पाठ – 1
विकास
In this post we have given the detailed notes of class 10 Social Science (Economics) chapter 1 Development in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (अर्थशास्त्र) के पाठ 1 विकास के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है।
| Board | CBSE Board, JAC Board, RBSE Board, MPBSE Board, UBSE Board |
| Textbook | NCERT — Understanding Economic Development (Reprint 2026-27) |
| Class | Class 10 |
| Subject | Social Science (Economics) |
| Chapter no. | Chapter 1 |
| Chapter Name | विकास (Development) |
| Category | Class 10 SST Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 1, विकास
विकास क्या है — अलग-अलग लोग, अलग-अलग लक्ष्य
विकास (Development): ऐसी प्रक्रिया जिसके माध्यम से लोगों के जीवन-स्तर एवं जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है। अलग-अलग व्यक्तियों के लिए विकास के अर्थ अलग-अलग, यहाँ तक कि परस्पर विरोधाभासी भी हो सकते हैं, क्योंकि उनकी जीवन-परिस्थितियाँ और आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न होती हैं।
उदाहरण के लिए दो अलग-अलग व्यक्तियों को लें —
- एक भूमिहीन ग्रामीण मजदूर चाहता है कि उसे अधिक दिनों तक काम मिले तथा बेहतर मजदूरी मिले, वह जो वस्तुएँ खरीदता है उनकी कीमतें कम हों, उसके बच्चों को अच्छी शिक्षा देने वाला एक स्थानीय विद्यालय हो, कोई सामाजिक भेदभाव न हो, तथा जमींदार के भय से मुक्ति मिले। ऐसे व्यक्ति के लिए विकास का अर्थ मुख्यतः काम की सुरक्षा, उचित मजदूरी और सम्मान से है।
- दूसरी ओर, एक ऐसा किसान जो सिंचाई के लिए ट्यूबवेल का उपयोग करता है, वह चाहता है कि उसे नियमित एवं भरोसेमंद बिजली आपूर्ति मिले ताकि ट्यूबवेल बिना रुकावट चल सके, उसकी फसल का अच्छा मूल्य मिले, सस्ता कच्चा माल आसानी से उपलब्ध हो, तथा अपनी उपज को खरीदने-बेचने पर कोई प्रतिबंध न हो। इस व्यक्ति के लिए विकास नियमित बिजली आपूर्ति, फसल के अच्छे दाम, तथा उपज बेचने की स्वतंत्रता से जुड़ा है।
ये दोनों व्यक्ति एक ही गाँव या क्षेत्र में रह सकते हैं, फिर भी दोनों के लिए “विकास” का अर्थ एक जैसा नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि विकास की धारणा हर व्यक्ति के लिए अलग होती है, क्योंकि यह इस बात पर निर्भर करती है कि उसके जीवन में किन बातों का सबसे अधिक महत्व है। जो एक व्यक्ति के लिए विकास है, वह दूसरे के लिए विकास न हो, बल्कि हानिकारक भी हो सकता है। उदाहरणस्वरूप, उद्योगपति अधिक सड़कें और बाँध चाहते हैं ताकि बिजली और परिवहन की सुविधा मिल सके, परन्तु जिस जंगल में रहने वाले आदिवासियों की भूमि इस बाँध से डूब जाएगी, उनके लिए यही परियोजना विस्थापन और आजीविका की हानि का कारण बन सकती है।
आय एवं अन्य लक्ष्य
अलग-अलग व्यक्तियों के विकास संबंधी लक्ष्य भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। जो एक के लिए विकास है, वह दूसरे के लिए विकास न भी हो। यहाँ तक कि यह किसी एक के लिए दूसरे की कीमत पर विकास भी हो सकता है।
