पाठ – 12
जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण
In this post we have given the detailed notes of class 9 Science chapter 12 Patterns in Life: Diversity and Classification in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के विज्ञान के पाठ 12 जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Exploration / अन्वेषण (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Science |
| Chapter no. | Chapter 12 |
| Chapter Name | जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण (Patterns in Life: Diversity and Classification) |
| Category | Class 9 Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 12, जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण
जैव विविधता और वर्गीकरण की आवश्यकता
जैव विविधता (Biodiversity): पृथ्वी पर सूक्ष्मदर्शीय जीवों से लेकर विशाल वृक्षों तक पाए जाने वाले जीवों के असंख्य रूपों और पर्यावासों की यह असीम विविधता जैव विविधता कहलाती है। यह पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है — शैवाल ऑक्सीजन देते हैं, कवक और जीवाणु अपघटन करके मृदा को उर्वर बनाते हैं, पक्षी-मधुमक्खियाँ परागण करते हैं और पादप भोजन तैयार करते हैं।
विशेषक्षेत्री जातियाँ (Endemic species): जो जातियाँ विश्व के किसी एक विशेष क्षेत्र में ही पाई जाती हैं और अन्यत्र प्राकृतिक रूप से नहीं मिलतीं, उन्हें विशेषक्षेत्री (endemic) जातियाँ कहते हैं। उदाहरण — नीलगिरी तहर, लॉयन टेल्ड मकाक, नेपेन्थीस खासियाना और नीलकुरिंजी, जो केवल भारत में पाए जाते हैं। जो क्षेत्र बड़ी संख्या में विशेषक्षेत्री जातियों को आश्रय देते हैं और जहाँ पर्यावास की अत्यधिक क्षति हुई है, उन्हें जैव विविधता हॉटस्पॉट (biodiversity hotspot) कहते हैं — जैसे पश्चिमी घाट, इंडो-बर्मा, हिमालय और सुंडालैंड।
इतनी व्यापक विविधता में जीवों में समानताएँ भी हैं और असमानताएँ भी। इस विविधता के क्रमबद्ध अध्ययन के लिए वैज्ञानिक जीवों के साझा गुणों और विकासात्मक संबंधों के आधार पर उनका समूहन एवं वर्गीकरण करते हैं।
जीवों को वर्गीकृत करने के मानदंड (Criteria for classification)
वैज्ञानिक जीवों को समूहबद्ध करने के लिए निम्नलिखित विशेषताओं का अध्ययन करते हैं —
- बाह्य विशेषताएँ (External features): आकार, आमाप और शारीरिक संगठन जैसी दृश्यमान विशेषताएँ।
- पोषण की विधि (Mode of nutrition): स्वपोषी (autotrophic) अथवा विषमपोषी (heterotrophic)।
- आंतरिक संरचनाएँ (Internal structures): कंकाल पैटर्न, अंगों की उपस्थिति/अनुपस्थिति और ऊतकों के प्रकार।
- कोशिका संरचना (Cell structure): जीव एककोशिकीय (unicellular) या बहुकोशिकीय (multicellular), कोशिका सुकेंद्रकी (eukaryote) या पूर्वकेंद्रकी (prokaryote), कोशिका भित्ति (cell wall) उपस्थित है या नहीं।
- पारिस्थितिकीय भूमिका (Ecological role): उत्पादक, उपभोक्ता अथवा अपघटक।
- जनन (Reproduction): अलैंगिक और/अथवा लैंगिक विधियाँ।
- आनुवंशिक समानता (Genetic similarity): डीएनए (DNA) के आधार पर वंशागत गुणों की समानता।
समान विशेषताएँ यह दर्शाती हैं कि जीव एक ही पूर्वज (common ancestor) से विकसित हुए हैं।
