पाठ – 1
यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय
In this post we have given the detailed notes of class 10 Social Science (History) chapter 1 The Rise of Nationalism in Europe in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (इतिहास) के पाठ 1 यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है।
| Board | CBSE Board, JAC Board, RBSE Board, MPBSE Board, UBSE Board |
| Textbook | NCERT — India and the Contemporary World-II (Reprint 2026-27) |
| Class | Class 10 |
| Subject | Social Science (History) |
| Chapter no. | Chapter 1 |
| Chapter Name | यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय (The Rise of Nationalism in Europe) |
| Category | Class 10 SST Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 1, यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय
राष्ट्रवाद (Nationalism) क्या है?
राष्ट्रवाद (Nationalism): यह वह भावना है जिसके अंतर्गत लोग स्वयं को एक साझा इतिहास, भाषा, संस्कृति और भूभाग के आधार पर एक राष्ट्र (nation) के रूप में पहचानते हैं और उस राष्ट्र के प्रति निष्ठा को अन्य किसी भी वफादारी से ऊपर रखते हैं। 19वीं शताब्दी से पहले यूरोप एक भौगोलिक अभिव्यक्ति मात्र था — जर्मनी, इटली और स्विट्ज़रलैंड जैसे क्षेत्र अनेक स्वतंत्र रियासतों, राजतंत्रों और डची (duchies) में बँटे हुए थे। आधुनिक राष्ट्र-राज्य (nation-state) — जिसमें एक निश्चित भूभाग पर एक सरकार की सर्वोच्च संप्रभु सत्ता (sovereign power) होती है और नागरिकों में साझा पहचान होती है — यूरोप में एक अपेक्षाकृत नई और आधुनिक घटना थी, जिसका उदय फ्रांसीसी क्रांति के बाद हुआ।
राष्ट्र-राज्य की स्थापना से पहले यूरोप पर राजतंत्र (monarchies), साम्राज्य (empires) और चर्च का शासन था। लोगों की निष्ठा अपने राजा, अपने क्षेत्र या अपने धर्म के प्रति होती थी, न कि किसी ‘राष्ट्र’ के प्रति। राष्ट्रवाद ने इस सोच को बदल दिया और लोगों को साझा भाषा, संस्कृति और इतिहास के आधार पर एकजुट होने के लिए प्रेरित किया।
फ्रांसीसी क्रांति (1789) और राष्ट्रवाद का प्रथम प्रकटीकरण
राष्ट्रवाद से जुड़े विचारों का प्रथम स्पष्ट प्रकटीकरण फ्रांसीसी क्रांति के साथ हुआ। 1789 में फ्रांस में जो राजनीतिक और संवैधानिक परिवर्तन हुए, उनसे सत्ता का हस्तांतरण राजतंत्र से नागरिकों के एक समूह की ओर हुआ। क्रांतिकारियों ने घोषणा की कि अब जनता (people) ही राष्ट्र की नियति (destiny) को आकार देगी।
- ला पात्री (la patrie) और ले सितोयें (le citoyen): ‘पितृभूमि’ (fatherland) और ‘नागरिक’ (citizen) जैसे नए शब्दों के प्रयोग से एक साझा सामूहिक पहचान (collective identity) का भाव उत्पन्न हुआ, जो फ्रांसीसी राष्ट्र से जुड़ी थी।
- नई तिरंगा ध्वज (tricolour flag): पुराने शाही ध्वज के स्थान पर एक नई फ्रांसीसी तिरंगा ध्वज को चुना गया।
