पाठ – 5
मिश्रण एवं उनके पृथक्करण का अन्वेषण
In this post we have given the detailed notes of class 9 Science chapter 5 Exploring Mixtures and their Separation in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के विज्ञान के पाठ 5 मिश्रण एवं उनके पृथक्करण का अन्वेषण के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Exploration / अन्वेषण (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Science |
| Chapter no. | Chapter 5 |
| Chapter Name | मिश्रण एवं उनके पृथक्करण का अन्वेषण (Exploring Mixtures and their Separation) |
| Category | Class 9 Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 5, मिश्रण एवं उनके पृथक्करण का अन्वेषण
मिश्रणों का वर्गीकरण
हमारे चारों ओर पाए जाने वाले अधिकतर पदार्थ शुद्ध नहीं होते बल्कि दो या दो से अधिक पदार्थों के मिश्रण होते हैं। मिश्रणों को उनके संघटन (composition) की एकरूपता के आधार पर दो वर्गों में बाँटा जाता है।
समांगी मिश्रण (Homogeneous Mixture):
जिस मिश्रण का संघटन पूरे मिश्रण में एकसमान (uniform) होता है, उसे समांगी मिश्रण कहते हैं। एक अच्छी तरह विलोडित चीनी और जल का मिश्रण पहले और आखिरी घूँट में समान रूप से मीठा होता है, इसलिए यह समांगी मिश्रण है। समांगी मिश्रण को विलयन (solution) भी कहते हैं। एक विलयन सदैव समांगी होता है।
- उदाहरण: चीनी-जल का विलयन, सिरका (जल में ऐसीटिक अम्ल), सोडा जल (जल में कार्बन डाइऑक्साइड)
विषमांगी मिश्रण (Heterogeneous Mixture):
जिस मिश्रण का संघटन पूरे मिश्रण में एकसमान नहीं होता, उसे विषमांगी मिश्रण कहते हैं। रेत और जल का विलोडित मिश्रण एकरूप नहीं होता — रेत के कण जल में स्पष्ट दिखाई देते हैं और कुछ समय बाद तली पर बैठ जाते हैं।
- उदाहरण: रेत-जल, तेल-जल, चॉक चूर्ण-जल, दूध-जल का मिश्रण
क्रियाकलाप से निष्कर्ष: जब नमक, चॉक चूर्ण और दूध की कुछ बूँदों को अलग-अलग जल में मिलाकर लेसर प्रकाश डाला जाता है, तो नमक के विलयन में प्रकाश का मार्ग दिखाई नहीं देता, जबकि चॉक चूर्ण (निलंबन) और दूध (कोलॉइड) में प्रकाश का मार्ग स्पष्ट दिखाई देता है। इससे पता चलता है कि ये तीनों भिन्न-भिन्न प्रकार के मिश्रण हैं।
विलयन (Solution)
विलयन एक समांगी मिश्रण है जो तब बनता है जब कोई विलेय (solute — जो पदार्थ घुलता है) किसी विलायक (solvent — जिसमें विलेय घुलता है) में मिश्रित किया जाता है। चीनी-जल के मिश्रण में चीनी विलेय है और जल विलायक है।
विलयन की सांद्रता (Concentration of a Solution):
विलेय की वह मात्रा जो किसी निश्चित मात्रा के विलायक अथवा विलयन में घुली होती है, विलयन की सांद्रता (concentration) कहलाती है। विलयन तैयार करते समय पदार्थों को सदैव सही अनुपात में लेना आवश्यक होता है — जैसे ओ.आर.एस. (ORS) या पीड़कनाशी का छिड़काव तैयार करते समय, यदि अनुपात गलत हो तो अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता।
सांद्रता व्यक्त करने की विधियाँ (प्रतिशत में):
