पाठ – 1
स्वयं को प्रवृत्त करना — निर्देशांकों का उपयोग
In this post we have given the detailed notes of class 9 Math chapter 1 Orienting Yourself: The Use of Coordinates in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के गणित के पाठ 1 स्वयं को प्रवृत्त करना — निर्देशांकों का उपयोग के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं गणित विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Ganita Manjari (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Math |
| Chapter no. | Chapter 1 |
| Chapter Name | स्वयं को प्रवृत्त करना — निर्देशांकों का उपयोग (Orienting Yourself: The Use of Coordinates) |
| Category | Class 9 Math Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 1, स्वयं को प्रवृत्त करना — निर्देशांकों का उपयोग
भूमिका (Introduction)
निर्देशांक पद्धति (System of Coordinates): यह एक सुसंगठित रूपरेखा है (जैसे मानचित्र या आलेख पत्रक पर बनी जाल रेखाएँ) जो हमें संख्याओं की सहायता से किसी वस्तु अथवा बिंदु की वास्तविक भौतिक स्थिति को सटीकता से व्यक्त करने में सक्षम बनाती है।
जाल आधारित चिंतन तथा समष्टि (स्पेस) में बिंदुओं की स्थिति को परिभाषित करने वाली ज्यामिति की जड़ें भारत में बहुत गहरी हैं—
- सिंधु-सरस्वती सभ्यता: हजारों वर्ष पूर्व यहाँ नगर की गलियाँ उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम दिशा में लगभग 10 मीटर की समान दूरी पर बनाई जाती थीं। कोई भी व्यापारी नगर के केंद्र से दूरी की इकाइयाँ गिनकर दुकान या गोदाम ढूँढ़ सकता था — यह व्यावहारिक निर्देशांक पद्धति का प्रारंभिक रूप था।
- बौधायन (लगभग 800 सामान्य संवत): इन्होंने अपनी गहन ज्यामितीय संरचनाओं के लिए उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम रेखाओं का उपयोग किया और बौधायन-पाइथागोरस प्रमेय को विकसित करते हुए निर्देशांक ज्यामिति की आधारशिला रखी।
- उज्जयिनी: प्राचीन विश्व में यह कम-से-कम चौथी शताब्दी सामान्य संवत पूर्व से ही केंद्रीय देशांतर मध्याह्न रेखा (zero-longitude) के रूप में मान्य थी, जिसके सापेक्ष अन्य स्थितियाँ मापी जाती थीं।
- आर्यभट्ट (लगभग 499 सामान्य संवत): इन्होंने ग्रीक ‘कॉर्ड्स’ के स्थान पर ‘ज्या (sines)’ का उपयोग किया, जिससे किसी नगर या तारे के निर्देशांक ज्ञात करना आसान हुआ। इन्होंने क्रांतिवृत्त (सूर्यपथ) से दूरियाँ मापकर आकाश का मानचित्र बनाया।
- ब्रह्मगुप्त (लगभग 628 सामान्य संवत): इन्होंने शून्य और ऋणात्मक संख्याओं को बीजगणितीय इकाइयों के रूप में औपचारिक रूप दिया। आधुनिक निर्देशांक पद्धति में ‘मूलबिंदु’ शून्य है और ‘ऋणात्मक अक्ष’ शून्य से कम मानों को दर्शाता है। ब्रह्मगुप्त के इस योगदान के बिना चार-चतुर्थांशी कार्तीय तल संभव ही नहीं होता।
- अल-बिरुनी (लगभग 1000 सामान्य संवत): इन्होंने भारतीय त्रिकोणमितीय विधियों का उपयोग कर विभिन्न नगरों के निर्देशांक ज्ञात किए और तारों की सहायता से समुद्री यात्रियों के लिए निर्देशांक बताने वाला उपकरण ‘ऐस्ट्रोलेब’ विकसित किया।
- उमर खय्याम (लगभग 1100 सामान्य संवत): ये बीजगणितीय समस्याओं को समतल पर निर्देशांकों के पदों में हल करने वाले पहले गणितज्ञ थे।