जैविक वर्गीकरण के लाभ
जैविक वर्गीकरण (Biological classification): जीवों की समानताओं और/अथवा भिन्नताओं के आधार पर समूहन करने की वैज्ञानिक पद्धति जैविक वर्गीकरण कहलाती है। यह निम्न प्रकार से सहायक है —
- यह सजीवों के अध्ययन को अधिक व्यवस्थित और क्रमबद्ध बनाता है।
- यह जीवों के बीच समानताओं और असमानताओं को समझने में सहायता करता है।
- यह समझने में सहायता करता है कि विभिन्न जीव एक-दूसरे से किस प्रकार संबंधित हैं और परस्पर क्रिया करते हैं।
- यह नए खोजे गए जीवों की पहचान और नामकरण में सहायक है।
- यह विलुप्त होने के खतरे वाले जीवों की पहचान कर जैव विविधता संरक्षण में सहायता करता है।
- यह विश्व भर के वैज्ञानिकों को एक समान प्रणाली से चर्चा करने में सक्षम बनाता है।
वर्गीकरण प्रणालियों का इतिहास
समय के साथ वैज्ञानिकों ने उपलब्ध ज्ञान के आधार पर विभिन्न वर्गीकरण प्रणालियाँ विकसित कीं।
| वैज्ञानिक | प्रणाली | विवरण |
| अरस्तू (चौथी शताब्दी ई.पू.) | कृत्रिम प्रणाली (Artificial system) | जीवों को उनके पर्यावास — स्थल, जल और वायु — तथा बाहरी स्वरूप के आधार पर समूहित किया। सीमा — यह मुख्यतः सरलता से दिखाई देने वाली बाहरी विशेषताओं पर आधारित थी। |
| कैरोलस लिनियस (1758) | द्विजगत प्रणाली (Two Kingdom system) | सभी सजीवों को प्लांटी (पादप जगत) और एनिमेलिया (जंतु जगत) में विभाजित किया। समस्या — अमीबा, पैरामीशियम व जीवाणु जैसे एककोशिकीय, विषमपोषी किंतु गतिशील जीवों को कहाँ रखा जाए, यह स्पष्ट नहीं था। |
| अर्न्स्ट हेकेल (1866) | त्रिजगत प्रणाली (Three Kingdom system) | एककोशिकीय सूक्ष्मजीवों के लिए एक तीसरा जगत प्रोटिस्टा जोड़ा गया। |
| हर्बर्ट एफ. कोपलैंड (1938) | चतुर्जगत प्रणाली (Four Kingdom system) | सूक्ष्मदर्शी में सुधार से पता चला कि अमीबा में झिल्ली-आबद्ध वास्तविक केंद्रक होता है जबकि जीवाणुओं में नहीं। अतः जीवाणुओं को अलग जगत मोनेरा में रखा गया — प्लांटी, एनिमेलिया, प्रोटिस्टा, मोनेरा। |
| रॉबर्ट एच. व्हिटेकर (1969) | पंचजगत प्रणाली (Five Kingdom system) | मशरूम जैसे कवक पौधों की तरह अचल रहते हैं परंतु विषमपोषी होते हैं, इसलिए इन्हें अलग जगत फंजाई में रखा गया — मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी, एनिमेलिया। |
पाँच जगत वर्गीकरण (Five Kingdom Classification)
व्हिटेकर की पाँच जगत वर्गीकरण प्रणाली में सभी जीवों को निम्नलिखित मानदंडों के आधार पर समूहित किया जाता है —
- कोशिका प्रकार (Cell type): पूर्वकेंद्रकी (prokaryote) अथवा सुकेंद्रकी (eukaryote)।
- कोशिका संरचना (Cell structure): कोशिका भित्ति उपस्थित है अथवा अनुपस्थित।
- संगठन का स्तर (Level of organisation): एककोशिकीय अथवा बहुकोशिकीय।
- पोषण की विधि (Mode of nutrition): स्वपोषी अथवा विषमपोषी।
इन्हीं मानदंडों के आधार पर जीवजगत को पाँच जगतों — मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई (कवक), प्लांटी (पादप) और एनिमेलिया (जंतु) — में बाँटा गया है।
जगत मोनेरा (Kingdom Monera) — एककोशिकीय पूर्वकेंद्रकी जीव
जीवाणु (bacteria) और नील-हरित शैवाल अर्थात सायनोबैक्टीरिया (cyanobacteria) एककोशिकीय पूर्वकेंद्रकी जीव हैं जिन्हें मोनेरा जगत में रखा गया है। इनमें झिल्ली-आबद्ध वास्तविक केंद्रक नहीं होता।