1. द्रव्यमान-द्रव्यमान प्रतिशत (% m/m अथवा % w/w): यह बताता है कि 100 g विलयन में विलेय के कितने ग्राम विद्यमान हैं। इसका उपयोग समांगी मिश्रणों के साथ-साथ दूध पाउडर व मसाला मिश्रण जैसे विषमांगी मिश्रणों तथा डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों के संघटन को व्यक्त करने के लिए भी किया जाता है।
द्रव्यमान-द्रव्यमान प्रतिशत = (विलेय का द्रव्यमान / विलयन का द्रव्यमान) × 100
उदाहरण: 90 g जल में 10 g नमक घोलने पर द्रव्यमान-द्रव्यमान प्रतिशत = (10/100) × 100 = 10% m/m।
2. द्रव्यमान-आयतन प्रतिशत (% m/v अथवा % w/v): इसका उपयोग वहाँ होता है जहाँ द्रव को तौलने की तुलना में उसका आयतन मापना अधिक सुगम होता है, जैसे दवाइयों और प्रयोगशालाओं में (उदाहरण — 5% ग्लूकोस विलयन)। यह बताता है कि 100 mL विलयन में विलेय के कितने ग्राम विद्यमान हैं।
द्रव्यमान-आयतन प्रतिशत = (विलेय का द्रव्यमान / विलयन का आयतन) × 100
उदाहरण: 100 mL विलयन में 5 g ग्लूकोस घोलने पर सांद्रता = (5/100) × 100 = 5% m/v। (साथ ही, चिकित्सालयों में प्रयुक्त लवणीय (saline) विलयन 0.9% m/v सोडियम क्लोराइड का विलयन होता है।)
3. आयतन-आयतन प्रतिशत (% v/v): यह विधि तब प्रयुक्त होती है जब दो मिश्रणीय द्रवों (miscible liquids) को मिलाया जाता है, जैसे इत्र, सौंदर्य प्रसाधन और सिरका। यह बताता है कि 100 mL विलयन में विलेय के कितने mL उपस्थित हैं।
आयतन-आयतन प्रतिशत = (विलेय का आयतन / विलयन का आयतन) × 100
उदाहरण: 100 mL पीड़कनाशी छिड़काव में 1 mL पीड़कनाशी मिश्रित होने पर % v/v = (1/100) × 100 = 1% v/v।
टिप्पणी: उद्योगों में सामान्यतः भार-भार प्रतिशत (% w/w) प्रयुक्त होता है, क्योंकि भार तथा द्रव्यमान को प्रायः एक-दूसरे के स्थान पर प्रयुक्त किया जाता है। संख्यात्मक रूप से % m/m और % w/w दोनों समान होते हैं।
पदार्थों की विलेयता (Solubility):
विलेय की वह अधिकतम मात्रा जो किसी निश्चित तापमान पर विलायक की एक निश्चित मात्रा (100 mL या 100 g) में घुलती है, उसकी विलेयता (solubility) कहलाती है। जो विलयन उस तापमान पर और अधिक विलेय को नहीं घोल सकता, उसे संतृप्त विलयन (saturated solution) कहते हैं।
- ठोस विलेय की द्रव विलायक में विलेयता सामान्यतः तापमान बढ़ने के साथ बढ़ती है।
- गैसों की द्रवों में विलेयता सामान्यतः तापमान बढ़ने के साथ घटती है।
तापमान के सापेक्ष विलेयता के ग्राफ को विलेयता वक्र (solubility curve) कहते हैं। विलेयता एक महत्त्वपूर्ण गुणधर्म है जिसका उपयोग मिश्रणों से पदार्थों को पृथक करने के लिए किया जाता है।
समांगी मिश्रणों के पृथक्करण की विधियाँ
1. क्रिस्टलीकरण (Crystallization):
यदि किसी संतृप्त विलयन को उच्च तापमान पर तैयार करके धीरे-धीरे ठंडा किया जाए, तो घटते तापमान पर विलेय की विलेयता कम हो जाने के कारण अतिरिक्त विलेय शुद्ध ठोस क्रिस्टलों के रूप में पृथक हो जाता है। क्रिस्टल एक ऐसा ठोस पदार्थ है जो कणों की एक नियमित ज्यामितीय प्रतिरूप (regular geometric pattern) से निर्मित होता है — जैसे सेंधा नमक, मिश्री (कैंडी शुगर), हिमकण (snowflakes) और तुषार (frost)।