- एस्टेट जनरल (Estates General): इसे निर्वाचित प्रतिनिधियों की एक सभा, ‘नेशनल असेंबली’ (National Assembly), में बदल दिया गया।
- नई प्रशासनिक इकाइयाँ: क्षेत्रीय राजवंशीय सीमाओं को समाप्त कर 83 विभागों (departéments) की स्थापना की गई, जिनका प्रशासन स्थानीय रूप से चुने गए अधिकारी करते थे।
- आंतरिक सीमा शुल्क (custom duties) समाप्त कर पूरे देश में समान कानून लागू किए गए। पेरिस में तैयार किया गया एक समान कानून-संहिता (uniform code of laws) पूरे देश पर लागू होता था।
- भाषा में एकरूपता लाने के लिए फ्रांसीसी भाषा को, जो पेरिस की बोलचाल की भाषा थी, राष्ट्रीय भाषा के रूप में बढ़ावा दिया गया।
क्रांतिकारियों ने यह भी घोषणा की कि उनका उद्देश्य केवल फ्रांसीसी लोगों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करना नहीं, बल्कि पूरे यूरोप में निरंकुशता (despotism) के विरुद्ध संघर्ष करने वाले लोगों की सहायता करना भी था।
नेपोलियन और राष्ट्रवाद का प्रसार
नेपोलियन बोनापार्ट ने 1799 में फ्रांस में गणतांत्रिक व्यवस्था को समाप्त कर राजतंत्र की स्थापना की, परंतु उसने कई क्रांतिकारी सिद्धांतों को यूरोप के अन्य भागों में फैलाने का कार्य जारी रखा।
नागरिक संहिता, 1804 (Civil Code of 1804): इसे नेपोलियन संहिता (Napoleonic Code) भी कहा जाता है। इसने जन्म आधारित सभी विशेषाधिकारों (privileges based on birth) को समाप्त कर कानून के समक्ष समानता (equality before the law) तथा संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित किया। नेपोलियन ने इस संहिता को उन क्षेत्रों में भी लागू किया जिन पर उसने विजय प्राप्त की थी — जैसे हॉलैंड, स्विट्ज़रलैंड, इटली और जर्मनी के अधिकांश भाग।
- प्रशासनिक विभागों (administrative divisions) को सरल बनाया गया।
- सामंती व्यवस्था (feudal system) को समाप्त कर किसानों को भू-दासत्व (serfdom) तथा गिल्ड प्रतिबंधों (guild restrictions) से मुक्त किया गया।
- नगरों में व्यापारिक संगठनों (business associations) के मार्ग की बाधाओं को दूर किया गया।
- यातायात व संचार व्यवस्था (transport and communication systems) में सुधार किया गया।
यद्यपि प्रारंभ में इन क्षेत्रों की जनता — जैसे व्यापारी और व्यवसायी वर्ग — ने इन सुधारों का स्वागत किया, परंतु शीघ्र ही उत्साह घटने लगा, क्योंकि नई प्रशासनिक व्यवस्थाओं के साथ उच्च कराधान (higher taxation), सेंसरशिप (censorship) और सेना में जबरन भर्ती (forced conscription) भी जुड़ी हुई थी। इससे यूरोप के अनेक भागों में नेपोलियन के विरुद्ध प्रतिक्रिया तथा राष्ट्रवादी भावनाएँ भी उत्पन्न होने लगीं।
उदार (liberal) मध्यम वर्ग का उदय और उदारवाद
1815 के बाद यूरोप में मध्यम वर्ग (middle class) राष्ट्रवादी विचारों का प्रमुख वाहक बनकर उभरा। यह वर्ग शिक्षित, उद्यमशील (enterprising) व्यापारियों, उद्योगपतियों, पेशेवरों (professionals) — जैसे वकीलों, अध्यापकों और सिविल सेवकों — पर आधारित था।
