पाठ – 10
ध्वनि तरंगें — अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
In this post we have given the detailed notes of class 9 Science chapter 10 Sound Waves: Characteristics and Applications in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के विज्ञान के पाठ 10 ध्वनि तरंगें — अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Exploration / अन्वेषण (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Science |
| Chapter no. | Chapter 10 |
| Chapter Name | ध्वनि तरंगें — अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग (Sound Waves: Characteristics and Applications) |
| Category | Class 9 Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 10, ध्वनि तरंगें — अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
ध्वनि का उत्पादन (Production of Sound)
कंपन (Vibration): किसी वस्तु की आगे-पीछे की आवर्ती गति (दोलन) को कंपन कहते हैं। सभी क्रियाकलापों से यह निष्कर्ष निकलता है कि ध्वनि कंपन करती हुई वस्तुओं द्वारा उत्पन्न होती है। जब तक कोई वस्तु कंपन करती रहती है तभी तक ध्वनि उत्पन्न होती है; कंपन रुकते ही ध्वनि भी बंद हो जाती है।
- तनी हुई डोरी को खींचकर छोड़ने या धातु की वस्तु पर प्रहार करने से कंपन उत्पन्न होकर ध्वनि बनती है।
- बाँसुरी में फूँक मारने पर उसके भीतर की वायु का स्तंभ (air column) कंपन करता है।
- ध्वनि उत्पन्न करने वाली वस्तु को ध्वनि का स्रोत (source) कहते हैं।
- मनुष्यों में ध्वनि गले (कंठ/larynx) में स्थित वाक् तंतु (vocal cords) के कंपन से उत्पन्न होती है। टिड्डे और झींगुर जैसे कुछ जंतु अपने शरीर के अंगों को परस्पर रगड़कर या टकराकर ध्वनि उत्पन्न करते हैं।
स्वरित्र द्विभुज (Tuning Fork):
स्वरित्र द्विभुज एक U-आकृति की धात्विक (स्टील या एलुमिनियम) छड़ होती है जिसमें एक स्तंभ (stem) और दो भुजाएँ (prongs) होती हैं। भुजाओं को रबड़ के पैड पर टकराकर कंपित किया जाता है। कंपायमान भुजा को जल की सतह से स्पर्श कराने पर जल की सतह पर तरंगें बनती हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि ध्वनि कंपन के कारण ही उत्पन्न होती है।
ध्वनि का संचरण (Propagation of Sound)
माध्यम (Medium): वह पदार्थ जिससे होकर ध्वनि संचरित होती है, माध्यम कहलाता है। ध्वनि ठोस, द्रव और गैस — तीनों प्रकार के माध्यमों से होकर संचरण कर सकती है। ठोस डेस्क पर कान लगाने पर ध्वनि स्पष्ट सुनाई देती है और जल में डूबे हुए चम्मचों की टकराहट की ध्वनि भी सुनाई देती है, जिससे स्पष्ट होता है कि ध्वनि ठोसों और द्रवों से होकर भी संचरण करती है।