प्रयोगशाला में किसी संतृप्त विलयन से क्रिस्टल बनाने की प्रक्रिया को क्रिस्टलीकरण कहा जाता है। इस विधि का उपयोग दो ऐसे घुलनशील ठोस पदार्थों के पृथक्करण के लिए किया जाता है जिनमें से एक पदार्थ अल्प मात्रा में उपस्थित हो और दोनों एक ही विलायक में घुलनशील हों। इसका उपयोग ठोस पदार्थों के शुद्धिकरण के लिए भी होता है। सिद्धांत: क्रिस्टलीकरण द्वारा शुद्धिकरण, विभिन्न तापमानों पर पदार्थ की विलेयता में भिन्नता के सिद्धांत पर आधारित है।
प्रयोगशाला विधि (कॉपर सल्फेट के क्रिस्टल): कॉपर सल्फेट का संतृप्त विलयन जल-ऊष्मक पर बनाया जाता है (सल्फ्यूरिक अम्ल की एक बूँद अवांछित अभिक्रियाओं को रोकती है), गर्म विलयन को निस्यंदित कर अशुद्धियाँ हटाई जाती हैं, फिर इसे स्थिर रखकर धीरे-धीरे ठंडा होने दिया जाता है जिससे बड़े, चमकदार, सुरूपित नीले क्रिस्टल बनते हैं। इन्हें निस्यंदित कर, ठंडे जल से धोकर सुखाया जाता है। समुद्री जल से नमक के क्रिस्टल भी इसी सिद्धांत पर प्राप्त किए जाते हैं (समुद्री जल → संतृप्त विलयन → नमक के क्रिस्टल)।
2. आसवन (Distillation):
दो मिश्रणीय द्रवों (miscible liquids) के समांगी मिश्रण को गर्म करने पर कम क्वथनांक (boiling point) वाला द्रव पहले वाष्पित हो जाता है। इस वाष्प को संघनित्र (condenser) से गुजारकर ठंडा किया जाता है, जिससे वह पुनः शुद्ध द्रव में परिवर्तित हो जाता है और एक पृथक पात्र में एकत्रित हो जाता है, जबकि मिश्रण में उपस्थित ठोस या दूसरा द्रव आसवन फ्लास्क में ही रह जाता है। इस प्रक्रिया को आसवन कहते हैं।
आसवन विधि उन द्रवों को पृथक करने के लिए उपयुक्त है जिनके क्वथनांकों में कम-से-कम 25°C का अंतर हो। इसका उपयोग विलायक को पुनः प्राप्त करने या किसी विलयन (जिसमें ठोस घुलनशील पदार्थ हो) से द्रव प्राप्त करने के लिए भी किया जाता है। उदाहरण के लिए, ऐसीटोन (क्वथनांक 56°C) और जल (क्वथनांक 100°C) के मिश्रण को आसवन विधि द्वारा आसानी से पृथक किया जा सकता है क्योंकि इनके क्वथनांकों में बड़ा अंतर है। कन्नौज (उत्तर प्रदेश) की पारंपरिक ‘देग-भापका विधि’ से मिट्टी का इत्र (सोंधी सुगंध) भी आसवन द्वारा बनाया जाता है।
प्रभाजी आसवन (Fractional Distillation):
प्रभाजी आसवन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मिश्रण के ऐसे घटकों को पृथक किया जाता है जिनके क्वथनांकों में अपेक्षाकृत कम अंतर (25°C से कम) होता है। इसका सबसे बड़ा औद्योगिक उदाहरण पेट्रोलियम परिशोधनशाला (refinery) है, जहाँ अपरिष्कृत तेल (crude oil) को प्रभाजी आसवन द्वारा पेट्रोलियम गैस, पेट्रोल, वैमानिक ईंधन (किरोसीन), डीज़ल, स्नेहक तेल और बिटुमिन जैसे विभिन्न उपयोगी प्रभाजों में पृथक किया जाता है। गैसीय प्रभाज को उच्च दाब पर सिलेंडरों में द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) के रूप में भरा जाता है।
3. कागज वर्णलेखिकी (Paper Chromatography):
‘वर्णलेखिकी’ (Chromatography) शब्द दो ग्रीक शब्दों — क्रोमा (रंग) तथा ग्रेफीन (लिखना) — से बना है, जिसका अर्थ है ‘रंग से लिखना’, क्योंकि प्रारंभ में इसका उपयोग रंजकों व स्याहियों जैसे रंगीन पदार्थों के पृथक्करण के लिए किया गया था।
