पाठ – 2
कोशिका — जीवन की निर्माण इकाई
In this post we have given the detailed notes of class 9 Science chapter 2 Cell: The Building Block of Life in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के विज्ञान के पाठ 2 कोशिका — जीवन की निर्माण इकाई के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Exploration / अन्वेषण (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Science |
| Chapter no. | Chapter 2 |
| Chapter Name | कोशिका — जीवन की निर्माण इकाई (Cell: The Building Block of Life) |
| Category | Class 9 Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 2, कोशिका — जीवन की निर्माण इकाई
कोशिका का परिचय
वैज्ञानिक समुदाय में यह व्यापक रूप से स्वीकृत है कि जीवन की उत्पत्ति जल में हुई थी। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि जीवन की उत्पत्ति महासागरों के बजाय बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों वाले छोटे जलकुंडों (जैसे उष्ण स्रोत) में हुई होगी। भारत में लद्दाख की पुगा घाटी के उष्ण स्रोत ठंडी जलवायु में भी अत्यधिक उच्च तापमान बनाए रखते हैं, जो लगभग 3.5 अरब वर्ष पूर्व की आदिकालीन पृथ्वी की स्थितियों जैसी मानी जाती हैं। इन उष्ण स्रोतों में रहने वाले जीव अधिकांशतः तापरागी जीवाणु (Thermophiles) होते हैं जो एककोशिकीय होते हैं। लखनऊ के बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने पाया कि इन उष्ण स्रोतों के चारों ओर तेजी से बना कैल्सियम कार्बोनेट, प्रारंभिक कार्बनिक अणुओं की रक्षा करने के साथ-साथ पहली सुरक्षात्मक झिल्ली (जो कोशिका की सीमा निर्धारित करती है) के निर्माण में सहायक रहा होगा।
सभी सजीव कोशिकाओं से बने होते हैं। कोशिका जीवन के अस्तित्व का मूलभूत स्तर है। जीवाणु और यीस्ट जैसे कुछ जीव केवल एक कोशिका से बने होते हैं (एककोशिकीय — Unicellular), जबकि पादप, मछली, पक्षी या मनुष्य जैसे जीव लाखों कोशिकाओं से मिलकर बने होते हैं (बहुकोशिकीय — Multicellular)। एक जैसा कार्य करने वाली समान कोशिकाओं का समूह ऊतक (Tissue) बनाता है, विभिन्न ऊतक मिलकर अंग (Organ) बनाते हैं और अनेक अंग मिलकर अंग-तंत्र (Organ System) बनाते हैं — जैसे नासा रंध्र, नासा गुहा, श्वासनली और फेफड़े मिलकर श्वसन तंत्र बनाते हैं। इतना संगठन होने के बाद भी कोशिका ही सभी सजीवों में संरचना और कार्य की मूलभूत इकाई बनी रहती है।
2.1 कोशिकाओं का अध्ययन कैसे करें?
विभेदन सीमा (Limit of Resolution): लगभग 25 cm (मानव नेत्र का निकट बिंदु) से देखने पर दो बिंदुओं के बीच की दूरी यदि लगभग 0.1 mm से अधिक हो तभी वे अलग-अलग दिखाई देते हैं। इसे मानव नेत्र की विभेदन सीमा कहते हैं, जो 0.1 mm है। कोशिका सामान्यतः इतनी छोटी होती है कि उसे नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता, इसलिए कोशिका जीवविज्ञानियों ने इसके अध्ययन के लिए सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप) का विकास किया।
सूक्ष्मदर्शी (Microscope):
- किसी वस्तु का आवर्धन करने के लिए उत्तल लेंस या लेंसों के संयोजन (अभिदृश्यक लेंस और नेत्रिका) का उपयोग किया जाता है।
- रॉबर्ट हुक पहले व्यक्ति थे जिन्होंने वर्ष 1665 में अपने स्व-निर्मित सूक्ष्मदर्शी (लगभग 200–300 गुना आवर्धन क्षमता) से कॉर्क के पतले टुकड़े में बॉक्स जैसे छोटे कोष्ठ देखे और उन्हें ‘सेल’ (कोशिका) नाम दिया।