निर्वात (Vacuum): ऐसा स्थान जहाँ कोई माध्यम (द्रव्य) नहीं होता, निर्वात कहलाता है। निर्वात बेलजार प्रयोग में जैसे-जैसे बेलजार से हवा बाहर निकाली जाती है, अंदर बज रही विद्युत घंटी की ध्वनि धीमी होती जाती है और लगभग निर्वात होने पर सुनाई देना बंद हो जाती है, जबकि घंटी को बजते हुए देखा जा सकता है। इससे सिद्ध होता है कि ध्वनि को संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है — ध्वनि निर्वात में संचरित नहीं हो सकती। यही कारण है कि अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में सीधे एक-दूसरे की आवाज़ नहीं सुन सकते और विशेष उपकरणों के माध्यम से संवाद करते हैं।
ध्वनि तरंगें (Sound Waves)
वायु से भरी एक लंबी नली में पिस्टन के आगे-पीछे दोलन करने से वायु के कणों का घनत्व बदलता है:
- संपीडन (Compression – C): पिस्टन की अग्र (आगे की) गति से वायु के कण पास-पास आ जाते हैं, जिससे वायु का घनत्व औसत घनत्व से अधिक हो जाता है।
- विरलन (Rarefaction – R): पिस्टन की पश्च (पीछे की) गति से वायु के कण दूर-दूर फैल जाते हैं, जिससे वायु का घनत्व औसत घनत्व से कम हो जाता है।
ध्वनि तरंग (Sound Wave): किसी माध्यम में उसके कणों के वास्तविक स्थानांतरण के बिना क्रमिक रूप से संचरित होते संपीडनों और विरलनों की श्रृंखला को ध्वनि तरंग कहते हैं। ध्यान रहे — माध्यम के कण अपनी माध्य स्थिति के इधर-उधर ही दोलन करते हैं, वे तरंग के साथ आगे नहीं बढ़ते; केवल विक्षोभ (घनत्व परिवर्तन) आगे बढ़ता है।
अनुदैर्ध्य तरंग (Longitudinal Wave): जिन तरंगों में माध्यम के कण तरंग-संचरण की दिशा के समांतर कंपन करते हैं, उन्हें अनुदैर्ध्य तरंग कहते हैं। ध्वनि तरंग एक अनुदैर्ध्य तरंग है। इसके विपरीत, जिन तरंगों (जैसे प्रकाश) में कण तरंग-संचरण की दिशा के लंबवत कंपन करते हैं, वे अनुप्रस्थ तरंगें (transverse waves) कहलाती हैं।
यांत्रिक तरंग (Mechanical Wave): जिन तरंगों को संचरण के लिए भौतिक माध्यम की आवश्यकता होती है, उन्हें यांत्रिक तरंग कहते हैं। ध्वनि तरंग एक यांत्रिक अनुदैर्ध्य तरंग है, जबकि प्रकाश जैसी अनुप्रस्थ तरंग निर्वात में भी गमन कर सकती है क्योंकि वह यांत्रिक तरंग नहीं है।
ध्वनि तरंगों की ऊर्जा (Energy of Sound Waves)
ध्वनि ऊर्जा का एक रूप है। जब ध्वनि स्रोत कंपन करता है, तो वह आस-पास के माध्यम में ऊर्जा स्थानांतरित करता है। ध्वनि तरंग के संचरण में माध्यम के कणों की स्वयं की गति नहीं होती, बल्कि ऊर्जा का स्थानांतरण होता है — यह क्रियाकलाप में धातु की प्लेट के पास रखी अनाज के दानों के उछलने से प्रमाणित होता है। माइक्रोफोन ध्वनि ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है, जबकि स्पीकर इसका उल्टा कार्य करता है — विद्युत संकेत को कंपन में बदलकर ध्वनि उत्पन्न करता है।
ध्वनि तरंग का आलेखीय निरूपण (Graphical Representation)