फिर भी कुछ बातें सभी में समान होती हैं — चाहे व्यक्ति अमीर हो या गरीब, अधिकांश लोग अधिक आय चाहते हैं। धन, या उससे खरीदी जा सकने वाली भौतिक वस्तुएँ, हमारे जीवन को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है। परन्तु हमारे जीवन की गुणवत्ता गैर-भौतिक (non-material) चीज़ों पर भी निर्भर करती है, जैसे —
- समान व्यवहार (Equal treatment): जाति, धर्म, लिंग अथवा क्षेत्र के आधार पर बिना किसी भेदभाव के समाज में समान व्यवहार पाना।
- स्वतंत्रता (Freedom): अपने निर्णय स्वयं लेने और सम्मान के साथ जीने की क्षमता।
- सुरक्षा (Security): घर पर, कार्यस्थल पर तथा समुदाय में सुरक्षा की भावना।
- दूसरों से सम्मान (Respect from others): परिवार व समाज की दृष्टि में पहचान और सम्मान।
लोग अधिक आय तो चाहते ही हैं, परन्तु साथ ही समानता, स्वतंत्रता, सुरक्षा तथा सम्मान जैसी चीज़ें भी चाहते हैं, जिन्हें केवल धन से नहीं खरीदा जा सकता। अतः अधिक आय के साथ-साथ लोग समान व्यवहार, स्वतंत्रता, सुरक्षा तथा दूसरों के सम्मान जैसी चीजें भी चाहते हैं।
राष्ट्रीय विकास (National Development)
जिस प्रकार अलग-अलग व्यक्तियों के लिए विकास के अर्थ भिन्न होते हैं, उसी प्रकार समाज के अलग-अलग वर्गों तथा अलग-अलग देशों की भी राष्ट्रीय विकास संबंधी धारणाएँ भिन्न-भिन्न, कभी-कभी परस्पर विरोधाभासी भी होती हैं।
- किसानों के लिए विकास का अर्थ हो सकता है — पूरे वर्ष सुनिश्चित सिंचाई तथा फसल का उचित मूल्य।
- औद्योगिक श्रमिकों के लिए इसका अर्थ हो सकता है — सुरक्षित रोजगार तथा बेहतर मजदूरी।
- व्यापारियों के लिए इसका अर्थ हो सकता है — कच्चे माल की उपलब्धता तथा खरीद-बिक्री पर बिना किसी प्रतिबंध के मुक्त बाज़ार।
- जो एक धनी किसान के लिए विकास है — जैसे सिंचाई हेतु अधिक भूजल का उपयोग — वह किसी निर्धन किसान के लिए विकास न हो, क्योंकि धनी किसानों द्वारा अत्यधिक भूजल दोहन से भूजल-स्तर नीचे चला जाता है, जिससे उन निर्धन किसानों को हानि होती है जो गहरे ट्यूबवेल लगाने में असमर्थ हैं।
अतः राष्ट्रीय विकास को एक ही तरीके से परिभाषित नहीं किया जा सकता — चूँकि समाज के अलग-अलग वर्गों की विकास संबंधी धारणाएँ भिन्न-भिन्न (और प्रायः परस्पर विरोधाभासी) होती हैं, इसलिए राष्ट्रीय विकास के बारे में सोचते समय मिश्रित लक्ष्यों को ध्यान में रखना पड़ता है — यह देखते हुए कि अधिकतम लोगों के लिए क्या अधिक लाभदायक है, तथा न्यूनतम लागत पर, संसाधनों को भविष्य के लिए संरक्षित रखते हुए, यह किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है।
जब किसी देश के विकास की चर्चा होती है, तो हम उस देश की तुलना अन्य देशों से करते हैं, या देश के भीतर विभिन्न राज्यों/क्षेत्रों की आपस में तुलना करते हैं। ऐसी तुलना के लिए हमें कुछ मापदंडों (criteria) की आवश्यकता होती है — जिनमें सबसे सामान्य मापदंड आय है।
विभिन्न देशों/राज्यों की तुलना कैसे करें?
