पाठ – 4
अपने परिवेश में गति का वर्णन
In this post we have given the detailed notes of class 9 Science chapter 4 Describing Motion Around Us in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के विज्ञान के पाठ 4 अपने परिवेश में गति का वर्णन के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Exploration / अन्वेषण (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Science |
| Chapter no. | Chapter 4 |
| Chapter Name | अपने परिवेश में गति का वर्णन (Describing Motion Around Us) |
| Category | Class 9 Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 4, अपने परिवेश में गति का वर्णन
सरल रेखा में गति (Motion in a Straight Line)
जब कोई वस्तु सरल रेखा में गमन करती है तो इसे रेखीय गति (Linear Motion) या सरल रेखीय गति कहते हैं। यह गति का सबसे सरल प्रकार है — जैसे सीधे राजमार्ग पर चलती कार, सीधी पटरी पर चलती रेलगाड़ी या ऊर्ध्वाधर नीचे गिरती हुई गेंद।
स्थिति का वर्णन करना:
- किसी वस्तु की स्थिति (Position) बताने के लिए सबसे पहले एक नियत संदर्भ बिंदु (Reference Point) या मूल बिंदु (Origin, O) निर्धारित किया जाता है।
- संदर्भ बिंदु से वस्तु की दूरी और दिशा मिलकर उसकी स्थिति बताते हैं।
- यदि समय के साथ संदर्भ बिंदु के सापेक्ष वस्तु की स्थिति बदलती है तो वस्तु गतिशील (in motion) कहलाती है; यदि नहीं बदलती तो वस्तु विरामावस्था (rest) में कही जाती है।
- सरल रेखा में गति करने वाली वस्तु केवल दो दिशाओं में गति कर सकती है — आगे या पीछे। इन्हें क्रमशः धन (+) व ऋण (−) चिह्न से दर्शाया जाता है। संदर्भ बिंदु के दाहिनी ओर की स्थिति सामान्यतः धनात्मक और बायीं ओर की स्थिति ऋणात्मक मानी जाती है।
चलित दूरी और विस्थापन (Distance and Displacement):
अदिश राशि (Scalar Quantity): ऐसी भौतिक राशियाँ जिन्हें मात्र उनके आंकिक मान (परिमाण) से निर्दिष्ट किया जा सकता है, जैसे दूरी।
सदिश राशि (Vector Quantity): ऐसी भौतिक राशियाँ जिनके लिए परिमाण और दिशा दोनों बताना आवश्यक होता है, जैसे विस्थापन।
चलित दूरी (Distance Travelled): वस्तु द्वारा वास्तव में तय किए गए पथ की कुल लंबाई। इसकी कोई दिशा नहीं होती।
विस्थापन (Displacement): समय के किन्हीं दो क्षणों के बीच वस्तु की स्थिति में होने वाला सकल (net) परिवर्तन। इसका परिमाण दोनों स्थितियों के बीच की सीधी दूरी होता है और इसकी दिशा पहले बिंदु से दूसरे बिंदु की ओर होती है। दोनों राशियों (दूरी व विस्थापन) का SI मात्रक मीटर (m) है।
- यदि वस्तु बिना पलटे एक ही दिशा में चलती रहे तो चलित दूरी और विस्थापन का परिमाण बराबर होता है।
