पाठ – 12
घर की याद
In this post we have given the detailed notes of Class 9 Hindi chapter 12 घर की याद These notes are useful for the students who are going to appear in Class 9 board exams
इस पोस्ट में कक्षा 9 के हिंदी के पाठ 12 घर की याद के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं हिंदी विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Ganga (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Hindi (गंगा) |
| Chapter no. | Chapter 12 |
| Chapter Name | घर की याद |
| Category | Class 9 Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 12, घर की याद
-भवानीप्रसाद मिश्र
सारांश
आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रात-भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,
अर्थ – कवि कहता है कि आज बहुत तेज पानी (वर्षा) हो रहा है और यह रात भर से लगातार गिरता ही रहा है। इस लगातार बरसते पानी से कवि के प्राण और मन भी घिर गए हैं अर्थात वर्षा की उदासी और जेल के एकाकीपन ने उसके मन को व्याकुल कर दिया है।
अब सबेरा हो गया है,
कब सबेरा हो गया है,
ठीक से मैंने न जाना,
बहुत सोकर सिर्फ माना—
अर्थ – अब सुबह हो चुकी है, परंतु कवि को यह ठीक-ठीक पता ही नहीं चला कि सुबह कब हुई। वह इतनी देर तक सोता रहा कि उसे बस अनुमान से ही मानना पड़ा कि सबेरा हो गया है, मानो नींद और जेल की एकरसता ने समय का भान ही समाप्त कर दिया हो।
क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,
अभी तक चुपचाप है सब,
रातवाली छाप है सब,
अर्थ – बादलों का अँधेरा अभी तक इतना घना है कि सुबह होने के बाद भी वातावरण में रात जैसा सन्नाटा और अँधेरे की छाप बनी हुई है। चारों ओर अभी भी सब कुछ चुपचाप और शांत है।
गिर रहा पानी झरा-झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर,
काँपते हैं प्राण थर-थर,
अर्थ – पानी झर-झर करके लगातार बरस रहा है, पत्ते हवा से हरा-हर हिल रहे हैं और हवा सर-सर की आवाज़ के साथ बह रही है। इस वातावरण को देखकर-सुनकर कवि के प्राण थर-थर काँप उठते हैं, मानो प्रकृति की ये ध्वनियाँ उसके मन की व्याकुलता को और बढ़ा देती हैं।
बहुत पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर खुशी का पूर है जो,
अर्थ – बहुत पानी गिर रहा है और इसी बीच कवि की आँखों के सामने अपना घर तैरने लगता है अर्थात उसे अपने घर की याद आने लगती है। वह घर जो उससे दूर है, पर जो खुशियों से भरा हुआ है।
घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हाय रे परिताप के घर!
अर्थ – कवि याद करता है कि उसके घर में चार भाई हैं और उसकी बहिन भी मायके (अपने पीहर) आई हुई है। परंतु आज वही घर, जो कभी खुशियों से भरा था, अब पिता के घर में दुख और चिंता का घर बन गया है क्योंकि कवि जेल में है।
आज का दिन दिन नहीं है,
क्योंकि इसका छिन नहीं है,
एक छिन सौ बरस है रे,
हाय कैसा तरस है रे,
अर्थ – कवि कहता है कि आज का दिन साधारण दिन जैसा नहीं लग रहा क्योंकि इसका कोई अंत ही होता नहीं दिखता। जेल में बिताया गया एक-एक क्षण सौ वर्षों के समान लंबा प्रतीत हो रहा है, और इस पीड़ा में उसे बड़ी तड़प और विवशता महसूस हो रही है।