उदारवाद (Liberalism): यह शब्द लैटिन मूल शब्द ‘liber’ से बना है, जिसका अर्थ है ‘स्वतंत्र’। मध्यम वर्ग के लिए उदारवाद का अर्थ था — व्यक्ति की स्वतंत्रता (freedom for the individual) तथा कानून के समक्ष सबके लिए समानता। राजनीतिक दृष्टि से उदारवाद ने सहमति द्वारा शासन (government by consent) पर बल दिया, तथा निरंकुश राजतंत्र, चर्च की विशेषाधिकारी शक्ति, वंश-आधारित सामाजिक श्रेणीबद्धता (hierarchy) की समाप्ति की माँग की।
1815 के बाद उदारवादी संविधान तथा प्रतिनिधि सरकार (representative government) के माध्यम से राष्ट्र-राज्य की स्थापना की माँग यूरोपीय राष्ट्रवादी आंदोलन की एक केंद्रीय विशेषता बन गई। आर्थिक क्षेत्र में उदारवाद बाज़ार को मुक्त करने तथा वस्तुओं व पूँजी की आवाजाही पर प्रतिबंधों को हटाने के पक्ष में था। जर्मनी में जर्मन राज्यों को मिलाकर बनाया गया शुल्क-संघ (customs union), जिसे ‘ज़ॉलफेराइन’ (Zollverein) कहा जाता था, 1834 में स्थापित हुआ, जिसने आंतरिक शुल्क बाधाओं को समाप्त कर मुद्रा व मापों की संख्या को घटाकर दो कर दिया। इससे रेलवे नेटवर्क के विस्तार को भी बढ़ावा मिला, जिससे राष्ट्रीय आर्थिक एकीकरण में तेज़ी आई और राष्ट्रवादी भावना को भी बल मिला।
1848 का क्रांतिकारी वर्ष: राजनीतिक व सामाजिक क्रांतिकारी
1848 में उदारवादी और लोकतांत्रिक क्रांतियाँ पूरे यूरोप में फैल गईं। इनमें दो प्रकार की धाराएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं —
- राजनीतिक रूप से उदारवादी वर्ग: मध्यम वर्ग के व्यावसायिक समूहों ने संवैधानिकता (constitutionalism) पर आधारित राष्ट्र-राज्य की माँग करते हुए विरोध प्रदर्शन आयोजित किए।
- सामाजिक रूप से पीड़ित वर्ग: कारीगर वर्ग (craftsmen) तथा मज़दूर वर्ग (working class) की भूख और बेरोज़गारी से जुड़ी माँगों ने भी इन क्रांतियों को बल दिया, विशेष रूप से 1848 के प्रारंभ में यूरोप में भीषण खाद्य संकट के बाद।
फ्रैंकफर्ट संसद, 1848 (Frankfurt Parliament)
जर्मन क्षेत्रों में मध्यम वर्ग के व्यवसायियों तथा पेशेवरों ने एक ऐसे एकीकृत जर्मन राष्ट्र की स्थापना के लिए आंदोलन आरंभ किया जो संसदीय सिद्धांतों पर आधारित हो। 18 मई 1848 को 831 निर्वाचित प्रतिनिधियों ने फ्रैंकफर्ट के ‘पॉलस चर्च’ (Paulskirche) में एक अस्थायी सरकार के तौर पर ‘फ्रैंकफर्ट संसद’ का गठन किया।
इस संसद ने एक जर्मन राष्ट्र के लिए संविधान का प्रारूप तैयार किया, जिसकी अध्यक्षता एक सम्राट के अधीन संसद करती। संसद ने प्रशिया के राजा फ्रेडरिक विलियम चतुर्थ को इस संवैधानिक राजतंत्र का ताज प्रस्तावित किया, परंतु राजा ने इसे अस्वीकार कर दिया और रूढ़िवादी राजतंत्रों (conservative monarchies) के साथ मिलकर इस संसद का विरोध किया। इस संसद का सामाजिक आधार संकुचित (narrow) था — इसने स्त्रियों तथा मेहनतकश वर्गों की माँगों की उपेक्षा की, जिसके परिणामस्वरूप वे इसके समर्थन से दूर हो गए। अंततः सैनिक शक्ति के दबाव में यह संसद भंग हो गई।