औसत आय / प्रति व्यक्ति आय (Average/Per Capita Income)
विभिन्न देशों की तुलना उनकी आय के आधार पर की जा सकती है। अधिक आय वाले देशों को कम आय वाले देशों की तुलना में अधिक विकसित माना जाता है। तुलना के लिए देश की कुल आय उपयुक्त मापदंड नहीं है, क्योंकि विभिन्न देशों की जनसंख्या अलग-अलग होती है। इसके बजाय औसत आय (जिसे प्रति व्यक्ति आय भी कहते हैं) — अर्थात देश की कुल आय को उसकी कुल जनसंख्या से विभाजित करने पर प्राप्त आय — का उपयोग तुलना के लिए किया जाता है।
प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income): किसी निश्चित वर्ष में किसी देश में प्रति व्यक्ति द्वारा अर्जित औसत आय। यह देश की कुल आय को उसकी कुल जनसंख्या से विभाजित करके प्राप्त की जाती है।
विश्व बैंक (World Bank) अपनी वार्षिक रिपोर्ट “वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट (World Development Report)” में देशों को अमीर तथा गरीब देशों के रूप में वर्गीकृत करने के लिए प्रति व्यक्ति आय को मापदंड के रूप में उपयोग करता है।
विश्व बैंक द्वारा देशों का वर्गीकरण
विश्व बैंक के मापदंडों के अनुसार, जिन देशों की प्रति व्यक्ति आय एक निश्चित स्तर से अधिक होती है, उन्हें अमीर (rich) देश कहा जाता है, तथा जिन देशों की प्रति व्यक्ति आय एक निश्चित स्तर से कम होती है, उन्हें निम्न-आय वाले (गरीब) देश कहा जाता है। उच्च प्रति व्यक्ति आय वाले देशों को “विकसित” (developed) माना जाता है, जबकि निम्न-आय वाले देशों को “विकासशील” (developing) माना जाता है।
भारत को निम्न-मध्यम आय वर्ग (low-middle income) वाला देश माना जाता है, क्योंकि इसकी औसत (प्रति व्यक्ति) आय अमीर देशों की तुलना में कम है, परन्तु विश्व के सबसे गरीब देशों की तुलना में अधिक है। मध्य-पूर्व के तेल-उत्पादक देशों तथा कुछ छोटे देशों को छोड़कर, अमीर देशों को सामान्यतः विकसित देश कहा जाता है।
अमेरिका, जापान तथा यूरोप के अनेक देश उच्च-आय समूह में आते हैं, जबकि दक्षिण एशिया तथा उप-सहारा अफ्रीका के अनेक देश निम्न-आय समूह में आते हैं।
आय एवं अन्य मापदंड — औसत से आगे देखना
यद्यपि तुलना के लिए औसत/प्रति व्यक्ति आय एक उपयोगी और महत्वपूर्ण मापदंड है, फिर भी इसकी एक महत्वपूर्ण सीमा है — यह मात्र एक औसत (average) है और यह नहीं बताती कि यह आय जनसंख्या के बीच वास्तव में किस प्रकार वितरित है।
यह संभव है कि किसी देश/राज्य की कुल अथवा औसत आय अधिक हो, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि वहाँ के सभी लोग समान रूप से संपन्न हैं। दो देश या राज्य समान प्रति व्यक्ति आय रखते हुए भी, आय के वितरण में बहुत भिन्न हो सकते हैं — एक में विषमता (disparity) कम हो सकती है (अधिक समान वितरण) तो दूसरे में विषमता अधिक हो सकती है (आय कुछ ही लोगों के पास केंद्रित)।
स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता तथा अवसंरचना (infrastructure) जैसी सार्वजनिक सुविधाएँ जीवन की गुणवत्ता के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, परन्तु आय के औसत आँकड़े यह नहीं बताते कि ये सुविधाएँ उपलब्ध हैं या नहीं। इसलिए, आय अकेले पूर्णतः पर्याप्त मापदंड नहीं है, क्योंकि यह लोगों के जीवन के गैर-आय पहलुओं जैसे साक्षरता स्तर, स्वास्थ्य स्थिति, अथवा काम की गरिमा के बारे में कुछ नहीं बताती।
