पाठ – 6
रीढ़ की हड्डी
In this post we have given the detailed notes of Class 9 Hindi chapter 6 रीढ़ की हड्डी These notes are useful for the students who are going to appear in Class 9 board exams
इस पोस्ट में कक्षा 9 के हिंदी के पाठ 6 रीढ़ की हड्डी के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं हिंदी विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Ganga (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Hindi (गंगा) |
| Chapter no. | Chapter 6 |
| Chapter Name | रीढ़ की हड्डी |
| Category | Class 9 Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 6, रीढ़ की हड्डी
-जगदीशचंद्र माथुर
सारांश
पात्र परिचय (मुख्य पात्र)
उमा — रामस्वरूप और प्रेमा की बेटी, बी.ए. पास, पढ़ी-लिखी और स्वाभिमानी लड़की। रामस्वरूप (बाबू) — उमा के पिता, दिखावटी स्वभाव के, ऊपर से आधुनिक पर भीतर से रूढ़िवादी सोच रखने वाले। प्रेमा — उमा की माँ, पढ़ाई-लिखाई को झंझट मानने वाली परंपरावादी स्त्री। शंकर — गोपालप्रसाद का बेटा, मेडिकल कॉलेज का छात्र, कमजोर व्यक्तित्व वाला युवक। गोपालप्रसाद — शंकर के पिता, पेशे से वकील, पढ़े-लिखे होकर भी दकियानूसी विचारों वाले। रतन — रामस्वरूप के घर का नौकर।
‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी की कहानी बाबू रामस्वरूप के घर के एक साधारण से कमरे से शुरू होती है, जिसे उस दिन विशेष रूप से सजाया जा रहा है क्योंकि उनकी बेटी उमा को देखने के लिए वर पक्ष आने वाला है। रामस्वरूप और उनकी पत्नी प्रेमा नौकर रतन के साथ मिलकर कमरे को व्यवस्थित करते हैं — तख्त बिछाया जाता है, दरी-चादर लगाई जाती है, सितार-हारमोनियम रखे जाते हैं और नाश्ते का प्रबंध किया जाता है। इसी हड़बड़ी में रतन से मक्खन लाने को कहा जाता है, पर वह जल्दी में बिना मक्खन के ही लौट आता है, जिससे रामस्वरूप झुँझला उठते हैं। इसी बीच पति-पत्नी की आपस में नोकझोंक भी होती है। प्रेमा शिकायत करती है कि उमा मुँह फुलाए बैठी है और पाउडर तक लगाने को तैयार नहीं। बातों-बातों में यह भी स्पष्ट हो जाता है कि प्रेमा पढ़ाई-लिखाई को व्यर्थ का झंझट मानती है, जबकि रामस्वरूप ने ही उमा को पढ़ा-लिखाकर आगे बढ़ाया है। लेकिन अब वे इस बात से चिंतित हैं कि उमा की ऊँची पढ़ाई कहीं इस रिश्ते में बाधा न बन जाए, इसलिए वे तय करते हैं कि लड़के वालों को उमा की पढ़ाई के बारे में ज्यादा नहीं बताया जाएगा।
इतने में बाबू गोपालप्रसाद और उनका बेटा शंकर आ जाते हैं। गोपालप्रसाद बड़ी चतुराई और अनुभव जताने वाले व्यक्ति हैं, जबकि शंकर झिझका हुआ, दब्बू स्वभाव का युवक है जो अपने पिता के सामने कुछ नहीं बोल पाता। शुरू में औपचारिक बातचीत होती है — पुराने ज़माने की पढ़ाई, सेहत, टैक्स और खूबसूरती पर हल्के-फुल्के मज़ाक होते हैं। रामस्वरूप बड़ी विनम्रता और चापलूसी से मेहमानों की खातिरदारी करते हैं। जब असली ‘बिजनेस’ यानी विवाह की बात चलती है तो गोपालप्रसाद साफ कह देते हैं कि उन्हें ज्यादा पढ़ी-लिखी बहू नहीं चाहिए, बहू का काम नौकरी करना नहीं बल्कि घर सँभालना है, और लड़कों की पढ़ाई तथा लड़कियों की पढ़ाई एक बात नहीं हो सकती। रामस्वरूप उनकी हाँ में हाँ मिलाते चले जाते हैं, यहाँ तक कि झूठ भी बोल देते हैं कि उनकी बेटी बस मैट्रिक तक ही पढ़ी है।
