पाठ – 3
जाति, धर्म और लैंगिक मसले
In this post we have given the detailed notes of class 10 Social Science (Political Science) chapter 3 Gender, Religion and Caste in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (राजनीति विज्ञान) के पाठ 3 जाति, धर्म और लैंगिक मसले के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है। नोट: यह अध्याय पहले पुरानी किताब में अध्याय 4 था, नई किताब (2026-27) में यह अध्याय 3 है।
| Board | CBSE Board, JAC Board, RBSE Board, MPBSE Board, UBSE Board |
| Textbook | NCERT — Democratic Politics-II (Reprint 2026-27) |
| Class | Class 10 |
| Subject | Social Science (Political Science) |
| Chapter no. | Chapter 3 |
| Chapter Name | जाति, धर्म और लैंगिक मसले (Gender, Religion and Caste) |
| Category | Class 10 SST Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 3, जाति, धर्म और लैंगिक मसले
परिचय
लोकतांत्रिक राजनीति में सामाजिक विभाजन (social divisions) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समाज में लोग विभिन्न आधारों पर विभाजित होते हैं — जैसे लिंग (gender), धर्म (religion), जाति (caste), भाषा और नस्ल। ये सभी सामाजिक विभाजन किसी न किसी रूप में राजनीति को प्रभावित करते हैं और राजनीति भी इन सामाजिक विभाजनों को आकार देती है। इस अध्याय में हम यह अध्ययन करेंगे कि लैंगिक मसले (gender issues), धार्मिक सांप्रदायिकता (communalism) और जातिगत असमानताएँ भारतीय राजनीति को किस प्रकार प्रभावित करती हैं।
लैंगिक विभाजन और राजनीति (Gender Division and Politics)
लिंग (Gender): लिंग का अर्थ केवल जैविक भिन्नता (biological difference) — स्त्री और पुरुष — से नहीं है, बल्कि यह समाज द्वारा स्त्री और पुरुष को दी गई भूमिकाओं, अपेक्षाओं और सामाजिक असमानताओं से भी जुड़ा है।
श्रम का लैंगिक विभाजन (Sexual Division of Labour)
अधिकांश समाजों में स्त्रियों और पुरुषों के काम अलग-अलग बाँट दिए जाते हैं। सामान्यतः पुरुषों को घर से बाहर के, वेतन वाले (paid) कार्यों की जिम्मेदारी दी जाती है, जबकि स्त्रियों की भूमिका मुख्यतः घर के भीतर के कार्यों — जैसे खाना बनाना, बच्चों की देखभाल, घर की सफाई — तक सीमित मान ली जाती है। इसे ही श्रम का लैंगिक विभाजन कहते हैं। यह विभाजन प्राकृतिक नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से निर्मित (socially constructed) है।
पितृसत्ता (Patriarchy)
पितृसत्ता: ऐसी व्यवस्था जिसमें पुरुषों को स्त्रियों की तुलना में अधिक सत्ता और वर्चस्व प्राप्त होता है, तथा सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन में पुरुषों का प्रभुत्व होता है। भारत सहित विश्व के अधिकांश समाज पितृसत्तात्मक (patriarchal) हैं।
- बालक की तुलना में बालिका के साथ भेदभाव जन्म से पहले (कन्या भ्रूण हत्या) और जन्म के बाद भी होता है।
- लड़कियों को अक्सर कम पढ़ाया जाता है, या उन्हें बीच में ही पढ़ाई छुड़वा दी जाती है।
- महिला साक्षरता दर (female literacy rate) पुरुष साक्षरता दर से कम है।
- समान काम के लिए स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में प्रायः कम वेतन (wage) मिलता है।
- अनेक क्षेत्रों में स्त्रियों को संपत्ति में समान अधिकार नहीं मिल पाता।
- स्त्रियों के विरुद्ध घरेलू हिंसा (domestic violence), दहेज उत्पीड़न (dowry harassment), बलात्कार, छेड़छाड़ जैसी घटनाएँ होती हैं।
सार्वजनिक और निजी क्षेत्र का विभाजन (Public-Private Divide)
समाज में यह मान लिया जाता है कि निजी क्षेत्र (private domain) — यानी घर-परिवार — स्त्रियों का क्षेत्र है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र (public domain) — यानी राजनीति, बाज़ार और नौकरी — पुरुषों का क्षेत्र है। इसी विभाजन के कारण घर के भीतर की स्त्रियों के काम (जैसे खाना बनाना, बच्चे पालना) को “काम” ही नहीं माना जाता और उसका कोई आर्थिक मूल्य नहीं आँका जाता। यह विभाजन स्त्रियों की सार्वजनिक जीवन — विशेषकर राजनीति — में भागीदारी को सीमित करता है।