- फर्मेट (1636) और रेने देकार्त (1637): देकार्त ने विधिवत रूप से यह प्रस्तुत किया कि द्वि-विमीय तल पर किसी भी बिंदु को दो लंबवत अक्षों से उसकी दूरियों के रूप में केवल दो संख्याओं द्वारा परिभाषित किया जा सकता है। इसी से बीजगणित और ज्यामिति का घनिष्ठ संबंध स्थापित हुआ, जिसे ‘कार्तीय निर्देशांक पद्धति’ (Cartesian Coordinate System) कहा जाता है।
विषय प्रवेश — रियान और शालिनी की कहानी
अध्याय की शुरुआत एक कहानी से होती है। रियान अपने परिवार के साथ नए शहर में आया है और नए विद्यालय में जाने वाला है। वह दृष्टिबाधित है। उसकी बहन शालिनी, जो कक्षा 9 उत्तीर्ण कर चुकी है, अपने निर्देशांक ज्यामिति के ज्ञान का उपयोग करके रियान को घर के कमरे से परिचित कराती है।
शालिनी ने एक आयताकार जाल पर पिन और धागों की सहायता से कमरे के तल (फर्श) का रेखाचित्र बनाया — यह 1 सेंटीमीटर : 1 फुट के पैमाने पर था। वस्तुओं के कोनों को दर्शाने वाले बिंदु मोटे ऊन से जोड़े गए ताकि रियान अपनी अँगुलियों से उनकी स्थिति महसूस कर सके। चूँकि यह रेखाचित्र केवल फर्श (2-D तल) को दर्शाता है, इसलिए खिड़कियों जैसी ऊँचाई पर स्थित वस्तुओं की स्थिति इसमें अंकित नहीं की जा सकती — यही इस कहानी का महत्वपूर्ण संकेत है कि निर्देशांक तल केवल दो विमाओं (x और y) में कार्य करता है।
द्वि-विमीय कार्तीय निर्देशांक पद्धति (The 2-D Cartesian Coordinate System)
पूर्णांकों, परिमेय संख्याओं और दशमलवों के अध्ययन में हमने एक-विमीय (1-D) संख्या रेखा का अध्ययन किया था। द्वि-विमीय (2-D) निर्देशांक पद्धति में समष्टि में बिंदुओं को चिह्नित करने के लिए दो परस्पर लंबवत रेखाओं का उपयोग किया जाता है।
- x-अक्ष (x-axis): क्षैतिज (horizontal) रेखा को x-अक्ष कहते हैं।
- y-अक्ष (y-axis): ऊर्ध्व (vertical) रेखा को y-अक्ष कहते हैं।
- मूलबिंदु (Origin O): x-अक्ष और y-अक्ष के प्रतिच्छेदन बिंदु को मूलबिंदु कहते हैं; इसके निर्देशांक (0, 0) होते हैं।
- निर्देशांक अक्ष (Coordinate axes): ‘axis’ का बहुवचन है, जो किसी बिंदु की स्थिति ज्ञात करने में सहायता करते हैं।
दोनों अक्षों पर मूलबिंदु O से दूरियाँ समान इकाइयों में चिह्नित की जाती हैं—
- O के दाहिनी ओर तथा O से ऊपर की ओर की दूरियाँ धनात्मक (positive) मानी जाती हैं।
- O के बाईं ओर तथा O से नीचे की ओर की दूरियाँ ऋणात्मक (negative) मानी जाती हैं।
उदाहरण — अक्षों पर स्थित बिंदु:
- बिंदु B, x-अक्ष पर O के दाहिनी ओर 4.5 इकाई पर है, अतः B = (4.5, 0)।
- बिंदु G, y-अक्ष पर O से नीचे की ओर 4.5 इकाई पर है, अतः G = (0, – 4.5)।
- बिंदु H, y-अक्ष पर O से ऊपर की ओर 4 इकाई पर है, अतः H = (0, 4)।
अक्षों पर स्थित बिंदुओं के सामान्य नियम:
- कोई बिंदु P = (x, 0) सदैव x-अक्ष पर स्थित होता है। यदि x धनात्मक है तो P, O के दाहिनी ओर होगा; यदि x ऋणात्मक है तो P, O के बाईं ओर होगा।
- कोई बिंदु P = (0, y) सदैव y-अक्ष पर स्थित होता है। यदि y धनात्मक है तो P, O के ऊपर की ओर होगा; यदि y ऋणात्मक है तो P, O के नीचे की ओर होगा।
बिंदु के निर्देशांक लिखते समय ‘=’ चिह्न हटाकर P = (x, y) को संक्षेप में P (x, y) भी लिखा जाता है — विशेषतः जब बिंदु को आलेख (graph) पर अंकित किया जाता है।
