पाठ – 13
पृथ्वी एक तंत्र — ऊर्जा, द्रव्य और जीवन
In this post we have given the detailed notes of class 9 Science chapter 13 Earth as a System: Energy, Matter, and Life in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के विज्ञान के पाठ 13 पृथ्वी एक तंत्र — ऊर्जा, द्रव्य और जीवन के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Exploration / अन्वेषण (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Science |
| Chapter no. | Chapter 13 |
| Chapter Name | पृथ्वी एक तंत्र — ऊर्जा, द्रव्य और जीवन (Earth as a System: Energy, Matter, and Life) |
| Category | Class 9 Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 13, पृथ्वी एक तंत्र — ऊर्जा, द्रव्य और जीवन
पृथ्वी तंत्र का परिचय — पृथ्वी के पाँच मंडल
पृथ्वी पर जीवन ऊर्जा (Energy) और द्रव्य (Matter) के निरंतर प्रवाह से संचालित होता है। सूर्य ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। इसके अतिरिक्त पृथ्वी का गर्म आंतरिक भाग तथा वायु, जल और चट्टानों में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाएँ भी ऊर्जा और द्रव्य के प्रवाह को संचालित करती हैं। पृथ्वी को एक तंत्र (System) के रूप में समझा जाता है जो परस्पर क्रिया करने वाले पाँच मंडलों से मिलकर बना है—
पृथ्वी के पाँच मंडल (Spheres):
- भूमंडल (Geosphere): ठोस चट्टानें, मृदा, भू-आकृतियाँ (जैसे दक्कन का पठार और थार मरुस्थल) तथा पृथ्वी का आंतरिक भाग।
- जलमंडल (Hydrosphere): द्रव रूप में पाया जाने वाला सतही जल, जैसे महासागर, नदियाँ (गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र), झीलें और भूजल।
- हिममंडल (Cryosphere): जल का ठोस रूप, जैसे हिम और बर्फ (हिमालयी हिमानियाँ, लद्दाख की बर्फ और ध्रुवीय हिम छत्रक)।
- वायुमंडल (Atmosphere): पृथ्वी के चारों ओर की वायु जिसे हम श्वास के रूप में ग्रहण करते हैं।
- जैवमंडल (Biosphere): सभी जीवित जीव और उनके पर्यावास (मैंग्रोव, वन, खेत, महासागरीय प्लवक और प्रवाल भित्तियाँ)।
| मंडल | संघटन / उदाहरण | पृथ्वी तंत्र में भूमिका |
| भूमंडल (Geosphere) | चट्टानें, मृदा, भू-आकृतियाँ, पृथ्वी का आंतरिक भाग | पोषक तत्वों (जैसे कार्बोनेट चट्टानें, जीवाश्म ईंधन) का दीर्घकालीन भंडार |
| जलमंडल (Hydrosphere) | महासागर, नदियाँ, झीलें, भूजल | ऊष्मा व पोषक तत्वों का परिवहन, जलवायु नियमन |
| हिममंडल (Cryosphere) | हिमानियाँ, बर्फ, ध्रुवीय हिम छत्रक | उच्च एल्बिडो के कारण पृथ्वी को ठंडा रखना; पिघलने पर जलमंडल को जल देना |
| वायुमंडल (Atmosphere) | नाइट्रोजन (78%), ऑक्सीजन (21%), CO2, जलवाष्प | ऊष्मा को रोकना, हानिकारक विकिरण से सुरक्षा, मौसम व जलवायु का नियमन |
| जैवमंडल (Biosphere) | वन, खेत, प्लवक, प्रवाल भित्तियाँ, सभी जीव | प्रकाश संश्लेषण व श्वसन द्वारा पदार्थों व ऊर्जा का चक्रण |