यद्यपि यह प्रयास असफल रहा, फिर भी उदारवादियों के इस आंदोलन ने राष्ट्रवादी भावना को मज़बूत किया और आगे के एकीकरण की नींव रखी।
अभिजात वर्ग (Aristocracy) बनाम नया मध्यम वर्ग
19वीं शताब्दी के आरंभ में यूरोप की सामाजिक और राजनीतिक सत्ता पर अभिजात वर्ग (aristocracy) का प्रभुत्व था। यह वर्ग एक संकीर्ण सामाजिक समूह था, जिसकी शक्ति भूमि की संपत्ति पर आधारित थी। इसमें ग्रामीण संपदा (rural estates) तथा नगरों में आलीशान गृह (townhouses) दोनों सम्मिलित थे। इस वर्ग में फ्रांस तथा जर्मनी की भाषा सामान्यतः फ्रेंच थी, जो अभिजात वर्ग की सामाजिक संस्कृति की प्रतीक मानी जाती थी तथा उच्च वर्ग के आपसी वैवाहिक संबंध भी राष्ट्रीय सीमाओं से परे होते थे।
इसके विपरीत, जनसंख्या का अधिकांश भाग किसानों का था। पश्चिमी भाग में भूमि छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित थी, जबकि मध्य व पूर्वी यूरोप में बड़ी जागीरें (large estates) थीं, जिनकी खेती भू-दासों (serfs) द्वारा की जाती थी।
19वीं शताब्दी में औद्योगीकरण (industrialisation) के साथ पश्चिमी व मध्य यूरोप के कुछ भागों में नए सामाजिक समूह उभरे — औद्योगिक मध्यम वर्ग, जिसमें कारखाना मालिक, व्यवसायी, पेशेवर वर्ग शामिल थे — जिनकी संपत्ति उद्योग व व्यापार पर आधारित थी, न कि भूमि पर। इसी वर्ग ने राष्ट्रवाद तथा उदारवाद के विचारों का समर्थन किया, क्योंकि वे राजनीतिक सत्ता में साझेदारी चाहते थे तथा अभिजात वर्ग के पारंपरिक विशेषाधिकारों को समाप्त करना चाहते थे।
जर्मनी का एकीकरण (Unification of Germany)
1848 की क्रांति के बाद जर्मन राष्ट्रवादियों ने एकीकरण को प्रशिया राज्य के नेतृत्व में साकार होते देखा। प्रशिया के प्रधानमंत्री ऑटो वॉन बिस्मार्क (Otto von Bismarck) इस प्रक्रिया के प्रमुख शिल्पकार थे, जिन्होंने प्रशियाई सेना तथा नौकरशाही (bureaucracy) की सहायता से इस कार्य को संपन्न किया।
बिस्मार्क ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सात वर्षों में तीन युद्ध लड़े —
- प्रशिया-ऑस्ट्रिया युद्ध, 1866: इस युद्ध में प्रशिया की विजय हुई।
- प्रशिया-फ्रांस युद्ध (फ्रैंको-प्रशियाई युद्ध), 1870-71: इस युद्ध में भी प्रशिया विजयी रही, जिससे जर्मन एकीकरण की प्रक्रिया पूर्ण हुई।
जनवरी 1871 में प्रशिया के राजा विलियम प्रथम को वर्साय के महल में आयोजित एक समारोह में जर्मनी के नए साम्राज्य ‘जर्मन रैख’ (German Reich) का कैसर (Kaiser अर्थात सम्राट) घोषित किया गया। इस प्रकार जर्मनी का एकीकरण संपन्न हुआ, जिसमें उदार-संस्थागत ढाँचों की अपेक्षा सैन्य शक्ति (militarism) व नौकरशाही की भूमिका प्रमुख रही।
नए जर्मन राज्य ने अपनी मुद्रा व बैंकिंग व्यवस्था, कानूनी तथा न्यायिक व्यवस्था को आधुनिक बनाने में तीव्र गति दिखाई। प्रशिया का यह मॉडल बाद में जर्मनी की आर्थिक और सैन्य शक्ति की नींव बना।