घर कि घर में सब जुड़े हैं,
सब कि इतने कब जुड़े हैं,
चार भाई चार बहिनें
भुजा भाई प्यार बहिनें,
अर्थ – कवि सोचता है कि घर में सब लोग एक साथ जुड़े हुए हैं, और वह याद करता है कि इतने सारे भाई-बहिन कभी इस तरह एक साथ कब मिले थे। चार भाई और चार बहिनें हैं—भाई जैसे भुजा (बाहु) का सहारा हैं तो बहिनें प्यार की मूर्ति।
और माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,
अर्थ – कवि की माँ पढ़ी-लिखी नहीं है, पर वह दुखों में तपकर गढ़ी हुई एक मजबूत स्त्री है। उस माँ की गोद में सिर रख देने भर से सारे दुख दूर हो जाते हैं, ऐसा ममता और सुरक्षा का भाव माँ की गोद में मिलता है।
माँ कि जिसकी स्नेह-धारा
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता।
अर्थ – माँ के स्नेह की धारा इतनी दूर तक फैली हुई है कि वह जेल में बैठे कवि तक भी पहुँच जाती है। माँ को लिखना नहीं आता, इसलिए जो भी उसका पत्र पाता, वह इस स्नेह को भावनाओं और आशीर्वाद के रूप में ही महसूस कर पाता।
और पानी गिर रहा है,
घर चतुर्दिक् घिर रहा है,
पिताजी भोले बहादुर,
वज्र-भुज नवनीत-सा उर,
अर्थ – पानी लगातार बरस रहा है और घर चारों ओर से इस वर्षा से घिरा हुआ है। कवि अपने पिता को याद करता है—वे स्वभाव से भोले और साहसी हैं, उनकी भुजाएँ वज्र के समान कठोर हैं परंतु हृदय मक्खन के समान कोमल है।
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिलखिलाएँ,
अर्थ – पिताजी पर बुढ़ापे का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है, वे अभी भी उतने ही सक्रिय और जीवंत हैं। वे आज भी दौड़ सकते हैं और खुलकर खिलखिलाकर हँस सकते हैं, मानो उम्र ने उनके उत्साह को छुआ ही न हो।
मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता,
अर्थ – कवि अपने पिता के साहस का वर्णन करता है—वे मृत्यु के सामने भी नहीं हिचकिचाते और शेर के सामने भी नहीं घबराते। उनकी वाणी में बादल के समान गरज है और उनके कार्य करने के अंदाज़ में आँधी जैसी तीव्रता और कंपन है।
आज गीता-पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
खूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उनकी मिला लेकर,
अर्थ – कवि कल्पना करता है कि पिताजी रोज़ की तरह आज भी गीता का पाठ करके, दो सौ साठ दंड (एक व्यायाम) लगाकर और खूब मुगदर घुमाकर व्यायाम करते होंगे तथा मुगदर की मूठ को कसकर पकड़ते होंगे—यानी उनकी दिनचर्या पहले जैसी ही चल रही होगी।
जब कि नीचे आए होंगे,
नैन जल से छाए होंगे,
हाय, पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,
अर्थ – व्यायाम करके जब पिताजी नीचे उतरे होंगे, तब बेटे की याद में उनकी आँखें आँसुओं से भर आई होंगी। कवि फिर से कहता है—हाय, पानी बरस रहा है और घर उसकी आँखों के सामने बार-बार तैर उठता है।
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नजर उनको पड़े होंगे।
अर्थ – कवि सोचता है कि उसके चार भाई और चार बहिनें (जो भुजा के समान बलशाली और प्यार से भरी हुई हैं) या तो खेल रहे होंगे या कहीं खड़े होंगे, और उसी बीच उन्हें जेल में बंद अपने भाई (कवि) की याद आई होगी।
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर,