क्रियाकलाप 13.1 से यह स्पष्ट होता है कि एक मंडल में विक्षोभ (disturbance) अन्य मंडलों में भी परिवर्तन ला सकता है। उदाहरण के लिए, शीतकाल में कम हिमपात होने पर ग्रीष्मकाल में झील का जल स्तर घट जाता है, जिससे घास की वृद्धि के लिए जल कम उपलब्ध हो पाता है। इसी प्रकार बड़े स्तर पर अरब सागर के गर्म जल के कारण अधिक वाष्पीकरण होता है, जिससे दक्षिण-पश्चिम मानसून में उतार-चढ़ाव होता है और भारत के कुछ क्षेत्रों में बाढ़ जबकि अन्य क्षेत्र सूखाग्रस्त रह सकते हैं। साथ ही वायुमंडलीय ताप में वृद्धि से हिममंडल में हिमानियों और ध्रुवीय हिम के पिघलने की दर बढ़ने से समुद्र का जल स्तर बढ़ सकता है, जिससे तटीय शहरों को खतरा उत्पन्न होता है और जैवमंडल में पारितंत्र पर्यावास हानि से विक्षोभित होते हैं।
पृथ्वी का असमान ऊष्मीकरण (Uneven Heating of the Earth)
सौर विकिरण और विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम:
पृथ्वी पर ऊर्जा का मुख्य स्रोत सौर विकिरण है, जो विद्युत चुंबकीय (Electromagnetic — EM) तरंगों के रूप में निर्वात में प्रकाश की गति (3 × 10⁸ ms⁻¹) से चलती हैं। विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम में उच्च आवृत्ति/लघु तरंगदैर्घ्य विकिरण (गामा किरणें, X-किरणें) से लेकर निम्न आवृत्ति/दीर्घ तरंगदैर्घ्य विकिरण (अवरक्त, रेडियो तरंगें) तक शामिल हैं। सूर्य की लगभग 99 प्रतिशत ऊर्जा पराबैंगनी (UV), दृश्य और अवरक्त (IR) परास में होती है। गामा किरणें और X-किरणें पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल द्वारा छान ली जाती हैं। लघु तरंगदैर्घ्य वाली UV विकिरणों का अधिकांश भाग ओजोन परत द्वारा अवशोषित हो जाता है, जिससे जीवन को सुरक्षा मिलती है। दृश्य प्रकाश प्रकाश संश्लेषण के लिए ऊर्जा प्रदान करता है, जबकि अवरक्त विकिरण पृथ्वी की सतह को गर्म करता है, जो बाद में इसे पुनः विकिरित करती है।
सूर्यातप और सौर स्थिरांक:
सूर्यातप (Insolation): पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाले सौर विकिरण की मात्रा को सूर्यातप कहते हैं। यह पृथ्वी की सतह और वायुमंडल को गर्म रखने के लिए उत्तरदायी है।
सौर स्थिरांक (Solar Constant): पृथ्वी के वायुमंडल के ऊपरी भाग पर सूर्य की किरणों के लंबवत प्रति इकाई क्षेत्र में प्रति इकाई समय में प्राप्त सौर ऊर्जा की औसत मात्रा को सौर स्थिरांक कहते हैं। इसका मान लगभग 1.4 kWm⁻² (1400 J s⁻¹m⁻²) होता है। वायुमंडल में अवशोषण व प्रकीर्णन के कारण स्वच्छ आकाश में सतह तक पहुँचने वाला अधिकतम सूर्यातप लगभग 1 kWm⁻² होता है। भारत उष्णकटिबंधीय स्थिति के कारण प्रचुर सूर्यातप प्राप्त करता है, जो दक्षिण-पश्चिम मानसून को संचालित करता है और सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएँ प्रदान करता है। भारत की अग्रणी वायुमंडलीय वैज्ञानिक अन्ना मणि ने एस. रंगराजन के साथ मिलकर 1982 में “Solar Radiation Over India” प्रकाशित की, जो देश का प्रथम सूर्यातप एटलस बनी।
सौर विकिरण की पारस्परिक क्रिया — एल्बिडो:
विभिन्न पदार्थ सूर्य के प्रकाश को भिन्न-भिन्न मात्रा में अवशोषित करते हैं। गहरे रंग की सतहें अधिक सूर्य प्रकाश अवशोषित करती हैं जबकि हल्के रंग की सतहें अधिक परावर्तन करती हैं और अपेक्षाकृत ठंडी रहती हैं।
एल्बिडो (Albedo): किसी सतह द्वारा सौर विकिरण का परावर्तित अंश एल्बिडो कहलाता है। उच्च एल्बिडो सतहें (जैसे हिम व बर्फ, एल्बिडो 0.80–0.90) ठंडी रहती हैं क्योंकि वे अधिक प्रकाश परावर्तित करती हैं, जिससे ध्रुवीय प्रदेश अत्यधिक ठंडे रहते हैं। निम्न एल्बिडो सतहें (जैसे काली मृदा और महासागरीय जल) अधिक अवशोषण के कारण अपेक्षाकृत अधिक गर्म रहती हैं।