- विद्यालयों में प्रकाश सूक्ष्मदर्शी (Light Microscope) का उपयोग होता है, जिसमें विभिन्न अभिदृश्यक लेंसों (जैसे 10X, 40X) से बेहतर आवर्धन और विभेदन प्राप्त होता है। इसके प्रमुख भाग हैं — नेत्रिका, स्थूल व सूक्ष्म समायोजन घुंडी, काय नली, अभिदृश्यक लेंस, मंच, दर्पण और आधार।
- इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Electron Microscope): प्रकाश के स्थान पर इलेक्ट्रॉन पुंज का उपयोग करके नैनोमीटर स्तर तक कोशिका संरचना को स्पष्टता से दिखाता है (1 नैनोमीटर = मीटर का एक अरबवाँ भाग)। इससे कोलोकेशिया की पत्ती की निचली सतह पर स्थित रंध्र जैसी सूक्ष्म संरचनाएँ भी स्पष्ट देखी जा सकती हैं।
- वर्षों में सूक्ष्मदर्शी को विभेदन (resolution), विपर्यास (contrast) और आवर्धन (magnification) — इन तीन विशेषताओं में सुधार करके अधिक शक्तिशाली बनाया गया है।
क्रियाकलाप 2.1 — कोशिका के आकार का अनुमान: पारदर्शी मापनी से सूक्ष्मदर्शी के दृश्य क्षेत्र का व्यास मापकर उसे माइक्रोमीटर (µm) में बदला जाता है (1 mm = 1000 µm)। फिर प्याज की झिल्ली की स्लाइड रखकर व्यास के अनुदिश कोशिकाओं की संख्या गिनी जाती है। सूत्र — कोशिका का अनुमानित आमाप = दृश्य क्षेत्र का व्यास (µm) ÷ कोशिकाओं की संख्या। उदाहरण के लिए, यदि व्यास 5000 µm है और उसके अनुदिश 25 कोशिकाएँ दिखती हैं, तो एक कोशिका का आमाप 5000/25 = 200 µm होगा।
2.2 कोशिका की संरचना
कोशिकाओं को इकाइयों के रूप में कार्य करने के लिए एक-दूसरे के साथ और अपने परिवेश के साथ अन्योन्यक्रिया करनी होती है। यह अन्योन्यक्रिया कोशिका की सीमा पर होती है, जहाँ पदार्थ कोशिका और उसके बाहरी परिवेश के बीच आवागमन करते हैं। यहाँ तक कि एककोशिकीय जीव भी कोशिका झिल्ली के माध्यम से पदार्थों का आदान-प्रदान करते हैं।
2.2.1 कोशिका झिल्ली (Cell Membrane) — कोशिका की सार्वत्रिक विशेषता:
कोशिका झिल्ली (Cell Membrane): एक पतला आवरण है जो कोशिका को चारों ओर से घेरकर उसकी अंतर्वस्तुओं की रक्षा करता है और कोशिका की विशिष्टता निर्धारित करता है। इसे प्लाज्मा झिल्ली (Plasma Membrane) भी कहते हैं। यह वरणात्मक रूप से पारगम्य (Selectively Permeable) होती है, अर्थात यह कुछ पदार्थों को अपने से होकर आर-पार जाने देती है जबकि कुछ को रोक लेती है।
- संरचना: कोशिका झिल्ली अत्यंत पतली (लगभग 7 से 10 नैनोमीटर मोटी) होती है और लिपिड (वसा) व प्रोटीन से बनी होती है। इसकी संरचना को तरल-मोजेक मॉडल (Fluid-Mosaic Model) द्वारा समझाया जाता है।
- झिल्ली में लिपिड द्विपरत (Lipid Bilayer) होती है — विशेष वसा अणुओं की दो परतें जिनके जल-आकर्षी शीर्ष बाहर की ओर और जल-प्रतिकर्षी पूँछें भीतर की ओर होती हैं, जिनमें प्रोटीन अंतःस्थापित होते हैं।
- अणु झिल्ली में पार्श्व गति कर सकते हैं, पलट सकते हैं और घूम सकते हैं, इसलिए इसे ‘तरल (fluid)’ कहा जाता है। प्रोटीन गेटकीपर की भाँति कार्य करते हैं। चूँकि अणु मोजेक की टाइलों जैसे व्यवस्थित होते हैं, इसलिए इसे ‘मोजेक (mosaic)’ मॉडल कहा जाता है।
परासरण और विसरण (Osmosis and Diffusion):
क्रियाकलाप 2.2: आलू के दो समान आकार के टुकड़ों में से एक को साधारण जल में और दूसरे को 20 प्रतिशत नमक/चीनी के घोल में रखा जाता है। लगभग एक घंटे बाद देखा जाता है कि साधारण जल वाला टुकड़ा फूल जाता है (भार बढ़ता है) जबकि नमक/चीनी के घोल वाला टुकड़ा संकुचित हो जाता है (भार घटता है)। इसका कारण यह है कि कोशिका झिल्ली जल को अंदर-बाहर आने-जाने देती है, किंतु चीनी या नमक के अणुओं को रोक देती है।
विसरण (Diffusion): उच्च सांद्रता से निम्न सांद्रता की ओर कणों की शुद्ध गति है, जो झिल्ली के बिना भी हो सकती है।