अर्थ – जिन पिताजी पर बुढ़ापे का असर एक पल के लिए भी नहीं दिखा, वे भी बार-बार रो पड़े होंगे और अपने पाँचवें बेटे (कवि स्वयं, जो पाँचवीं संतान है) का नाम लेकर उसे याद करते होंगे।
पाँचवाँ मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,
अर्थ – कवि खुद को अभागा पाँचवाँ बेटा कहता है, जिसे पिताजी हमेशा ‘सोने पर सुहागा’ (यानी विशेष रूप से प्रिय) कहते रहे हैं और सदा उसके प्रति अपने प्यार में बहते रहे हैं।
आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उन पर सुहागा
बँधा बैठा हूँ अभागा,
अर्थ – कवि सोचता है कि आज उनके स्वर्ण के समान कीमती बेटे उन्हें बेकार-से लगे होंगे, क्योंकि जिस पाँचवें बेटे पर उन्हें सबसे अधिक गर्व (सुहागा) था, वही अभागा आज जेल में बंधा बैठा है।
और माँ ने कहा होगा,
दुख कितना बहा होगा
आँख में किसलिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,
अर्थ – कवि कल्पना करता है कि माँ ने पिता से कहा होगा कि इतना दुख क्यों बहा रहे हो, आँखों में आँसू क्यों हैं—भवानी (कवि) वहाँ जेल में भी ठीक ही है, इसलिए चिंता मत करो।
वह तुम्हारा मन समझकर,
और अपनापन समझकर,
गया है सो ठीक ही है
यह तुम्हारी लीक ही है,
अर्थ – माँ आगे समझाती है कि बेटा तुम्हारा (पिता का) मन और अपनापन समझकर ही देश के लिए जेल गया है, इसलिए उसका जाना ठीक ही है—आखिर यह तो तुम्हारे ही (देशभक्ति के) मार्ग (लीक) पर चलना है।
पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और बच्चे,
अर्थ – माँ कहती है कि यदि वह (बेटा) कदम पीछे हटाता तो मेरी कोख को शर्मिंदा करता। इसलिए तुम भी इस तरह कमज़ोर (कच्चे) मत बनो, नहीं तो देखकर बाकी बच्चे भी रो पड़ेंगे।
पिताजी ने कहा होगा,
हाय, कितना सहा होगा,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,
अर्थ – कवि सोचता है कि पिताजी ने भी कहा होगा—हाय, बेटे ने कितना कष्ट सहा होगा। इस पर कवि स्वयं उत्तर देता हुआ कहता है कि मैं कहाँ रोता हूँ और कहाँ धैर्य खोता हूँ—अर्थात वह अपने परिवार को यह विश्वास दिलाना चाहता है कि वह जेल में बिल्कुल दुखी या कमज़ोर नहीं है।
गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,
उसे थी बरसात प्यारी,
रात दिन की झड़ी झारी,
अर्थ – आज फिर से पानी बरस रहा है और इसी बरसात में कवि भवानी को अपना बचपन याद आ जाता है। उसे बचपन में बरसात बहुत प्रिय थी—रात-दिन लगातार झड़ी लगी बारिश उसे बहुत भाती थी।
खुले सिर नंगे बदन वह,
घूमता फिरता मगन वह,
बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगाता,
अर्थ – कवि अपने बचपन को याद करता है कि वह खुले सिर और खुले बदन (बिना छाते-कपड़ों की परवाह किए) बरसात में मगन होकर घूमता-फिरता था। वह बड़े बगीचे (बाड़े) में जाकर लौकी के बीज बोया करता था।
तुझे बतलाता कि बेला
ने फलानी फूल झेला,
तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती,
अर्थ – कवि अपने किसी प्रिय (जैसे बहिन) को संबोधित करते हुए कहता है कि वह उसे बताता था कि बेला के पौधे में अमुक जगह फूल खिला है, और वह भी उसके साथ-साथ जाया करती थी। आज इसी स्मृति की याद उसे बहुत सताती है।
मैं न रोऊँगा — कहा होगा,
और फिर पानी बहा होगा,