इसके बाद उमा को पान की तश्तरी लेकर बुलाया जाता है। उसकी आँखों पर सोने की कमानी वाला चश्मा देखकर गोपालप्रसाद और शंकर चौंक जाते हैं, क्योंकि चश्मा पढ़ाई-लिखाई का संकेत माना जाता है। रामस्वरूप जल्दी से बहाना बना देते हैं कि आँखें दुखने के कारण चश्मा लगाना पड़ा है। इसके बाद उमा से गाना सुनाने को कहा जाता है। वह मीरा का भजन ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ बड़े सुंदर स्वर में गाने लगती है, पर तभी उसकी नज़र शंकर की झेंपती हुई आँखों से मिल जाती है और वह गाते-गाते रुक जाती है। इसके बाद उससे चित्रकारी और सिलाई के बारे में पूछा जाता है, जिसका जवाब रामस्वरूप खुद ही गर्व से देते हैं। लेकिन जब गोपालप्रसाद उससे सीधे पूछते हैं कि क्या उसने कोई इनाम भी जीता है, तो उमा चुप रह जाती है। रामस्वरूप के बार-बार टोकने पर भी वह कुछ नहीं बोलती, बल्कि गोपालप्रसाद के रूखे स्वर में डाँटने पर वह फूट पड़ती है।
यहीं से एकांकी का सबसे तीखा और महत्वपूर्ण मोड़ आता है। उमा दृढ़ता से कहती है कि जिस तरह दुकान पर कुर्सी-मेज बिकते समय उनसे कुछ नहीं पूछा जाता, बस खरीदार को दिखा दिया जाता है, वैसे ही उसे भी दिखाया जा रहा है — मानो लड़कियों का कोई दिल ही न हो, मानो वे बेबस भेड़-बकरियाँ हों जिन्हें कसाई जाँच-परखकर खरीदते हैं। गोपालप्रसाद इसे अपनी बेइज़्ज़ती मानकर आगबबूला हो उठते हैं, पर उमा बिना डरे आगे कहती है कि जब उसकी इतनी नाप-तोल हो रही है तो यह भी पूछा जाए कि पिछली फरवरी में शंकर लड़कियों के हॉस्टल के आसपास क्यों घूम रहे थे और वहाँ से डरकर कैसे भागे थे। यह सुनकर गोपालप्रसाद स्तब्ध रह जाते हैं और उमा से पूछते हैं कि क्या वह कॉलेज में पढ़ी है। उमा साफ स्वीकार करती है कि वह बी.ए. पास है, उसने कोई पाप या चोरी नहीं की, बल्कि उसे अपने मान-सम्मान का पूरा खयाल है — जो शंकर जैसे लड़कों में नहीं दिखता जो मुँह छिपाकर भाग जाते हैं। यह सुनते ही गोपालप्रसाद रामस्वरूप पर झूठ बोलने और धोखा देने का आरोप लगाते हैं और गुस्से में बेटे को लेकर वहाँ से चलने लगते हैं। जाते-जाते उमा उन पर करारा व्यंग्य करती है — वह कहती है कि जाइए, ज़रूर जाइए, पर घर जाकर यह ज़रूर पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे की रीढ़ की हड्डी है भी या नहीं, यानी उसमें ‘बैकबोन’ है या नहीं।
गोपालप्रसाद और शंकर अपमानित होकर चले जाते हैं। रामस्वरूप सन्न होकर कुर्सी पर बैठ जाते हैं और उमा की खामोशी सिसकियों में बदल जाती है। घबराई हुई प्रेमा अंदर से दौड़ी आती है। ठीक इसी क्षण रतन हाथ में मक्खन लिए आता है और कहता है — “बाबूजी, मक्खन!” सब उसकी ओर देखते हैं और पर्दा गिर जाता है। यह अंत बड़ी कुशलता से हास्य और व्यंग्य के मेल से एकांकी के गंभीर विषय — दिखावटी आधुनिकता, स्त्री-शिक्षा के प्रति संकीर्ण सोच और विवाह में लड़की को वस्तु की तरह परखने की कुरीति — को उभारता है। एकांकी यह संदेश देती है कि ‘रीढ़ की हड्डी’ केवल शरीर का अंग नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, नैतिक साहस और सच बोलने की दृढ़ता का प्रतीक है, जो उमा में तो है पर शंकर और उसके पिता के दिखावटी व्यक्तित्व में नहीं।
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