वर्णलेखन कागज (या निस्यंदक पत्र) की एक पट्टी पर नीचे से थोड़ा ऊपर एक रेखा पर स्याही का बिंदु अंकित किया जाता है। पट्टी को इस प्रकार जल में खड़ा किया जाता है कि जल-स्तर बिंदु से नीचे रहे। जैसे-जैसे जल कागज पर ऊपर चढ़ता है, स्याही भिन्न-भिन्न रंगों के धब्बों में पृथक हो जाती है।
सिद्धांत: यह विधि घटकों की विलायक तथा कागज के साथ अंतर्क्रिया (interaction) में अंतर का उपयोग करती है — द्रव (विलायक) पदार्थों को कागज पर ऊपर की ओर ले जाता है और उनकी गति की दर में अंतर के आधार पर उन्हें पृथक कर देता है। पालक की पत्तियों के हरे सत्व में उपस्थित वर्णक (pigments) या पुष्प की पंखुड़ियों के रंगीन वर्णक भी इसी प्रकार पृथक किए जा सकते हैं। जल हर स्थिति में विलायक का कार्य नहीं करता — कभी-कभी ऐल्कोहॉल या विलायकों के मिश्रण की आवश्यकता होती है।
विषमांगी मिश्रणों के घटकों का पृथक्करण
1. दो अमिश्रणीय द्रवों का पृथक्करण — पृथक्कारी कीप (Separating Funnel):
तेल और जल जैसे द्रव आपस में मिश्रित नहीं होते, इन्हें अमिश्रणीय द्रव (immiscible liquids) कहते हैं और ये पृथक परतें बनाते हैं। सरसों के तेल और जल के मिश्रण को पृथक्कारी कीप में डालकर स्थिर छोड़ दिया जाता है — कम घनत्व वाला पीले रंग का तेल ऊपरी परत बनाता है और अधिक घनत्व वाला जल निचली परत बनाता है। कीप के स्टॉपकॉक को धीरे-धीरे खोलकर पहले निचली परत (जल) को एक पात्र में एकत्रित किया जाता है, स्टॉपकॉक बंद किया जाता है, और फिर तेल की परत को अलग पात्र में एकत्रित किया जाता है। सिद्धांत: यह विधि दोनों द्रवों के भिन्न घनत्व पर आधारित है।
2. ऊर्ध्वपातन (Sublimation):
कुछ ठोस पदार्थ गर्म करने पर (गलनांक से निम्न ताप पर) द्रव अवस्था में परिवर्तित हुए बिना सीधे ठोस अवस्था से वाष्प अवस्था में परिवर्तित हो जाते हैं — इस प्रक्रिया को ऊर्ध्वपातन (sublimation) कहते हैं। शीतलन पर वाष्प बिना द्रव बने पुनः ठोस में संघनित हो जाती है, इसे निक्षेपण (deposition) कहते हैं।
पिसे कर्पूर (camphor) और रेत के मिश्रण को चीनी मिट्टी की प्याली में गर्म करने पर कर्पूर ऊर्ध्वपातित होकर एक उल्टी रखी कीप (जिसकी नलिका रूई से बंद हो) की भीतरी दीवार पर श्वेत ठोस के रूप में जम जाता है, जबकि रेत प्याली में शेष रह जाती है, क्योंकि रेत गर्म करने पर ऊर्ध्वपातित नहीं होती। नैफ्थलीन भी एक अन्य ऊर्ध्वपातित होने वाला पदार्थ है। ठोस कार्बन डाइऑक्साइड (शुष्क बर्फ / dry ice), जिसका उपयोग आइसक्रीम भंडारण में होता है, भी ऊर्ध्वपातित होता है।
मिश्रधातु (Alloy): सामान्य ताप पर धातुएँ एक-दूसरे में विलेय नहीं होतीं, परंतु उच्च तापमान पर पिघलाकर मिलाने पर एक विलयन बनता है, जो ठंडा होने पर एक नए ठोस पदार्थ (मिश्रधातु) में बदल जाता है जो अकेली धातु जैसा प्रतीत होता है। दो या दो से अधिक धातुओं का, अथवा एक धातु और एक अधातु का समांगी मिश्रण मिश्रधातु (alloy) कहलाता है। भौतिक विधियों द्वारा मिश्रधातु के घटकों को पृथक नहीं किया जा सकता। उदाहरण — पीतल (लगभग 80% कॉपर और 20% जिंक), काँसा (लगभग 80% ताँबा और 20% टिन), स्टेनलेस स्टील (आयरन के साथ कार्बन, क्रोमियम, निकैल, मोलिब्डेनम)।
