पाठ – 11
जनन — जीवन की निरंतरता
In this post we have given the detailed notes of class 9 Science chapter 11 Reproduction: How Life Continues in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के विज्ञान के पाठ 11 जनन — जीवन की निरंतरता के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Exploration / अन्वेषण (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Science |
| Chapter no. | Chapter 11 |
| Chapter Name | जनन — जीवन की निरंतरता (Reproduction: How Life Continues) |
| Category | Class 9 Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 11, जनन — जीवन की निरंतरता
जनन क्या है और यह क्यों आवश्यक है?
जनन (Reproduction): जनन वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव अपने जैसे नए जीव उत्पन्न करते हैं। इसी से पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता बनी रहती है। उदाहरण के लिए, एक आम का वृक्ष वृद्ध होकर नष्ट हो सकता है, किंतु उसके बीज नए आम के पौधों के रूप में अंकुरित होते हैं। इसी प्रकार गायें बछड़ों को, कुत्ते पिल्लों को, बिल्लियाँ बिलौटों को और मनुष्य शिशुओं को जन्म देते हैं।
प्रत्येक जीव का एक निश्चित जीवन काल होता है — वह जन्म लेता है, वृद्धि करता है, परिपक्व होता है, जनन करता है और अंततः मृत हो जाता है। सजीव मुख्यतः दो प्रकार से जनन करते हैं —
- अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction): इसमें एक ही जनक ऐसी संतति उत्पन्न करता है जो जनक की लगभग यथार्थ प्रति (copy) होती है।
- लैंगिक जनन (Sexual Reproduction): इसमें संतति में दोनों जनकों की विशेषताओं का संयोजन वंशानुगत होता है।
लैंगिक जनन में विशेषताओं के सम्मिश्रण के कारण जनकों और उनकी संततियों के मध्य कुछ अंतर हो सकते हैं। ऐसे अंतर अनेक पीढ़ियों में संचित होते हुए सजीवों को परिवर्तित परिवेश के अनुकूल बनाने में सहायक होते हैं तथा कभी-कभी नई जातियों की उत्पत्ति भी कराते हैं।
अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction)
अलैंगिक जनन अधिकांश एककोशिकीय जीवों (जैसे — जीवाणु, अमीबा, यीस्ट) तथा सरल बहुकोशिकीय जीवों (हाइड्रा, स्पंज) में देखा जाता है। यह अनेक पौधों में भी पाया जाता है।
पौधों में कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation):
अधिकांश पौधे अपने विद्यमान भागों से नए प्ररोह (shoot) और जड़ें अंकुरित करते हैं। जैसे —
- गूदेदार भूमिगत तनों वाले पौधे, जैसे आलू और अदरक, बिना बीज उत्पन्न किए नए पौधों में विकसित हो जाते हैं।
- मनीप्लांट और गन्ने के तने की कर्तन (cutting) नए पौधे में विकसित हो जाती है।
- ब्रायोफिलम की पत्तियों पर छोटे-छोटे पादपक (plantlets) निकलते हैं जो अंततः नए पौधों में विकसित हो जाते हैं।
ये सभी कायिक प्रवर्धन के उदाहरण हैं — अर्थात नए पौधे, पौधे के कायिक (वर्धनशील) भागों से उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार के जनन में केवल एक ही जनक होता है, इसलिए इससे आनुवंशिक रूप से समान (identical) पौधे उत्पन्न होते हैं।
कृषि में कायिक प्रवर्धन की विधियाँ:
वैज्ञानिकों और बागवानी विशेषज्ञों ने इस प्राकृतिक प्रक्रिया को अपनाकर पौधों के प्रवर्धन की कई विधियाँ विकसित की हैं, जिनसे कृषक बड़े पैमाने पर वांछित फसलें उगा सकते हैं —
- कर्तन (Cutting): पौधे की शाखा का एक टुकड़ा काटकर मिट्टी में लगभग 45°–60° के कोण पर मिट्टी में रोपित किया जाता है, जिससे वह नए पौधे में विकसित हो जाता है।
- कलम बाँधना (Grafting): एक स्वस्थ बद्धमूल पौधे (पौधा A) पर चीरा लगाकर उसमें दूसरे पौधे (पौधा B) की तने की कलम को जोड़ा जाता है और उसे सूती कपड़े/रैपिंग फिल्म से ढककर पीड़कों से सुरक्षित रखा जाता है।
- परतन (Layering): किसी पेड़ या झाड़ी (जैसे नींबू) की पतली, लचीली टहनी को बीच से मिट्टी में दबा दिया जाता है। 10–15 दिनों में उसमें जड़ें विकसित हो जाती हैं, जिसके बाद टहनी को जनक पौधे से काटकर अलग नए पौधे के रूप में उगाया जाता है।
- ऊतक संवर्धन (Tissue Culture): पौधों के प्ररोह शीर्ष (शीर्षस्थ विभज्योतक) से व्यापक स्तर पर स्वस्थ पादपक तैयार किए जाते हैं। इस तकनीक ने केले जैसी फसलों की खेती में क्रांति ला दी है — यह विषाणु-संक्रमित पौधों को हटाने में सहायक है और उच्च उपज सुनिश्चित करती है।
मुकुलन (Budding):
यीस्ट में जनक कोशिका से छोटे गोलाकार उद्वर्ध (outgrowths) उत्पन्न होते हैं जिन्हें मुकुल (bud) कहते हैं। हाइड्रा (एक बहुकोशिकीय जंतु) में जनक काय पर किसी विशिष्ट स्थल पर बार-बार कोशिका विभाजन होने से एक छोटा उभार (मुकुल) उत्पन्न होता है। मुकुल वृद्धि करके जनक से अलग हो जाता है और स्वतंत्र रूप से जीवित रहने लगता है। इसे मुकुलन कहते हैं। हाइड्रा में प्रायः जनक काय पर एक साथ अनेक मुकुल विकसित होते हुए देखे जा सकते हैं।
बीजाणु निर्माण (Spore Formation):
ब्रेड या रोटी पर उगने वाली फफूँद (कवक), जैसे राइजोपस (Rhizopus) और ऐस्परजिलस (Aspergillus), बीजाणुओं (spores) द्वारा जनन करती है। बीजाणु एक थैली जैसी संरचना (सैक) में या कवक तंतुओं की एक पट्टी पर बनी फूली हुई पुटिका पर बनते हैं। बीजाणु संख्या में बहुत अधिक (एक कवक कॉलोनी से लाखों), हल्के और सामान्यतः एककोशिकीय होते हैं, जो वायु-धाराओं में तैरते रहते हैं और नमी व पोषक तत्व मिलते ही नए जीव में अंकुरित हो जाते हैं। लुई पाश्चर के प्रयोगों ने सिद्ध किया कि नया जीवन सदैव पहले से विद्यमान जीवन से ही उत्पन्न होता है (न कि निर्जीव पदार्थ से स्वतः)।
अलैंगिक जनन का आधार — समसूत्री विभाजन (Mitosis):
ऊपर वर्णित सभी उदाहरणों में अलैंगिक जनन की मुख्य प्रक्रिया समसूत्री विभाजन (mitosis) है — कोशिका विभाजन की एक ऐसी विधि, जिसमें दो संतति कोशिकाएँ बनती हैं और प्रत्येक में जनक कोशिका के समान संख्या में गुणसूत्र (chromosome) होते हैं। इसी कारण उत्पन्न संतान आनुवंशिक रूप से जनक के समरूपी होती है, और इन्हें क्लोन (clones) कहा जाता है। यह विधि द्रुत (तेज) है और अनुकूल परिस्थितियों में जीवों की संख्या को तीव्रता से बढ़ाने में सहायक है।
| अलैंगिक जनन की विधि | उदाहरण |
| कायिक प्रवर्धन (कर्तन, कलम, परतन, ऊतक संवर्धन) | आलू, अदरक, मनीप्लांट, गन्ना, ब्रायोफिलम, केला |
| मुकुलन (Budding) | यीस्ट, हाइड्रा |