सभी वस्तुएँ ऊष्मा का पुनः विकिरण भी करती हैं। कंक्रीट के मकान रात्रि में ऊष्मा पुनः विकिरित करते हैं, जबकि गाढ़ी मिट्टी व लकड़ी से बने पारंपरिक घर कम पुनः विकिरण के कारण गर्मियों में भी ठंडक देते हैं। इसी सिद्धांत पर आधारित है शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव (Urban Heat Island Effect) — शहरों में इस्पात, कंक्रीट, ईंट और डामर की सड़कें अधिक सौर विकिरण अवशोषित कर ऊष्मा संचित करती हैं और उसे पुनः विकिरित करती हैं, जिससे शहर आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक गर्म हो जाते हैं। इससे वातानुकूलन की माँग बढ़ती है और शहरी पारितंत्र पर दबाव पड़ता है, जबकि वनों व ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक वनस्पति के कारण छाया और वाष्पोत्सर्जन से ठंडक बनी रहती है।
अक्षांश और पृथ्वी का आकार:
पृथ्वी गोलाकार होने के कारण सूर्य की किरणें विभिन्न अक्षांशों पर भिन्न-भिन्न कोणों पर पड़ती हैं। भूमध्यरेखीय प्रदेशों में सौर विकिरण छोटे क्षेत्र में केंद्रित रहती है जबकि ध्रुवीय प्रदेशों में यह बड़े क्षेत्र में फैल जाती है। इसी कारण भूमध्यरेखीय प्रदेश पूरे वर्ष अपेक्षाकृत गर्म रहते हैं जबकि ध्रुवीय प्रदेश ठंडे रहते हैं — यही असमान ऊष्मण भूमध्य रेखा और ध्रुवों के बीच ताप में अंतर उत्पन्न करता है। पृथ्वी की गोलीय आकृति और अपनी धुरी पर झुकाव ही ऋतुओं में परिवर्तन और दिन की अवधि में बदलाव का कारण बनता है। यह असमान ऊष्मण ही वैश्विक पवन और महासागरीय धाराओं को संचालित करता है।
वायुमंडल की भूमिका:
वायुमंडल मुख्यतः नाइट्रोजन (78%) और ऑक्सीजन (21%) के साथ आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, जलवाष्प व अन्य गैसों से बना है और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण अपने स्थान पर बना रहता है। वायुमंडल विभिन्न संस्तरों (layers) में विभाजित है—
| परत | अनुमानित ऊँचाई | विशेषताएँ |
| क्षोभमंडल (Troposphere) | 0 – 12 km | मौसम का निर्माण; ऊँचाई के साथ ताप घटता है (~6.5°C/km) |
| समतापमंडल (Stratosphere) | 12 – 50 km | ओजोन परत UV अवशोषण करती है; ऊँचाई के साथ ताप बढ़ता है |
समतापमंडल के ऊपर मध्यमंडल, तापमंडल और बहिर्मंडल होते हैं, जो पृथ्वी की जलवायु नियंत्रण में गौण भूमिका निभाते हैं। पृथ्वी से लगभग 100 km ऊपर बाह्य अंतरिक्ष प्रारंभ होता है। भारत के वायुमंडलीय वैज्ञानिक के.आर. रामनाथन ने 1934 में हिमालय की 18,000 फीट ऊँचाई पर ओजोन स्तर मापे थे।
वायुमंडल पृथ्वी पर जीवन की सुरक्षा में दो महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाता है — पहली, यह आने वाले सौर विकिरण का कुछ भाग अवशोषित करता है (ओजोन परत हानिकारक UV किरणों को रोकती है); दूसरी, यह बाहर जाने वाली ऊष्मा को रोकता है। पृथ्वी की सतह सूर्य के प्रकाश को अवशोषित कर अवरक्त क्षेत्र में पुनः विकिरित करती है, जिसे हरितगृह गैसें (Greenhouse Gases) जैसे CO₂, CH₄ और जलवाष्प अवशोषित कर लेती हैं, जिससे यह अंतरिक्ष में जाने से रुक जाती है — इसे हरितगृह प्रभाव कहते हैं। वायुमंडल के बिना पृथ्वी जीवन के लिए बहुत ठंडी होती। शुक्र ग्रह, बुध ग्रह से अधिक निकट न होते हुए भी अनियंत्रित हरितगृह प्रभाव के कारण अधिक गर्म है। मानवीय गतिविधियों से निकलने वाली अतिरिक्त CO₂ हरितगृह प्रभाव को बढ़ाकर वैश्विक ताप वृद्धि (Global Warming) का कारण बनती है।