दृश्य उसके बाद का रे,
पाँचवें की याद का रे,
अर्थ – कवि कल्पना करता है कि उसने कहा होगा कि मैं नहीं रोऊँगा, परंतु फिर भी आँसू बह गए होंगे। इसके बाद का दृश्य पाँचवें बेटे (कवि) की याद में डूबा हुआ दृश्य रहा होगा।
भाई पागल, बहिन पागल,
और अम्मा ठीक बादल,
और भौजी और सरला,
सहज पानी सहज तरला,
अर्थ – कवि सोचता है कि उसके वियोग में भाई और बहिन पागलों जैसे व्याकुल हो गए होंगे, और माँ तो मानो बादल के समान (आँसुओं से) बरस रही होगी। भाभी और सरला (बहिन) की आँखों से भी सहज ही आँसू बह निकले होंगे।
शर्म से रो भी न पाएँ,
खूब भीतर छटपटाएँ,
आज ऐसा कुछ हुआ होगा
आज सबका मन चुआ होगा।
अर्थ – घर के लोग शायद संकोच और मर्यादा के कारण खुलकर रो भी नहीं पाए होंगे, पर भीतर ही भीतर बहुत छटपटाए होंगे। कवि को लगता है कि आज कुछ ऐसा ही हुआ होगा और सबका मन दुख से भर आया (चुआ) होगा।
अभी पानी थम गया है,
मन निहायत नम गया है,
एक-से बादल जमे हैं,
गगन-भर फैले रमे हैं,
अर्थ – अब बारिश थोड़ी देर के लिए थम गई है, परंतु कवि का मन अभी भी बहुत भीगा (नम) हुआ है। आकाश में एक जैसे बादल जमकर पूरे आसमान में फैले हुए दिखाई दे रहे हैं।
ढेर है उनका, न फाँकें,
जो कि किरनें झुकें-झाँकें,
लग रहे हैं वे मुझे यों,
माँ कि आँगन लीप दे ज्यों;
अर्थ – बादलों का ढेर इतना घना है कि सूरज की किरणें झाँक भी नहीं पातीं। कवि को ये बादल ऐसे लगते हैं जैसे माँ आँगन को गोबर-मिट्टी से लीपकर सुंदर बना देती है, वैसे ही बादलों ने आकाश के आँगन को सजा दिया हो।
गगन-आँगन की लुनाई
दिशा के मन में समाई
दश-दिशा चुपचाप है रे,
स्वस्थ की लय छाप है रे
अर्थ – आकाश रूपी आँगन की यह सुंदरता चारों दिशाओं में समा गई है। दसों दिशाएँ चुपचाप और शांत हैं, मानो स्वस्थ, संतुलित जीवन की लय की छाप हर ओर फैली हुई हो।
झाड़ आँखें बंद करके
साँस सुस्थिर मंद करके,
हिले बिन चुपके खड़े हैं,
क्षितिज पर जैसे जड़े हैं
अर्थ – पेड़ अपनी पत्तियों रूपी आँखें मानो बंद करके, साँस को धीमा और स्थिर करके, बिना हिले-डुले चुपचाप खड़े हैं—मानो वे क्षितिज पर स्थिर होकर जड़ जमा चुके हों।
एक पंछी बोलता है,
घाव उर के खोलता है,
आदमी के उर बिचारे,
किसलिए इतनी तृषा रे,
अर्थ – इसी शांति में कहीं एक पंछी बोल उठता है, जिसकी आवाज़ मानो हृदय के घाव को फिर से खोल देती है। कवि सोचता है कि बेचारे मनुष्य के हृदय में आखिर इतनी तीव्र इच्छा (तृषा) और तड़प क्यों है।
तू जरा-सा दुख कितना,
सह सकेगा क्या कि इतना,
और इस पर बस नहीं है,
बस बिना कुछ रस नहीं है,
अर्थ – कवि हवा को संबोधित करते हुए कहता है कि तू भला थोड़ा-सा भी दुख कितना सह पाएगी। और यह भी सच है कि इस पर किसी का वश नहीं है—फिर भी बिना धैर्य (बस) रखे कोई रस या राहत नहीं मिलती।
हवा आई उड़ चला तू,
लहर आई मुड़ चला तू,
लगा झटका टूट बैठा,
गिरा नीचे फूट बैठा,
अर्थ – कवि हवा की चंचल प्रकृति का वर्णन करता है—हवा आते ही तू उड़ चलता है, लहर आते ही मुड़ जाता है। ज़रा-सा झटका लगते ही तू टूट जाता है और नीचे गिरकर फूट जाता है, यानी हवा और मनुष्य दोनों ही बहुत कोमल और चंचल स्वभाव के हैं।
तू कि प्रिय से दूर होकर,
बह चला रे पूर होकर,
दुख भर क्या पास तेरे,
अश्रु सिंचित हास तेरे!