- विस्थापन का परिमाण सदैव चलित दूरी से कम या उसके बराबर होता है, कभी अधिक नहीं हो सकता।
उदाहरण: कोई धावक बिंदु O से चलकर बिंदु A (100 m दूर) तक जाता है और फिर वापस बिंदु B (60 m पीछे) तक लौट आता है। कुल चलित दूरी = OA + AB = 100 m + 60 m = 160 m, जबकि विस्थापन केवल OB = 40 m (धनात्मक दिशा में) होता है — अर्थात दोनों राशियाँ बराबर नहीं हैं।
माध्य चाल और माध्य वेग (Average Speed and Average Velocity):
माध्य चाल (Average Speed): किसी वस्तु द्वारा चली गई कुल दूरी को उस दूरी को तय करने में लगे समय अंतराल से भाग देने पर प्राप्त मान।
माध्य चाल = कुल चलित दूरी / समय अंतराल (समीकरण 4.1)
माध्य चाल की कोई दिशा नहीं होती, क्योंकि यह दूरी से परिकलित होती है।
- एकसमान गति (Uniform Motion): यदि वस्तु समान समय अंतरालों में समान दूरियाँ तय करे तो यह एकसमान सरल रेखीय गति कहलाती है — वस्तु अचर (constant) चाल से चलती है।
- असमान गति (Non-uniform Motion): यदि वस्तु समान समय अंतरालों में असमान दूरियाँ तय करे तो यह असमान गति कहलाती है — चाल बढ़ती, घटती या दोनों हो सकती है।
माध्य वेग (Average Velocity): किसी समय अंतराल में वस्तु की स्थिति में परिवर्तन (विस्थापन) को उस समय अंतराल से भाग देने पर प्राप्त मान। यदि माध्य वेग को vav, विस्थापन को s और समय अंतराल को t से निरूपित करें तो —
माध्य वेग = विस्थापन / समय अंतराल, अर्थात vav = s / t (समीकरण 4.2)
माध्य वेग की दिशा वही होती है जो विस्थापन की होती है, इसे धन (+) या ऋण (−) चिह्न से दर्शाया जाता है। माध्य चाल एवं माध्य वेग दोनों का SI मात्रक मीटर प्रति सेकंड (m s⁻¹ या m/s) है; इन्हें किलोमीटर प्रति घंटा (km h⁻¹) में भी मापा जाता है। माध्य वेग वस्तु की स्थिति में परिवर्तन की समय-सापेक्ष दर (rate of change) है।
उदाहरण 4.1 (भारत का प्राचीन योगदान — आर्यभटीय/गणित कौमुदी पर आधारित):
प्रश्न: दो पत्रवाहक एक-दूसरे से 210 योजन दूर से एक-दूसरे की ओर चलना आरंभ करते हैं। एक 9 योजन प्रतिदिन और दूसरा 5 योजन प्रतिदिन चलता है। वे कितने दिन बाद मिलेंगे?
हल: दोनों द्वारा एक दिन में चलित कुल दूरी = 9 + 5 = 14 योजन।
दोनों को मिलकर 210 योजन दूरी तय करनी है।
समय = 210 ÷ 14 = 15 दिन।
(15 दिनों में पहला पत्रवाहक 135 योजन और दूसरा 75 योजन चलेगा।)
उदाहरण 4.2 (तैराक सारंग):
प्रश्न: सारंग नामक तैराक 25 m लंबे तरण-ताल के एक किनारे से दूसरे किनारे तक तैरकर वापस लौटने में 50 s लेता है। उसकी माध्य चाल एवं माध्य वेग ज्ञात कीजिए।
हल: 50 s में कुल चलित दूरी = 25 m + 25 m = 50 m; विस्थापन = 0 m (वह वापस उसी बिंदु पर आ गया)।