- जीवाणु मृदा, जल, वायु, उष्ण स्रोतों और अन्य चरम परिस्थितियों सहित सर्वत्र पाए जाते हैं, यहाँ तक कि मानव शरीर के भीतर भी।
- ये रोमंथी जीवों (जुगाली करने वाले जंतुओं) की आहार नली में पाए जाते हैं और उनके गोबर से बायोगैस उत्पादन के लिए उत्तरदायी हैं।
- कुछ जीवाणु हानिकारक (रोगजनक) होते हैं जबकि लैक्टोबैसिलस और राइजोबियम जैसे अनेक जीवाणु लाभदायक हैं।
- सायनोबैक्टीरिया स्वपोषी होते हैं और कुछ जीवाणु अपघटक की भूमिका निभाते हुए तेल, कीटनाशक, वाहित मल जैसे प्रदूषकों को भी विघटित कर देते हैं।
जगत प्रोटिस्टा (Kingdom Protista) — एककोशिकीय सुकेंद्रकी जीव
ऐसे सभी एककोशिकीय सुकेंद्रकी जीव जिनमें कोशिका भित्ति नहीं होती अथवा जिनकी कोशिका भित्ति सेल्युलोस की बनी होती है, प्रोटिस्टा जगत में रखे गए हैं। ये सूक्ष्मदर्शीय, अत्यंत विविध और जल या नम स्थानों में रहने वाले जीव हैं। उदाहरण — अमीबा (Amoeba), पैरामीशियम (Paramecium) और यूग्लीना (Euglena)।
- इनमें से कुछ स्वपोषी होते हैं और कुछ विषमपोषी।
- ये जलीय आहार शृंखलाओं की महत्वपूर्ण कड़ी हैं — कुछ ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं जबकि कुछ छोटे जीवों का भोजन बनते हैं।
- कुछ प्रोटिस्ट अपघटक के रूप में कार्य करते हैं और पोषक तत्वों के चक्रण में सहायता करते हैं।
जगत फंजाई (Kingdom Fungi) — बहुकोशिकीय, विषमपोषी सुकेंद्रकी जीव
कवक प्रायः बहुकोशिकीय सुकेंद्रकी जीव होते हैं जिनकी कोशिका भित्ति काइटिन (chitin) की बनी होती है। ये अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते।
- ये मृत या सड़ रहे पदार्थों से पोषक तत्वों को महीन तंतुओं द्वारा अवशोषित करते हैं, जो मिलकर कवक जाल (Mycelium) नामक संजाल बनाते हैं।
- अधिकांश कवक मृतपोषी (Saprophyte) होते हैं और अपघटक के रूप में मृत कार्बनिक पदार्थों को सरल पदार्थों में तोड़कर मृदा में खनिज उपलब्ध कराते हैं।
- कुछ कवक अन्य जीवों के साथ सहजीवी (symbiotic) संबंध बनाते हैं जबकि कुछ परजीवी (parasitic) के रूप में रहकर पादपों और जंतुओं में रोग उत्पन्न करते हैं।
- ये लैंगिक और अलैंगिक दोनों प्रकार से, प्रायः बीजाणु (spores) बनाकर, जनन करते हैं और गर्म-नम परिस्थितियों में भली-भाँति वृद्धि करते हैं।
- यीस्ट (एककोशिकीय, किंतु काइटिन युक्त कोशिका भित्ति के कारण फंजाई में रखा गया), ऐस्पर्जिलस और मशरूम (स्थूलदर्शीय कवक) इसके उदाहरण हैं। ऐस्पर्जिलस और पेनिसिलियम जैसे कवक एंजाइम और प्रतिजैविक (antibiotic) दवाएँ बनाने में उपयोग होते हैं।
जगत प्लांटी (Kingdom Plantae) — पादप जगत
पादप बहुकोशिकीय, स्वपोषी सुकेंद्रकी जीव हैं जो प्रकाश संश्लेषण करते हैं। इनकी कोशिकाओं में सेल्युलोस से बनी दृढ़ कोशिका भित्ति होती है जो अवलंब और सुरक्षा प्रदान करती है। पादप अधिकांश आहार शृंखलाओं का आधार हैं और ऑक्सीजन मुक्त करते हैं। जगत प्लांटी को पाँच वर्गों में बाँटा गया है — थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म।
थैलोफाइटा (Thallophyta) — आद्य पौधे