परासरण (Osmosis): एक वरणात्मक रूप से पारगम्य झिल्ली के आर-पार जल का विसरण परासरण कहलाता है। जल तनु विलयन क्षेत्र (जहाँ जल अधिक व विलेय कम है) से सांद्र विलयन क्षेत्र (जहाँ जल कम व विलेय अधिक है) की ओर गति करता है, जब तक दोनों क्षेत्रों की सांद्रता समान न हो जाए। पौधों में जल इसी परासरण की प्रक्रिया द्वारा मिट्टी से जड़ों की कोशिकाओं में प्रवेश करता है।
कोशिका को अलग-अलग सांद्रता के विलयनों में रखने पर तीन स्थितियाँ बनती हैं:
| विलयन का प्रकार | स्थिति |
| समपरासारी विलयन (Isotonic Solution) | कोशिकाबाह्य माध्यम की विलेय सांद्रता = अंतःकोशिकीय माध्यम की विलेय सांद्रता |
| अल्पपरासारी विलयन (Hypotonic Solution) | कोशिकाबाह्य माध्यम की विलेय सांद्रता < अंतःकोशिकीय माध्यम की विलेय सांद्रता (कोशिका फूलती है) |
| अतिपरासारी विलयन (Hypertonic Solution) | कोशिकाबाह्य माध्यम की विलेय सांद्रता > अंतःकोशिकीय माध्यम की विलेय सांद्रता (कोशिका सिकुड़ती है) |
2.2.2 कोशिका भित्ति (Cell Wall) — कोशिकाओं का बाहरी आवरण:
कोशिका भित्ति (Cell Wall): चूँकि पादप एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं जा सकते, इसलिए उन्हें पर्यावरणीय दबावों (जैसे वायु और वर्षा) को सहन करने के लिए एक दृढ़ संरचना चाहिए होती है। पादप कोशिकाओं में कोशिका झिल्ली के बाहर एक अतिरिक्त आवरण होता है जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं। यह पत्तियों और फूलों की दृढ़ता बनाए रखने तथा पौधों को सीधा खड़े रहने में सहायता करती है। दृढ़ होते हुए भी कोशिका भित्ति पारगम्य होती है — जल और कुछ घुले हुए खनिज इसमें से आर-पार जा सकते हैं, जिससे पादप जड़ों को मृदा से जल व पोषक तत्व अवशोषित करने में सहायता मिलती है।
- क्रियाकलाप 2.3 में प्याज की झिल्ली/रोइओ (क्रेडल लिली) की पत्ती की कोशिकाएँ और मानव कपोल (गाल) कोशिकाओं का अवलोकन किया जाता है। प्याज/रोइओ की कोशिकाएँ बॉक्स जैसी और नियमित रूप से व्यवस्थित दिखती हैं, जबकि कपोल कोशिकाएँ अनियमित रूप से व्यवस्थित होती हैं — क्योंकि पादप कोशिकाओं में कोशिका भित्ति होती है, जंतु कोशिकाओं में नहीं।
- चीनी के सांद्र विलयन में रखने पर पादप कोशिका की अंतर्वस्तु परासरण के कारण सिकुड़ जाती है, किंतु कोशिका भित्ति के कारण कोशिका का बाहरी आकार वैसा ही बना रहता है। इसके विपरीत, कोशिका भित्ति न होने के कारण जंतु कोशिकाएँ (जैसे कपोल कोशिकाएँ) सांद्र विलयन में पूरी तरह सिकुड़ जाती हैं।
- पादप कोशिका भित्ति मुख्यतः सेल्युलोस (Cellulose) नामक कार्बोहाइड्रेट से बनी होती है, जो अनेक ग्लूकोस इकाइयों के जुड़ने से बनता है। हमारे आहार में सेल्युलोस रुक्षांश (roughage) के रूप में पाचन में सहायक होता है। कवकों और जीवाणुओं जैसे कुछ सूक्ष्मजीवों में भी सुरक्षा व संरचनात्मक सहायता के लिए कोशिका भित्ति पाई जाती है।
2.3 कोशिका का आंतरिक भाग — एक समन्वित कार्य प्रणाली
अधिकांश कोशिकाओं के तीन मूलभूत भाग होते हैं — (1) एक वरणात्मक रूप से पारगम्य झिल्ली जिसे प्लाज्मा झिल्ली कहते हैं, (2) एक अर्धतरल जेली जैसा पदार्थ जिसे कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) कहते हैं, और (3) एक सुस्पष्ट केंद्रक (Nucleus)। केंद्रक के अतिरिक्त कोशिकाद्रव्य में अनेक उप-कोशिकीय घटक होते हैं जिन्हें कोशिकांग (Organelles) कहते हैं, जिनमें से अधिकांश केवल इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से ही स्पष्ट देखे जा सकते हैं।
