पाठ – 7
मैं और मेरा देश
In this post we have given the detailed notes of Class 9 Hindi chapter 7 मैं और मेरा देश These notes are useful for the students who are going to appear in Class 9 board exams
इस पोस्ट में कक्षा 9 के हिंदी के पाठ 7 मैं और मेरा देश के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं हिंदी विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Ganga (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Hindi (गंगा) |
| Chapter no. | Chapter 7 |
| Chapter Name | मैं और मेरा देश |
| Category | Class 9 Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 7, मैं और मेरा देश
-कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
सारांश
‘मैं और मेरा देश’ निबंध में लेखक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने प्रश्नोत्तर और संवाद की सरल शैली में यह बताया है कि व्यक्ति और उसका देश कभी अलग-अलग नहीं हो सकते। लेखक कहता है कि वह अपने घर में जन्मा, पड़ोसियों के प्यार में पला-बढ़ा और अपने नगर के विशाल समाज से जुड़कर एक पूर्ण मनुष्य बन गया। उसे लगने लगा था कि उसका घर, पड़ोस और नगर मिलकर उसे पूरी तरह संतुष्ट कर चुके हैं और अब उसे कुछ और नहीं चाहिए।
परंतु एक दिन इस आनंद की दीवार में एक दरार पड़ गई। यह दरार किसी भूकंप से नहीं बल्कि लेखक के अपने मानस में उठे विचारों के भूकंप से पड़ी थी, जो स्वर्गीय पंजाब-केसरी लाला लाजपत राय के एक अनुभव को सुनकर उत्पन्न हुई। लाला जी ने बताया था कि वे अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस सहित संसार के अनेक देशों में घूमे, पर जहाँ भी गए, भारत की गुलामी का कलंक उनके माथे पर बना रहा। इससे लेखक को यह अनुभूति हुई कि यदि मनुष्य के पास संसार-भर के साधन और सुख-सुविधाएँ हों, पर उसका देश गुलाम या हीन हो, तो वे सारी सुविधाएँ उसे सच्चा सम्मान नहीं दे सकतीं। इसी से लेखक यह निष्कर्ष निकालता है कि जैसे उसका कर्तव्य है कि वह अपने देश के सम्मान और स्वतंत्रता को कभी ठेस न पहुँचाए, वैसे ही उसका यह अधिकार भी है कि उसे देश के सम्मान और शक्ति का पूरा-पूरा सहारा मिले।
इसके बाद लेखक इस शंका का समाधान करता है कि एक साधारण नागरिक इतने बड़े देश के लिए भला क्या कर सकता है। वह कहता है कि जीवन एक युद्ध के समान बहुमुखी है, जिसमें केवल लड़ने वालों का ही नहीं बल्कि रसद पहुँचाने वालों और जय-जयकार करने वालों का भी महत्व होता है, जैसे खेल के मैदान में दर्शकों की तालियाँ गिरते खिलाड़ी को भी उभार देती हैं। इसीलिए ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’ वाली कहावत को लेखक झूठा बताता है और कहता है कि इतिहास में अकेले व्यक्तियों ने भी बड़े-बड़े परिवर्तन किए हैं।
अपनी बात स्पष्ट करने के लिए लेखक दो घटनाएँ सुनाता है। पहली घटना में स्वामी रामतीर्थ जापान की यात्रा में फल न मिलने पर कह बैठे कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। यह सुनकर एक जापानी युवक दौड़कर ताजे फल ले आया और मूल्य के रूप में केवल इतना माँगा कि स्वामी जी अपने देश जाकर यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। इस युवक ने अपने एक छोटे से कार्य से अपने देश का गौरव बहुत बढ़ा दिया। इसके विपरीत दूसरी घटना में जापान में पढ़ने आए एक विदेशी विद्यार्थी ने पुस्तकालय की एक पुस्तक से दुर्लभ चित्र चुरा लिए। पकड़े जाने पर उसे तो देश से निकाला ही गया, साथ ही पुस्तकालय के बाहर यह भी लिख दिया गया कि उसके देश का कोई भी नागरिक वहाँ प्रवेश नहीं कर सकता। इस तरह एक व्यक्ति के बुरे कार्य ने पूरे देश को वर्षों तक कलंकित कर दिया। इन दोनों घटनाओं से लेखक यह सिद्ध करता है कि हर नागरिक अपने देश से इस तरह बँधा है कि उसकी हीनता और गौरव, दोनों का फल देश को भी मिलता है, इसलिए ‘मैं और मेरा देश’ दो अलग चीजें नहीं हैं।
लेखक आगे कहता है कि किसी भी कार्य का महत्व उसकी विशालता में नहीं बल्कि उसके पीछे की भावना में होता है। इसके लिए वह दो उदाहरण देता है — तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा ने एक गरीब बूढ़े किसान द्वारा तीस मील पैदल चलकर लाई गई शहद की छोटी हँडिया को बड़े प्रेम से स्वीकार किया और उसे शाही सम्मान के साथ घर पहुँचवाया, क्योंकि उसमें बूढ़े का शुद्ध प्रेम था। इसी तरह भारत में एक किसान रंगीन सुतलियों से बुनी खाट लेकर प्रधानमंत्री नेहरू के पास पहुँचा, तो नेहरू जी ने न केवल वह उपहार स्वीकार किया बल्कि उसे अपनी हस्ताक्षरित तस्वीर भेंट में दी। दोनों घटनाएँ यह दिखाती हैं कि उपहार का मूल्य उसकी कीमत में नहीं, देने वाले की भावना में होता है।