थैलोफाइट (थैलोस = अविभेदित काया, फाइटॉन = पादप) सबसे सरल पादप हैं, जो अधिकांशतः जल या नम पर्यावरण में पाए जाते हैं। इनका शरीर थैलस (Thallus) होता है — एक सरल संरचना जिसके माध्यम से गैसों, पोषक तत्वों और जल का प्रत्यक्ष आदान-प्रदान होता है। उदाहरण — स्पाइरोगाइरा। लाइकेन (लाइकेन एक स्वपोषी शैवाल और विषमपोषी कवक का सहजीवी संबंध है) वायु प्रदूषण के प्राकृतिक जैव सूचक (bioindicator) के रूप में जाने जाते हैं।
लाभ: सरल पादप काय संरचना जल में उत्तरजीविता व प्रसार को सुगम करती है। चुनौती: ये स्थल पर नहीं रह सकते।
ब्रायोफाइटा (Bryophyta) — पादप जगत के उभयचर
ब्रायोफाइट (ब्रायोन = मॉस, फाइटॉन = पादप), जैसे मार्केंशिया और मॉस, जल से स्थल पर आने का महत्वपूर्ण परिवर्तन दर्शाते हैं। इनका शरीर थैलोफाइट से अधिक विभेदित होता है — इनमें जड़ों जैसी संरचनाएँ जिन्हें मूलाभास (Rhizoids) कहते हैं, तथा कभी-कभी तने और पत्तियों जैसी सरल संरचनाएँ भी होती हैं। इनमें जल-भोजन परिवहन के लिए संवहनी ऊतक नहीं होते और जनन के लिए जल आवश्यक है (नर जनन कोशिकाएँ तैरकर मादा कोशिका तक पहुँचती हैं) — इसीलिए इन्हें पादप जगत का ‘उभयचर’ कहा जाता है।
लाभ: काया नम स्थल पर रहने के लिए अनुकूलित है। चुनौती: इन्हें सदा जल (नमी) की आवश्यकता होती है।
टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) — संवहन तंत्र वाले स्थलीय पौधे
टेरिडोफाइट (टेरिस = पंख, फाइटॉन = पादप), जैसे फर्न, में वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ होती हैं। इनमें संवहनी ऊतक (Vascular tissue) — जाइलम (जल का परिवहन) और फ्लोएम (भोजन का परिवहन) — पाए जाते हैं जो पूरे पौधे में जल और भोजन पहुँचाते हैं। इन्हें जनन के लिए जलीय परिस्थितियों की आवश्यकता होती है और ये बीज उत्पन्न नहीं करते।
लाभ: स्थल पर रहते हैं तथा पूरे पौधे में जल-भोजन का परिवहन करते हैं। चुनौती: जल के अभाव में जनन नहीं होता।
जिम्नोस्पर्म (जिम्नोस = अनावृत, स्पर्मोस = बीज), जैसे चीड़ (पाइन) और साइकैड, ठंडे-शुष्क क्षेत्रों के लिए अनुकूलित होते हैं। इनकी सुई या शल्क जैसी पत्तियाँ जल की हानि कम करती हैं। इनके बीज विकासशील भ्रूण की रक्षा करते हैं और भोजन संचित रखते हैं। निषेचन (fertilisation) के लिए जल आवश्यक नहीं होता तथा बीज फलों में बंद न होकर शंकुओं (cones) पर अनावृत रहते हैं।
लाभ: पत्तियाँ शुष्क परिस्थितियों के अनुकूल हैं, जनन के लिए जल आवश्यक नहीं। चुनौती: बीज फल से आवृत नहीं होते।
एंजियोस्पर्म (Angiosperm) — आवृतबीजी अथवा पुष्पी पौधे
एंजियोस्पर्म (एंजियोंन = पात्र, स्पर्मोस = बीज) सबसे जटिल काय संगठन वाले पादप हैं और पृथ्वी पर सर्वाधिक विविधता वाला पादप समूह हैं। ये पुष्प और फल उत्पन्न करते हैं — पुष्प परागणकर्ताओं को आकर्षित कर जनन की दक्षता बढ़ाते हैं जबकि फल बीजों को नए स्थानों तक फैलाने में सहायक होते हैं। इनके बीज कीटों, पक्षियों, जंतुओं, वायु या जल द्वारा प्रकीर्णित (dispersed) होते हैं। पत्तियों की शिरा-विन्यास के आधार पर इन्हें एकबीजपत्री (monocot) और द्विबीजपत्री (dicot) में बाँटा जाता है।
लाभ: सुविकसित जनन तंत्र, बीज आवरित (ढके) होते हैं। चुनौती: जनन विभिन्न कर्मकों द्वारा परागण पर निर्भर करता है।
पादप जगत के पाँचों वर्गों की तुलना
| वर्ग | शारीरिक संरचना | संवहनी ऊतक | बीज | उदाहरण |