प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक कोशिकाएँ:
जीवाणु कोशिका में सुस्पष्ट केंद्रक और झिल्ली-आबद्ध कोशिकांग नहीं होते। ऐसी कोशिकाओं को प्रोकैरियोटिक (पूर्वकेंद्रकी) कोशिका कहते हैं (pro का अर्थ है पूर्व और karyon का अर्थ है केंद्रक)। प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में अधिकांश कोशिकीय गतिविधियाँ सीधे कोशिकाद्रव्य में होती हैं। इसके विपरीत, पादप और जंतु कोशिकाओं में एक सुस्पष्ट केंद्रक और अनेक झिल्ली-आबद्ध कोशिकांग होते हैं — इन्हें यूकैरियोटिक (सुकेंद्रकी) कोशिका कहते हैं (eu का अर्थ है वास्तविक और karyon का अर्थ है केंद्रक)।
| विशेषताएँ | प्रोकैरियोटिक कोशिका | यूकैरियोटिक कोशिका |
| आद्य केंद्रक (नुक्लियॉइड) | उपस्थित | अनुपस्थित |
| एक सामान्य कोशिका का व्यास | 1 से 10 µm | 10 से 100 µm |
| जीव में कोशिकाओं की संख्या | सामान्यतः एककोशिकीय | एककोशिकीय या बहुकोशिकीय हो सकते हैं |
| झिल्ली-आबद्ध कोशिकांग | अनुपस्थित | उपस्थित |
| झिल्ली-आबद्ध केंद्रक | अनुपस्थित | उपस्थित |
प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं का डीएनए एक एकल गोल अणु के रूप में विशेष प्रोटीन से संबद्ध होकर उपस्थित रहता है। इस आनुवंशिक पदार्थ वाले क्षेत्र को न्यूक्लियॉइड / केंद्रकाभ (Nucleoid) कहते हैं।
कोशिका पंजर (Cytoskeleton): यूकैरियोटिक कोशिकाओं में अत्यंत पतले तंतुओं का जाल कोशिका पंजर बनाता है, जो कोशिका को संरचनात्मक स्थिरता प्रदान करता है, आकार बनाए रखता है और कोशिका की गति व आंतरिक परिवहन में सहायता करता है। यह केवल इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से दिखाई देता है। कोशिकाद्रव्य में मंड (स्टार्च, पादप कोशिकाओं में) अथवा कैल्सियम ऑक्जलेट या सिलिका के क्रिस्टल भी संग्रहीत होते हैं, जिन्हें कोशिका अंतरंगक (Cell Inclusions) कहते हैं।
कोशिकांग (Cell Organelles)
यूकैरियोटिक कोशिकाएँ विभिन्न कोशिकांगों में स्वतंत्र रूप से एक साथ विभिन्न जैव प्रक्रियाएँ संपन्न करती हैं। कोशिकांग नए पदार्थ बनाने, अपशिष्ट हटाने और कोशिका को ऊर्जा प्रदान करने में सहायता करते हैं। दूसरे शब्दों में, कोशिका एक सूक्ष्म जीवित कार्यशाला की भाँति है जिसका प्रत्येक भाग एक विशिष्ट कार्य करता है।
केंद्रक (Nucleus) — कूटबद्ध अनुदेशों का केंद्र:
केंद्रक का एक द्विपरती नाभिकीय झिल्ली (Nuclear Membrane) होती है, जिसमें छिद्र होते हैं जो केंद्रक और कोशिकाद्रव्य के बीच पदार्थों का आवागमन संभव बनाते हैं। केंद्रिका (Nucleolus) केंद्रक में स्थित एक सघन गोल पिंड है, जहाँ राइबोसोम की उपइकाइयों का संश्लेषण होता है। ये उपइकाइयाँ केंद्रक से कोशिकाद्रव्य में जाकर एक बड़ी और एक छोटी उपइकाई के मिलने से राइबोसोम बनाती हैं।
- गुणसूत्र (Chromosome): केंद्रक में उपस्थित होते हैं और केवल कोशिका विभाजन के समय छड़ाकार संरचनाओं के रूप में दिखाई देते हैं। इनमें माता-पिता से अगली पीढ़ी में लक्षणों की वंशागति के लिए सूचना डीएनए (DNA — Deoxyribonucleic Acid) के रूप में सन्निहित होती है। गुणसूत्र डीएनए और विशेष प्रोटीन से बने होते हैं। डीएनए के कार्यात्मक खंडों को जीन (Gene) कहते हैं।
- विभाजन न करने वाली कोशिका में डीएनए क्रोमेटिन (Chromatin) पदार्थ के रूप में उलझे हुए धागे जैसा दिखाई देता है। जब कोशिका विभाजित होने वाली होती है तो क्रोमेटिन पदार्थ गुणसूत्रों में संगठित हो जाता है।
