पाठ – 10
भारति, जय, विजय करे!
In this post we have given the detailed notes of Class 9 Hindi chapter 10 भारति, जय, विजय करे! These notes are useful for the students who are going to appear in Class 9 board exams
इस पोस्ट में कक्षा 9 के हिंदी के पाठ 10 भारति, जय, विजय करे! के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं हिंदी विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Ganga (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Hindi (गंगा) |
| Chapter no. | Chapter 10 |
| Chapter Name | भारति, जय, विजय करे! |
| Category | Class 9 Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 10, भारति, जय, विजय करे!
-सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
सारांश
भारति, जय, विजय करे!
कनक-शस्य-कमलधरे!
लंका पदतल शतदल,
गर्जितोर्मि सागर-जल
धोता शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!
अर्थ – कवि निराला भारतमाता को ‘भारति’ कहकर संबोधित करते हुए उनकी जय और विजय की कामना करते हैं। वे भारतभूमि को ‘कनक-शस्य-कमलधरे’ कहते हैं, अर्थात् जो सोने के समान चमकीली फसलों और कमल को धारण करने वाली है — यह भारत की कृषि-समृद्धि और सौंदर्य का प्रतीक है। कवि की कल्पना में भारत के चरणों में लंका मानो सौ पंखुड़ियों वाला कमल है, और गरजती हुई समुद्र की लहरें (गर्जितोर्मि सागर-जल) भारतमाता के पवित्र चरण-युगल को धोती रहती हैं। इस प्रकार सागर स्वयं अनेक अर्थों से भरी हुई स्तुति करता प्रतीत होता है, अर्थात् प्रकृति स्वयं भारत की महिमा का गुणगान करती है।
तरु-तृण-वन-लता वसन,
अंचल में खचित सुमन;
गंगा ज्योतिर्जल-कण
धवल धार हार गले।
अर्थ – इस छंद में कवि भारतमाता का मानवीकरण करते हुए प्रकृति को ही उनका वस्त्र और आभूषण बताते हैं। वृक्ष, तिनके, वन और लताएँ मानो भारतमाता के वस्त्र (वसन) हैं, और उनके आँचल में तरह-तरह के सुंदर फूल जड़े (खचित) हुए हैं। गंगा के प्रकाशमान जल-कणों की धवल (श्वेत) धारा उनके गले में हार के समान सुशोभित है। इस प्रकार कवि ने भारत की प्राकृतिक संपदा — वन, वनस्पति और गंगा नदी — को भारतमाता के सौंदर्य और शृंगार के रूप में चित्रित किया है।
मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,
प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे!
अर्थ – अंतिम छंद में कवि हिमालय के उज्ज्वल और श्वेत हिम-तुषार को भारतमाता का मुकुट बताते हैं, जिससे भारत की भव्यता और दिव्यता प्रकट होती है। पवित्र ‘ओंकार’ ध्वनि को उनके प्राण अर्थात् जीवन-शक्ति के समान बताया गया है, जो उदारतापूर्वक सभी दिशाओं में गूँज रही है। भारतमाता को ‘शतमुख-शतरव-मुखरे’ अर्थात् सौ मुखों और सौ प्रकार के स्वरों से मुखरित बताया गया है, जो भारत की भाषिक, सांस्कृतिक और वैचारिक विविधता तथा उसकी एकता में अनेकता का प्रतीक है।
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