माध्य चाल = 50 m / 50 s = 1 m s⁻¹
माध्य वेग = 0 m / 50 s = 0 m s⁻¹
इससे स्पष्ट होता है कि माध्य चाल शून्य नहीं होते हुए भी माध्य वेग शून्य हो सकता है।
माध्य त्वरण (Average Acceleration):
माध्य त्वरण: किसी दिए गए समय अंतराल में वस्तु के वेग में होने वाले परिवर्तन को उस समय अंतराल से भाग देने पर प्राप्त मान।
माध्य त्वरण = वेग-परिवर्तन / समय अंतराल (समीकरण 4.3क)
यदि क्षण t1 पर वस्तु का आरंभिक वेग u है और यह क्षण t2 पर बदलकर अंतिम वेग v हो जाता है तो —
a = (v − u) / (t2 − t1) (समीकरण 4.3ग)
माध्य त्वरण का SI मात्रक m s⁻² (या m/s²) है। त्वरण एक सदिश राशि है — यदि वेग का परिमाण बढ़ रहा हो तो त्वरण वेग की दिशा में होता है; यदि वेग का परिमाण घट रहा हो तो त्वरण वेग की दिशा के विपरीत होता है। ध्यान रहे — कोई वस्तु बहुत तेज़ गति से चल भी सकती है और फिर भी उसका त्वरण शून्य हो सकता है (जैसे नियत वेग से चलती बस), क्योंकि त्वरण इस बात पर निर्भर करता है कि वेग कितनी शीघ्रता से बदल रहा है, न कि वेग कितना अधिक है।
उदाहरण 4.3 (राजमार्ग पर बस):
प्रश्न: कोई बस 36 km h⁻¹ के वेग से चल रही है। चालक त्वरित्र को 10 s तक दबाता है जिससे वेग बढ़कर 54 km h⁻¹ हो जाता है। बाद में ब्रेक लगाने पर बस 5 s में रुक जाती है। दोनों समयांतरालों में माध्य त्वरण ज्ञात कीजिए।
हल (i) त्वरित्र दबाने पर: u = 36 km h⁻¹ = 10 m s⁻¹, v = 54 km h⁻¹ = 15 m s⁻¹, t = 10 s
a = (15 − 10)/10 = 0.5 m s⁻² (वेग की दिशा में, क्योंकि वेग बढ़ रहा है)
हल (ii) ब्रेक लगाने पर: u = 15 m s⁻¹, v = 0 m s⁻¹, t = 5 s
a = (0 − 15)/5 = −3 m s⁻² (ऋण चिह्न दर्शाता है कि त्वरण वेग की दिशा के विपरीत है, क्योंकि वेग घट रहा है)
उदाहरण 4.4 (ऊँचाई से गिरती वस्तु व गुरुत्वीय त्वरण g):
प्रश्न: कोई वस्तु ऊँचाई से गिराई जाती है। t = 0 s पर u = 0 m s⁻¹; t = 1 s पर v = 9.8 m s⁻¹; t = 2 s पर v = 19.6 m s⁻¹; t = 3 s पर v = 29.4 m s⁻¹; t = 4 s पर v = 39.2 m s⁻¹। प्रत्येक 1 s के अंतराल में माध्य त्वरण ज्ञात कीजिए।
हल:
0 s से 1 s: (9.8 − 0)/1 = 9.8 m s⁻²
1 s से 2 s: (19.6 − 9.8)/1 = 9.8 m s⁻²
2 s से 3 s: (29.4 − 19.6)/1 = 9.8 m s⁻²
3 s से 4 s: (39.2 − 29.4)/1 = 9.8 m s⁻²
इस प्रकार माध्य त्वरण हर अंतराल में नियत और 9.8 m s⁻² है तथा यह गति की दिशा में (नीचे की ओर) है। इसी नियत त्वरण को पृथ्वी के गुरुत्वीय त्वरण (g) कहते हैं।
गति का आलेखीय निरूपण (Graphical Representation of Motion)