| थैलोफाइटा | थैलस (अविभेदित) | नहीं | नहीं | स्पाइरोगाइरा |
| ब्रायोफाइटा | मूलाभास, सरल तना-पत्ती | नहीं | नहीं | मार्केंशिया, मॉस |
| टेरिडोफाइटा | वास्तविक जड़, तना, पत्ती | हाँ (जाइलम-फ्लोएम) | नहीं | फर्न |
| जिम्नोस्पर्म | सुई/शल्क जैसी पत्तियाँ | हाँ | अनावृत (शंकु पर) | चीड़, साइकैड |
| एंजियोस्पर्म | सुविकसित जड़, तना, पत्ती, पुष्प | हाँ | आवृत (फल में) | गुलमोहर, गुलाब |
जगत एनिमेलिया (Kingdom Animalia) — जंतु जगत
जंतु बहुकोशिकीय और विषमपोषी सुकेंद्रकी जीव हैं जो भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं। अधिकांश जंतु चलन (locomotion), उद्दीपन के प्रति त्वरित अनुक्रिया और समन्वित व्यवहार दर्शाते हैं। जंतुओं के वर्गीकरण का एक मुख्य आधार पृष्ठरज्जु (Notochord) — एक लचीली छड़ाकार संरचना — की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति है। इसी आधार पर जंतुओं को दो समूहों में बाँटा गया है — नॉन-कॉर्डेटा/अकशेरुकी (Non-chordata/Invertebrata) और कॉर्डेटा/कशेरुकी (Chordata)। कॉर्डेटा को आगे प्रोटोकॉर्डेटा और वर्टिब्रेटा में बाँटा गया है।
अकशेरुकी जीव (Invertebrates) — पृष्ठरज्जु रहित जंतु
अकशेरुकी जीवों में पृष्ठरज्जु नहीं होती, तब भी ये सरल से जटिल तक शरीर संगठन की व्यापक विविधता दर्शाते हैं।
- पोरीफेरा (Porifera) — छिद्रधारी जीव: स्पंज सरलतम जंतु शरीर रचना दर्शाते हैं — बहुकोशिकीय होते हुए भी इनमें ऊतक और अंग संगठन नहीं होता (कोशिकीय स्तर का संगठन)। शरीर के अनेक छिद्रों से जल निरंतर बहता है जो भोजन-कण व ऑक्सीजन कोशिकाओं तक पहुँचाता है और अपशिष्ट बाहर ले जाता है। ये स्थिर रहते हैं और जलीय (समुद्री) पर्यावरण में पाए जाते हैं।
- नाइडेरिया (Cnidaria) — वास्तविक ऊतक वाले जीव: हाइड्रा, जेलीफिश और कोरल में ऊतक-स्तरीय संगठन होता है। ये शिकार पकड़ने के लिए स्पर्शक (tentacles) का उपयोग करते हैं। इनमें भोजन-अंतर्ग्रहण और अपशिष्ट-निष्कासन दोनों के लिए एक ही छिद्र होता है। पर्यावास — जल (अलवण एवं समुद्री)।
- प्लैटीहेल्मिन्थीस (Platyhelminthes) — चपटे कृमि: इनमें द्विपार्श्व सममिति (bilateral symmetry) होती है — शरीर को एक तल से दो समान भागों में बाँटा जा सकता है, स्पष्ट सिर-पूँछ व आगे-पीछे भाग होते हैं। शरीर चपटा होने से गैसों का विसरण बिना विशेष श्वसन अंग के होता है, लेकिन भोजन-अपशिष्ट के लिए एक ही छिद्र है। अनेक चपटे कृमि परजीवी होते हैं और अंकुश-चूषक (hooks-suckers) से परपोषी से जुड़ते हैं। संगठन स्तर — अंग स्तर।
- नेमाटोडा (Nematoda) — गोल कृमि: लंबा, बेलनाकार शरीर मृदा, जल या परपोषी के ऊतकों में सरल गति में सहायक है। शरीर में दो छिद्र (मुख और गुदा) होते हैं। संगठन स्तर — अंग तंत्र (जैसे पाचन तंत्र), नर-मादा में भिन्न-भिन्न।
- ऐनेलिडा (Annelida) — संखंड कृमि: केंचुए जैसे ऐनेलिड में बेलनाकार शरीर खंडों में विभाजित होता है (खंडीभवन/segmentation), जिससे अधिक लचीलापन और गति पर नियंत्रण मिलता है। इनमें पेशियाँ (गति के लिए), तंत्रिका रज्जु (नियंत्रण-समन्वय के लिए) और देहगुहा (body cavity) पाई जाती है। संगठन स्तर — अंग तंत्र, कोई बहिःकंकाल नहीं।