ओजोन परत का महत्व: ओजोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक UV किरणों को अवशोषित कर सुरक्षा कवच का कार्य करती है। 20वीं शताब्दी में मानव-निर्मित क्लोरोफ्लुओरोकार्बन (CFCs) रसायनों के कारण अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत में गंभीर क्षरण हुआ, जिसे “ओजोन छिद्र” कहा गया। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल नामक वैश्विक समझौते ने CFC के उपयोग को घटाया, जिससे ओजोन परत धीरे-धीरे पुनर्निर्मित हो रही है।
असमान ऊष्मण के कारण पवन और महासागरीय धाराएँ
पवन (Wind), उच्च दाब वाले क्षेत्र से निम्न दाब वाले क्षेत्र की ओर चलने वाली वायु है। दाब में यह अंतर मुख्यतः सूर्य द्वारा पृथ्वी की सतह के असमान ऊष्मण के कारण होता है। भूमि और जल का असमान ऊष्मण ही स्थल समीर और समुद्री समीर जैसी परिघटनाओं के लिए उत्तरदायी है।
स्थानीय पवन (Local Winds):
पर्वतीय क्षेत्रों में ढलान और घाटी की सतह समान दर से गर्म-ठंडी नहीं होतीं। दिन में सूर्य की ओर वाली पर्वतीय ढलानें अधिक तेज़ी से गर्म होती हैं, जिससे उनके ऊपर की वायु गर्म होकर ऊपर उठती है और घाटी से ठंडी वायु ऊपर की ओर बहती है — इसे घाटी समीर (Valley Breeze) कहते हैं। सूर्यास्त के बाद स्थिति उलट जाती है — पर्वतीय ढलानें तेज़ी से ठंडी होकर सघन वायु को घाटी की ओर नीचे बहाती हैं — इसे पर्वतीय समीर (Mountain Breeze) कहते हैं। ऐसे दैनिक परिवर्तन शिमला, देहरादून जैसी हिमालयी घाटियों में सामान्य हैं और कृषि, मृदा तथा जन-जीवन को प्रभावित करते हैं।
ग्रहीय पवन (Planetary Winds):
भूमध्य रेखा और ध्रुवों के मध्य असमान ऊष्मण के कारण निम्न व उच्च दाब की पट्टियाँ बनती हैं, जो लंबी दूरियों तक हवा को गतिशील बनाती हैं। भूमध्य रेखा के पास तीव्र ऊष्मण से गर्म वायु ऊपर उठकर भूमध्यरेखीय निम्न दाब पट्टी बनाती है। यह वायु ध्रुवों की ओर बढ़ते हुए ठंडी व सघन होकर लगभग 30° उत्तर-दक्षिण अक्षांशों पर उतरती है, जिससे उपोष्णकटिबंधीय उच्च दाब पट्टियाँ बनती हैं। इस उतरती वायु का एक भाग सतह के सहारे भूमध्य रेखा की ओर लौटकर परिसंचरण चक्र पूरा करता है, जबकि शेष भाग ध्रुवों की दिशा में बहकर लगभग 60° अक्षांशों पर ध्रुवीय ठंडी वायु से मिलकर उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टियाँ बनाता है। ध्रुवीय क्षेत्रों (लगभग 90°) में अत्यधिक ठंडी व सघन वायु नीचे उतरकर ध्रुवीय उच्च दाब पट्टियाँ बनाती है। पृथ्वी के घूर्णन के कारण ये पवनें सीधे मार्ग के बजाय वक्राकार मार्ग में चलती हैं — उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर विक्षेपित होती हैं।
महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents):