यदि किसी निश्चित समय पर माध्यम के घनत्व को दूरी के साथ आलेखित किया जाए, तो संपीडन के क्षेत्र में घनत्व औसत घनत्व से अधिक होकर उच्चतम बिंदु पर पहुँचता है, जिसे श्रृंग (crest) कहते हैं, और विरलन के क्षेत्र में घनत्व औसत से कम होकर निम्नतम बिंदु पर पहुँचता है, जिसे गर्त (trough) कहते हैं।
ध्वनि तरंग के अभिलक्षण (Characteristics of a Sound Wave)
तरंगदैर्घ्य, आवृत्ति और आवर्तकाल:
तरंगदैर्घ्य (Wavelength): दो क्रमागत श्रृंगों (या दो क्रमागत गर्तों) के मध्य की दूरी को तरंग का तरंगदैर्घ्य कहते हैं। इसे ग्रीक अक्षर λ (लैम्डा) द्वारा दर्शाया जाता है। इसका SI मात्रक मीटर (m) है।
आवृत्ति (Frequency): किसी नियत बिंदु पर प्रति इकाई समय में होने वाले घनत्व दोलनों की संख्या को ध्वनि तरंग की आवृत्ति कहते हैं। इसे ग्रीक अक्षर ν (न्यू) द्वारा दर्शाया जाता है। इसका SI मात्रक प्रति सेकंड (s⁻¹) है, जिसे हर्ट्ज (Hz) भी कहते हैं।
आवर्तकाल (Time Period): किसी निश्चित बिंदु पर घनत्व के एक पूर्ण दोलन में लगने वाले समय को आवर्तकाल कहते हैं। इसे प्रतीक T से दर्शाया जाता है। इसका SI मात्रक सेकंड (s) है। आवृत्ति और आवर्तकाल एक-दूसरे के व्युत्क्रम (inverse) होते हैं:
ν = 1 / T …(समीकरण 10.1)
| राशि (Quantity) | प्रतीक | SI मात्रक |
| तरंगदैर्घ्य (Wavelength) | λ | मीटर (m) |
| आवृत्ति (Frequency) | ν | हर्ट्ज (Hz या s⁻¹) |
| आवर्तकाल (Time Period) | T | सेकंड (s) |
| चाल (Speed) | v | मीटर प्रति सेकंड (m s⁻¹) |
उदाहरण 10.1 — यदि किसी दी गई स्थिति में 2 सेकंड में 10 घनत्व दोलन होते हैं तब (i) ध्वनि तरंग की आवृत्ति और (ii) इसके आवर्तकाल का परिकलन कीजिए।
हल:
ध्वनि तरंग की आवृत्ति = दोलनों की संख्या / लिया गया समय = 10 / 2 s = 5 Hz
किसी दी गई स्थिति पर एकल घनत्व दोलन में लगा समय (आवर्तकाल) = 2 s / 10 = 0.2 s
आयाम और तीव्रता (Amplitude and Intensity):
आयाम (Amplitude): औसत घनत्व की तुलना में संपीडन (या विरलन) में वायु के घनत्व में होने वाला अधिकतम परिवर्तन ध्वनि तरंग का आयाम कहलाता है। घनत्व में परिवर्तन जितना अधिक होगा, तरंग का आयाम उतना ही बड़ा होगा। अधिक आयाम वाली तरंग अधिक ऊर्जा वहन करती है, अर्थात आयाम और ऊर्जा में सीधा संबंध होता है।
तीव्रता (Intensity): ध्वनि संचरण की दिशा के लंबवत एकांक क्षेत्रफल से एकांक समय में संचरित होने वाली ध्वनि ऊर्जा की मात्रा को ध्वनि की तीव्रता कहते हैं। स्रोत से दूरी बढ़ने पर ध्वनि उसी ऊर्जा को बड़े क्षेत्रफल में फैलाती है, इसलिए तीव्रता दूरी के साथ घटती जाती है।
ध्वनि की चाल (Speed of Sound):
ध्वनि की चाल वह दूरी है जो तरंग का कोई बिंदु (जैसे श्रृंग या गर्त) एकांक समय में तय करता है। एक तरंगदैर्घ्य (λ) की दूरी एक आवर्तकाल (T) में तय होती है, इसलिए:
v = λ / T, और चूँकि ν = 1/T, अतः
v = λ × ν …(समीकरण 10.2)
अर्थात चाल = तरंगदैर्घ्य × आवृत्ति
ध्वनि की चाल माध्यम पर निर्भर करती है — यह ठोसों में सबसे तेज़, द्रवों में उससे धीमी और गैसों में सबसे धीमी गति से चलती है। सामान्यतः जल में ध्वनि की चाल वायु की तुलना में 4-5 गुना और ठोसों में वायु की तुलना में 15-20 गुना अधिक होती है। वायु में ध्वनि की चाल ताप और आर्द्रता बढ़ने पर बढ़ती है — उदाहरणतः शुष्क वायु में 0°C पर लगभग 331 m s⁻¹ और 22°C पर लगभग 344 m s⁻¹ होती है।
| अवस्था | पदार्थ/माध्यम | लगभग चाल (15°C पर) |
| ठोस | स्टील | 5000 m s⁻¹ |
| द्रव | जल | 1500 m s⁻¹ |
| गैस | वायु | 340 m s⁻¹ |
उदाहरण 10.2 — मनुष्यों में ध्वनि की श्रव्यता का परिसर लगभग 20 Hz से 20 kHz होता है। वायु में इन दोनों आवृत्तियों के संगत तरंगदैर्घ्य क्या हैं? (वायु में ध्वनि की चाल = 344 m s⁻¹)
हल: λ = v / ν
(i) ν = 20 Hz के लिए: λ = 344 / 20 = 17.2 m
(ii) ν = 20000 Hz के लिए: λ = 344 / 20000 = 0.0172 m = 1.72 cm
उदाहरण 10.3 — मेघों की गड़गड़ाहट के समय गर्जन की ध्वनि से पूर्व तड़ित (बिजली) की चमक दिखाई देती है क्योंकि प्रकाश की तुलना में ध्वनि बहुत धीमी गति से गमन करती है। यदि तड़ित की चमक देखने और गर्जन सुनने के मध्य का समयांतराल 5 s मापा जाता है तो तड़ित गिरने की दूरी का अनुमान लगाइए। (वायु में ध्वनि की चाल = 340 m s⁻¹; प्रकाश तत्काल पहुँचता है मान लें)
हल: दूरी = चाल × समय = 340 m s⁻¹ × 5 s = 1700 m (अर्थात लगभग 1.7 km)
उदाहरण 10.4 — स्टील में संचरित ध्वनि तरंग के आलेखीय निरूपण से इसकी तरंगदैर्घ्य 50 m प्राप्त होती है। यदि स्टील में ध्वनि की चाल 5000 m s⁻¹ है, तो इसकी आवृत्ति और आवर्तकाल का परिकलन कीजिए।
हल: समीकरण (10.2) से, आवृत्ति ν = v / λ = 5000 / 50 = 100 Hz
समीकरण (10.1) से, आवर्तकाल T = 1 / ν = 1 / 100 = 0.01 s
तारत्व (Pitch): ध्वनि की आवृत्ति के मानवीय बोध को तारत्व कहते हैं। सीटी या सायरन जैसी तीक्ष्ण, कर्णभेदी ध्वनियों का तारत्व उच्च होता है (उच्च आवृत्ति), जबकि मेघों की गड़गड़ाहट जैसी गंभीर ध्वनियों का तारत्व कम होता है (निम्न आवृत्ति)।
श्रव्यता परिसर (Audible Range): मनुष्य केवल 20 Hz से 20,000 Hz (20 kHz) तक की आवृत्तियों की ध्वनि सुन सकते हैं। यह परिसर आयु बढ़ने के साथ घटता जाता है।
- अवश्रव्य तरंगें (Infrasonic Waves): 20 Hz से कम आवृत्ति की ध्वनि तरंगें। हाथी इन्हें सुन सकते हैं।
- पराश्रव्य तरंगें (Ultrasonic Waves): 20 kHz से अधिक आवृत्ति की ध्वनि तरंगें। कुत्ते, बिल्लियाँ, चमगादड़ और डॉल्फिन इन्हें सुन सकते हैं।