| बीजाणु निर्माण (Spore Formation) | राइजोपस व ऐस्परजिलस जैसे कवक (फफूँद) |
लैंगिक जनन (Sexual Reproduction)
लैंगिक जनन में नए जीव के निर्माण में दो जनक भाग लेते हैं — अर्थात संतति के आनुवंशिक पदार्थ में दोनों जनक योगदान करते हैं। यदि प्रत्येक पीढ़ी को दोनों जनकों से गुणसूत्रों का पूरा समूह प्राप्त हो, तो गुणसूत्रों की संख्या हर पीढ़ी में दोगुनी हो जाएगी। इस समस्या का समाधान एक विशेष प्रकार के कोशिका विभाजन — अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) — द्वारा होता है।
अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) और विभिन्नता:
गुणसूत्र (Chromosome), कोशिका के केंद्रक में उपस्थित धागे जैसी संरचनाएँ हैं जो आनुवंशिक सूचना वहन करती हैं। मनुष्यों में गुणसूत्रों के 23 जोड़े (कुल 46) होते हैं — प्रत्येक जोड़े में एक गुणसूत्र माता से और एक पिता से आता है।
अर्धसूत्री विभाजन में जनक कोशिका (द्विगुणित) की तुलना में संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी (अगुणित) हो जाती है। इन अगुणित कोशिकाओं का उपयोग केवल जनन के लिए होता है, इन्हें युग्मक (gametes) कहते हैं।
- जंतुओं में — नर युग्मक को शुक्राणु (sperm) और मादा युग्मक को अंडाणु (egg) कहते हैं।
- पौधों में — नर युग्मक परागकण (pollen grain) में होते हैं, जो बीजांड (ovule) में स्थित मादा युग्मक (अंडकोशिका) तक पहुँचते हैं।
अर्धसूत्री विभाजन के समय प्रत्येक जोड़े के गुणसूत्र अलग हो जाते हैं, जिससे प्रत्येक युग्मक को प्रत्येक जोड़े से केवल एक गुणसूत्र मिलता है — यानी मानव युग्मक में 23 गुणसूत्र होते हैं। दोनों जनकों से मिलने वाले गुणसूत्रों का यादृच्छिक मिश्रण अनेक संयोजन संभव बनाता है, जिस कारण बच्चे अपने माता-पिता और भाई-बहनों से आनुवंशिक रूप से भिन्न होते हैं। यह विभिन्नता (variation) किसी जाति की उत्तरजीविता के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है — यह जीवों को बदलते परिवेश के प्रति बेहतर अनुकूलन में सहायता करती है और समय के साथ विकास (evolution) में योगदान देती है।
पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन
पुष्पी पादप, जिन्हें आवृतबीजी (angiosperms) भी कहते हैं, पृथ्वी पर पौधों का सबसे विविधतापूर्ण समूह हैं। आवृतबीजियों में पुष्प (Flower) जनन अंग के रूप में कार्य करता है।
पुष्प की संरचना:
एक संपूर्ण पुष्प के चार भाग होते हैं — बाह्यदल, दल, पुंकेसर और स्त्रीकेसर।
- बाह्यदल (Sepal): कली अवस्था में सभी भागों को घेरने वाला हरा आवरण, जो पुष्प का सबसे बाहरी चक्र बनाता है और कली को सुरक्षा देता है।
- दल (Petal): पुष्प के रंगीन प्रवर्ध, जो परागणकारियों को आकर्षित करने में सहायक होते हैं।
- पुंकेसर (Stamen): पुष्प का नर भाग, जिसमें एक तंतु (filament) और एक परागकोश (anther) होता है। परागकोश परागकण (pollen grain) उत्पन्न करता है जिसमें नर युग्मक होते हैं।
- स्त्रीकेसर (Pistil): पुष्प का मादा भाग, जिसके तीन उपभाग होते हैं — वर्तिकाग्र (stigma, जो शीर्ष पर स्थित, सपाट व/अथवा चिपचिपा होता है), वर्तिका (style, जो एक पतली नली की भाँति वर्तिकाग्र को अंडाशय से जोड़ती है) और अंडाशय (ovary, जिसमें बीजांड होते हैं और प्रत्येक बीजांड में एक अंडकोशिका/मादा युग्मक होती है)।