- मनुष्यों में परिपक्व लाल रक्त कोशिकाओं (RBC) में केंद्रक नहीं होता (केंद्रक-रहित/enucleate)। केंद्रक की अनुपस्थिति हीमोग्लोबिन के लिए अधिक स्थान देती है, जिससे अधिक ऑक्सीजन का परिवहन संभव होता है; किंतु इस कारण ये स्वयं की मरम्मत या विभाजन नहीं कर सकतीं और लगभग 120 दिन तक ही जीवित रहती हैं।
राइबोसोम (Ribosomes) — प्रोटीन की फैक्टरी:
राइबोसोम: सूक्ष्म संरचनाएँ हैं जो कोशिकाद्रव्य में मुक्त रूप से उपस्थित होती हैं अथवा अंतर्द्रव्यी जालिका से जुड़ी होती हैं। राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण के स्थल हैं।
अंतर्द्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum — ER) — निर्माणशाला:
अंतर्द्रव्यी जालिका: एक बड़ा कोशिकांग है जो कोशिकाद्रव्य में एक जाल की तरह फैला होता है और केंद्रक आवरण की बाहरी झिल्ली से जुड़ा रहता है। यह प्रोटीन, वसा (लिपिड) और कुछ हार्मोन के संश्लेषण व परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके दो प्रकार होते हैं:
- रुक्ष अंतर्द्रव्यी जालिका (Rough Endoplasmic Reticulum — RER): इसकी सतह पर राइबोसोम जुड़े होने के कारण यह इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी में खुरदुरी दिखाई देती है। यह मुख्यतः प्रोटीन संश्लेषण और प्रोटीन के स्रवण में सम्मिलित होती है (उदाहरण — अग्न्याशयी ग्रंथि कोशिकाएँ)।
- चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका (Smooth Endoplasmic Reticulum — SER): इसकी सतह पर राइबोसोम नहीं होते, इसलिए यह चिकनी दिखाई देती है। यह वसा और हार्मोन के संश्लेषण व भंडारण का कार्य करती है।
गॉल्जी उपकरण (Golgi Apparatus) — पैकेजिंग और शिपिंग केंद्र:
गॉल्जी उपकरण: चपटी, थैली जैसी संरचनाओं की ढेरियाँ मिलकर गॉल्जी उपकरण बनाती हैं। यह कार्यात्मक रूप से अंतर्द्रव्यी जालिका, कोशिका झिल्ली और अन्य कोशिकांगों से जुड़ा होता है। यह कोशिका के ‘डाकघर’ की भाँति कार्य करते हुए प्रोटीन और/अथवा लिपिड को रूपांतरित, वर्गीकृत और पुटिकाओं (vesicles) में पैक करके परिवहन, स्रवण अथवा लाइसोसोम निर्माण के लिए भेजता है। गॉल्जी उपकरण को पहली बार वर्ष 1898 में इतालवी वैज्ञानिक कैमिलो गॉल्जी ने बार्न उल्लू की तंत्रिका कोशिकाओं में विशेष अभिरंजन तकनीकों से देखा था; बाद में इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से इसकी पुष्टि हुई और उनके सम्मान में इसका नाम रखा गया।
लाइसोसोम (Lysosomes) — निर्मलन प्रणाली:
लाइसोसोम: एंजाइम से भरे एकल झिल्ली-आबद्ध थैले होते हैं, जो अवांछित प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा और कोशिका के क्षतिग्रस्त अंगों को विघटित कर कोशिका को स्वच्छ व स्वस्थ रखते हैं। विघटन से बने उत्पाद कोशिकाद्रव्य में निर्मुक्त होकर अन्य कोशिकीय प्रक्रियाओं में पुनः उपयोग होते हैं। मानव शुक्राणु कोशिकाओं में लाइसोसोमीय एंजाइम होते हैं, जो अंडाणु की बाहरी परत को विघटित कर निषेचन में सहायता करते हैं।
माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria) — कोशिका का ऊर्जा केंद्र:
माइटोकॉन्ड्रिया (सूत्रकणिका): इन्हें प्रायः कोशिका का ‘पावरहाउस (Powerhouse)’ कहा जाता है क्योंकि ये अधिकांश कोशिकीय गतिविधियों के लिए आवश्यक ऊर्जा देते हैं। प्रत्येक माइटोकॉन्ड्रिया दो झिल्लियों से घिरा होता है:
- बाहरी झिल्ली चिकनी और छिद्रित होती है।
- भीतरी झिल्ली अँगुली जैसे उभारों में अंतर्वलित होती है जिन्हें अंतःकटक (Cristae) कहते हैं — ये रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए सतह क्षेत्र बढ़ाकर ऊर्जा उत्पादन को सुगम बनाती हैं।