इटली का एकीकरण (Unification of Italy)
19वीं शताब्दी में इटली भी जर्मनी की भाँति राजनीतिक रूप से खंडित था — यह सात राज्यों में बँटा हुआ था, जिनमें से केवल एक — सार्डिनिया-पीडमॉन्ट (Sardinia-Piedmont) — पर एक इतालवी राजघराने का शासन था। इटली के मध्य भाग पर पोप का शासन था, जबकि उत्तरी भाग ऑस्ट्रियाई हैब्सबर्ग साम्राज्य के अधीन था।
इटली के एकीकरण में तीन प्रमुख नेताओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही —
- ज्यूसेप मैज़िनी (Giuseppe Mazzini): इन्होंने ‘यंग इटली’ (Young Italy) नामक एक गुप्त संगठन की स्थापना की तथा एक एकीकृत गणतांत्रिक इटली की स्थापना का सपना देखा। उनके विचारों ने इतालवी युवाओं को क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की ओर प्रेरित किया, यद्यपि उनके प्रयास बार-बार असफल रहे।
- काउंट कैवूर (Count Camillo Benso di Cavour): सार्डिनिया-पीडमॉन्ट के प्रधानमंत्री, जिन्होंने कूटनीतिक गठबंधन (diplomatic alliances) — विशेषतः फ्रांस के साथ — के माध्यम से ऑस्ट्रिया को परास्त करने की रणनीति अपनाई। न तो वे क्रांतिकारी थे और न ही लोकतंत्रवादी, परंतु उन्होंने इटली को राजनीतिक रूप से एकजुट करने का व्यावहारिक मार्ग अपनाया।
- ज्यूसेप गैरीबॉल्डी (Giuseppe Garibaldi): उन्होंने अपनी सशस्त्र स्वयंसेवी सेना, जिसे ‘रेड शर्ट्स’ (Red Shirts) कहा जाता था, के साथ दक्षिणी इटली तथा दो सिसिलियों के राज्य (Kingdom of the Two Sicilies) पर विजय प्राप्त की और जनता के व्यापक समर्थन से इसे एकीकृत इटली में मिला दिया।
1861 में विक्टर एमैनुएल द्वितीय (Victor Emmanuel II) को एकीकृत इटली के राजा के रूप में घोषित किया गया। इस प्रकार इटली एक संवैधानिक राजतंत्र (constitutional monarchy) के रूप में एकीकृत हुआ, हालाँकि जनसंख्या के बड़े भाग तक राष्ट्रवाद की चेतना अभी नहीं पहुँची थी — इटली की अधिकांश जनता इतालवी भाषा से भी परिचित नहीं थी।
ब्रिटेन: क्रमिक राष्ट्र-निर्माण (Britain’s Evolutionary Nationalism)
ब्रिटेन का उदाहरण जर्मनी व इटली से भिन्न है। यहाँ राष्ट्र-राज्य का निर्माण किसी अचानक क्रांति या युद्ध से नहीं, बल्कि एक लंबी क्रमिक प्रक्रिया (gradual, evolutionary process) के माध्यम से हुआ, जिसमें कोई एकल राष्ट्रवादी आंदोलन उत्तरदायी नहीं था।
1688 से पूर्व इंग्लैंड में कोई ‘ब्रिटिश राष्ट्र’ अस्तित्व में नहीं था। प्रमुख जातीय समूह — अंग्रेज़ (English), वेल्श (Welsh), स्कॉट्स (Scots), तथा आयरिश (Irish) — अपनी अलग-अलग सांस्कृतिक व राजनीतिक परंपराओं का पालन करते थे। जैसे-जैसे इंग्लैंड की शक्ति व संपत्ति बढ़ती गई, इसने अन्य द्वीपों के राष्ट्रों पर अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया।
- 1707 के ‘एक्ट ऑफ यूनियन’ (Act of Union) के माध्यम से इंग्लैंड और स्कॉटलैंड मिलकर ‘यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन’ (United Kingdom of Great Britain) बना। इस प्रक्रिया में इंग्लैंड का सांस्कृतिक व राजनीतिक प्रभुत्व नए राष्ट्र पर हावी रहा — इस दौरान स्कॉटलैंड की अपनी संसद को समाप्त कर दिया गया।