3. निलंबन (Suspension):
ऐसे विषमांगी मिश्रण जिनमें ठोस कण घुलते नहीं हैं अपितु संपूर्ण माध्यम में निलंबित रहते हैं, निलंबन कहलाते हैं। निलंबन में कणों का आकार विलयन के कणों की अपेक्षा बड़ा होता है और ये नग्न आँखों से दिखाई देते हैं (जैसे रेत-जल, लकड़ी का बुरादा-जल, चाय की पत्तियाँ-जल)। पंकिल (मटमैले) जल को स्थिर छोड़ने पर भारी कण नीचे बैठ जाते हैं, परंतु सूती कपड़े या निस्यंदक पत्र से छानने पर भी सूक्ष्म कण नहीं हट पाते और जल धुँधला रह जाता है। ऐसी स्थिति में अपकेंद्रण और/अथवा स्कंदन का उपयोग किया जाता है।
अपकेंद्रण (Centrifugation):
इस प्रक्रिया में मिश्रण को एक नलिका में तीव्र गति से घुमाया जाता है। घूर्णन के समय अपकेंद्रीय बल (centrifugal force) भारी कणों को बाहर की ओर खींचता है, जहाँ वे नलिका की तली पर बैठ जाते हैं, जबकि हल्का द्रव ऊपर रह जाता है। सिद्धांत: यह अपकेंद्रीय बल पर आधारित है। प्रयोगशाला में रक्त के घटकों (लाल रक्त कोशिकाओं और प्लाज्मा) को पृथक करने तथा अनेक रासायनिक उद्योगों में इसका व्यापक उपयोग होता है। हाथ से चलने वाला सस्ता उपकरण ‘पेपरफ्यूज’ (paperfuge) भी बिना बिजली के यही कार्य करता है और दूरस्थ क्षेत्रों में मलेरिया व ऐनीमिया जैसे रोगों की जाँच में सहायक है।
स्कंदन (Coagulation):
फिटकरी (alum) के चूर्ण को पंकिल जल में मिलाने पर वह सूक्ष्म निलंबित कणों को एकत्रित (गुच्छों के रूप में) कर देती है — इस प्रक्रिया को स्कंदन कहते हैं और फिटकरी एक स्कंदक (coagulant) के रूप में कार्य करती है। बने गुच्छे गुरुत्वाकर्षण के कारण तली पर बैठ जाते हैं (अवसादन/sedimentation) और इन्हें निस्तारण (decantation) या निस्यंदन (filtration) द्वारा जल से पृथक किया जा सकता है। दूध से पनीर बनाने की प्रक्रिया भी स्कंदन है, जिसमें अम्ल (नींबू का रस या सिरका) स्कंदक का कार्य करता है और दूध के प्रोटीन का स्कंदन कर देता है।
कोलॉइड (Colloid)
रक्त न तो एक विलयन है और न ही एक वास्तविक निलंबन — यह एक कोलॉइड है। दूध, टमाटर सॉस तथा आइसक्रीम कोलॉइड के अन्य उदाहरण हैं।
विलयन, निलंबन और कोलॉइड मुख्यतः घुले हुए या निलंबित कणों के आकार के आधार पर भिन्न होते हैं:
- विलयन में कणों का आकार सबसे छोटा होता है (1 nm से कम व्यास)
- कोलॉइड में कणों का आकार अपेक्षाकृत बड़ा होता है (1 से 1000 nm व्यास)
- निलंबन में कण सबसे बड़े होते हैं (1000 nm से अधिक व्यास)
निलंबन के विपरीत, कोलॉइड के कण समय के साथ तली पर नहीं बैठते — वे संपूर्ण मिश्रण में समान रूप से फैले रहते हैं, ठीक विलयन की भाँति।
परिक्षिप्त प्रावस्था (Dispersed Phase) और परिक्षेपण माध्यम (Dispersion Medium): कोलॉइड में विलेय जैसे घटक या परिक्षिप्त कणों को परिक्षिप्त प्रावस्था कहते हैं, और जिस माध्यम में यह प्रावस्था निलंबित रहती है, उसे परिक्षेपण माध्यम कहा जाता है।