महिला आंदोलन (Feminist/Women’s Movements)
विश्वभर में महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर आंदोलन चलाए हैं। इन आंदोलनों ने मताधिकार (voting rights), कानूनी समानता, समान वेतन, संपत्ति में अधिकार और शिक्षा के अधिकार जैसी माँगें उठाईं। भारत में भी स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ और उसके बाद स्त्रियों की स्थिति में सुधार के लिए अनेक संगठन सक्रिय रहे हैं। इन आंदोलनों के परिणामस्वरूप आज अधिकांश देशों में स्त्रियों को मतदान का अधिकार प्राप्त है और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी बढ़ रही है, फिर भी लैंगिक असमानता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व (Women’s Political Representation)
महिलाएँ भारत की जनसंख्या का लगभग आधा हिस्सा हैं, परंतु राजनीति में उनकी भागीदारी बहुत कम रही है।
लोकसभा और विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व
- लोकसभा (Lok Sabha) में निर्वाचित महिला सदस्यों का प्रतिशत कभी भी 15% को पार नहीं कर पाया है।
- राज्य विधानसभाओं (State Assemblies) में स्थिति और भी खराब है, जहाँ महिला विधायकों का औसत प्रतिशत लगभग 5% ही है।
- भारत इस मामले में विश्व के अनेक देशों — जिनमें कुछ विकासशील देश भी शामिल हैं — से पीछे है।
- मंत्रिपरिषदों (Council of Ministers) में भी महिलाओं को बहुत कम प्रतिनिधित्व मिलता है।
महिला आरक्षण विधेयक (Women’s Reservation Bill)
लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने हेतु एक विधेयक — महिला आरक्षण विधेयक — कई वर्षों से संसद में विचाराधीन रहा, जो महिलाओं के लिए एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव रखता था। लंबे समय तक राजनीतिक सहमति न बन पाने के कारण यह पारित नहीं हो सका था; कुछ दलों की माँग थी कि पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों की महिलाओं के लिए भी उप-कोटा (sub-quota) होना चाहिए। इस विधेयक पर बहस इस बात को दर्शाती है कि महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की माँग कितनी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
पंचायती राज में महिला आरक्षण
- 73वें और 74वें संविधान संशोधन (1992) के द्वारा स्थानीय स्वशासन संस्थाओं — पंचायती राज (Panchayati Raj) संस्थाओं और नगर निकायों — में महिलाओं के लिए एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित की गईं।
- आज भारत में पंचायतों और नगर निकायों में दस लाख से अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं।
- कई राज्यों ने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण को बढ़ाकर 50% कर दिया है, जिससे स्थानीय स्तर पर महिलाओं की भागीदारी और अधिक सुदृढ़ हुई है।
- यह आरक्षण दर्शाता है कि यदि संवैधानिक प्रावधान हों तो महिलाओं का प्रतिनिधित्व प्रभावी रूप से बढ़ाया जा सकता है।
सांप्रदायिकता, धर्म और राजनीति (Communalism, Religion and Politics)
सांप्रदायिकता क्या है? (What is Communalism?)
सांप्रदायिकता (Communalism): यह वह विचारधारा है जिसमें एक धर्म को दूसरे धर्मों से श्रेष्ठ माना जाता है, तथा यह विश्वास किया जाता है कि किसी एक धर्म को मानने वाले लोग एक ही समुदाय बनाते हैं जिनके हित एक समान और अन्य धार्मिक समुदायों के हितों से भिन्न व विरोधी होते हैं। सरल शब्दों में, सांप्रदायिकता वह विश्वास है कि धर्म ही किसी सामाजिक समुदाय (social community) के गठन का मूल आधार है।
सांप्रदायिकता के विभिन्न रूप (Different Forms of Communalism)
- सामान्य दैनिक जीवन में धार्मिक पूर्वाग्रह (Everyday Religious Prejudices): अन्य धर्मों के बारे में सामान्यीकृत (generalised) धारणाएँ बनाना, अपने धर्म को श्रेष्ठ तथा दूसरे धर्मों को हीन मानना।
- एक-धार्मिक-प्रभुत्व की चाहत (Political Dominance of One’s Own Religious Community): एक धार्मिक समुदाय के लोगों में यह चाहत होना कि राजनीतिक व्यवस्था में उनके ही धर्म का प्रभुत्व रहे।
- धार्मिक आधार पर राजनीतिक लामबंदी (Political Mobilisation on Religious Lines): राजनीतिक दलों द्वारा पवित्र प्रतीकों, धार्मिक नेताओं, भावनात्मक अपीलों और भय का उपयोग करके मतदाताओं को धर्म के नाम पर एकजुट करना।