अंत में लेखक बताता है कि अपने कार्यों को देश के अनुकूल जाँचने के लिए देश को दो चीज़ों की सबसे अधिक आवश्यकता है — शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध। सार्वजनिक स्थानों पर देश की बुराई करना या दूसरे देशों से तुलना करके अपने देश को हीन बताना, ठीक वैसे ही देश के आत्मविश्वास को चोट पहुँचाता है जैसे महाभारत में शल्य ने बार-बार अर्जुन की प्रशंसा करके कर्ण के आत्मविश्वास को कमजोर कर दिया था। इसी तरह गंदगी फैलाना, इधर-उधर थूकना या सार्वजनिक स्थानों को गंदा रखना देश के सौंदर्य-बोध को चोट पहुँचाता है। लेखक यह भी बताता है कि किसी देश की उच्चता और हीनता तौलने की सबसे बड़ी कसौटी है — चुनाव। जिस देश के नागरिक सोच-समझकर सही व्यक्ति को अपना मत देते हैं, वह देश उच्च है, और जो नारों या गलत प्रभाव में आकर मत देते हैं, वह देश हीन माना जाता है। इसलिए हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह चुनाव में सही व्यक्ति को वोट दे और उसका यह अधिकार भी है कि उसके मत के बिना कोई भी व्यक्ति सत्ता की कुर्सी पर न बैठ सके।
साथ-साथ पढ़ें — निर्मल जीत सिंह सेखों
‘निर्मल जीत सिंह सेखों’ परम वीर चक्र विजेता एक वीर वायुसैनिक की गौरवगाथा है। सरदार त्रिलोक सिंह सेखों और हरबंस कौर के पुत्र निर्मल जीत सिंह का जन्म 17 जुलाई 1945 को पंजाब के लुधियाना के पास इसेवाल गाँव में हुआ था, जो हलवारा एयरफोर्स स्टेशन के निकट था। बचपन से ही हवाई जहाज़ों के प्रति उनके मन में गहरा आकर्षण था। योद्धा हरी सिंह नलवा की कहानियों और भारतीय वायुसेना में सेवारत अपने पिता से प्रेरित होकर उन्होंने बचपन में ही लड़ाकू विमान चालक बनने का दृढ़ निश्चय कर लिया था। उन्होंने खालसा हाई स्कूल, अजितसर मोहे से प्रथम श्रेणी में मैट्रिक पास की और 1962 में दयालबाग इंजीनियरिंग कॉलेज, आगरा में दाखिला लिया, जहाँ एन.सी.सी. कैडेट रहते हुए उनकी एरो-मॉडलिंग में गहरी रुचि जगी। 1965 के युद्ध के बाद उन्होंने वायुसेना में शामिल होने के अपने सपने को पूरा करने के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी।
4 जून 1967 को उन्हें भारतीय वायुसेना में नियुक्ति मिली। लंबे कद के कारण छोटे ‘नैट’ लड़ाकू विमान में बैठना उनके लिए असहज था, फिर भी वे जल्द ही इन विमानों को उड़ाने में निपुण हो गए। अपने उदार और मैत्रीपूर्ण स्वभाव के कारण सब उन्हें प्यार से ‘भाई’ कहते थे। अक्टूबर 1968 में वे फ्लाइंग ऑफिसर के रूप में ‘फ्लाइंग बुलेट्स’ नाम से प्रसिद्ध 18 स्क्वाड्रन में शामिल हुए। 1971 में जब पाकिस्तान ने भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में हवाई हमले शुरू किए, तो युद्ध की विशेष परिस्थिति में श्रीनगर की सुरक्षा के लिए नैट स्क्वाड्रन तैनात किया गया, जिसमें सेखों भी शामिल थे। भयानक ठंड के बावजूद उन्होंने निर्भीकता से पाकिस्तानी वायुसेना का सामना किया।
14 दिसंबर 1971 को पेशावर से उड़े पाकिस्तानी एफ-86 सेबर लड़ाकू विमानों ने श्रीनगर हवाई अड्डे पर हमला किया। उस समय ड्यूटी पर तैनात फ्लाइंग ऑफिसर सेखों बिना अपनी जान की परवाह किए नैट विमान लेकर आकाश में जूझ पड़े। प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने छह सेबर विमानों को घेरकर उन पर हमला किया और अधिकतर को क्षतिग्रस्त कर दिया। नियंत्रण कक्ष को उन्होंने निडरता से संदेश भेजा कि वे दो सेबर विमानों के पीछे लगे हैं और उन्हें भागने नहीं देंगे। अंत में संख्या में कहीं अधिक शत्रु विमानों ने उन्हें घेर लिया और मात्र 26 वर्ष की आयु में मातृभूमि की रक्षा करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हो गए। अपने पीछे वे पत्नी मनजीत सेखों को छोड़ गए, जिनसे उनका विवाह मात्र दस माह पहले ही हुआ था। भारतीय वायुसेना के वे एकमात्र अधिकारी हैं जिन्हें परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनके सम्मान में 1982 में विशेष डाक आवरण तथा वर्ष 2000 में डाक टिकट जारी किया गया, लुधियाना न्यायालय परिसर और दिल्ली के वायुसेना संग्रहालय में उनकी प्रतिमा स्थापित है, और उनके शौर्य पर आधारित 1971 के युद्ध की गाथा फिल्म ‘हिन्दुस्तान की कसम’ में भी दिखाई गई है।
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