महासागरीय धाराएँ महासागरीय जल के विशाल समूहों का निरंतर प्रवाह हैं। ग्रहीय पवनों का घर्षण सतही जल को खींचकर सतही धाराएँ उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त ताप व लवणता में अंतर, पृथ्वी का घूर्णन तथा स्थलखंडों का वितरण भी महासागरीय जल की गति को प्रभावित करते हैं। भूमध्यरेखीय गर्म जल सतह से ध्रुवों की ओर बहता है जबकि ठंडा-सघन जल गहरे स्तर से भूमध्य रेखा की ओर लौटता है। कम लवणता का जल सतह के निकट रहता है जबकि अधिक लवणता वाला सघन जल गहरे स्तरों में चला जाता है। पृथ्वी के घूर्णन से बड़े वृत्ताकार प्रवाह पैटर्न बनते हैं जिन्हें महासागरीय भंवर (Gyres) कहा जाता है — उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुई की दिशा में और दक्षिणी गोलार्ध में इसके विपरीत। उदाहरणस्वरूप, गल्फ स्ट्रीम का विस्तार उत्तर अटलांटिक प्रवाह (North Atlantic Drift) यूरोप के उत्तर-पश्चिमी तट को शीतकाल में भी बर्फ-मुक्त रखता है। महासागरीय धाराएँ भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर ऊष्मा स्थानांतरित कर तापमान के अंतर को कम करती हैं, व्यापार-वाणिज्य में सहायक होती हैं और पोषक तत्वों के परिवहन द्वारा विशाल समुद्री पारितंत्र को सहारा देती हैं। पुणे स्थित भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) उपग्रह, बॉय (buoys) व अंटार्कटिका के आँकड़ों का उपयोग कर उन्नत कंप्यूटर मॉडलों से भारतीय मानसून का अनुकरण करता है।
जैव-भू रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycles)
सजीव निरंतर अपने आस-पास की वायु, जल, मृदा और चट्टानों के साथ द्रव्य और ऊर्जा का आदान-प्रदान करते हैं। निर्जीव (Abiotic) और सजीव (Biotic) घटकों के मध्य द्रव्य और ऊर्जा के इस चक्रीय संचलन को जैव-भू रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle) कहते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि कार्बन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन जैसे आवश्यक पोषक तत्व पुनः चक्रण द्वारा जीवन के लिए उपलब्ध रहें।
जल चक्र (Water Cycle):
जल नदियों, झीलों, महासागरों जैसे स्रोतों से वाष्पित (Evaporation) होकर संघनित (Condensation) होता है और बादल बनाता है। यह वर्षण (Precipitation) — वर्षा, ओले या हिम के रूप में — स्थल पर लौटता है और अंततः समुद्र में प्रवाहित हो जाता है। कुछ जल मृदा और चट्टानों से रिसकर भूजल बनता है और खनिजों को घोलकर स्थलीय जीवों तथा समुद्री जीवन को सहारा देता है। जलवायु परिवर्तन जल चक्र को प्रभावित कर रहा है — गर्म वायुमंडल अधिक नमी संचित करता है जिससे कुछ क्षेत्रों में तीव्र मानसून व अधिक वर्षा होती है जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में सूखा पड़ता है। हिमानियों के पिघलने से नदियों में जल बढ़ता है और दीर्घकाल में समुद्र का जल स्तर बढ़ने से मुंबई-चेन्नई जैसे तटीय शहरों को खतरा उत्पन्न होता है। आकस्मिक तीव्र वर्षा से अपवाह (Runoff) बढ़ने से मृदा क्षरण होता है और कम रिसाव से भूजल पुनर्भरण घटता है, जिससे शुष्क महीनों में कृषि कठिन हो जाती है। इस प्रकार जल चक्र हिममंडल, जलमंडल, वायुमंडल, भूमंडल और जैवमंडल को परस्पर जोड़ता है।
कार्बन चक्र (Carbon Cycle):
