पाठ – 8
पद
In this post we have given the detailed notes of Class 9 Hindi chapter 8 पद These notes are useful for the students who are going to appear in Class 9 board exams
इस पोस्ट में कक्षा 9 के हिंदी के पाठ 8 पद के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं हिंदी विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Ganga (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Hindi (गंगा) |
| Chapter no. | Chapter 8 |
| Chapter Name | पद |
| Category | Class 9 Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 8, पद
-रैदास
सारांश
रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म काशी (वाराणसी) में हुआ था। उनका जीवन-काल 15वीं शताब्दी (सन् 1388–1518) माना जाता है। रैदास संत कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने बाह्य आडंबरों का खंडन कर मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति को ही सच्चा धर्म माना है। रैदास ने अपनी काव्य-रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है।
यहाँ रैदास के दो पद लिए गए हैं। पहले पद में बताया गया है कि जैसे चंदन-पानी, दीपक-बाती, मोती-धागा और बादल-मोर का संबंध अटूट होता है, वैसे ही भक्त से उसके आराध्य अलग नहीं हो सकते। इस पद में अनन्य भक्ति और आराध्य के प्रति समर्पण का भाव प्रकट होता है। दूसरे पद में भी आराध्य से भक्त का अटूट नाता व्यक्त किया गया है। वह तीर्थ और व्रत छोड़ सकता है, पर प्रभु-चरणों की भक्ति नहीं। यह पद निष्ठा, विश्वास और अडिग भक्ति को व्यंजित करता है।
पद 1
अब कैसे छूटै राम रट लागी।
अर्थ – रैदास कहते हैं कि अब उन्हें राम-नाम रटने अर्थात जपने की जो लगन लग गई है, वह किसी भी तरह छूट नहीं सकती। भक्ति की यह रट अब उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गई है।
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।
अर्थ – रैदास कहते हैं कि हे प्रभु, आप चंदन के समान हैं और मैं जल के समान हूँ। जिस प्रकार चंदन को पानी में घिसने पर उसकी सुगंध जल के कण-कण में समा जाती है, उसी प्रकार भक्त और भगवान का संबंध भी इतना घुला-मिला और अटूट है।
प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
अर्थ – हे प्रभु, आप बादल के समान हैं और मैं मोर के समान हूँ। जिस प्रकार बादल को देखकर मोर हर्षित होकर नाचने लगता है और जिस प्रकार चकोर पक्षी चंद्रमा को एकटक निहारता रहता है, उसी प्रकार भक्त की दृष्टि भी सदा अपने आराध्य पर टिकी रहती है।
प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
अर्थ – हे प्रभु, आप दीपक हैं और मैं उसकी बाती हूँ। जिस प्रकार दीपक और बाती के मेल से दिन-रात निरंतर ज्योति जलती रहती है, उसी प्रकार भक्त और भगवान के मिलन से भक्ति की ज्योति सदा प्रज्वलित रहती है।
प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।
अर्थ – हे प्रभु, आप मोती हैं और मैं उस मोती को पिरोने वाला धागा हूँ। जिस प्रकार सुहागा के मिलने से सोना अपनी अशुद्धियों को त्यागकर निखर उठता है, उसी प्रकार आराध्य के साथ भक्त का संबंध भी उसे शुद्ध और उज्ज्वल बना देता है।
प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।
अर्थ – हे प्रभु, आप स्वामी हैं और मैं आपका दास हूँ। रैदास कहते हैं कि वे अपने आराध्य के प्रति ऐसी ही अनन्य और समर्पित भक्ति करते हैं, जैसे एक सच्चा दास अपने स्वामी के प्रति करता है।
पद 2
जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।
अर्थ – रैदास कहते हैं कि हे राम, यदि आप मुझसे नाता तोड़ भी दें, तो भी मैं आपसे अपना नाता कभी नहीं तोड़ूँगा; क्योंकि आपसे संबंध तोड़कर मैं फिर किससे नाता जोड़ूँ? यहाँ भक्त का आराध्य के प्रति अटूट और शर्तरहित प्रेम व्यक्त हुआ है।
तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।
अर्थ – रैदास कहते हैं कि उन्हें तीर्थ-यात्रा और व्रत-उपवास करने की कोई चिंता या आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उन्हें तो केवल प्रभु के चरण-कमलों का ही एक भरोसा है। बाहरी कर्मकांडों से बढ़कर सच्ची भक्ति ही आराध्य तक पहुँचने का सच्चा साधन है।
जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव और नहिं दूजा।
अर्थ – रैदास कहते हैं कि वे जहाँ-जहाँ भी जाते हैं, वहाँ केवल प्रभु की ही पूजा करते हैं, क्योंकि संसार में उनके समान दूसरा कोई देवता नहीं है। यहाँ भक्त की अनन्य और एकनिष्ठ आस्था प्रकट होती है।
मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरौं।
अर्थ – रैदास कहते हैं कि उन्होंने अपना मन केवल हरि से जोड़ लिया है, और हरि से नाता जोड़कर उन्होंने संसार के अन्य सभी सांसारिक मोह-बंधनों से अपना नाता तोड़ लिया है।
सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।
अर्थ – रैदास कहते हैं कि दिन के सभी पहरों में अर्थात हर समय उन्हें केवल प्रभु की ही आशा रहती है। रैदास मन, कर्म और वचन तीनों से यही कहते हैं कि उनकी भक्ति और निष्ठा पूर्णतः अपने आराध्य के प्रति समर्पित है।
We hope that Class 9 Hindi Chapter 8 पद notes in Hindi helped you. If you have any query about Class 9 Hindi Chapter 8 पद notes in Hindi or about any other notes of Class 9 Hindi Notes, so you can comment below. We will reach you as soon as possible…