पाठ्यपुस्तक में रियान के कमरे के रेखाचित्र (कोने O, A, B, C) के आधार पर निम्न प्रकार के प्रश्न पूछे गए हैं जो अक्षों पर दूरी व निर्देशांक की समझ जाँचते हैं—
- दरवाजे (D1R1) की y-अक्ष (बाईं दीवार) से तथा x-अक्ष से दूरी ज्ञात करना और D1 के निर्देशांक बताना।
- यदि R1 = (11.5, 0) है, तो दरवाजे की चौड़ाई ज्ञात करना और यह जाँचना कि क्या यह चौड़ाई व्हीलचेयर के लिए उपयुक्त है।
- यदि स्नानगृह के दरवाजे के सिरे B1 (0, 1.5) और B2 (0, 4) हों, तो उसकी चौड़ाई की तुलना कमरे के दरवाजे से करना।
इस प्रकार के प्रश्न वास्तविक जीवन में x-अक्ष और y-अक्ष के अनुदिश दूरी नापने का व्यावहारिक अभ्यास कराते हैं।
चतुर्थांश (Quadrants) और तल के चार भाग
अभी तक हमने केवल अक्षों पर स्थित बिंदुओं पर विचार किया। जिस तल में दोनों अक्ष स्थित होते हैं, उसे कार्तीय तल (Cartesian plane), निर्देशांक तल (coordinate plane) अथवा xy-तल कहते हैं। ये अक्ष तल को चार भागों में विभाजित करते हैं, जिन्हें चतुर्थांश (quadrants) कहा जाता है।
पूर्व में बताई गई परिपाटी (धनात्मक/ऋणात्मक दिशाओं) के अनुसार चारों चतुर्थांशों में चिह्नों की परिपाटी इस प्रकार है—
| चतुर्थांश | x-निर्देशांक | y-निर्देशांक | चिह्न रूप (x, y) |
| प्रथम चतुर्थांश (Quadrant I) | धनात्मक | धनात्मक | (+, +) |
| द्वितीय चतुर्थांश (Quadrant II) | ऋणात्मक | धनात्मक | (–, +) |
| तृतीय चतुर्थांश (Quadrant III) | ऋणात्मक | ऋणात्मक | (–, –) |
| चतुर्थ चतुर्थांश (Quadrant IV) | धनात्मक | ऋणात्मक | (+, –) |
सामान्य रूप से, द्वि-विमीय तल में किसी बिंदु P के निर्देशांक (x, y) होते हैं, जहाँ—
- x (x-निर्देशांक): y-अक्ष से बिंदु P की लंबवत दूरी है, जिसे x-अक्ष के अनुदिश मापा जाता है।
- y (y-निर्देशांक): x-अक्ष से बिंदु P की लंबवत दूरी है, जिसे y-अक्ष के अनुदिश मापा जाता है।
उदाहरण — विभिन्न चतुर्थांशों में बिंदु:
- बिंदु S (3, – 5): यहाँ x-निर्देशांक 3 (धनात्मक) और y-निर्देशांक – 5 (ऋणात्मक) है, अतः S चतुर्थ चतुर्थांश में स्थित है।
- बिंदु Q (– 5, 3): यहाँ x-निर्देशांक – 5 (ऋणात्मक) और y-निर्देशांक 3 (धनात्मक) है, अतः Q द्वितीय चतुर्थांश में स्थित है।
सोचिए और विचार कीजिए (महत्वपूर्ण संकल्पनाएँ):
- y-अक्ष पर स्थित किसी भी बिंदु का x-निर्देशांक सदैव शून्य होता है, और x-अक्ष पर स्थित किसी भी बिंदु का y-निर्देशांक सदैव शून्य होता है।
- बिंदु Q (y, x) तभी बिंदु P (x, y) के संपाती (coincide) होगा जब x = y हो।
- यह कथन सत्य है — यदि x ≠ y है तो (x, y) ≠ (y, x); और (x, y) = (y, x) होगा केवल तभी, जब x = y हो।
इस प्रश्नावली में आलेख पत्रक पर x-अक्ष पर (– 7, 0) से (13, 0) तक और y-अक्ष पर (0, – 15) से (0, 12) तक बिंदु अंकित करने होते हैं (पैमाना: 1 से.मी. = 1 इकाई)। इसके आधार पर रियान के घर से जुड़े प्रश्न पूछे जाते हैं, जैसे — अध्ययन मेज के तीन पाये (8, 9), (11, 9), (11, 7) दिए जाने पर चौथे पाये का निर्देशांक ज्ञात करना, स्नानगृह के कोनों तथा फव्वारा क्षेत्र के निर्देशांक बताना, वॉशबेसिन और शौचालय के लिए स्थान चिह्नित करना, तथा भोजनकक्ष (18 फुट × 15 फुट) और उसमें रखी भोजन-मेज (5 फुट × 3 फुट) के कोनों/पायों के निर्देशांक ज्ञात करना। ये प्रश्न आयताकार वस्तुओं के कोनों के निर्देशांकों को समझने का अभ्यास कराते हैं।