कार्बन जीवन का मुख्य आधार है — प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा और DNA सभी में कार्बन होता है। यह वायुमंडल (CO₂ गैस), जैवमंडल (पादप व जंतु), भूमंडल (कार्बोनेट चट्टानें और जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला व कच्चा तेल) और जलमंडल (घुली CO₂ व समुद्री शंख-कवच) के मध्य निरंतर परिसंचरित होता है। द्रुत चक्र (Fast Cycle) कुछ दिनों से वर्षों में पूर्ण होता है — पादप प्रकाश संश्लेषण द्वारा वायुमंडलीय CO₂ को ग्लूकोस में बदलते हैं, श्वसन से CO₂ वापस वायुमंडल में जाती है, और जंतु मृत्यु व अपघटन के बाद भी CO₂ वायु में लौट आती है। मंद चक्र (Slow Cycle) लाखों वर्षों में चलता है — मृत पादप-जंतु मृदा में दबकर कोयला, तेल व गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों में बदल जाते हैं, जिन्हें जलाने पर कार्बन बहुत कम समय में CO₂ के रूप में उत्सर्जित हो जाता है। महासागर वायुमंडल से CO₂ अवशोषित कर कार्बोनेट व बाइकार्बोनेट आयन बनाते हैं, जिन्हें पादप प्लवक (Phytoplankton) प्रकाश संश्लेषण व शंख-निर्माण में उपयोग करते हैं। मानव गतिविधियों — जीवाश्म ईंधन दहन और वनोन्मूलन — ने 1960 से वायुमंडलीय CO₂ को लगभग 35 प्रतिशत (315 ppm से 420 ppm) बढ़ा दिया है, जो हरितगृह प्रभाव को तीव्र कर वैश्विक ताप वृद्धि, हिमानियों व आर्कटिक बर्फ के पिघलने तथा समुद्र जल स्तर वृद्धि का कारण बन रहा है। ज्ञातव्य है कि सजीवों के शुष्क भार का लगभग 49 प्रतिशत भाग कार्बन है, और वैश्विक कार्बन का लगभग 71 प्रतिशत भाग महासागरों में तथा मात्र लगभग 1 प्रतिशत ही वायुमंडल में पाया जाता है।
नाइट्रोजन चक्र (Nitrogen Cycle):
नाइट्रोजन प्रोटीन व न्यूक्लिक अम्लों के संश्लेषण के लिए आवश्यक तत्व है। इसका सबसे बड़ा भंडार वायुमंडल में है, परंतु नाइट्रोजन गैस (N₂) अभिक्रियाशील न होने के कारण पादप-जंतु इसका सीधे उपयोग नहीं कर सकते। वायु, मृदा, जल और जीवों के मध्य नाइट्रोजन के समग्र संचरण को नाइट्रोजन चक्र कहते हैं, जिसमें निम्न चरण होते हैं—
- नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation): राइजोबियम (फलीदार पादपों की जड़ ग्रंथियों में) और एजोटोबैक्टर जैसे जीवाणु वायुमंडलीय N₂ को अमोनिया (NH₃) में बदलते हैं। तड़ित (Lightning) भी कुछ नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती है।
- नाइट्रीकरण (Nitrification): नाइट्रोसोमोनास अमोनिया को नाइट्राइट (NO₂⁻) में और नाइट्रोबैक्टर नाइट्राइट को नाइट्रेट (NO₃⁻) में बदलते हैं।
- स्वांगीकरण (Assimilation): पादप मृदा से नाइट्रोजन यौगिक ग्रहण करते हैं; जंतु पादप या अन्य जंतुओं से नाइट्रोजन प्राप्त करते हैं।
- अमोनीकरण (Ammonification): जीवाणु-कवक जैसे अपघटक मृत पादप-जंतुओं व अपशिष्ट के कार्बनिक द्रव्य को अपघटित कर अमोनिया मृदा में लौटाते हैं।
- विनाइट्रीकरण (Denitrification): स्यूडोमोनास जैसे जीवाणु नाइट्रेट को पुनः नाइट्रोजन गैस में बदलकर चक्र पूर्ण करते हैं।
आज अधिकांश नाइट्रोजन कृत्रिम रूप से हाबर-बॉश प्रक्रिया (Haber-Bosch Process) द्वारा स्थिरीकृत होकर उर्वरकों के निर्माण का आधार बनती है — इस “वायु से अन्न” ने भारत की हरित क्रांति को संभव बनाया, हालाँकि यह प्रक्रिया ऊर्जा-गहन है और उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग ने मृदा व जल को क्षतिग्रस्त किया है।
ऑक्सीजन चक्र (Oxygen Cycle):