अतः औसत आय के साथ-साथ हमें अन्य मापदंडों/विशेषताओं को भी देखना चाहिए, जैसे — साक्षरता दर, जीवन प्रत्याशा (life expectancy), शिशु मृत्यु दर (infant mortality rate), सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता व पहुँच, लिंगानुपात, तथा विद्यालयों में शुद्ध उपस्थिति अनुपात।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (United Nations Development Programme — UNDP) देशों की तुलना उनके नागरिकों के शिक्षा-स्तर, स्वास्थ्य-स्थिति तथा प्रति व्यक्ति आय के आधार पर करता है। यह तुलना प्रतिवर्ष मानव विकास रिपोर्ट (Human Development Report) में एक संयुक्त सूचकांक — मानव विकास सूचकांक (HDI) — के माध्यम से प्रकाशित की जाती है।
मानव विकास सूचकांक (HDI): UNDP द्वारा प्रकाशित एक संयुक्त सूचकांक, जो देशों को तीन प्रमुख संकेतकों के आधार पर श्रेणीबद्ध करता है — दीर्घ एवं स्वस्थ जीवन (जन्म के समय जीवन प्रत्याशा द्वारा मापित), ज्ञान/शिक्षा (औसत विद्यालयी वर्ष तथा प्रत्याशित विद्यालयी वर्ष द्वारा मापित), तथा जीवन-स्तर (प्रति व्यक्ति आय/क्रय-शक्ति समता के अनुसार समायोजित GNI द्वारा मापित)।
HDI तुलना में, किसी देश को उच्च स्तर का विकसित माना जाता है यदि वहाँ के लोगों की जीवन प्रत्याशा अधिक हो, शिक्षा का स्तर ऊँचा हो, तथा जीवन-स्तर बेहतर हो। देशों को उनके HDI मूल्य के आधार पर श्रेणीबद्ध किया जाता है — सबसे ऊँचे HDI मूल्य वाले देश को श्रेणी 1 दी जाती है।
ध्यान देने योग्य है कि विश्व बैंक द्वारा प्रकाशित वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट मुख्यतः आय को विकास के मापदंड के रूप में देखती है, जबकि UNDP द्वारा प्रकाशित मानव विकास रिपोर्ट आय को कई मापदंडों में से एक मानती है, तथा इसे विकास का साधन (means) मानती है, न कि स्वयं में लक्ष्य (end)।
औसत उपयोगी हैं, फिर भी सीमित क्यों हैं?
औसत आय तथा HDI दोनों उपयोगी हैं, क्योंकि इनकी सहायता से हम बहुत भिन्न-भिन्न देशों तथा राज्यों की एक ही संख्या के माध्यम से तुलना कर पाते हैं, जिससे तुलना सरल हो जाती है। परन्तु ये सीमित भी हैं, क्योंकि औसत, किसी देश के भीतर लोगों के बीच मौजूद व्यापक विषमताओं (disparities) को छिपा देता है — किसी देश/राज्य का उच्च औसत मूल्य यह जरूरी नहीं बताता कि वहाँ के सभी लोग समान रूप से संपन्न हैं।
सार्वजनिक सुविधाएँ (Public Facilities)
यदि दो देशों/राज्यों की प्रति व्यक्ति आय समान भी हो, तब भी वे विकास के अन्य पहलुओं में काफी भिन्न हो सकते हैं, क्योंकि प्रति व्यक्ति आय केवल एक औसत है और यह नहीं बताती कि आय किस प्रकार वितरित है, और न ही यह बताती है कि सम्मानजनक जीवन-स्तर के लिए आवश्यक सुविधाएँ, जैसे स्वास्थ्य व शिक्षा अवसंरचना, लोगों को उपलब्ध हैं या नहीं।
केरल तथा पंजाब की तुलना:
- केरल की प्रति व्यक्ति आय पंजाब की तुलना में कम है, फिर भी वहाँ शिशु मृत्यु दर कम है, जीवन प्रत्याशा अधिक है, तथा साक्षरता दर लगभग पूर्ण है। इसका कारण है, केरल में वर्षों से क्रमिक सरकारों द्वारा बनाया गया सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों, अस्पतालों तथा विद्यालयों का व्यापक जाल — अर्थात केरल के लोगों को उपलब्ध सार्वजनिक सुविधाएँ भारत के अधिकांश अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक हैं।
