पाठ – 9
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
In this post we have given the detailed notes of Class 9 Hindi chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद These notes are useful for the students who are going to appear in Class 9 board exams
इस पोस्ट में कक्षा 9 के हिंदी के पाठ 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं हिंदी विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Ganga (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Hindi (गंगा) |
| Chapter no. | Chapter 9 |
| Chapter Name | राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद |
| Category | Class 9 Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 9, राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
-तुलसीदास
सारांश
यह काव्यांश गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के ‘बालकांड’ से लिया गया है। सीता-स्वयंवर की सभा में श्रीराम द्वारा शिव-धनुष तोड़े जाने का समाचार जब मुनि परशुराम को मिलता है, तो वे अत्यंत क्रोधित होकर सभा में आ पहुँचते हैं। धनुष को खंडित देखकर उनका रोष और बढ़ जाता है और वे उपस्थित सभी राजाओं पर क्रोधित होते हैं। इस अंश में परशुराम के भयानक रूप, राजा जनक के भय, सीता तथा उनकी माता की चिंता, श्रीराम की विनम्रता और लक्ष्मण के तीखे व्यंग्यपूर्ण उत्तरों का सजीव वर्णन हुआ है।
देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥
पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥
अर्थ – परशुराम (भृगुपति) के भयानक रूप को देखते ही सभा में बैठे सभी राजा भय से व्याकुल होकर खड़े हो गए। वे अपने-अपने पिता का नाम लेकर अपना परिचय देते हुए परशुराम को दंडवत प्रणाम करने लगे।
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥
जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥
अर्थ – परशुराम जिस स्वाभाविक दृष्टि से किसी को हितैषी समझकर देखते, वही व्यक्ति मानो अपना अंत निकट जानकर घबरा उठता। राजा जनक भी वहाँ आकर सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं और सीता को बुलाकर उनसे भी परशुराम को प्रणाम करवाते हैं।
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं॥
बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥
अर्थ – सीता की सखियाँ प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देती हैं और चतुर सखियाँ उन्हें अपने समाज में वापस ले जाती हैं। इसी बीच विश्वामित्र वहाँ आकर मिलते हैं और राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों से परशुराम के चरण-कमलों का स्पर्श करवाते हैं।
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥
रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥
अर्थ – राम और लक्ष्मण को राजा दशरथ के पुत्र जानकर तथा इस सुंदर जोड़ी को देखकर सब उन्हें आशीर्वाद देते हैं। श्रीराम के अपार सौंदर्य को देखकर सबकी आँखें वहीं थककर ठहर जाती हैं – उनका रूप कामदेव के भी अभिमान को चूर करने वाला है।
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।
पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥
अर्थ – फिर (टूटे हुए धनुष को) देखकर परशुराम राजा जनक (विदेह) से पूछते हैं कि बताओ यहाँ इतनी भीड़ किस कारण जुटी है। वे सब कुछ जानते हुए भी मानो अनजान बनकर पूछ रहे थे, क्योंकि उनके शरीर में तब तक क्रोध पूरी तरह व्याप्त हो चुका था।
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महिप सब आए॥
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥
अर्थ – राजा जनक ने परशुराम को वह पूरा समाचार सुनाया जिस कारण सभी राजा वहाँ एकत्र हुए थे। यह सुनते ही परशुराम ने दूसरी ओर देखा तो उन्हें टूटे हुए धनुष के टुकड़े भूमि पर पड़े दिखाई दिए।