प्रबलता (Loudness): मनुष्य ध्वनि तरंगों के आयाम को प्रबलता के रूप में अनुभव करते हैं — अधिक आयाम की ध्वनि प्रबल (loud) और कम आयाम की ध्वनि धीमी (soft) सुनाई देती है। प्रबलता, तीव्रता से भिन्न है — तीव्रता एक मापनीय भौतिक राशि है जबकि प्रबलता श्रोता की श्रव्य क्षमता पर निर्भर करती है। ध्वनि की प्रबलता डेसिबेल (dB) में मापी जाती है — सामान्य वार्तालाप लगभग 60 dB का होता है, जबकि पटाखों की ध्वनि 100 dB से अधिक हो सकती है। अवांछित या हानिकारक ध्वनि को शोर (noise) कहा जाता है, और दीर्घकाल तक प्रबल शोर सुनने से श्रवण क्षमता को नुकसान हो सकता है।
ध्वनि का परावर्तन (Reflection of Sound)
ध्वनि तरंगें ठोस या द्रव जैसी बाधाओं से टकराकर वापस लौट सकती हैं, जिसे ध्वनि का परावर्तन कहते हैं। ध्वनि परावर्तन के वही नियम मानती है जो प्रकाश परावर्तन के होते हैं — आपतन कोण और परावर्तन कोण अभिलंब के साथ बराबर होते हैं, और आपतित किरण, अभिलंब तथा परावर्तित किरण एक ही तल में स्थित होते हैं।
प्रतिध्वनि (Echo):
जब हम किसी पर्वत, चट्टान या लंबे मार्ग के समीप चिल्लाते हैं और कुछ समय बाद अपनी वाणी दोबारा सुनाई देती है, तो इसे प्रतिध्वनि कहते हैं — यह किसी दूर स्थित कठोर सतह से परावर्तित होकर लौटी ध्वनि है।
प्रतिध्वनि सुनने के लिए हमारे कानों तक पहुँचने वाली मूल और परावर्तित ध्वनि के मध्य कम-से-कम 0.1 सेकंड का समय अंतराल आवश्यक है, तभी मस्तिष्क उन्हें अलग-अलग ध्वनियों के रूप में पहचान पाता है। इस 0.1 s के आधार पर परावर्तक सतह की न्यूनतम दूरी ज्ञात की जा सकती है:
दूरी = चाल × समय = 340 m s⁻¹ × 0.1 s = 34.0 m (स्रोत से सतह तक जाकर वापस आने की कुल दूरी)
चूँकि यह दूरी स्रोत से सतह तक जाकर वापस आने की कुल दूरी है, अतः प्रतिध्वनि सुनने के लिए परावर्तक सतह की न्यूनतम दूरी = 34.0 / 2 = 17 m होती है। कठोर और चिकनी सतहें (जैसे दीवार, चट्टान) ध्वनि को स्पष्ट रूप से परावर्तित करती हैं, जबकि पर्दे जैसी कोमल सतहें ध्वनि को अवशोषित कर लेती हैं और खुरदरी सतहें ध्वनि को प्रकीर्णित (scatter) कर देती हैं, जिससे प्रतिध्वनि स्पष्ट सुनाई नहीं देती।
उदाहरण 10.5 — आप एक खाली गलियारे में ताली बजाते हैं और 0.5 सेकंड पश्चात आपको प्रतिध्वनि सुनाई देती है। यदि वायु में ध्वनि की चाल 340 m s⁻¹ है, तो दीवार से अपनी दूरी ज्ञात कीजिए।
हल: ध्वनि दीवार तक जाकर वापस आती है, अतः
दीवार से दूरी = (v × t) / 2 = (340 m s⁻¹ × 0.5 s) / 2 = 170 / 2 = 85 m
अनुरणन (Reverberation):
किसी बड़े हॉल या सभागार में उत्पन्न ध्वनि दीवारों से बार-बार परावर्तित होती रहती है, जिससे स्रोत के बंद होने के बाद भी ध्वनि कुछ समय तक सुनाई देती रहती है — इसे अनुरणन कहते हैं। यह तब होता है जब परावर्तित ध्वनियाँ 0.05 सेकंड से कम समयांतराल में हमारे कानों तक पहुँचती हैं। आधुनिक सभागार और कॉन्सर्ट हॉल वास्तुकला के अनुसार इस प्रकार बनाए जाते हैं कि उचित अनुरणन बना रहे और ध्वनि विकृत न हो; इसके लिए ध्वनि-अवशोषक पैनल, गद्देदार कुर्सियाँ और पर्दों जैसी मुलायम, छिद्रयुक्त सतहों का उपयोग किया जाता है।