ग्राफ द्वारा यह दिखाया जा सकता है कि समय के साथ स्थिति, वेग या त्वरण किस प्रकार बदलते हैं। ग्राफ में सामान्यतः स्वतंत्र राशि (समय) को X-अक्ष पर तथा आश्रित राशि (स्थिति/वेग) को Y-अक्ष पर दर्शाया जाता है।
स्थिति-समय ग्राफ (Position-Time Graph):
- यदि वस्तु नियत वेग से चल रही हो तो स्थिति-समय ग्राफ एक सीधी रेखा (straight line) होती है (बराबर समय अंतरालों में स्थिति में बराबर परिवर्तन)।
- यदि वेग बदल रहा हो (त्वरित गति) तो ग्राफ एक वक्र (curve) होता है।
- यदि ग्राफ समय-अक्ष के समांतर सीधी रेखा हो (Y-अक्ष पर स्थिर मान) तो वस्तु उस स्थिति पर विरामावस्था में है।
स्थिति-समय ग्राफ से वेग ज्ञात करना: ग्राफ पर किन्हीं दो बिंदुओं A (t₁, s₁) और B (t₂, s₂) को लेकर, स्थिति में परिवर्तन (s₂ − s₁) को समय में परिवर्तन (t₂ − t₁) से भाग देने पर माध्य वेग प्राप्त होता है — इसे रेखा की प्रवणता या ढलान (slope) कहते हैं।
v = (s₂ − s₁) / (t₂ − t₁)
उदाहरणस्वरूप, यदि t = 2 s पर स्थिति 40 m और t = 4 s पर स्थिति 80 m हो, तो v = (80 − 40)/(4 − 2) = 40/2 = 20 m s⁻¹। दो वस्तुओं के स्थिति-समय ग्राफ की तुलना में जिस रेखा की प्रवणता अधिक होती है (अर्थात जो समय-अक्ष से अधिक झुकी होती है), उस वस्तु का वेग अधिक होता है।
वेग-समय ग्राफ (Velocity-Time Graph):
- यदि वेग नियत (अचर) है तो ग्राफ समय-अक्ष के समांतर एक सीधी क्षैतिज रेखा होती है, और त्वरण शून्य होता है।
- यदि वेग नियत त्वरण से बढ़ रहा है तो ग्राफ ऊपर की ओर उठती हुई सीधी रेखा होती है (त्वरण वेग की दिशा में)।
- यदि वेग नियत त्वरण से घट रहा है तो ग्राफ नीचे की ओर झुकती हुई सीधी रेखा होती है (त्वरण वेग की दिशा के विपरीत)।
वेग-समय ग्राफ की प्रवणता (Slope) = त्वरण: रेखा पर दो बिंदुओं A (t₁, u) व B (t₂, v) लेकर,
a = (v − u) / (t₂ − t₁)
उदाहरणस्वरूप t = 10 s पर वेग 5 m s⁻¹ और t = 20 s पर वेग 10 m s⁻¹ हो तो a = (10 − 5)/(20 − 10) = 0.5 m s⁻²। यदि वेग घट रहा हो तो इसी विधि से त्वरण का मान ऋणात्मक (जैसे −0.5 m s⁻²) प्राप्त होता है, जो दर्शाता है कि त्वरण की दिशा वेग की दिशा के विपरीत है।
वेग-समय ग्राफ के नीचे का क्षेत्रफल (Area) = विस्थापन: ग्राफ-रेखा और समय-अक्ष के बीच घिरा क्षेत्रफल उस समय अंतराल में वस्तु के विस्थापन के बराबर होता है।
- नियत वेग की स्थिति में क्षेत्रफल एक आयत (rectangle) होता है: विस्थापन = वेग × समय। उदाहरण के लिए 20 m s⁻¹ के नियत वेग पर 6 s में विस्थापन = 20 × 6 = 120 m।
- नियत त्वरण (बदलते वेग) की स्थिति में क्षेत्रफल एक आयत व एक त्रिभुज के योग के बराबर होता है। उदाहरण के लिए 10 s से 20 s के बीच जहाँ वेग 5 m s⁻¹ से 10 m s⁻¹ तक बढ़ा — विस्थापन = (5 m s⁻¹ × 10 s) + (½ × 10 s × 5 m s⁻¹) = 50 m + 25 m = 75 m।