द्वि-विमीय तल में दो बिंदुओं के मध्य दूरी (Distance Between Two Points)
यदि दो बिंदु किसी अक्ष पर स्थित हों, या अक्षों के समांतर रेखाखंड बनाते हों, तो उनके मध्य दूरी सीधे ज्ञात की जा सकती है। परंतु यदि दोनों बिंदुओं को मिलाने वाला रेखाखंड किसी भी अक्ष के समांतर न हो, तो हमें बौधायन-पाइथागोरस प्रमेय (Baudhāyana–Pythagoras Theorem) का उपयोग करना पड़ता है।
उदाहरण — त्रिभुज ADM में भुजाओं की लंबाई ज्ञात करना:
माना त्रिभुज ADM की शीर्ष स्थितियाँ A (3, 4), D (7, 1) और M (9, 6) हैं। यह त्रिभुज प्रथम चतुर्थांश में स्थित एक न्यूनकोण त्रिभुज है।
भुजा AD की लंबाई:
- x-अक्ष के अनुदिश तय दूरी: CD = D का x-निर्देशांक − A का x-निर्देशांक = 7 − 3 = 4
- y-अक्ष के अनुदिश तय दूरी: AC = A का y-निर्देशांक − D का y-निर्देशांक = 4 − 1 = 3
- बौधायन-पाइथागोरस प्रमेय से: AD = √(42 + 32) = √25 = 5 इकाई
भुजा DM और MA की लंबाई (इसी विधि से):
- DM = √(22 + 52) = √(4 + 25) = √29 इकाई
- MA = √(62 + 22) = √(36 + 4) = √40 इकाई
दूरी का व्यापक सूत्र (General Distance Formula):
व्यापक रूप से, बिंदुओं (x1, y1) और (x2, y2) के मध्य की दूरी निम्नलिखित सूत्र द्वारा दी जाती है—
दूरी = √[(x2 − x1)2 + (y2 − y1)2]
यहाँ (x2 − x1) और (y2 − y1) धनात्मक हों या ऋणात्मक, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि वर्ग (square) करने पर मान सदैव धनात्मक हो जाता है — हम वास्तव में दोनों अक्षों के अनुदिश हुए परिवर्तन (shift) को ही माप रहे होते हैं।
उदाहरण — ऋणात्मक निर्देशांकों के साथ परावर्तन (Reflection):
यदि त्रिभुज AMD को y-अक्ष में परावर्तित (reflect) कर दिया जाए, तो बिंदुओं के प्रतिबिंब इस प्रकार होंगे — A’ (– 3, 4), M’ (– 9, 6), D’ (– 7, 1)।
- C’D’ = A’ का x-निर्देशांक − D’ का x-निर्देशांक = − 3 − (− 7) = 4
- A’C’ = A’ का y-निर्देशांक − D’ का y-निर्देशांक = 4 − 1 = 3
- अतः A’D’ = √(42 + 32) = 5 इकाई (मूल भुजा AD के बराबर)
- D’M’ = √[(−2)2 + 52] = √29 इकाई
- M’A’ = √[(−6)2 + 22] = √40 इकाई
यह उदाहरण दर्शाता है कि परावर्तन (reflection) से त्रिभुज की भुजाओं की लंबाई अपरिवर्तित रहती है, भले ही निर्देशांकों के चिह्न बदल जाएँ। इससे स्पष्ट है कि दूरी सूत्र ऋणात्मक निर्देशांकों के लिए भी समान रूप से लागू होता है।
विशेष स्थितियाँ — अक्षों के समांतर बिंदुओं के मध्य दूरी:
- बिंदुओं (x1, y) और (x2, y) के मध्य दूरी, x1 व x2 के अंतर का निरपेक्ष मान |x2 − x1| होती है।
- बिंदुओं (x, y1) और (x, y2) के मध्य दूरी, y1 व y2 के अंतर का निरपेक्ष मान |y2 − y1| होती है।
अध्याय की अंतिम प्रश्नावली में निम्न प्रकार की उच्च-स्तरीय संकल्पनाएँ अभ्यास हेतु दी गई हैं, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं—
- दोनों अक्षों के प्रतिच्छेदन बिंदु (मूलबिंदु) के निर्देशांक सदैव (0, 0) होते हैं।
