर-नीचे और दाएँ-बाएँ गति को संभव बनाती है (जैसे दरवाजे के डोरनॉब का घूमना)।
4. अचल संधियाँ (Fixed Joints):
खोपड़ी आपस में जुड़ी चपटी अस्थियों का एक कठोर आवरण है जो मस्तिष्क, आँखों और कानों की रक्षा करती है। खोपड़ी की अस्थियाँ अचल (fixed) संधियों से जुड़ी होती हैं, जिसका अर्थ है कि ये अस्थियाँ गति नहीं कर सकतीं, जिससे शरीर के गति करने पर भी मस्तिष्क सुरक्षित रहता है।
| संधि का प्रकार | उदाहरण | संभव गति |
| कंदुक-खल्लिका संधि (Ball and socket) | कंधा | अग्र, पश्च, पार्श्व और गोलाकार गति |
| कोर संधि (Hinge) | कोहनी, घुटना | केवल एक दिशा में मुड़ना/सीधा होना |
| धुराग्र संधि (Pivot) | खोपड़ी व मेरुदंड का जोड़ (गर्दन) | सिर का ऊपर-नीचे व दाएँ-बाएँ घूमना |
| अचल संधि (Fixed) | खोपड़ी की अस्थियाँ | कोई गति नहीं |
कंकाल तंत्र (Skeletal System)
कंकाल तंत्र अस्थियों का एक ऐसा ढाँचा है जो शरीर को दृढ़ता प्रदान करता है और कोमल आंतरिक अंगों की रक्षा करता है। इसमें खोपड़ी (skull), कशेरुक दंड (vertebral column) और पसली पिंजर (rib cage) शामिल हैं।
- कशेरुक दंड / मेरुदंड (Backbone/Spine): खोपड़ी के आधार से निकलने वाला एक लचीला दंड, जो कशेरुका (vertebrae) नामक छोटी अस्थियों की एक श्रृंखला से बना होता है। यह शरीर को सहारा देता है और सीधे खड़े रहने में मदद करता है। दो कशेरुकाओं के बीच एक उपास्थि चक्रिका (cartilage disc) होती है, जो गद्दी के समान कार्य करते हुए लचीलापन देती है, जिससे मेरुरज्जु (spinal cord) को चोट पहुँचाए बिना हम झुक-मुड़ सकें।
- पसली पिंजर (Rib cage): मानव शरीर में पसलियों के 12 जोड़े होते हैं, जो मिलकर पसली पिंजर बनाते हैं। यह हृदय और फेफड़ों जैसे महत्त्वपूर्ण अंगों की रक्षा करता है। पसलियाँ पीछे मेरुदंड से और सामने उरोस्थि (sternum) से लचीली उपास्थि द्वारा जुड़ी होती हैं, जिससे यह श्वसन के दौरान फैलती-सिकुड़ती है और वक्ष गुहा में वायु का आवागमन संभव होता है।
सही मुद्रा बनाए रखना, उचित पोषण, नियमित व्यायाम और योग करने से अस्थियों में सुदृढ़ता, माँसपेशियों में कार्यक्षमता और संधियों में लचीलापन बना रहता है और शरीर दुर्नम्यता (जकड़न) से बचता है। प्रत्येक वर्ष 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है।
पाठ का सारांश
- ऊतक समान कोशिकाओं के वे समूह हैं जो विशिष्ट प्रकार्यों के लिए मिलकर कार्य करते हैं।
- पादप ऊतकों को विभाजन की क्षमता के आधार पर विभज्योतकी और स्थायी ऊतक में वर्गीकृत किया जाता है।
- कार्यात्मक रूप से पादप ऊतक सुरक्षात्मक, सहायक और संवहन ऊतक के रूप में वर्गीकृत होते हैं।
- स्थायी ऊतक सरल (मृदूतक, श्लेषोतक, दृढ़ोतक) या जटिल (जाइलम, फ्लोएम) हो सकते हैं।
- जंतु ऊतक मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं — उपकला, संयोजी, पेशीय और तंत्रिका ऊतक।
- कंकाल तंत्र अंगों की रक्षा करता है और अवलंब प्रदान करता है; पेशी-कंकाल तंत्र, तंत्रिका तंत्र के नियंत्रण में शरीर में गति संभव बनाता है।
We hope that class 9 Science Chapter 3 क्रियाशील ऊतक (Tissues in Action) Notes in Hindi helped you. If you have any queries about class 9 Science Chapter 3 क्रियाशील ऊतक (Tissues in Action) Notes in Hindi or about any other Notes of class 9 Science in Hindi, so you can comment below. We will reach you as soon as possible…