उदाहरण 4.6 व 4.7 (ग्राफ की व्याख्या):
यदि किसी वाहन का स्थिति-समय ग्राफ समय-अक्ष के समांतर सीधी रेखा हो (जैसे स्थिति सदैव 40 m) तो वाहन विरामावस्था में है। दो वस्तुओं A व B के स्थिति-समय ग्राफ की तुलना करने पर जिस वस्तु की रेखा अधिक तीव्र ढलान (steeper slope) दिखाती है, उसी का वेग अधिक होता है — क्योंकि समान समय अंतराल में उसका विस्थापन अधिक है।
सरल रेखा में नियत त्वरण से गति के लिए शुद्धगतिक समीकरण (Kinematic Equations)
नियत त्वरण वाली सरल रेखीय गति के लिए पाँच राशियों — विस्थापन (s), समय (t), आरंभिक वेग (u), अंतिम वेग (v) और त्वरण (a) — को जोड़ने वाले तीन मुख्य समीकरण हैं। ये तभी वैध हैं जब त्वरण नियत हो।
पहला समीकरण (v = u + at) की व्युत्पत्ति:
माध्य त्वरण के सूत्र a = (v − u)/t से —
at = v − u ⇒ v = u + at (समीकरण 4.4क)
इस समीकरण से यदि आरंभिक वेग (u) व त्वरण (a) ज्ञात हों तो किसी भी क्षण t पर अंतिम वेग (v) निकाला जा सकता है। इसका वेग-समय ग्राफ भी एक सीधी रेखा होती है, जिसकी प्रवणता त्वरण के बराबर होती है।
दूसरा समीकरण (s = ut + ½at²) की व्युत्पत्ति:
वेग-समय ग्राफ में विस्थापन s उस समलंब आकृति (trapezium) OABD के क्षेत्रफल के बराबर होता है, जिसे एक आयत (क्षेत्रफल = u × t) व एक त्रिभुज (क्षेत्रफल = ½ × t × (v − u)) के योग में तोड़ा जा सकता है —
s = (u × t) + ½ × t × (v − u)
अब (v − u) के स्थान पर समीकरण 4.4क से at रखने पर —
s = ut + ½at² (समीकरण 4.4ख)
तीसरा समीकरण (v² = u² + 2as) की व्युत्पत्ति:
समीकरण 4.4क से t = (v − u)/a निकालकर इसे समीकरण 4.4ख में रखने पर तथा सरल करने पर —
s = u(v − u)/a + ½ × a × [(v − u)/a]² ⇒ 2as = v² − u²
v² = u² + 2as (समीकरण 4.4ग)
शुद्धगतिक समीकरणों की तालिका (Kinematic Equations Summary):
| समीकरण संख्या | समीकरण | उपयोग |
| 4.4क | v = u + at | वेग व समय के बीच संबंध |
| 4.4ख | s = ut + ½at² | विस्थापन व समय के बीच संबंध |
| 4.4ग | v² = u² + 2as | वेग व विस्थापन के बीच संबंध (समय के बिना) |
राशियों के मात्रकों (SI Units) की तालिका:
| राशि | प्रतीक | SI मात्रक |
| दूरी / विस्थापन | s | मीटर (m) |
| समय अंतराल | t | सेकंड (s) |
| चाल / वेग | u, v | मीटर प्रति सेकंड (m s⁻¹) |
| त्वरण | a | मीटर प्रति सेकंड वर्ग (m s⁻²) |
उदाहरण 4.8 (ब्रेक लगाने पर रुकने की दूरी):
प्रश्न: किसी कार में ब्रेक लगाने से −4 m s⁻² का त्वरण उत्पन्न होता है। कार कितनी दूरी तय करके रुकेगी यदि ब्रेक लगाते समय इसका वेग (i) 54 km h⁻¹ और (ii) 108 km h⁻¹ हो?