अर्थ – तू (हवा) भी अपने प्रिय (उद्गम स्थान) से दूर होकर बाढ़ (पूर) की तरह बह चला है। तेरे पास भी दुख से भरा हुआ, आँसुओं से सिंचा हुआ हास्य (हँसी) ही तो है, यानी हवा भी कवि के समान विरह और वेदना लिए हुए है।
पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको,
देह एक पहाड़ जैसे,
मन कि बड़ का झाड़ जैसे,
अर्थ – कवि कहता है कि पिताजी का रूप-वेश याद करके उसे कष्ट होता है, क्योंकि पिताजी की देह पहाड़ के समान विशाल और दृढ़ है, परंतु मन बरगद के पेड़ के समान कोमल और विस्तृत (सबको छाया देने वाला) है।
एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धारा फूट जाए,
एक हल्की चोट लग ले,
दूध की नदी उमग ले,
अर्थ – कवि पिता के वात्सल्य का वर्णन करता है—बस एक पत्ता भी टूट जाए (यानी बच्चों में से किसी को थोड़ी भी तकलीफ हो) तो उनके स्नेह की धारा फूट पड़ती है। ज़रा-सी भी चोट लगे तो उनके हृदय से ममता की दूध जैसी नदी उमड़ पड़ती है।
एक टहनी कम न हो ले,
कम कहाँ कि ख़म न हो ले,
ध्यान कितना फिक्र कितनी,
डाल जितनी जड़ें उतनी!
अर्थ – पिता चाहते हैं कि परिवार रूपी वृक्ष की एक भी टहनी कम न हो और कहीं कोई कमी या झुकाव (ख़म) न आए। कवि कहता है कि जितनी उनकी शाखाएँ (संतानें) हैं, उतनी ही गहरी उनकी जड़ें (चिंता और स्नेह) भी हैं।
इस तरह का हाल उनका,
इस तरह का ख्याल उनका,
हवा, उनको धीर देना,
यह नहीं जी चीर देना,
अर्थ – कवि कहता है कि पिताजी का हाल और उनके विचार कुछ इस प्रकार के हैं। इसलिए वह हवा से प्रार्थना करता है कि उन्हें धैर्य देना, उनके हृदय को चीरकर दुखी मत करना अर्थात उन्हें जेल के कष्टों की सच्चाई न बताना।
कह न देना मौन हूँ मैं,
खुद न समझूँ कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,
अर्थ – कवि हवा से आग्रह करता है कि यह मत कहना कि मैं (कवि) चुप और उदास रहता हूँ या खुद को पहचान नहीं पाता। ध्यान रखना कि कुछ उल्टा-सीधा मत बक देना जिससे उन्हें (परिवार को) कोई शक या चिंता हो।
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें,
अर्थ – कवि सुंदर हरे-भरे सावन (मानसून) के बादल को संबोधित करता है—हे मेरे पुण्य और पवित्र सावन, तुम स्वयं बरस लो, पर मेरे परिवार वालों की आँखों से आँसू न बरसें, यानी वे मेरे लिए (पाँचवें बेटे के लिए) दुखी होकर न तरसें।
मैं मजे में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है,
अर्थ – कवि कहता है कि सच में मैं मज़े में हूँ, बस इतना ही है कि मैं घर पर नहीं हूँ। परंतु यह ‘बस’ (केवल इतनी-सी बात) ही बहुत बड़ी बात है, और इसी एक कमी की वजह से सब कुछ नीरस और अप्रिय लगने लगता है।
किंतु उनसे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा हूँ,
उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ,
अर्थ – कवि हवा से कहता है कि परिवार वालों से यह सच मत कहना, बल्कि उन्हें धैर्य बँधाते रहना। उनसे बस इतना कहना कि मैं जेल में भी लिख रहा हूँ और पढ़ रहा हूँ, यानी अपने समय का सदुपयोग कर रहा हूँ।
काम करता हूँ कि कहना,
नाम करता हूँ कि कहना,