- सांप्रदायिक हिंसा/दंगे (Communal Violence/Riots): सांप्रदायिकता का सबसे उग्र और खतरनाक रूप, जिसमें विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच हिंसक टकराव, दंगे और नरसंहार होते हैं। भारत विभाजन (1947) के समय हुए दंगे इसका सबसे भीषण उदाहरण हैं।
सांप्रदायिकता विभिन्न रूपों में प्रकट हो सकती है — कभी-कभी यह राजनीतिक दलों द्वारा एक धार्मिक समुदाय के प्रभुत्व की माँग के रूप में, तो कभी अलग धार्मिक राज्य की माँग के रूप में भी सामने आती है।
पंथनिरपेक्षता / धर्मनिरपेक्षता (Secularism)
सांप्रदायिकता की समस्या से निपटने के लिए भारत ने एक धर्मनिरपेक्ष राज्य (secular state) की स्थापना की। भारतीय संविधान में निम्नलिखित प्रावधान भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाते हैं:
- भारत का कोई आधिकारिक/राजकीय धर्म (official religion) नहीं है — भारतीय संविधान किसी विशेष धर्म को न तो बढ़ावा देता है और न ही प्रोत्साहित करता है।
- संविधान सभी व्यक्तियों और समुदायों को धार्मिक स्वतंत्रता (freedom of religion) का अधिकार देता है — वे किसी भी धर्म का पालन कर सकते हैं, या किसी भी धर्म का पालन न करने का विकल्प चुन सकते हैं।
- संविधान में ऐसे प्रावधान हैं जो किसी एक धार्मिक समुदाय के प्रभुत्व को रोकते हैं तथा बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों के हनन को रोकते हैं।
- राज्य धर्म के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता — जैसे किसी धार्मिक समुदाय को अपनी शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित करने की स्वतंत्रता।
- फिर भी, संविधान राज्य को धर्म के नाम पर होने वाले सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने के लिए हस्तक्षेप करने की अनुमति देता है — जैसे अस्पृश्यता (untouchability) का उन्मूलन, जो एक सामाजिक बुराई है, भले ही इसे कुछ लोग धार्मिक परंपरा से जोड़ते रहे हों।
इस प्रकार भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म-विरोधी होना नहीं, बल्कि सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान (equal respect) और राज्य की धर्म से एक “सैद्धांतिक दूरी” (principled distance) रखना है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर सामाजिक न्याय के लिए हस्तक्षेप भी किया जा सके।
जाति और राजनीति (Caste and Politics)
जाति व्यवस्था (Caste System)
जाति व्यवस्था: भारतीय समाज की एक पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, जिसमें समाज जन्म पर आधारित समूहों (जातियों) में विभाजित होता है, तथा प्रत्येक जाति के साथ पारंपरिक रूप से कोई-न-कोई व्यवसाय (occupation) जुड़ा होता है। जाति व्यवस्था के अंतर्गत विवाह भी सामान्यतः अपनी ही जाति में होते हैं (endogamy)।
जाति और आर्थिक स्थिति का संबंध
- परंपरागत रूप से भारत में जाति व्यवस्था आर्थिक स्थिति (economic status) से भी जुड़ी रही है — कुछ जातियों को उच्च दर्जे के व्यवसाय (जैसे पुरोहित, ज़मींदार, व्यापारी) प्राप्त थे, जबकि अन्य को निम्न या “अशुद्ध” माने जाने वाले काम (जैसे सफाई, चमड़े का काम) करने पड़ते थे।
- इसी कारण जाति और गरीबी के बीच भी एक संबंध देखने को मिलता है — निम्न मानी जाने वाली जातियाँ प्रायः आर्थिक रूप से भी पिछड़ी रही हैं।
- परंतु आज यह संबंध पूर्णतया सत्य नहीं रहा। समय के साथ शिक्षा, शहरीकरण (urbanisation), नए व्यवसायों के उदय और आरक्षण नीति के कारण व्यावसायिक गतिशीलता (occupational mobility) बढ़ी है — अर्थात लोग अब अपनी पारंपरिक जाति-आधारित पेशे के बजाय अन्य व्यवसाय भी अपना रहे हैं।
- आज एक ही जाति के भीतर भी आर्थिक असमानता पाई जाती है — कुछ लोग बहुत अमीर तो कुछ बहुत गरीब हो सकते हैं।
राजनीति में जाति की भूमिका (Caste in Politics)
- चुनावों में राजनीतिक दल किसी क्षेत्र-विशेष में जातियों की संख्या को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवार (candidates) खड़ा करते हैं, ताकि चुनाव जीतने की संभावना बढ़े।