परागण (Pollination):
परागकोश से पुष्प के वर्तिकाग्र तक परागकणों के स्थानांतरण को परागण कहते हैं। फल-निर्माण के लिए यह स्थानांतरण आवश्यक है।
- स्व-परागण (Self-pollination): जब परागकणों का स्थानांतरण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर, या उसी पौधे के किसी अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र पर होता है।
- पर-परागण (Cross-pollination): जब परागकण एक पौधे के पुष्प के परागकोश से उसी प्रकार के किसी दूसरे पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र तक स्थानांतरित होते हैं।
परागण की युक्तियाँ (Pollination Strategies):
परागण बाहरी माध्यमों — परागणकारियों (pollinators) — पर निर्भर करता है, जैसे वायु, जल, कीट अथवा पक्षी।
- वायु-परागण: गेहूँ, मक्का, चावल जैसे पौधों में। परागकण हल्के, छोटे तथा भारी संख्या में बनते हैं और वर्तिकाग्र लंबा तथा पंखनुमा होता है जिससे वह परागकणों को पाशित (trap) कर सके।
- जल-परागण: वैलिसनेरिया और हाइड्रिला जैसे जलीय पौधों में, जहाँ जल-धाराएँ परागकण को एक पुष्प से दूसरे तक ले जाती हैं।
- कीट-परागण: सूरजमुखी, गुड़हल और गेंदा जैसे पौधों में मधुमक्खियों और तितलियों द्वारा। इनके पुष्प चटकीले रंग के, मकरंद (nectar) उत्पन्न करने वाले तथा सुगंधित होते हैं; परागकण बड़े, चिपचिपे या काँटेदार होते हैं और वर्तिकाग्र भी चिपचिपा होता है।
- पक्षी-परागण: कोरल ट्री और गुड़हल जैसे पुष्पों का परागण इंडियन व्हाइट-आई और सनबर्ड जैसे पक्षियों द्वारा होता है।
निषेचन और बीज/फल निर्माण:
परागकण के संगत वर्तिकाग्र तक पहुँचने के बाद, परागकण पराग नलिका (pollen tube) उत्पन्न करते हैं जो वर्तिका से होते हुए अंडाशय में बढ़ती है। नर युग्मक इसी नलिका से होकर बीजांड तक पहुँचता है, जहाँ वह अंडकोशिका के साथ युग्मित होता है।
निषेचन (Fertilisation): युग्मकों के इस युग्मन को निषेचन कहते हैं, और इसी से नए जीवन का आरंभ होता है। निषेचित अंडाणु को युग्मनज (Zygote) कहते हैं, जो आगे चलकर भ्रूण (embryo) में विकसित होता है। इस दौरान बीजांडों को घेरे हुए अंडाशय बड़ा होकर फल (fruit) में विकसित हो जाता है, जबकि बीजांड बीज (seed) में विकसित हो जाते हैं। बीजों का प्रकीर्णन (dispersal) वायु, जल और जंतुओं द्वारा होता है। अनुकूल परिस्थितियों (जल, वायु, तापमान) में बीज अंकुरित होकर नए पौधे में विकसित हो जाता है। इस प्रकार लैंगिक जनन न केवल नए पौधे उत्पन्न करता है, बल्कि विभिन्नताएँ भी उत्पन्न करता है, जिससे पादप जाति को अपने परिवेश में उत्तरजीविता और अनुकूलन में सहायता मिलती है।
जंतुओं में लैंगिक जनन
जंतुओं में जनन अलैंगिक और/अथवा लैंगिक विधि से होता है। सभी जंतुओं के सामने एक मूलभूत चुनौती होती है कि नर व मादा युग्मकों का मिलन सुनिश्चित हो और संतति इतने लंबे समय तक जीवित रहे कि वे बड़े होकर स्वयं जनन कर सकें।
बाह्य निषेचन और आंतरिक निषेचन:
- बाह्य निषेचन (External Fertilisation): मेंढक और अधिकांश मछलियों जैसे जल में रहने वाले जंतुओं में देखा जाता है। मादा जल में अंडे देती है और नर उन पर शुक्राणु छोड़ता है। यद्यपि अंडे बड़ी संख्या में दिए जाते हैं, परंतु कई अंडे जल-धाराओं द्वारा नष्ट हो जाते हैं या अन्य जंतुओं द्वारा खा लिए जाते हैं।
- आंतरिक निषेचन (Internal Fertilisation): सरीसृपों, पक्षियों और स्तनधारियों में निषेचन मादा के शरीर के भीतर होता है। इसमें निषेचित अंडे या भ्रूण अधिक सुरक्षित रहते हैं, इसलिए संतति की उत्तरजीविता की संभावना सामान्यतः अधिक होती है।
| जंतु | पर्यावास | निषेचन की विधि | उत्पन्न अंडों की संख्या | संतति की अनुमानित उत्तरजीविता |
| मछली | जल | बाह्य | 100 – 1,000 तक | कम |
| मेंढक | जल/भूमि | बाह्य | 5,000 – 50,000 तक | कम |
| छिपकली | भूमि | आंतरिक | 2 – 20 तक | मध्यम |
| पक्षी | जल/भूमि | आंतरिक | 1 – 15 तक | मध्यम से उच्च |
जंतुओं में जनन संबंधी विभिन्नताएँ:
मछली, उभयचर और कीट एक बार में कई सौ से लेकर कई हज़ार पीतक (yolk) युक्त अंडे देते हैं, जिनमें विकासशील भ्रूण के पोषण हेतु पोषक तत्व होते हैं। चूँकि माँ का शरीर इतने अंडों के लिए पर्याप्त पीतक नहीं दे सकता, इन जातियों में उतना ही पीतक होता है जितने से एक लार्वा (larva) बन सके, जो अंडे से स्फुटित होकर बाहर निकलता है। लार्वा सड़े हुए खाद्य पदार्थों जैसे कार्बनिक अपशिष्टों का सेवन कर पोषण प्राप्त करता है और वृद्धि करता है — यह उसके विकास की एक मध्यवर्ती (भोजन ग्रहण करने वाली) अवस्था होती है। पर्याप्त पोषक तत्व संचित हो जाने पर लार्वा का प्यूपा (pupa) में और फिर वयस्क शरीर में रूपांतरण होता है, जैसे तितली और मेंढक में देखा जाता है।
इसके विपरीत, सरीसृप और पक्षी ऐसे अंडे देते हैं जिनमें भ्रूण को अंडा फूटने तक पोषण देने के लिए पर्याप्त पीतक पहले से ही उपलब्ध होता है। स्तनधारियों में युग्मनज मादा के शरीर के भीतर ही वृद्धि करता और विकसित होता है। कुछ जातियों में जन्म लेते ही बच्चे अपना भोजन स्वयं खोजने के लिए तैयार होते हैं, जबकि अन्य में जन्म के बाद लंबे समय तक पोषण और देखभाल की आवश्यकता होती है — स्तनधारी सामान्यतः जन्म के पश्चात कुछ समय तक अपने बच्चों को स्तनपान कराते हैं।
जब बच्चा वयस्क के रूप में बड़ा होता है, तब उसके जनन अंग परिपक्व हो जाते हैं और युग्मक (नर में शुक्राणु और मादा में अंडाणु) उत्पन्न करने लगते हैं। जब मादा के शरीर के भीतर एक शुक्राणु किसी अंडाणु से युग्मित होता है तो वे युग्मनज बनाते हैं, जो भ्रूण के रूप में विकसित होकर अंततः गर्भाशय में गर्भस्थ शिशु (foetus) का रूप धारण कर लेता है।
नर जनन तंत्र (Male Reproductive System):
नर जनन तंत्र में वे अंग होते हैं जो शुक्राणु उत्पन्न करते हैं और उन्हें मादा शरीर तक पहुँचाने में सहायता करते हैं।
- वृषण (Testes): दो अंडाकार अंग, जो वृषणकोश (scrotum) नामक त्वचा की थैली में स्थित होते हैं। वृषणकोश वृषणों को शरीर के सामान्य तापमान से थोड़ा ठंडा रखता है, जो शुक्राणु निर्माण के लिए आवश्यक है। वृषण एक हार्मोन भी उत्पन्न करते हैं जो शुक्राणु उत्पादन को नियंत्रित करता है और यौवनारंभ में लड़कों में दिखने वाले शारीरिक परिवर्तनों का कारण बनता है।