चाहते हैं लोग, कहना
मत करो कुछ शोक, कहना,
अर्थ – उनसे कहना कि मैं यहाँ काम भी कर रहा हूँ और नाम भी कमा रहा हूँ (अच्छे कार्यों से प्रतिष्ठा अर्जित कर रहा हूँ)। लोग मुझसे यही चाहते हैं, इसलिए तुम शोक मत करना—यह संदेश उन्हें ज़रूर देना।
और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वजन सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,
अर्थ – उनसे यह भी कहना कि मैं यहाँ बहुत मस्त हूँ और चरखे पर सूत कातने में व्यस्त रहता हूँ। मेरा वज़न भी पूरे सत्तर सेर (स्वस्थ) है और मुझे भरपूर भोजन भी मिलता है, ताकि उन्हें मेरी सेहत की चिंता न हो।
कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुख डटकर ठेलता हूँ,
और कहना मस्त हूँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं,
अर्थ – उनसे कहना कि मैं यहाँ कूदता-खेलता हूँ और अपने दुखों को डटकर, हिम्मत से दूर ठेल देता हूँ। सदा यही कहना कि मैं मस्त हूँ, कभी यह मत कहना कि मैं टूट चुका हूँ या हताश (अस्त) हूँ।
हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ,
आदमी से भागता हूँ,
अर्थ – कवि बार-बार आग्रह करता है कि हाय, ऐसा कभी मत कहना जो सच्चाई है, यानी असली हाल मत बताना। यह भी मत कहना कि मैं रातों को जागता रहता हूँ या लोगों से (मिलना-जुलना छोड़कर) दूर भागता हूँ।
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें।
अर्थ – कविता के अंत में कवि यही पंक्तियाँ फिर से दोहराता है—हे सुंदर हरे सावन, तुम स्वयं बरस लेना, पर मेरे परिवार की आँखों से आँसू न बरसें। यह पुनरावृत्ति कविता के मूल भाव को और गहरा करती है कि कवि अपने कष्टों से अधिक परिवार की चिंता और उनकी सांत्वना को महत्व देता है।
साथ-साथ पढ़ें — तब याद तुम्हारी आती है
-रामनरेश त्रिपाठी
जब बहुत सुबह चिड़ियाँ उठकर, कुछ गीत खुशी के गाती हैं।
कलियाँ दरवाजे खोल-खोल, जब दुनिया पर मुसकाती हैं।।
जब ठंडी-ठंडी हवा कहीं से, मस्ती ढोकर लाती है।
हे जग के सिरजनहार प्रभो! तब याद तुम्हारी आती है।।
अर्थ – कवि कहते हैं कि जब बहुत सुबह-सुबह चिड़ियाँ जागकर खुशी के मधुर गीत गाने लगती हैं, और कलियाँ मानो अपने दरवाज़े खोल-खोलकर संसार पर मुसकुराने लगती हैं, तथा जब कहीं से ठंडी-ठंडी हवा अपने साथ एक अनोखी मस्ती लेकर आती है—तब हे संसार को रचने वाले प्रभु! मुझे तुम्हारी याद आ जाती है।
चुपचाप चमकते तारों की, महफ़िल जब रात सजाती है।
जब चाँद शान से उठता है, दिल की दुनिया जग जाती है।।
कुछ पता नहीं, लेकिन जरूर, वह संदेशा कुछ पाती है।
हे जग के सिरजनहार प्रभो! तब याद तुम्हारी आती है!!
अर्थ – जब रात चुपचाप चमकते हुए तारों की सुंदर महफ़िल सजाती है, और जब चाँद पूरी शान के साथ आकाश में उदय होता है, तो मन की दुनिया मानो जाग उठती है। कवि कहते हैं कि ठीक-ठीक पता तो नहीं, पर निश्चय ही यह प्रकृति उस समय ईश्वर का कोई संदेशा पाती है, तभी इतनी सुंदर लगती है—और हे जगत के रचयिता प्रभु, उसी क्षण मुझे तुम्हारी याद आ जाती है।
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