पाठ – 11
झाँसी की रानी
In this post we have given the detailed notes of Class 9 Hindi chapter 11 झाँसी की रानी These notes are useful for the students who are going to appear in Class 9 board exams
इस पोस्ट में कक्षा 9 के हिंदी के पाठ 11 झाँसी की रानी के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं हिंदी विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Ganga (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Hindi (गंगा) |
| Chapter no. | Chapter 11 |
| Chapter Name | झाँसी की रानी |
| Category | Class 9 Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 11, झाँसी की रानी
-सुभद्रा कुमारी चौहान
सारांश
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फ़िरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में
वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – कवयित्री कहती हैं कि सन् 1857 में जब क्रांति की चिंगारी भड़की तो राजाओं-रजवाड़ों के सिंहासन हिल गए और उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध भौंहें तान लीं। बूढ़े हो चुके भारत में मानो फिर से जवानी लौट आई, यानी नया जोश और स्फूर्ति जाग उठी। खोई हुई आज़ादी की सच्ची कीमत सभी को समझ में आ गई और सबने मन ही मन विदेशी अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का दृढ़ संकल्प कर लिया। सन् सत्तावन (1857) में वह पुरानी तलवार फिर एक बार चमक उठी, अर्थात लंबे समय बाद भारतीयों ने फिर हथियार उठाए। बुंदेलखंड के लोकगायक हरबोलों के मुख से यह गाथा सुनने को मिली कि झाँसी की रानी बड़ी वीरता और मर्दानगी से लड़ी थी।
कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के संग पढ़ती थी वह, नाना के संग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,
वीर शिवाजी की गाथाएँ
उसको याद ज़बानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – इस पद में रानी लक्ष्मीबाई के बचपन का परिचय दिया गया है। वे कानपुर के नाना साहब की मुँहबोली बहन थीं, जिन्हें प्यार से ‘छबीली’ कहा जाता था। उनका नाम लक्ष्मीबाई था और वे अपने पिता की एकमात्र संतान थीं। वे नाना साहब के साथ ही पढ़ती और खेलती हुई बड़ी हुईं। बरछी, ढाल, कृपाण और कटारी जैसे शस्त्र ही उनके बचपन के सच्चे साथी (सहेली) थे। वीर शिवाजी की वीरता भरी गाथाएँ उन्हें ज़बानी याद थीं, जिनसे उन्हें प्रेरणा मिलती थी।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार,
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी
भी आराध्य भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – कवयित्री कहती हैं कि लक्ष्मीबाई मानो साक्षात लक्ष्मी या दुर्गा का ही रूप थीं, वे स्वयं वीरता की जीती-जागती प्रतिमा थीं। उनकी तलवार के वार देखकर मराठा योद्धा भी प्रसन्न हो उठते थे। नकली युद्ध का अभ्यास करना, सेना की व्यूह-रचना सीखना और खूब शिकार खेलना उनके प्रिय खेल थे। सेना को घेरना और किले तोड़ना जैसे कार्य उन्हें बहुत भाते थे। महाराष्ट्र की कुल-देवी भवानी ही उनकी भी आराध्य देवी थीं।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाइ झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया,
शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – इस पद में लक्ष्मीबाई के विवाह का वर्णन है। झाँसी में वीरता और वैभव की मानो सगाई हो गई, अर्थात झाँसी के राजा से लक्ष्मीबाई का विवाह हुआ और वे रानी बनकर झाँसी आईं। राजमहल में बधाइयाँ बजीं और चारों ओर खुशियाँ छा गईं। वे बुंदेलों की वीरता का यशोगान करने वाली कीर्ति-गाथा के समान झाँसी में आईं। कवयित्री उपमा देती हैं कि जैसे चित्रा ने अर्जुन को पाया था और भवानी शिव से मिली थीं, वैसे ही यह मिलन हुआ।
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई,
निःसंतान मरे राजाजी
रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – कुछ समय झाँसी के महलों में सुख और सौभाग्य का उजाला छाया रहा, परंतु समय ने चुपके-चुपके एक काली घटा (दुख का समय) ला दी। जिन हाथों में तीर-कमान शोभा देते थे, उन्हें विधवा की चूड़ियाँ पहननी पड़ीं—अर्थात राजा की मृत्यु के बाद रानी विधवा हो गईं। नियति (विधि) को भी उन पर दया नहीं आई। बिना संतान के राजा का देहांत हो गया और रानी शोक में डूब गईं।