- आर्थ्रोपोडा (Arthropoda) — संधिपाद जीव: आर्थ्रो = संधित, पोडा = पाद। कीट, केकड़े और मकड़ियाँ इसमें आते हैं। शरीर खंडयुक्त होता है और विभिन्न खंड अलग-अलग कार्यों के लिए विशेषीकृत होते हैं। इनकी निर्धारक विशेषता कठोर बहिःकंकाल (Exoskeleton) है, जो सुरक्षा देता है, जल-हानि कम करता है और पेशियों को अवलंब देता है — जिससे ये शुष्क व अरक्षित पर्यावरण में जीवित रह पाते हैं।
- मोलस्का (Mollusca) — मृदुकवची जीव: घोंघा, स्क्विड और ऑक्टोपस में अंग तंत्र स्तर का संगठन होता है और शरीर कोमल होता है। कई मोलस्क में कवच (shell) कोमल शरीर की रक्षा करता है। शरीर स्पष्ट सिर, पेशीय पाद और उभरे भाग में बँटा होता है।
- एकाइनोडर्मेटा (Echinodermata) — शूलचर्मी जीव: एकाइनो = कांटेदार, डर्मा = त्वचा। स्टारफिश और समुद्री अर्चिन में कैल्सियम कार्बोनेट से बना कठोर अंतःकंकाल (endoskeleton) होता है। पृष्ठरज्जु न होने पर भी यह अंतःकंकाल सुरक्षा व नियंत्रित गति देता है। पर्यावास — समुद्री जल।
अकशेरुकी संघों की तुलनात्मक तालिका
| संघ | पर्यावास | संगठन स्तर | कंकाल |
| पोरीफेरा | जल (समुद्री) | कोशिकीय | नहीं |
| नाइडेरिया | जल (अलवण व समुद्री) | ऊतक | नहीं |
| प्लैटीहेल्मिन्थीस | जल/परपोषी के अंदर | अंग | नहीं |
| नेमाटोडा | मृदा/जल/परपोषी के अंदर | अंग तंत्र (पाचन तंत्र) | नहीं |
| ऐनेलिडा | नम मिट्टी/जल | अंग तंत्र | नहीं |
| आर्थ्रोपोडा | भूमि/जल | अंग तंत्र | बहिःकंकाल |
| मोलस्का | जल/नम भूमि | अंग तंत्र | बहिःकंकाल (कवच) |
| एकाइनोडर्मेटा | समुद्री जल | अंग तंत्र | अंतःकंकाल |
प्रोटोकॉर्डेट और कशेरुकी जीव
प्रोटोकॉर्डेट (Protochordates): जैसे ऐम्फिऑक्सस — इनमें जीवन की किसी न किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु उपस्थित होती है। यह संरचना गति को सीमित किए बिना आंतरिक अवलंब देती है और यह आदिम कॉर्डेट हैं जो बताते हैं कि पृष्ठरज्जु वाले प्राणी सरल रूपों से कैसे विकसित हुए होंगे।
कशेरुकी जीव (Vertebrates): इनमें कशेरुक दंड (Vertebral column) — रीढ़ की हड्डी, एक अंतःकंकाल संरचना — होती है जो शरीर को अवलंब देती है और मस्तिष्क-मेरुरज्जु जैसे महत्वपूर्ण अंगों की रक्षा करती है। इससे शरीर का बड़ा आकार, प्रभावी गति और जटिल अंग-तंत्रों का विकास संभव होता है। पर्यावास उपयोग, देहावरण (शरीर के आवरण) और जनन के प्रतिरूप के आधार पर कशेरुकी जीवों को पाँच समूहों में बाँटा गया है —
- मत्स्य (Pisces): पख (fins) और क्लोम (gills) जल में तैरने व श्वसन में सहायक हैं।
- उभयचर (Amphibia): जल और स्थल दोनों में रहने में सक्षम।
- सरीसृप (Reptilia)।
- पक्षी (Aves): पंख और खोखली हड्डियाँ उड़ान में सहायक हैं।
- स्तनधारी (Mammalia): मादा स्तनधारियों में स्तन ग्रंथियाँ (mammary glands) शिशुओं की उत्तरजीविता को उन्नत बनाती हैं।
ऊँट में वसा-संचय और ध्रुवीय भालू में मोटा फर जैसी संरचनात्मक विशेषताएँ दर्शाती हैं कि किस प्रकार अनुकूलन (Adaptation) चरम परिस्थितियों में उत्तरजीविता में सहायता करते हैं। स्पंज से लेकर एकाइनोडर्म और आगे कशेरुकियों तक, प्राणी-शरीर संगठन में क्रमिक रूप से बढ़ती जटिलता स्पष्ट दिखती है।
वर्गीकरण की पदानुक्रमी प्रकृति (Hierarchy)