- शुक्रवाहिनी (Vas Deferens): एक लंबी नली, जिससे होकर शुक्राणु वृषण से मूत्रमार्ग (urethra) तक पहुँचते हैं। मूत्रमार्ग मूत्र और शुक्राणु दोनों के लिए उभय मार्ग है।
- शुक्राशय और प्रोस्टेट ग्रंथि: ये शुक्राणुओं को पोषण देने वाला तरल स्रावित करती हैं जो उन्हें सक्रिय और गतिशील रखने में सहायक होता है। प्रत्येक शुक्राणु में एक शीर्ष (जिसमें आनुवंशिक पदार्थ होता है) और एक लंबी पूँछ होती है जो उसे अंडाणु की ओर तैरने में सहायता करती है।
मादा जनन तंत्र (Female Reproductive System):
मादा जनन तंत्र में एक जोड़ी अंडाशय, अंडवाहिनियाँ (डिंबवाहिनी/fallopian tube), एक गर्भाशय और एक योनि होती है।
- अंडाशय (Ovary): मादा जनन कोशिकाएँ (अंडाणु) उत्पन्न करता है और हार्मोन भी स्रावित करता है, जो यौवनारंभ के समय परिवर्तन लाते हैं।
- डिंबवाहिनी (Oviduct): प्रत्येक अंडाशय को गर्भाशय से जोड़ती है।
- गर्भाशय (Uterus): एक थैले जैसी संरचना, जहाँ गर्भस्थ शिशु विकसित होता है। गर्भाशय, गर्भाशय ग्रीवा (cervix) नामक संकरे मार्ग द्वारा योनि में खुलता है।
युग्मकजनन (Gametogenesis):
युग्मकों के निर्माण की प्रक्रिया को युग्मकजनन कहते हैं, जो वृषणों और अंडाशयों में होती है। यह अर्धसूत्री विभाजन द्वारा होती है, जिसमें गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है — मानव कोशिकाओं में 46 गुणसूत्र होते हैं, किंतु शुक्राणु व अंडाणु में केवल 23। नरों में युग्मकजनन से असंख्य सूक्ष्म, सक्रिय गतिशील शुक्राणु बनते हैं, जबकि मादाओं में एक बड़े अंडाणु का निर्माण होता है। नर और मादा युग्मक आमाप (size), संख्या और संरचना में बहुत भिन्न होते हैं —
| विशेषता | शुक्राणु | अंडाणु |
| आमाप | अति सूक्ष्म | बड़ा |
| उत्पादित संख्या | लाखों | कम |
| संग्रहीत पोषक तत्व | अनुपस्थित | उपस्थित |
| गतिशीलता | सक्रिय रूप से गतिशील | अचल |
निषेचन की प्रक्रिया (Fertilisation):
जन्म के समय से ही एक लड़की के अंडाशय में लाखों अपरिपक्व अंडाणु होते हैं। यौवनारंभ से प्रत्येक माह सामान्यतः एक परिपक्व अंडाणु किसी एक अंडाशय से निकलता है — इसे अंडोत्सर्ग (Ovulation) कहते हैं। अंडोत्सर्ग होने पर अंडाणु अंडाशय से डिंबवाहिनी में जाता है। मैथुन के समय लाखों शुक्राणु योनि से प्रवेश कर जनन मार्ग से तैरते हुए डिंबवाहिनी में अंडाणु तक पहुँचते हैं। यदि एक शुक्राणु अंडाणु से युग्मित होने में सफल हो जाता है, तो युग्मनज (zygote) बनता है। यह युग्मनज गर्भाशय की ओर जाते हुए अनेक समसूत्री विभाजनों से गुजरता है और पोषण प्राप्त करने के लिए गर्भाशय के आंतरिक आस्तर में अंतर्रोपित हो जाता है — यही अंतर्रोपण गर्भावस्था का आरंभ है।
मासिक धर्म (Menstruation):
यदि अंडाणु निषेचित नहीं होता, तो वह लगभग एक दिन तक जीवनक्षम रहकर नष्ट हो जाता है। गर्भाशय का आंतरिक आस्तर, जो युग्मनज को ग्रहण करने हेतु मोटा और रक्तवाहिकाओं से समृद्ध हो चुका था, अब आवश्यक नहीं रहता और निस्तारित (shed) हो जाता है। यह आस्तर कुछ रक्त के साथ योनि से बाहर निकलता है — इसे मासिक धर्म या रजोधर्म (Menstruation) कहते हैं, जो सामान्यतः 3 से 7 दिनों तक चलता है। अंडोत्सर्ग, गर्भाशय की तैयारी और रजोधर्म का यह चक्र सामान्यतः प्रत्येक 21–35 दिनों (प्रायः लगभग 28 दिन) में दोहराया जाता है, जो लड़कियों में 10–14 वर्ष की आयु में आरंभ होकर लगभग 50 वर्ष की आयु (रजोनिवृत्ति) तक चलता है।