हल: दिया है a = −4 m s⁻², v = 0 m s⁻¹।
समीकरण v² = u² + 2as से: 0 = u² + 2×(−4)×s ⇒ s = u²/8
(i) u = 54 km h⁻¹ = 15 m s⁻¹ ⇒ s = 15²/8 = 225/8 = 28.1 m
(ii) u = 108 km h⁻¹ = 30 m s⁻¹ ⇒ s = 30²/8 = 900/8 = 112.5 m
इसी कारण तेज़ चलने वाले वाहन को आगे चलने वाले वाहन से अधिक सुरक्षित दूरी बनाकर रखनी चाहिए — क्योंकि रुकने की दूरी वेग के वर्ग के अनुपात में बढ़ती है।
समतल में गति एवं एकसमान वृत्तीय गति (Motion in a Plane and Uniform Circular Motion)
जब गति किसी सीधी रेखा में न होकर किसी समतल (plane) में होती है — जैसे वाहन का दूसरे वाहन को ओवरटेक करना, फेंकी गई गेंद का पथ, या उपग्रह का वृत्ताकार पथ में गमन — तो इसे द्विविमीय गति (Motion in Two Dimensions) कहते हैं।
वृत्तीय गति (Circular Motion):
जब कोई वस्तु किसी वृत्ताकार पथ पर गति करती है तो इसकी गति वृत्तीय गति कहलाती है। एक चक्रीय झूले पर बैठा बच्चा A से B होते हुए C तक जाता है — उसके द्वारा चलित दूरी वक्र ABC की लंबाई है, जबकि विस्थापन सीधी रेखा AC है; ये दोनों बराबर नहीं होते।
एक पूरी परिक्रमा (circle का एक चक्कर) में चलित दूरी वृत्त की परिधि के बराबर होती है। यदि पथ की त्रिज्या R हो, तो एक परिक्रमा में चलित दूरी = 2πR, जबकि विस्थापन शून्य होता है (वस्तु अपने मूल बिंदु पर लौट आती है)। यदि वस्तु एक परिक्रमा पूरी करने में समय T लेती है, तो उसकी माध्य चाल —
vav = 2πR / T (समीकरण 4.5)
जबकि उस समय अंतराल T में माध्य वेग शून्य होगा, क्योंकि विस्थापन शून्य है।
एकसमान वृत्तीय गति (Uniform Circular Motion):
जब कोई वस्तु किसी वृत्ताकार पथ पर नियत (अचर) चाल से गति करती है, तो इसे एकसमान वृत्तीय गति कहते हैं। इसमें चाल तो स्थिर रहती है, किंतु वेग की दिशा प्रत्येक बिंदु पर बदलती रहती है (वेग की दिशा उस बिंदु पर वृत्त की स्पर्श रेखा (tangent) के अनुदिश होती है)। चूँकि वेग एक सदिश राशि है और उसकी दिशा निरंतर बदल रही है, इसलिए यह गति त्वरित गति होती है, भले ही चाल स्थिर हो।
- आयताकार पथ पर धावक को एक चक्कर में 4 बार दिशा बदलनी पड़ती है, षट्भुजाकार पथ पर 6 बार।
- जैसे-जैसे पथ की भुजाओं की संख्या बढ़ती जाती है, पथ वृत्त जैसा होता जाता है और दिशा-परिवर्तन निरंतर (सतत) होने लगता है — यही वृत्तीय गति की मूल प्रकृति है।
वास्तविक जगत में पूर्णतः नियत चाल व पूर्णतः वृत्ताकार पथ की स्थितियाँ प्रायः पूरी तरह नहीं मिलतीं, इसलिए एकसमान वृत्तीय गति एक आदर्श (idealised) प्रतिरूप है। फिर भी यह उपयोगी है क्योंकि यह सूर्य के चारों ओर घूमते ग्रहों की गति या वाहन के वृत्ताकार मोड़ पर मुड़ने जैसी जटिल वास्तविक परिस्थितियों को समझने का आधार प्रदान करता है।
महत्वपूर्ण बिंदु (Key Points to Remember)
- किसी संदर्भ बिंदु के सापेक्ष वस्तु की दूरी व दिशा उसकी स्थिति बताती है।
- विस्थापन = स्थिति में सकल परिवर्तन; इसका परिमाण सदैव चलित दूरी से कम या बराबर होता है।
- माध्य चाल = कुल चलित दूरी ÷ समय अंतराल; माध्य वेग = विस्थापन ÷ समय अंतराल।
- माध्य त्वरण = वेग-परिवर्तन ÷ समय अंतराल।
- स्थिति-समय ग्राफ की प्रवणता = वेग; वेग-समय ग्राफ की प्रवणता = त्वरण; वेग-समय ग्राफ के नीचे का क्षेत्रफल = विस्थापन।
- शुद्धगतिक समीकरण: v = u + at, s = ut + ½at², v² = u² + 2as (केवल नियत त्वरण के लिए मान्य)।
- एकसमान वृत्तीय गति में चाल स्थिर परंतु वेग की दिशा निरंतर बदलती रहती है, इसलिए यह त्वरित गति होती है।
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