वर्गीकरण एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है जिसमें बड़े समूहों से आरंभ कर छोटे और अधिक विशिष्ट समूहों तक पहुँचा जाता है। प्रत्येक निम्नतर स्तर पर जीव अधिक समान विशेषताएँ साझा करते हैं, और प्रत्येक निम्नतर समूह अपने से ऊपर वाले बड़े समूह का भाग होता है —
जगत (Kingdom) → संघ (Phylum) → वर्ग (Class) → गण (Order) → कुल (Family) → वंश (Genus) → जाति (Species)
यह व्यवस्था एक पते (address) की तरह कार्य करती है, जैसे घर का पता किसी स्थान को सटीक ढूँढ़ने में मदद करता है, वैसे ही यह वैज्ञानिकों को जीवों की पहचान, तुलना और अध्ययन में सहायता करती है।
| स्तर | बाघ (जंतु) | मटर (पादप) |
| जगत | एनिमेलिया | प्लांटी |
| संघ | कॉर्डेटा | मैग्नोलियोफाइटा |
| उपसंघ/वर्ग | वर्टिब्रेटा (उपसंघ) | मैग्नोलियोप्सिडा (वर्ग) |
| वर्ग/गण | मैमेलिया | फेबेलीस (गण) |
| गण | कार्निवोरा | — |
| कुल | फेलिडी | फेबेसी |
| वंश | पेंथेरा | पाइसम |
| जाति | पी. टाइग्रिस | पाइसम सेटाइवम |
द्विनाम पद्धति (Binomial Nomenclature)
टाइगर को हिंदी में बाघ, तमिल में पुलि, अंग्रेजी में टाइगर और फ्रेंच में तीग्रे कहा जाता है — भ्रम से बचने के लिए वैज्ञानिक जीवों के नामकरण की एक सार्वभौमिक प्रणाली प्रयोग करते हैं जिसे द्विनाम पद्धति (Binomial nomenclature) कहते हैं। इसे 18वीं शताब्दी में कैरोलस लिनियस ने प्रस्तुत किया था। इसके अनुसार प्रत्येक जीव का वैज्ञानिक नाम दो भागों — वंश (Genus) और जाति (Species) — में, लैटिन अथवा लैटिनकृत रूप में होता है। उदाहरण — बाघ का वैज्ञानिक नाम पेंथेरा टाइग्रिस (Panthera tigris) और आम का मेंजीफेरा इंडिका (Mangifera indica)।
वैज्ञानिक नाम लिखने के नियम
- नाम के दो भाग होते हैं — वंश और जाति।
- वंश का नाम पहले लिखा जाता है और इसका पहला अक्षर बड़ा (capital) होता है; जाति का नाम बाद में छोटे अक्षरों में लिखा जाता है।
- वैज्ञानिक नाम छपते समय तिरछे (italics) में और हाथ से लिखते समय अलग-अलग रेखांकित (underlined) किए जाते हैं।
एक वंश (Genus) निकट संबंधित जातियों का समूह होता है जिनमें समान विशेषताएँ पाई जाती हैं — जैसे पेंथेरा टाइग्रिस (बाघ) और पेंथेरा लिओ (सिंह) दोनों गर्जना करने वाली बिल्लियाँ हैं और ‘पेंथेरा’ वंश में आते हैं। जाति (Species) ऐसे समान जीवों का समूह है जो परस्पर जनन करके संतान उत्पन्न करने में सक्षम हों।
तीन डोमेन पद्धति और आगे की समझ
पाँच जगत वर्गीकरण पद्धति पूर्व पद्धतियों से अधिक व्यापक थी, परंतु यह भी जीवन की पूरी विविधता को नहीं समझा सकी। सूक्ष्मदर्शी और आनुवंशिक (genetic) अनुसंधान में प्रगति के बाद वैज्ञानिकों ने जीवों की तुलना डीएनए स्तर पर करना आरंभ किया। समान डीएनए वाले जीवों को सहपूर्वजता वाला माना जाता है। आनुवंशिक आँकड़ों के आधार पर कार्ल वूस (1977) ने तीन डोमेन पद्धति (Three Domain System) प्रस्तावित की —
- बैक्टीरिया (Bacteria)
- आर्किया (Archaea)
- यूकैरिया (Eukarya)
इस पद्धति ने दर्शाया कि सूक्ष्मजीवों में विविधता पहले सोची गई विविधता से कहीं अधिक है। इससे स्पष्ट होता है कि वर्गीकरण एक स्थिर व्यवस्था नहीं बल्कि निरंतर विवेचन और परिवर्तन की चलती-फिरती प्रक्रिया है — जैसे-जैसे नई तकनीकें (सूक्ष्मदर्शी, अभिरंजक तकनीकें, डीएनए अध्ययन) आती हैं, वैसे-वैसे वर्गीकरण भी परिष्कृत होता जाता है।