माइटोकॉन्ड्रिया में ग्लूकोस और अन्य अणु कोशिकीय श्वसन (Cellular Respiration) नामक प्रक्रिया के दौरान विघटित होकर ऊर्जा मुक्त करते हैं। यह ऊर्जा ऐडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट (ATP) नामक अणु के रूप में संग्रहीत होती है, जो ऊर्जा की मुद्रा के रूप में कार्य करती है।
लवक/प्लास्टिड (Plastids) — भोजन संश्लेषण का केंद्र:
पादप सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis) द्वारा अपना भोजन संश्लेषण व भंडारण के लिए लवक (Plastid) नामक विशेष कोशिकांगों का उपयोग करते हैं।
- हरितलवक (Chloroplast): इसमें हरा वर्णक पर्णहरित (Chlorophyll) उपस्थित होता है जो सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करता है। यह माइटोकॉन्ड्रिया की तरह दोहरी झिल्ली-आबद्ध कोशिकांग है। इसके भीतर अर्ध-तरल पदार्थ पीठिका (Stroma) होता है, जिसमें चक्रिका (disc) के आकार की झिल्लीनुमा संरचनाएँ पर्णहरित युक्त होती हैं। प्रकाश-संश्लेषण में संश्लेषित शर्करा स्टार्च के कणों के साथ पीठिका में संग्रहीत रहती है। माइटोकॉन्ड्रिया व लवक दोनों में अपना डीएनए और राइबोसोम होता है, जो इनके जीवाणुओं जैसे एककोशिकीय जीवों के साथ विकासीय संबंध की ओर संकेत करता है।
- वर्णीलवक (Chromoplast): फूल की पंखुड़ियों और फलों के लवकों में पर्णहरित के अतिरिक्त अन्य वर्णक (पीले, नारंगी या लाल) होते हैं, जो फूल-फलों को चटक रंग देते हैं। ये रंग परागणकारियों और बीज-प्रकीर्णन में सहायक फल-भक्षी जंतुओं को आकर्षित करते हैं (ग्रीक में chroma का अर्थ है रंग)।
- अवर्णी लवक (Leucoplast): इनमें वर्णक नहीं होते, अतः ये रंगहीन होते हैं (ग्रीक में leukos का अर्थ है सफेद)। ये स्टार्च, तेल या प्रोटीन जैसी खाद्य सामग्री संग्रहीत करते हैं — जैसे आलू और अरबी (कोलोकेशिया) की कोशिकाओं में स्टार्च संग्रहीत करने वाले अवर्णी लवक।
रसधानी (Vacuole) — भंडारण और अवलंब के लिए कोशिकांग:
रसधानी: एक परिपक्व पादप कोशिका में सामान्यतः एक बड़ी केंद्रीय रसधानी (Large Central Vacuole) होती है, जो एकल वरणात्मक रूप से पारगम्य झिल्ली से घिरी होती है। यह कोशिका-रस (Cell Sap) नामक जलीय तरल से भरी रहती है और जल, खनिज, शर्करा व अपशिष्ट पदार्थ संग्रहीत करती है। बड़ी मात्रा में जल संग्रहीत करके यह कोशिका के भीतर दाब बनाए रखती है, जिससे पादप कोशिका दृढ़ बनी रहती है। जब पौधे को पर्याप्त जल न मिले तो रसधानी से जल की हानि होती है और पौधा मुरझा जाता है। जंतु कोशिकाओं में भी कभी-कभी रसधानियाँ होती हैं, किंतु ये पादप रसधानियों जितनी बड़ी नहीं होतीं और केवल अस्थायी भंडारण में सहायक होती हैं।
पादप कोशिका और जंतु कोशिका में अंतर
| कोशिका संरचना | पादप कोशिका | जंतु कोशिका |
| कोशिका भित्ति | उपस्थित (सेल्युलोस की बनी) | अनुपस्थित |
| रसधानी | एक बड़ी केंद्रीय रसधानी | छोटी, अस्थायी रसधानियाँ (यदि उपस्थित हों) |
| लवक (हरितलवक आदि) | उपस्थित | अनुपस्थित |
| आकार | निश्चित बॉक्स जैसा आकार | अनियमित आकार, आकार आसानी से बदल सकता है |
| कोशिका झिल्ली, कोशिकाद्रव्य, केंद्रक, माइटोकॉन्ड्रिया, ER, गॉल्जी उपकरण, राइबोसोम, लाइसोसोम | उपस्थित | उपस्थित |
इसके अतिरिक्त, प्रोकैरियोटिक (जीवाणु) कोशिका में सुस्पष्ट केंद्रक और झिल्ली-आबद्ध कोशिकांग नहीं होते; उसके स्थान पर आद्य केंद्रक (नुक्लियॉइड) तथा कोशिकाद्रव्य में मुक्त राइबोसोम और चलन हेतु उपांग (जैसे कशाभिका) पाए जाते हैं।
2.4 सामान्य कोशिकाएँ किस प्रकार वृद्धि और विभाजन करती हैं?