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा
झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – राजा की मृत्यु से झाँसी का दीपक बुझ गया, यह देखकर अंग्रेज गवर्नर-जनरल डलहौजी बहुत प्रसन्न हुआ, क्योंकि उसे राज्य हड़पने का अच्छा अवसर मिल गया। उसने तुरंत अपनी फौजें भेजकर झाँसी के किले पर अपना झंडा फहरा दिया। बिना किसी वारिस के राज्य का स्वयंभू वारिस बनकर ब्रिटिश राज झाँसी में आ धमका। यह देखकर रानी की आँखों में आँसू आ गए, क्योंकि झाँसी अब उनकी अपनी नहीं, पराई (बिरानी) हो चुकी थी।
अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फ़िरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नवाबों को भी उसने पैरों ठुकराया,
रानी दासी बनी, बनी यह
दासी अब महरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – कवयित्री कहती हैं कि छली अंग्रेज किसी की विनती नहीं सुनते। जो अंग्रेज व्यापारी बनकर दया माँगते हुए भारत आए थे, डलहौजी के आते-आते उनकी पूरी काया ही पलट गई और वे अब स्वयं शासक बनकर पैर पसारने लगे। उन्होंने बड़े-बड़े राजाओं और नवाबों तक को अपने पैरों तले कुचल दिया। इस प्रकार जो दासी (अंग्रेज व्यापारी) कभी छोटी हैसियत में थी, वही अब महारानी अर्थात शासक बन बैठी।
छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपूर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जब कि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात,
बंगाले, मद्रास आदि की
भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – अंग्रेजों ने एक-एक करके भारत के अनेक राज्य छीन लिए—दिल्ली की राजधानी छिन गई, लखनऊ को बातों ही बातों में हड़प लिया गया, पेशवा को बिठूर में कैद कर दिया गया और नागपुर पर भी आघात हुआ। उदयपुर, तंजौर, सतारा और कर्नाटक जैसे राज्यों की तो कोई हैसियत ही नहीं रह गई थी। सिंध, पंजाब और ब्रह्म (बर्मा) पर भी वज्रपात जैसा भीषण आघात हो चुका था। बंगाल और मद्रास की भी यही कहानी थी, अर्थात पूरे भारत में अंग्रेजों का साम्राज्य फैलता जा रहा था।
रानी रोइ रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेजार,
उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार,
सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
‘नागपूर के जेवर ले लो’, ‘लखनऊ के लो नौलख हार’,
यों परदे की इज़्ज़त पर-
देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – रनिवासों में रानियाँ रो रही थीं और बेगमें दुख से व्याकुल थीं। उनके गहने और कपड़े कलकत्ते के बाजार में बेचे जाने लगे। अंग्रेजों के अखबार खुलेआम इन वस्तुओं की नीलामी छापते थे—’नागपुर के गहने ले लो’, ‘लखनऊ का नौलखा हार ले लो’ जैसे विज्ञापन छपते थे। इस प्रकार पर्दानशीन रानियों की इज़्ज़त की वस्तुएँ भी देशी-विदेशी लोगों के हाथों बिकने लगीं, जो भारतीयों के लिए अत्यंत अपमानजनक था।
कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट आह्वान,
हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो
सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – गरीबों की झोपड़ियों में भी असहनीय पीड़ा थी और महलों में भी अपमान का घाव गहरा था। वीर सैनिकों के मन में अपने पूर्वजों की वीरता का अभिमान जगा हुआ था। नाना साहब के मंत्री धुंधूपंत पेशवा विद्रोह की सारी तैयारियाँ जुटा रहे थे। बहन छबीली अर्थात रानी लक्ष्मीबाई ने युद्ध की देवी रण-चंडी का खुलकर आह्वान कर दिया। इस प्रकार क्रांति का यज्ञ आरंभ हो गया और सोई हुई स्वतंत्रता की ज्योति को फिर से जगाने का समय आ गया।
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी
कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – जैसे महलों ने आग दी वैसे ही झोपड़ियों ने भी क्रांति की ज्वाला सुलगाई, अर्थात राजा और प्रजा दोनों ने मिलकर विद्रोह में भाग लिया। स्वतंत्रता की यह चिंगारी हर भारतीय के हृदय की गहराई से उठी थी। झाँसी, दिल्ली और लखनऊ में विद्रोह की लपटें फैल गईं। मेरठ, कानपुर और पटना में भी भारी हलचल मच गई। जबलपुर और कोल्हापुर में भी विद्रोह की चिंगारी भड़काई गई, अर्थात पूरे देश में क्रांति की आग फैल चुकी थी।
इस स्वतंत्रता-महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती
उनकी जो कुरबानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – इस स्वतंत्रता रूपी महायज्ञ में अनेक वीर योद्धाओं ने अपना बलिदान दिया—नाना साहब धुंधूपंत, ताँतिया टोपे, चतुर अज़ीमुल्ला, अहमद शाह मौलवी और ठाकुर कुँवरसिंह जैसे सैनिक इसमें सम्मिलित हुए। भारत के इतिहास-आकाश में इनके नाम सदा अमर रहेंगे। परंतु दुख की बात है कि आज उनकी वह कुरबानी अंग्रेजों की दृष्टि में अपराध कहलाई जाती है।
इनकी गाथा छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में,
जख्मी होकर वॉकर भागा,
उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – इन वीरों की गाथा को छोड़कर कवयित्री अब हमें झाँसी के युद्धक्षेत्र में ले चलती हैं, जहाँ लक्ष्मीबाई पुरुषों के समान वीरों के बीच डटकर खड़ी हैं। लेफ्टिनेंट वॉकर वहाँ आ पहुँचा और सैनिकों के बीच आगे बढ़ा। रानी ने तुरंत अपनी तलवार खींच ली और दोनों के बीच घमासान द्वंद्व-युद्ध हुआ। घायल होकर वॉकर भाग खड़ा हुआ और उसे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि एक स्त्री इतनी वीरता से लड़ सकती है।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थककर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया
ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – रानी लगातार सौ मील का सफर तय करके कालपी पहुँचीं। इस कठिन यात्रा में उनका घोड़ा थककर गिर पड़ा और वहीं तत्काल उसकी मृत्यु हो गई। यमुना नदी के तट पर भी अंग्रेजों को रानी से हार का सामना करना पड़ा। विजयी होकर रानी आगे बढ़ीं और उन्होंने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजों का मित्र राजा सिंधिया यह देखकर अपनी राजधानी छोड़कर भाग गया।
विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थीं,
युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी,
पर, पीछे ह्यू रोज आ गया,
हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – ग्वालियर पर विजय तो मिली, परंतु शीघ्र ही अंग्रेजों की सेना फिर से घेरा डालकर आ पहुँची। इस बार जनरल स्मिथ सामने था, जिसे रानी के हाथों मुँह की खानी पड़ी अर्थात पराजय झेलनी पड़ी। रानी की सखियाँ काना और मंदरा भी उनके साथ युद्धभूमि में डटी रहीं और दोनों ने युद्धक्षेत्र में शत्रुओं को खूब मारा। परंतु तभी पीछे से जनरल ह्यू रोज़ आ पहुँचा और रानी चारों ओर से घिर गईं।
तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किंतु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी
उसे वीर-गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – फिर भी रानी शत्रु सेना को मार-काटकर आगे बढ़ने लगीं, परंतु सामने एक नाला आ गया, जो बहुत बड़ी विपत्ति बन गया। उनका घोड़ा नाला पार करने से हिचकिचाया, और वह नया घोड़ा भी था। इतने में शत्रु सैनिक वहाँ आ पहुँचे। अकेली रानी के सामने असंख्य शत्रु थे और लगातार वार होने लगे। अंततः घायल होकर वह वीरांगना सिंहनी के समान गिर पड़ीं, क्योंकि उन्हें तो वीरगति ही प्राप्त करनी थी।
रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई
हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – रानी परलोक सिधार गईं और उनकी चिता ही अब उनकी दिव्य सवारी बन गई। उनका तेज परम तेज (परमात्मा) में जा मिला, क्योंकि वे सचमुच उस तेज की सच्ची अधिकारिणी थीं। उनकी आयु मात्र तेईस वर्ष की थी, फिर भी वे कोई साधारण मनुष्य नहीं बल्कि अवतार के समान थीं। वे मानो हमें फिर से जीवित करने, अर्थात नई प्रेरणा देने के लिए स्वतंत्रता की साक्षात मूर्ति बनकर आई थीं। वे हमें मार्ग दिखाकर तथा वह सीख सिखाकर चली गईं जो हमें सीखनी चाहिए थी।
जाओ रानी, याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी,
तेरा स्मारक तू ही होगी,
तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अर्थ – कवयित्री रानी को संबोधित करते हुए कहती हैं कि हे रानी, हम कृतज्ञ भारतवासी तुम्हें सदा याद रखेंगे। तुम्हारा यह बलिदान अमर और अविनाशी स्वतंत्रता की भावना को सदा जगाता रहेगा। चाहे इतिहास चुप रह जाए, चाहे सच्चाई को दबाने की कितनी भी कोशिश की जाए, चाहे अंग्रेजों की विजय कितनी ही उन्मत्त क्यों न हो और चाहे झाँसी को गोलों से नष्ट ही क्यों न कर दिया जाए, फिर भी तुम्हारा स्मारक तुम स्वयं ही हो—तुम स्वयं ही अपनी वीरता की अमिट पहचान (निशानी) हो।
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