पायस (Emulsion): कुछ सामान्य कोलॉइड जिनमें परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम दोनों ही द्रव होते हैं, पायस (इमल्शन) कहलाते हैं। तेल-जल पायस दो प्रकार के होते हैं — जल में तेल (उदाहरण — दूध, वैनिशिंग क्रीम) और तेल में जल (उदाहरण — मक्खन, बॉडी लोशन, कोल्ड क्रीम)। पायसी कारक (emulsifying agent) पायस को स्थिर करते हैं, जैसे दूध और मक्खन में प्रोटीन।
टिंडल प्रभाव (Tyndall Effect)
जब प्रकाश की एक संकीर्ण किरणपुंज किसी कोलॉइड या निलंबन में से गुजरती है, तो कणों द्वारा प्रकाश का प्रकीर्णन (scattering) हो जाता है जिससे उसका मार्ग दृश्य हो जाता है, परंतु जब यह किसी पारदर्शी सच्चे विलयन से गुजरती है तो ऐसा नहीं होता, क्योंकि विलयन के कण इतने छोटे होते हैं कि प्रकाश को प्रकीर्णित नहीं कर पाते। इस घटना को टिंडल प्रभाव कहा जाता है — इसका नाम वैज्ञानिक जॉन टिंडल के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने सबसे पहले कणों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन का अध्ययन किया था।
यह प्रभाव तब भी देखा जा सकता है जब किसी अंधेरे कक्ष में छोटे छिद्र से प्रकाश की संकीर्ण किरणपुंज प्रवेश करती है (वायु में धूल व धुएँ के कणों द्वारा प्रकीर्णन) या खेल स्टेडियम की फ्लड लाइट्स में, अथवा घने वृक्ष की पत्तियों के मध्य छोटे अंतरालों से छनकर आते सूर्य के प्रकाश में।
विलयन, निलंबन और कोलॉइड की तुलना
| गुणधर्म | विलयन (Solution) | निलंबन (Suspension) | कोलॉइड (Colloid) |
| प्रकृति | समांगी | विषमांगी | विषमांगी (देखने में समांगी प्रतीत) |
| कणों का आकार | 1 nm से कम | 1000 nm से अधिक | 1 nm से 1000 nm के बीच |
| दृश्यता (नग्न आँखों से) | कण दिखाई नहीं देते | कण स्पष्ट दिखाई देते हैं | कण सामान्यतः नहीं दिखते |
| निस्यंदन द्वारा पृथक्करण | नहीं हो सकता | हो सकता है (आंशिक रूप से) | सामान्य निस्यंदक पत्र से नहीं हो सकता |
| निःसादन (settling) | नहीं होता | स्थिर छोड़ने पर तली में बैठ जाते हैं | नहीं होता |
| टिंडल प्रभाव | नहीं दिखाता | दिखाता है | दिखाता है |
पृथक्करण की विधियों का सारांश
| विधि | सिद्धांत / आधार | किसके लिए उपयुक्त |
| क्रिस्टलीकरण (Crystallization) | विभिन्न तापमानों पर विलेयता में भिन्नता | संतृप्त विलयन से शुद्ध ठोस क्रिस्टल प्राप्त करना; दो घुलनशील ठोसों का पृथक्करण/शुद्धिकरण |
| आसवन (Distillation) | क्वथनांकों में कम-से-कम 25°C का अंतर | दो मिश्रणीय द्रवों को पृथक करना; विलयन से विलायक पुनः प्राप्त करना |
| प्रभाजी आसवन (Fractional Distillation) | क्वथनांकों में 25°C से कम का अंतर | पेट्रोलियम/कच्चे तेल के विभिन्न प्रभाजों (पेट्रोल, डीज़ल, केरोसिन आदि) का पृथक्करण |
| कागज वर्णलेखिकी (Paper Chromatography) | घटकों की विलायक व कागज के साथ अंतर्क्रिया व गति की दर में अंतर | स्याही, रंजक, पादप वर्णक जैसे घटकों को पृथक करना |
| पृथक्कारी कीप (Separating Funnel) | द्रवों के भिन्न घनत्व | दो अमिश्रणीय द्रवों (जैसे तेल-जल) का पृथक्करण |