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥
अर्थ – धनुष के टुकड़े देखते ही परशुराम अत्यंत क्रोध में कठोर वचन बोलते हैं – हे मूर्ख जनक, बताओ यह धनुष किसने तोड़ा है। शीघ्र मुझे वह दिखाओ, नहीं तो आज मैं तुम्हारे पूरे राज्य को उलट-पुलट (नष्ट) कर दूँगा।
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥
सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥
अर्थ – अत्यधिक भय के कारण राजा जनक कोई उत्तर नहीं दे पाते। यह देखकर सभा में उपस्थित कुछ कुटिल स्वभाव के राजा मन-ही-मन प्रसन्न होते हैं। वहीं देवता, मुनि, नाग तथा नगर के सभी स्त्री-पुरुष हृदय में भारी भय के साथ चिंतित हो उठते हैं।
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥
अर्थ – सीता की माता मन-ही-मन पछताती हैं कि विधाता ने बनी-बनाई बात (सीता के विवाह की बात) बिगाड़ दी। परशुराम के क्रोधी स्वभाव के विषय में सुनकर सीता के लिए आधे पल का समय भी एक कल्प (युग) के समान लंबा बीतने लगता है।
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥
अर्थ – सभा में उपस्थित सभी लोगों को भयभीत देखकर और सीता की व्याकुलता को जानकर, श्रीराम बिना किसी हर्ष या विषाद के, पूर्ण रूप से शांत और संतुलित मन से बोलते हैं।
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
अर्थ – राम अत्यंत विनम्रतापूर्वक कहते हैं – हे नाथ, शिवजी के धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई सेवक होगा। आपकी क्या आज्ञा है, वह मुझसे क्यों नहीं कही जाती? यह सुनकर स्वभाव से क्रोधी परशुराम और भी अधिक क्रोधित होकर बोलते हैं।
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
अर्थ – परशुराम कहते हैं – सेवक वही कहलाता है जो सेवा का कार्य करे, जो शत्रु के समान आचरण करे उससे तो युद्ध ही किया जाता है। हे राम सुनो, जिसने भी शिवजी का धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है।
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥
अर्थ – परशुराम आगे कहते हैं कि धनुष तोड़ने वाला इस सभा को छोड़कर अलग हो जाए, नहीं तो यहाँ उपस्थित सभी राजा मारे जाएँगे। परशुराम के यह कठोर वचन सुनकर लक्ष्मण मुसकराते हैं और परशुराम का उपहास करते हुए बोलते हैं।
बहु धनुहीं तोड़ीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
अर्थ – लक्ष्मण व्यंग्यपूर्वक कहते हैं – हे स्वामी, हमने तो बचपन में ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ी हैं, तब तो आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया। फिर इस धनुष पर आपकी इतनी ममता किस कारण है? लक्ष्मण के इन व्यंग्यभरे वचनों को सुनकर भृगुकुलकेतू परशुराम और भी अधिक क्रोधित हो उठते हैं।
रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥
अर्थ – क्रोधित परशुराम लक्ष्मण से कहते हैं – अरे राजकुमार, तू काल के वश में आ चुका है, इसीलिए बिना सोचे-समझे बोल रहा है, तुझे अपनी वाणी पर संभल नहीं है। यह कोई साधारण धनुही नहीं है, यह तो त्रिपुरारी अर्थात भगवान शिव का धनुष है, जो संपूर्ण संसार में विख्यात है।
पाठ्यपुस्तक में दिया गया यह अंश यहीं समाप्त होता है, किंतु रामचरितमानस में इससे आगे की कथा में परशुराम का क्रोध और भी बढ़ता है तथा लक्ष्मण और परशुराम के बीच व्यंग्यपूर्ण संवाद चलता रहता है। ऐसी तनावपूर्ण स्थिति में भी श्रीराम अपने धीर-गंभीर और शांत स्वभाव को बनाए रखते हैं। अंत में राम की विनम्रता, विश्वामित्र के समझाने और राम द्वारा अपनी शक्ति का परिचय दिए जाने पर परशुराम का क्रोध शांत हो जाता है। इस प्रकार यह संवाद परशुराम के रौद्र रूप, राजा जनक तथा प्रजा के भय, लक्ष्मण के निर्भीक प्रत्युत्तर और राम की मर्यादा एवं संयम को बड़ी नाटकीयता के साथ प्रस्तुत करता है।
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