त्वचा पर कट लगने पर वह कुछ दिनों में ठीक हो जाता है और झड़े बालों की जगह नए बाल उग आते हैं — क्योंकि हमारे शरीर की कोशिकाएँ पुरानी, मृत या क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को प्रतिस्थापित करने के लिए वृद्धि करती हैं और विभाजित होती हैं। कोशिकाएँ केवल एक निश्चित आकार तक ही बढ़ सकती हैं, इसलिए शारीरिक वृद्धि कोशिकाओं के विभाजित होकर नई कोशिकाएँ बनाने से होती है। क्रियाकलाप 2.5 में प्याज के वर्धनशील मूलाग्रों की स्लाइड बनाकर एसीटो-कार्मिन अभिरंजक से अभिरंजित कर सूक्ष्मदर्शी में देखने पर कोशिका विभाजन की विभिन्न अवस्थाएँ दिखाई देती हैं, क्योंकि प्याज के मूलाग्र की वर्धनशील कोशिकाएँ निरंतर विभाजित होती रहती हैं।
2.4.1 कोशिका विभाजन (Cell Division):
कोशिका विभाजन: वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा पूर्वविद्यमान कोशिकाओं से नई कोशिकाएँ उत्पन्न होती हैं, जो सजीवों में वृद्धि, ऊतक-मरम्मत और जनन को संभव बनाती है। हमारे शरीर में प्रतिदिन अनुमानित सैकड़ों अरब कोशिकाएँ (कुल संख्या का लगभग 1 प्रतिशत) प्रतिस्थापित होती हैं। प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक दोनों प्रकार की कोशिकाएँ विभाजित होती हैं, किंतु यूकैरियोटिक कोशिकाएँ कोशिका चक्र (Cell Cycle) नामक प्रक्रिया द्वारा अधिक नियंत्रित व व्यवस्थित ढंग से विभाजित होती हैं। कोशिका विभाजन के दो प्रमुख प्रकार हैं — समसूत्री विभाजन (Mitosis) और अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)।
समसूत्री विभाजन (Mitosis):
प्रत्येक मनुष्य के जीवन का आरंभ एक एकल निषेचित अंडाणु से होता है, जो बार-बार विभाजित होकर शरीर में खरबों कोशिकाएँ बनाता है। समसूत्री विभाजन एक जनक कोशिका से आनुवंशिक रूप से समान दो संतति कोशिकाएँ उत्पन्न करता है — प्रत्येक नई कोशिका को जनक कोशिका के समान डीएनए और समान संख्या में गुणसूत्र मिलते हैं। यह सामान्य वृद्धि, मरम्मत, रखरखाव और अलैंगिक जनन के लिए महत्वपूर्ण है।
अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis):
अर्धसूत्री विभाजन एक ऐसा कोशिका विभाजन है जिसमें युग्मक (gametes) बनते हैं और यह केवल जनन अंगों की कोशिकाओं में होता है — मनुष्य सहित जंतुओं में नर के वृषण में शुक्राणु और मादा के अंडाशय में अंडाणु बनाने हेतु; पौधों में परागकोश (नर भाग) में परागकण तथा अंडाशय (मादा भाग) में अंडकोशिकाएँ बनाने हेतु। इसमें जनक कोशिका दो बार विभाजित होकर चार संतति कोशिकाएँ बनाती है, जिनमें से प्रत्येक में गुणसूत्रों की संख्या आधी होती है। निषेचन के समय जब दो जीवों के युग्मक मिलते हैं तो गुणसूत्रों की मूल संख्या पुनर्स्थापित हो जाती है। अर्धसूत्री विभाजन से उत्पन्न विविधता के कारण ही बच्चे अपने माता-पिता से मिलते-जुलते हैं किंतु पूर्णतः उनके जैसे नहीं होते।
कोशिका संवर्धन (Tissue/Cell Culture): वैज्ञानिकों ने पादप और जंतु कोशिकाओं को विशेष पोषक-समृद्ध, निर्जर्मीकृत परिस्थितियों में शरीर के बाहर वृद्धि करने की विधि विकसित की है, जिसे कोशिका संवर्धन कहते हैं। यह कोशिकाओं के कार्य के अध्ययन तथा जैव-रसायनों, भोजन, औषधियों और टीकों के उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
समसूत्री और अर्धसूत्री विभाजन की प्रक्रियाएँ यदि उचित रीति से न हों तो समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं — समसूत्री विभाजन की त्रुटियाँ अनियंत्रित कोशिका विभाजन का कारण बनकर अर्बुद (Tumour) का निर्माण करती हैं, जबकि अर्धसूत्री विभाजन की त्रुटियाँ आनुवंशिक विकार, गर्भपात या प्रजनन क्षमता में कमी ला सकती हैं।
2.5 कोशिका सिद्धांत — जीव विज्ञान का एकीकरण सिद्धांत
वर्ष 1838 में जर्मन वनस्पतिशास्त्री मैथियास श्लाइडेन (Matthias Schleiden) ने बताया कि सभी पादप कोशिकाओं से बने होते हैं। वर्ष 1839 में जर्मन प्राणिविज्ञानी थियोडोर श्वान (Theodor Schwann) ने पाया कि सभी जंतु भी कोशिकाओं से बने होते हैं। इसके पश्चात वर्ष 1855 में जर्मन वैज्ञानिक रुडोल्फ विरचो (Rudolf Virchow) ने यह कहकर कोशिका सिद्धांत का विस्तार किया कि नई कोशिकाएँ केवल पूर्व विद्यमान कोशिकाओं से बनती हैं। इन तीनों के कार्यों ने मिलकर कोशिका सिद्धांत (Cell Theory) को निरूपित किया।
पुरातन (क्लासिकल) कोशिका सिद्धांत के अनुसार:
- सभी सजीव एक या एक से अधिक कोशिकाओं से बने होते हैं।
- कोशिका सजीवों में संरचना और कार्य की मूलभूत इकाई है।
- सभी कोशिकाएँ पूर्वविद्यमान कोशिकाओं से उत्पन्न होती हैं।
यह सिद्धांत जीवाणुओं से लेकर मनुष्य तक सभी जीवों को एकीकृत करता है और कोशिका विभाजन के माध्यम से जीवन की निरंतरता को स्पष्ट करता है।
2.5.1 क्या कोशिकाएँ चिरकाल तक वृद्धि और जनन करती हैं?