| ऊर्ध्वपातन (Sublimation) | एक घटक का सीधे ठोस से वाष्प में परिवर्तित होना | कर्पूर, नैफ्थलीन जैसे ऊर्ध्वपातित पदार्थों को अऊर्ध्वपातित ठोस (जैसे रेत) से पृथक करना |
| अपकेंद्रण (Centrifugation) | अपकेंद्रीय बल द्वारा भारी कणों का बाहर की ओर विस्थापन | रक्त के घटकों (RBC, प्लाज्मा) का पृथक्करण; सूक्ष्म निलंबित कणों को द्रव से पृथक करना |
| स्कंदन (Coagulation) | स्कंदक द्वारा सूक्ष्म कणों को बड़े गुच्छों में एकत्रित करना | पंकिल जल का शुद्धिकरण (फिटकरी); दूध से पनीर बनाना (अम्ल) |
| निस्तारण (Decantation) व निस्यंदन (Filtration) | अवसादित/स्कंदित कणों को द्रव से भौतिक रूप से अलग करना | अवसादन के बाद स्वच्छ जल प्राप्त करना |
| चुंबकीय पृथक्करण (Magnetic Separation) | एक घटक का चुंबकीय होना | लोहे की कीलों को लकड़ी के बुरादे से पृथक करना |
दैनिक जीवन और पर्यावरण में पृथक्करण
पृथक्करण की प्रक्रिया प्रकृति और हमारे शरीर में भी होती है — उदाहरण के लिए, हमारे गुर्दे रक्त से अपशिष्ट पदार्थों को पृथक करते हैं। वाहित मल जल (sewage) को पर्यावरण में छोड़ने से पहले उसका उपचार करना आवश्यक है, जिसमें अवसादन, स्कंदन और निस्यंदन जैसी प्रक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं। घर से निकलने वाले सूखे कचरे (प्लास्टिक, कागज, काँच, धातु) को पुनर्चक्रित किया जा सकता है और गीले कचरे (भोजन के अवशेष, सब्जियों के छिलके) से खाद (कंपोस्ट) बनाई जा सकती है। पुरानी बैटरियों से लीथियम जैसे मूल्यवान पदार्थों को पुनः प्राप्त करने की विधियाँ भी विकसित की जा रही हैं।
मुख्य बिंदु (एक नज़र में)
- मिश्रणों को समांगी अथवा विषमांगी के रूप में तथा विलयन, निलंबन अथवा कोलॉइड के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
- शुद्ध पदार्थ प्राप्त करने के लिए मिश्रणों का पृथक्करण एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है।
- क्रिस्टलीकरण एक ऐसी तकनीक है जो संतृप्त विलयन से शुद्ध ठोस प्राप्त करने के लिए उपयोग होती है।
- आसवन का उपयोग कम-से-कम 25°C के क्वथनांक अंतर वाले दो मिश्रणीय द्रवों को पृथक करने के लिए किया जाता है; इसका उपयोग द्रव और ठोस के मिश्रण से द्रव प्राप्त करने में भी होता है।
- कागज वर्णलेखिकी का उपयोग यौगिकों को कागज पर उनकी गति की दर में अंतर के आधार पर पृथक करने के लिए किया जा सकता है।
- पृथक्कारी कीप का उपयोग दो अमिश्रणीय द्रवों को उनके भिन्न घनत्व के आधार पर पृथक करने के लिए किया जाता है।
- किसी ठोस का बिना द्रव अवस्था से गुजरे सीधे वाष्प में बदल जाना (गलनांक से नीचे) ऊर्ध्वपातन कहलाता है; वाष्प का ठंडा होकर बिना द्रव बने पुनः ठोस बनना निक्षेपण कहलाता है।
- अपकेंद्रण तीव्र घूर्णन का उपयोग करके ठोस-द्रव मिश्रण से भारी ठोस कणों को पृथक करता है।
- स्कंदन में एक स्कंदक पदार्थ मिलाकर विषमांगी ठोस-द्रव मिश्रण के छोटे कणों को गुच्छों में एकत्रित कर तली में बैठाया जाता है।
- कोलॉइड अथवा निलंबन के परिक्षिप्त कण प्रकाश को प्रकीर्णित करते हैं, जिसे टिंडल प्रभाव कहा जाता है।
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