गर्भावस्था और प्रसव (Pregnancy and Childbirth):
मनुष्यों में गर्भावस्था लगभग नौ महीने तक चलती है, जिसे तीन त्रिमास (trimesters) में बाँटा जाता है —
- पहला त्रिमास: निषेचित अंडाणु आरंभिक दो महीनों में भ्रूण में विकसित होता है और प्रमुख अंगों का निर्माण आरंभ होता है। लगभग नौवें सप्ताह से विकासशील भ्रूण को गर्भ (foetus) कहा जाता है।
- दूसरा त्रिमास: गर्भ बड़ा और पुष्ट होता है, माँ सामान्यतः उसकी हलचल का अनुभव करने लगती है।
- तीसरा त्रिमास: शिशु तीव्र गति से बढ़ता है और गर्भाशय के बाहर के जीवन के लिए तैयार होता है।
प्रसव के समय गर्भाशय की माँसपेशियों में तीव्र संकुचन गर्भस्थ शिशु को जनन मार्ग से बाहर धकेलने में सहायता करते हैं। कुछ मामलों में सामान्य योनि प्रसव संभव या सुरक्षित न होने पर चिकित्सक चिकित्सीय या शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं का उपयोग करते हैं। जन्म के बाद स्तनपान अनिवार्य है क्योंकि माँ का दूध पूर्ण पोषण देता है और शिशु को अनेक रोगों से बचाता है। माँ को भी गर्भावस्था के दौरान संतुलित आहार, नियमित चिकित्सा जाँच, पर्याप्त विश्राम और धूम्रपान-मद्यपान जैसी हानिकारक आदतों से बचाव की आवश्यकता होती है।
लैंगिक परिपक्वता, गर्भनिरोधक विधियाँ और यौन संचारित संक्रमण:
किशोरावस्था में शरीर जनन के योग्य हो जाता है (लड़कों में शुक्राणु उत्पादन और लड़कियों में मासिक धर्म का आरंभ), किंतु भावनात्मक और सामाजिक परिपक्वता विकसित होने में अधिक समय लगता है। जिम्मेदार निर्णय अनियोजित गर्भावस्था और यौन संचारित संक्रमण (STI): जैसे सुजाक, हर्पीज, सिफिलिस, जननिक मस्से और एच.आई.वी. (जिससे अंततः एड्स हो सकता है) — से बचाव में सहायक होते हैं। कंडोम का उपयोग इनके संचरण के साथ-साथ अवांछित गर्भावस्था को भी रोकने में सहायक है।
अवांछित गर्भावस्था रोकने के लिए विभिन्न गर्भनिरोधक (Contraceptive) विधियाँ प्रयोग की जाती हैं —
- अवरोधक विधियाँ: कंडोम या योनि आवरण, जो शुक्राणु को अंडाणु तक पहुँचने से रोकते हैं।
- औषधीय विधियाँ: मुँह से ली जाने वाली गोलियाँ, जो हार्मोन में परिवर्तन कर अंडाणु के मोचन को प्रभावित करती हैं (इनके कुछ दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं)।
- अंतर्गर्भाशयी युक्ति (IUD): जैसे कॉपर-T, जो गर्भाशय में रखी जाती है।
- शल्य-चिकित्सा विधियाँ: पुरुषों में शुक्रवाहिनी या महिलाओं में डिंबवाहिनी को अवरुद्ध करना।
कुछ मामलों में गर्भावस्था के पहले त्रिमास में, जब भ्रूण बहुत छोटा होता है, शल्य क्रिया द्वारा उसे हटाया जा सकता है — इसे गर्भपात कहते हैं। किसी विशेष लिंग की वरीयता से प्रेरित स्वयं-चयनित गर्भपात लिंगानुपात में गंभीर असंतुलन ला सकता है, इसलिए भारत में प्रसव-पूर्व लिंग जाँच कानूनी रूप से पूर्णतः प्रतिबंधित है।
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