- सरकारें और मंत्रिपरिषदें बनाते समय भी विभिन्न जातियों और समुदायों को उचित प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया जाता है।
- राजनीतिक दल और उम्मीदवार अपने चुनाव-प्रचार में जाति-समूहों की भावनाओं को आकर्षित करने वाली अपील का भी सहारा लेते हैं।
- जब निर्वाचन क्षेत्र में कोई एक जाति बहुसंख्यक नहीं होती, तब राजनीतिक दल विभिन्न जातियों और समूहों के बीच गठबंधन (coalition/alliance) बनाने का प्रयास करते हैं, ताकि व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हो सके।
नहीं। यद्यपि जाति चुनावी राजनीति को प्रभावित करती है, परंतु यह अकेला कारक (factor) नहीं है जो चुनाव परिणाम तय करता है:
- किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में एक जाति के सभी सदस्य किसी एक ही दल या उम्मीदवार को वोट नहीं देते।
- सत्तारूढ़ दल (ruling party) या सरकार का प्रदर्शन, उम्मीदवार की छवि व लोकप्रियता, तथा स्थानीय मुद्दे भी चुनाव परिणाम को प्रभावित करते हैं।
- यदि जाति ही एकमात्र निर्णायक कारक होती, तो हर निर्वाचन क्षेत्र में विजयी उम्मीदवार सदैव बहुसंख्यक जाति का ही होता और सत्तारूढ़ दल कभी नहीं हारते — किन्तु वास्तविकता में ऐसा नहीं होता।
सामाजिक विभाजन और राजनीति — एक संतुलित दृष्टिकोण
लिंग, धर्म और जाति से जुड़ी राजनीति के उदाहरण देखकर यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि भारतीय राजनीति केवल “सांप्रदायिक” (communal) या “पहचान-केंद्रित” (identity-obsessed) है। वास्तव में:
- सामाजिक विभाजन राजनीति में इसलिए दिखाई देते हैं क्योंकि समाज में असमानताएँ और भेदभाव वास्तव में मौजूद हैं — राजनीति इन्हें अभिव्यक्ति (expression) देती है।
- जब वंचित और उपेक्षित समूह (जैसे स्त्रियाँ, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीतिक माध्यम से अपनी माँगें उठाते हैं, तो यह लोकतंत्र के स्वस्थ कामकाज का संकेत है, न कि समस्या का।
- राजनीति केवल सामाजिक विभाजनों को प्रतिबिंबित (reflect) ही नहीं करती, बल्कि नए सामाजिक समीकरण भी गढ़ती (create) है — उदाहरणस्वरूप, विभिन्न जातियों के बीच गठबंधन बनने से नए सामाजिक-राजनीतिक समूह उभरते हैं।
- अतः लिंग, धर्म और जाति का राजनीति में प्रभाव यह दर्शाता है कि सामाजिक विभाजन किस प्रकार राजनीतिक रूप ले लेते हैं, और राजनीति भी किस प्रकार सामाजिक विभाजनों को नया आकार देती है — यह एक पारस्परिक (two-way) प्रक्रिया है।
मुख्य बिंदु (Key Points to Remember)
- श्रम का लैंगिक विभाजन और पितृसत्ता स्त्रियों की सार्वजनिक जीवन में भागीदारी को सीमित करते हैं।
- लोकसभा में महिला प्रतिनिधित्व कभी 15% से अधिक नहीं रहा; राज्य विधानसभाओं में यह लगभग 5% है।
- 73वें/74वें संविधान संशोधन से पंचायती राज व नगर निकायों में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित हैं; कई राज्यों में यह बढ़कर 50% हो गई हैं।
- महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा/विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव करता है।
- सांप्रदायिकता यह विश्वास है कि धर्म ही सामाजिक समुदाय के गठन का मूल आधार है; इसके रूप हैं — पूर्वाग्रह, राजनीतिक प्रभुत्व की चाहत, धार्मिक लामबंदी और सांप्रदायिक हिंसा।
- भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है — इसका कोई आधिकारिक धर्म नहीं, सभी को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है, तथा सामाजिक बुराइयों (जैसे अस्पृश्यता) को समाप्त करने के लिए राज्य हस्तक्षेप कर सकता है।
- जाति व्यवस्था पारंपरिक रूप से आर्थिक स्थिति से जुड़ी रही है, परंतु आज व्यावसायिक गतिशीलता बढ़ी है।
- राजनीतिक दल जाति को उम्मीदवार चयन और गठबंधन बनाने में ध्यान में रखते हैं, परंतु जाति अकेला कारक नहीं जो चुनाव तय करता है।
- सामाजिक विभाजनों का राजनीति में प्रकट होना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी सक्रियता का प्रमाण है — राजनीति और सामाजिक विभाजन एक-दूसरे को पारस्परिक रूप से आकार देते हैं।
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