कोशिकाएँ नियंत्रित विधि से वृद्धि और विभाजन करती हैं, अपने निर्धारित स्थान पर बनी रहती हैं, अपना कार्य करती हैं और अंततः आवश्यकता न रहने पर मृत हो जाती हैं; मृत कोशिकाओं का स्थान नई कोशिकाएँ ले लेती हैं। इस प्रकार प्रत्येक कोशिका की एक निश्चित जीवन अवधि होती है। अनेक जंतु कोशिकाओं में जब कोशिकाएँ पड़ोसी कोशिकाओं के संपर्क में आती हैं तो कोशिका विभाजन रुक जाता है — इस प्रक्रिया को संपर्क अवरोध (Contact Inhibition) कहते हैं। कैंसर कोशिकाएँ यह नियंत्रण खो देती हैं और अनियंत्रित रूप से विभाजित होती रहती हैं, जिससे अर्बुद (Tumour) बनते हैं — ये सुदम्य (benign) या दुर्दम/कैंसरयुक्त (malignant) हो सकते हैं, जो आस-पास के ऊतकों में फैलकर शरीर के अन्य भागों में नए अर्बुद बना सकते हैं। पादप कोशिकाएँ अपनी कठोर कोशिका भित्ति के कारण संपर्क अवरोध नहीं दर्शातीं और वृद्धि के भिन्न प्रतिरूप का अनुसरण करती हैं।
क्रमादेशित कोशिका मृत्यु (Programmed Cell Death — PCD): यह कोशिका के वरणात्मक रूप से नष्ट होने की आनुवंशिकतः नियंत्रित और व्यवस्थित प्रक्रिया है, जो सामान्य विकास, कोशिकीय गुणवत्ता नियंत्रण और प्रतिरक्षा कार्य के लिए अनिवार्य है — उदाहरण के लिए, भ्रूण विकास के दौरान PCD अँगुलियों के बीच की कोशिकाओं को हटाकर अँगुलियाँ बनाता है, जिसके बिना हाथ जालयुक्त बने रहते।
मुख्य बिंदु (सारांश)
- कोशिका सभी सजीवों की मूलभूत संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई है।
- प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में सुस्पष्ट केंद्रक व झिल्ली-आबद्ध कोशिकांग नहीं होते; उनका आनुवंशिक पदार्थ केंद्रकाभ में होता है।
- यूकैरियोटिक कोशिकाएँ बड़ी व जटिल होती हैं, इनमें सुस्पष्ट केंद्रक और अनेक झिल्ली-आबद्ध कोशिकांग होते हैं।
- सभी कोशिकाएँ कोशिका झिल्ली से घिरी होती हैं; पादप, कवक और जीवाणुओं में इसके बाहर अतिरिक्त कोशिका भित्ति भी होती है।
- महत्वपूर्ण कोशिकांगों में केंद्रक, अंतर्द्रव्यी जालिका, माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जी उपकरण, राइबोसोम और लाइसोसोम सम्मिलित हैं।
- पादप कोशिकाओं में विशेष रूप से हरितलवक, अवर्णी लवक और वर्णीलवक जैसे लवक भी पाए जाते हैं।
- समसूत्री विभाजन जनक कोशिका के समान दो संतति कोशिकाएँ बनाता है; अर्धसूत्री विभाजन चार संतति कोशिकाएँ बनाता है जिनमें गुणसूत्रों की संख्या आधी होती है।
- सामान्य कोशिकाएँ नियंत्रित ढंग से वृद्धि व मृत्यु को प्राप्त होती हैं, जबकि कैंसर कोशिकाएँ नियंत्रण खोकर अर्बुद बनाती हैं।
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