जीवाश्म और जैव विविधता पर संकट
जीवाश्म (Fossils): ये चट्टानों, रेत और मिट्टी की परतों में दबे पादपों-जंतुओं के परिरक्षित अवशेष हैं। सामान्यतः पुरानी परतों में सरल जीव और नई परतों में अधिक जटिल जीव मिलते हैं। जीवाश्म प्राकृतिक अभिलेख की भाँति कार्य करते हैं जिनसे यह समझा जा सकता है कि करोड़ों वर्षों में जीवन में किस प्रकार परिवर्तन हुए। केरल में मिला बैंगनी मेंढक (Nasikabatrachus sahyadrensis) इसका एक उदाहरण है, जिसकी 2003 में हुई खोज ने प्राचीन उभयचर समूहों को समझने में सहायता की।
जैव विविधता पर मंडराता खतरा: प्रत्येक जाति, चाहे बड़ी हो या छोटी, प्रकृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है — पौधे भोजन-ऑक्सीजन देते हैं, जंतु परागण-बीज प्रकीर्णन करते हैं और सूक्ष्मजीव पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करते हैं। प्रदूषण, वनों की कटाई, संसाधनों का अत्यधिक उपयोग और जलवायु परिवर्तन जैसी मानवीय गतिविधियों से जैव विविधता का ह्रास हो रहा है। जब एक जाति विलुप्त होती है तो उस पर निर्भर अन्य जातियाँ भी धीरे-धीरे कम होकर विलुप्त हो सकती हैं।
एक नज़र में — मुख्य बिंदु
- पृथ्वी पर जीवन सरल जीवाणुओं से लेकर जटिल जंतुओं तक अनेक रूपों में पाया जाता है।
- वैज्ञानिक जीवों को कोशिका संरचना, कोशिकाओं की संख्या, पोषण की विधि और पारिस्थितिकीय भूमिका के आधार पर वर्गीकृत करते हैं।
- व्हिटेकर की पाँच जगत वर्गीकरण प्रणाली — मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया — जैव विविधता को समझने की एक सरल और उपयोगी पद्धति है।
- जगत प्लांटी को थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म — पाँच वर्गों में बाँटा गया है।
- जगत एनिमेलिया को पृष्ठरज्जु की उपस्थिति/अनुपस्थिति के आधार पर नॉन-कॉर्डेटा (अकशेरुकी) और कॉर्डेटा (कशेरुकी) में बाँटा गया है। नॉन-कॉर्डेटा को आगे पोरीफेरा, नाइडेरिया, प्लैटीहेल्मिन्थीस, नेमाटोडा, ऐनेलिडा, आर्थ्रोपोडा, मोलस्का और एकाइनोडर्मेटा संघों में बाँटा गया है।
- प्रोटोकॉर्डेट अकशेरुकी से कशेरुकी की ओर संक्रमण दर्शाते हैं क्योंकि इनमें जीवन की किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु होती है। कशेरुकी जीवों को मत्स्य, उभयचर, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी में बाँटा गया है।
- वर्गीकरण केवल नामकरण नहीं है — यह जीवों के बीच संबंधों को समझने, पृथ्वी पर जीवन के इतिहास का पता लगाने और जैव विविधता संरक्षण में सहायता करता है।
We hope that class 9 Science Chapter 12 जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण (Patterns in Life: Diversity and Classification) Notes in Hindi helped you. If you have any queries about class 9 Science Chapter 12 जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण (Patterns in Life: Diversity and Classification) Notes in Hindi or about any other Notes of class 9 Science in Hindi, so you can comment below. We will reach you as soon as possible…