- दूसरी ओर, पंजाब की प्रति व्यक्ति आय केरल की तुलना में बहुत अधिक है (मुख्यतः कृषि से), परन्तु उसके जीवन प्रत्याशा तथा शिशु मृत्यु दर के संकेतक तुलनात्मक रूप से उतने अच्छे नहीं हैं, क्योंकि पंजाब के लोग सुविकसित सार्वजनिक सुविधाओं के बजाय महँगे निजी अस्पतालों तथा निजी विद्यालयों पर अधिक निर्भर हैं।
यह तुलना दर्शाती है कि प्रति व्यक्ति आय यह नहीं बताती कि यह आय किस प्रकार वितरित है, तथा नागरिकों को कौन-सी सार्वजनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इसलिए हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि प्रति व्यक्ति आय उपयोगी तो है, परन्तु विकास के लिए पूर्णतः पर्याप्त मापदंड नहीं है, क्योंकि यह विषमताओं को छिपा देती है और स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी सार्वजनिक सुविधाओं की गुणवत्ता को नहीं दर्शाती।
विकास की सततता (Sustainability of Development)
विकास के बारे में सोचते समय हमें केवल वर्तमान पीढ़ी के बारे में ही नहीं, बल्कि यह भी सोचना चाहिए कि क्या यह विकास भावी पीढ़ियों (future generations) के लिए भी सतत (sustainable) रह पाएगा। हमारा विकास संसाधनों का इस प्रकार दोहन नहीं करना चाहिए कि हमारे बच्चों तथा पौत्र-पौत्रियों के लिए कुछ भी शेष न बचे।
सतत विकास (Sustainable Development): ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को इस प्रकार पूरा करे कि भावी पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने की क्षमता प्रभावित न हो।
भूजल का ह्रास — एक उदाहरण
पंजाब भारत के सबसे कृषि-समृद्ध राज्यों में से एक है, मुख्यतः सिंचाई के लिए ट्यूबवेल के माध्यम से भूजल के गहन उपयोग के कारण। परन्तु इसके परिणामस्वरूप भूजल-स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है। यदि भूजल का उपयोग इसी दर से जारी रहा, तो शीघ्र ही पंजाब की भावी पीढ़ियों के लिए इसकी भारी कमी हो जाएगी — अर्थात जो स्रोत आज विकास को संभव बना रहा है, वही भविष्य के विकास के लिए खतरा बन सकता है। यह किसी संसाधन के असतत (unsustainable) उपयोग का स्पष्ट उदाहरण है।
हमारी पृथ्वी पर प्राकृतिक संसाधनों का भंडार सीमित है। इनमें से कुछ संसाधन, जैसे कच्चा तेल, कोयला तथा प्राकृतिक गैस, अनवीकरणीय (non-renewable) हैं — अर्थात एक बार पूरी तरह से समाप्त हो जाने पर इन्हें लाखों वर्षों तक पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता।
अनवीकरणीय संसाधन (Non-Renewable Resource): कच्चा तेल, कोयला अथवा प्राकृतिक गैस जैसे संसाधन, जो उपयोग तथा दोहन के साथ घटते जाते हैं, और एक बार समाप्त हो जाने पर मानव-जीवनकाल में पुनः नवीकृत अथवा प्रतिस्थापित नहीं किए जा सकते।
कच्चे तेल का उपयोग पेट्रोल तथा डीज़ल बनाने में होता है, जो विश्वभर के वाहनों, मशीनों तथा जनरेटरों को चलाते हैं। वर्तमान दर से दोहन तथा उपभोग जारी रहने पर, विशेषज्ञों ने बार-बार चेतावनी दी है कि विश्व के ज्ञात कच्चे तेल के भंडार आने वाले कुछ दशकों में समाप्त हो सकते हैं। यदि ऐसा हुआ, तो इसका परिवहन, उद्योग तथा दैनिक जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा, विशेषकर उन देशों पर जो भारत की भाँति आयातित तेल पर अत्यधिक निर्भर हैं।
निरंतर विकास के लिए सततता क्यों महत्वपूर्ण है?