- यदि किसी बिंदु का x-निर्देशांक निश्चित है और वह y-अक्ष के समांतर रेखा पर स्थित है, तो उसका x-निर्देशांक अपरिवर्तित रहता है, केवल y-निर्देशांक बदलता है — ऐसा बिंदु किन्हीं दो चतुर्थांशों में हो सकता है।
- दिए गए बिंदुओं को क्रमानुसार मिलाकर बनी आकृति (जैसे RAMP) में — किन भुजाओं के अक्षों के समांतर होने, किन भुजाओं के परस्पर लंबवत होने, तथा कौन-से बिंदु किसी अक्ष में एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब (mirror image) हैं — इसका अनुमान लगाना और फिर बिंदु अंकित कर सत्यापन करना।
- तीन बिंदुओं का एक ही सरल रेखा (collinear points) पर होने की जाँच बिना अंकन किए किसी विधि से करना (उदाहरण: M (– 3, – 4), A (0, 0), G (6, 8))।
- मूलबिंदु को एक शीर्ष मानकर समकोण समद्विबाहु त्रिभुज या विभिन्न चतुर्थांशों में शीर्षों वाला समद्विबाहु त्रिभुज बनाना।
- रेखाखंड ST के मध्यबिंदु M के निर्देशांकों और S, T के निर्देशांकों के बीच संबंध ज्ञात करना, तथा इस संबंध का उपयोग करके किसी अज्ञात बिंदु के निर्देशांक ज्ञात करना।
- त्रिभुज के मध्यबिंदुओं (जैसे D, E, F) से मूल शीर्षों (A, B, C) के निर्देशांक ज्ञात करना।
- वास्तविक जीवन में निर्देशांक पद्धति के अनुप्रयोग — जैसे नगर की गलियों को (2, 5) जैसे निर्देशांक-जोड़े से पहचानना, अथवा कंप्यूटर ग्राफिक्स की स्क्रीन (मूलबिंदु नीचे-बाएँ कोने पर) पर स्थित वृत्ताकार चिह्नों (icons) का स्क्रीन के भीतर होना या दो चिह्नों का प्रतिच्छेद करना जाँचना।
- चार बिंदुओं A (2, 1), B (– 1, 2), C (– 2, – 1), D (1, – 2) से बनी आकृति का वर्ग (square) होना जाँचना और उसका क्षेत्रफल ज्ञात करना।
अध्याय सार (Chapter Summary)
- किसी तल में किसी बिंदु या वस्तु की स्थिति ज्ञात करने के लिए हमें दो परस्पर लंबवत रेखाओं की आवश्यकता होती है — एक क्षैतिज और दूसरी ऊर्ध्व।
- इस तल को कार्तीय तल, निर्देशांक तल अथवा xy-तल कहते हैं, और रेखाओं को निर्देशांक अक्ष कहा जाता है।
- क्षैतिज रेखा x-अक्ष कहलाती है और ऊर्ध्व रेखा y-अक्ष कहलाती है।
- निर्देशांक अक्ष तल को चार भागों — चतुर्थांशों — में विभाजित करते हैं।
- अक्षों का प्रतिच्छेद बिंदु मूलबिंदु कहलाता है, जिसके निर्देशांक (0, 0) होते हैं।
- y-अक्ष से किसी बिंदु की दूरी उसका x-निर्देशांक है, और x-अक्ष से उसकी दूरी उसका y-निर्देशांक है। यदि किसी बिंदु का x-निर्देशांक x और y-निर्देशांक y है, तो (x, y) उस बिंदु के निर्देशांक कहलाते हैं।
- x-अक्ष पर किसी बिंदु के निर्देशांक (x, 0) रूप के होते हैं, और y-अक्ष पर स्थित बिंदु के निर्देशांक (0, y) रूप के होते हैं।
- किसी बिंदु के निर्देशांक प्रथम चतुर्थांश में (+, +), द्वितीय चतुर्थांश में (–, +), तृतीय चतुर्थांश में (–, –) और चतुर्थ चतुर्थांश में (+, –) रूप के होते हैं।
- यदि x = y हो तो (x, y) = (y, x) होगा; यदि x ≠ y हो तो (x, y) ≠ (y, x) होगा।
- बिंदुओं (x1, y) और (x2, y) के मध्य दूरी |x2 − x1| होती है, और बिंदुओं (x, y1) और (x, y2) के मध्य दूरी |y2 − y1| होती है।
- बौधायन-पाइथागोरस प्रमेय के अनुसार, बिंदुओं (x1, y1) और (x2, y2) के मध्य दूरी √[(x2 − x1)2 + (y2 − y1)2] होती है।
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