वायुमंडल का लगभग 21 प्रतिशत भाग मुक्त ऑक्सीजन गैस (O₂) से बना है, जो कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल व वसा जैसे जैविक अणुओं का आवश्यक घटक है। पादप-जंतु श्वसन के लिए ऑक्सीजन उपयोग कर CO₂ उत्सर्जित करते हैं; ईंधन दहन में भी ऑक्सीजन का उपयोग होकर CO₂ बनती है। पादप प्रकाश संश्लेषण द्वारा सूर्य प्रकाश, जल व CO₂ का उपयोग कर ग्लूकोस बनाते हैं और O₂ मुक्त करते हैं। श्वसन-दहन (उपभोग) तथा प्रकाश संश्लेषण (उत्पादन) के बीच यह संतुलन वायुमंडल, स्थल, महासागरों और सजीवों के बीच ऑक्सीजन का परिसंचरण बनाए रखता है, जिससे पृथ्वी के सभी मंडलों में जीवन सतत बना रहता है।
जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग से बढ़ते CO₂ स्तर के कारण चरम मौसमी स्थितियाँ और जैव विविधता का नाश होता है। मानवीय गतिविधियाँ पृथ्वी के सभी मंडलों में जैव-भूरासायनिक चक्रों को बाधित करती हैं—
- महासागरीय अम्लीकरण: वायुमंडलीय CO₂ की अधिकता से महासागरों में अवशोषण बढ़ने पर समुद्री जल अधिक अम्लीय हो जाता है, जिससे प्लवक व प्रवाल भित्तियों को खतरा होता है। गर्म महासागरीय जल की CO₂ अवशोषण क्षमता भी घट जाती है, जिससे यह प्रभावी कार्बन अवशोषक (Carbon Sink) के रूप में कमजोर पड़ता है।
- सुपोषण (Eutrophication): कृषि में उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से अतिरिक्त नाइट्रोजन नाइट्रेट के रूप में नदियों-झीलों में पहुँचती है, जिससे शैवाल प्रस्फुटन (Algal Bloom) होता है — यह जल में ऑक्सीजन की कमी कर मछलियों की मृत्यु का कारण बनता है और जल निकायों तथा तटीय मत्स्य संसाधनों को खतरे में डालता है।
- वनोन्मूलन (Deforestation): वनों की कटाई से प्रकाश संश्लेषण व वाष्पोत्सर्जन घटता है, जिससे स्थानीय वर्षा में कमी हो सकती है और सतही एल्बिडो बदल जाता है। वृक्षों की जड़ों के अभाव में मृदा अपरदन बढ़ता है, पर्यावास नष्ट होते हैं और जैव विविधता में कमी आती है।
- वाहन उत्सर्जन: वाहनों से निकलने वाला धुआँ सूर्य प्रकाश से अभिक्रिया कर धूमकुहरा (Smog) और भूतल ओजोन बनाता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है (जबकि समतापमंडल की ओजोन जीवन-रक्षक है)।
इन चुनौतियों के समाधान हेतु स्थानीय व वैश्विक प्रयास चल रहे हैं — मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने ओजोन परत के सुधार में वैश्विक सहयोग की मिसाल कायम की, हालाँकि क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौता, जिनका उद्देश्य CO₂ उत्सर्जन घटाना था, उतने सफल नहीं रहे। भारत ने बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया है, सौर व नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा दिया है और सतत कृषि पद्धतियों को अपनाया है। भारत द्वारा संचालित वैश्विक पहल मिशन LiFE (Lifestyle for Environment), जिसे 2021 के संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया, लोगों को सजग व पर्यावरण हितैषी जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करती है। ऊर्जा व संसाधनों का संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा (सौर व पवन) का उपयोग, वृक्षारोपण, जल संरक्षण, सतत कृषि तथा अपशिष्ट में कमी, पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण जैसे व्यक्तिगत व सामुदायिक प्रयास मिलकर पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में सहायक हैं।
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