पराश्रव्य तथा अवश्रव्य तरंगें और उनके अनुप्रयोग
मनुष्यों की श्रव्य सीमा से बाहर की आवृत्तियों वाली ध्वनि तरंगों के विज्ञान, चिकित्सा और प्रौद्योगिकी में अनेक महत्वपूर्ण अनुप्रयोग हैं:
अवश्रव्य तरंगों (20 Hz से कम) के अनुप्रयोग:
- भूकंप तथा ज्वालामुखी विस्फोट जैसी प्राकृतिक घटनाओं का पता लगाने में।
- तीव्र झंझावतों (severe storms) का पता लगाने में, क्योंकि ये तरंगें वायु और पृथ्वी में लंबी दूरी तक यात्रा करती हैं।
पराश्रव्य तरंगों (20 kHz से अधिक) के अनुप्रयोग:
- बिना शल्यक्रिया के आंतरिक अंगों का प्रतिबिंब प्राप्त करने में (अल्ट्रासोनोग्राफी)।
- गुर्दे की पथरी को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने में, जिससे वे शरीर से बाहर निकल सकें।
- उद्योगों में अल्ट्रासोनिक वेल्डिंग तथा संवेदनशील मशीन के भागों की सफाई में।
- निर्माण कार्य और औद्योगिक परीक्षणों में धातु खंडों के भीतर दोषों का पता लगाने में।
- ध्वनि तरंगों के परावर्तन द्वारा वस्तुओं का स्थान ज्ञात करने में।
प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण (Echolocation):
चमगादड़ निशाचर जीव होते हैं जो अंधेरे में उड़ते हुए बिना किसी वस्तु से टकराए अपने शिकार की खोज कर लेते हैं। वे पराश्रव्य तरंगों के छोटे-छोटे स्पंद उत्सर्जित करते हैं जो आस-पास की वस्तुओं से परावर्तित होते हैं; इन प्रतिध्वनियों की अनुभूति करके चमगादड़ बाधाओं और शिकार की स्थिति का पता लगा लेते हैं। परावर्तित ध्वनि तरंगों की सहायता से वस्तुओं का स्थान ज्ञात करने की इस क्षमता को प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण (echolocation) कहते हैं। चमगादड़ों के अतिरिक्त डॉल्फिन, व्हेल तथा कुछ पक्षी भी दिशा-निर्धारण और शिकार के लिए इसका उपयोग करते हैं।
मनुष्यों ने इसी सिद्धांत को पानी के भीतर खोज के लिए अपनाया है। सोनार में पराश्रव्य तरंगें जल में भेजी जाती हैं और उनकी परावर्तित तरंगों का विश्लेषण करके पनडुब्बी या डूबे हुए जहाज़ जैसी वस्तुओं की दूरी, दिशा और चाल ज्ञात की जाती है।
उदाहरण 10.6 — एक नौसैनिक सोनार संकेत समुद्री जल में भेजा जाता है और 0.90 सेकंड बाद वापस लौटता है। समुद्री जल में ध्वनि की चाल 1530 m s⁻¹ है। वस्तु कितनी दूर है?
हल: संकेत को वस्तु तक जाकर वापस आने में लगा कुल समय = 0.90 s
वस्तु तक पहुँचने में लगा समय = 0.90 / 2 = 0.45 s
अतः दूरी = चाल × समय = 1530 m s⁻¹ × 0.45 s = 688.5 m
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