यदि भूजल तथा कच्चे तेल जैसे संसाधनों का उपयोग लापरवाही से जारी रहा, तो वर्तमान का विकास भविष्य के विकास की कीमत पर होगा — भावी पीढ़ियों के पास अपनी आर्थिक गतिविधियों तथा जीवन-स्तर के लिए पर्याप्त संसाधन शेष नहीं बचेंगे। यही कारण है कि विकास के संदर्भ में संसाधनों की सततता एक महत्वपूर्ण मुद्दा है — प्रत्येक पीढ़ी को प्रकृति की देन को समाप्त करने के बजाय अगली पीढ़ी के लिए संरक्षित रखना चाहिए।
संसाधनों का संरक्षण (Conserving Resources)
विकास को सतत बनाए रखने के लिए हमें निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए —
- नवीकरणीय संसाधनों (जैसे सौर तथा पवन ऊर्जा) का अधिक उपयोग करना, तथा अनवीकरणीय संसाधनों का अधिक सावधानी एवं दक्षता से उपयोग करना।
- वर्षा जल संचयन (rainwater harvesting) के माध्यम से भूजल का पुनर्भरण करना, तथा अत्यधिक दोहन को नियंत्रित करना।
- ऐसी प्रौद्योगिकियों तथा जीवनशैली को अपनाना जो संसाधनों की बर्बादी को कम करें।
- भावी पीढ़ियों के लिए संसाधनों को संरक्षित रखने की आवश्यकता के बारे में जन-जागरूकता फैलाना।
इस प्रकार विकास की सततता एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है — यह आज के विकास संबंधी निर्णयों को कल की संभावनाओं से जोड़ती है, तथा यह याद दिलाती है कि संसाधनों का उपयोग जिम्मेदारी से किया जाना चाहिए ताकि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उपलब्ध रहें।
मुख्य बिंदु (Key Points to Remember)
- अलग-अलग लोगों के विकास संबंधी विचार भिन्न-भिन्न, कभी-कभी परस्पर विरोधाभासी होते हैं — जैसे भूमिहीन मजदूर के लिए काम की सुरक्षा व उचित मजदूरी महत्वपूर्ण है, जबकि ट्यूबवेल उपयोग करने वाले किसान के लिए नियमित बिजली आपूर्ति महत्वपूर्ण है।
- आय के साथ-साथ लोग समान व्यवहार, स्वतंत्रता, सुरक्षा तथा दूसरों से सम्मान जैसी गैर-भौतिक चीजें भी चाहते हैं।
- जो एक व्यक्ति के लिए विकास है, वह दूसरे के लिए विकास न हो, यहाँ तक कि हानिकारक भी हो सकता है — राष्ट्रीय विकास में मिश्रित एवं प्रायः परस्पर विरोधाभासी लक्ष्य शामिल होते हैं।
- औसत/प्रति व्यक्ति आय (कुल आय ÷ कुल जनसंख्या) का उपयोग सामान्यतः देशों की तुलना के लिए किया जाता है, परन्तु यह अकेले पर्याप्त नहीं है।
- विश्व बैंक प्रति व्यक्ति आय के आधार पर देशों को अमीर या गरीब वर्गीकृत करता है (वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट); भारत को निम्न-मध्यम आय वर्ग वाला देश माना जाता है।
- प्रति व्यक्ति आय केवल एक औसत है और देश के भीतर आय के वितरण/विषमता को छिपा देती है, तथा यह स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी सार्वजनिक सुविधाओं की उपलब्धता को नहीं दर्शाती।
- UNDP द्वारा प्रकाशित मानव विकास सूचकांक (HDI) जीवन प्रत्याशा, शिक्षा तथा प्रति व्यक्ति आय — तीनों को मिलाकर देशों की तुलना करता है।
- केरल की प्रति व्यक्ति आय कम है परन्तु मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य व शिक्षा सुविधाओं के कारण साक्षरता व जीवन प्रत्याशा अधिक है; पंजाब की प्रति व्यक्ति आय अधिक है परन्तु सार्वजनिक सुविधाओं के परिणाम तुलनात्मक रूप से कमजोर हैं।
- विकास सतत होना चाहिए — भूजल (पंजाब का उदाहरण) तथा कच्चे तेल जैसे अनवीकरणीय संसाधनों को भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित करना आवश्यक है।
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