- स्कॉटिश हाइलैंड (Scottish Highlands) की गेलिक संस्कृति (Gaelic culture) तथा परंपराओं को दबाया गया।
- आयरलैंड, जो पहले से विभाजित था, को 1801 में सैन्य शक्ति द्वारा ‘यूनाइटेड किंगडम’ में मिला लिया गया।
इस प्रकार एक नए ‘ब्रिटिश राष्ट्र’ का प्रतीकात्मक निर्माण हुआ — नया ब्रिटिश ध्वज (यूनियन जैक), राष्ट्रगान (God Save Our Noble King), तथा अंग्रेज़ी भाषा — जिन्हें सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया गया, जबकि स्कॉटलैंड, वेल्स और आयरलैंड की स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान को दबा दिया गया।
राष्ट्र की कल्पना: कला में दृश्यीकरण (Visualising the Nation)
18वीं व 19वीं शताब्दी के कलाकारों ने एक राष्ट्र को स्त्री रूपक (female allegory) के माध्यम से चित्रित किया, ताकि इसे मूर्त (concrete) रूप में प्रस्तुत किया जा सके। यह किसी वास्तविक स्त्री का चित्रण नहीं था, बल्कि राष्ट्र के अमूर्त विचार (abstract idea) को व्यक्त करने का प्रतीकात्मक प्रयास था।
- मारिआन (Marianne): यह फ्रांस के राष्ट्र का स्त्री-प्रतीक (allegory) है। इसे फ़्रीजियन टोपी (Phrygian cap — दास मुक्ति का प्रतीक) पहने हुए दर्शाया जाता है। मारिआन की प्रतिमाएँ फ्रांस के सार्वजनिक स्मारकों में स्थापित की गईं तथा उसकी छवि डाक टिकटों व सिक्कों पर भी अंकित की गई, ताकि जनता के मन में गणतंत्र के आदर्शों — स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व — को स्थापित किया जा सके।
- जर्मानिया (Germania): यह जर्मन राष्ट्र का स्त्री-प्रतीक है। जर्मानिया को ओक के पत्तों का मुकुट (crown of oak leaves — वीरता का प्रतीक) पहने हुए दिखाया जाता है, जिसके हाथ में तलवार होती है। उसकी वेशभूषा में उकाब (eagle) का चिह्न भी दर्शाया जाता है, जो पूर्व जर्मन रोमन साम्राज्य का प्रतीक था। जर्मानिया की एक प्रसिद्ध पेंटिंग में उसे 1848 की फ्रैंकफर्ट संसद के लिए तैयार किए गए झंडे के साथ दिखाया गया है, जिसमें काला, लाल व सुनहरा रंग सम्मिलित था — जो बाद में जर्मन राष्ट्रीय ध्वज के रंग बने।
इन स्त्री-प्रतीकों (allegories) के माध्यम से कलाकारों ने अमूर्त विचारों — स्वतंत्रता, न्याय, राष्ट्र — को मूर्त रूप देकर जनसाधारण में राष्ट्रीय भावना को सुदृढ़ करने का प्रयास किया।
बाल्कन संकट और राष्ट्रवाद: संघर्ष का स्रोत
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध व 20वीं शताब्दी के आरंभ में राष्ट्रवाद, जो पहले उदार व लोकतांत्रिक भावनाओं से जुड़ा था, धीरे-धीरे एक संकीर्ण विचारधारा में परिवर्तित हो गया, जिसका उपयोग विभिन्न यूरोपीय राष्ट्र अपने संकीर्ण राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए करने लगे।
इस परिवर्तन का सबसे स्पष्ट उदाहरण बाल्कन क्षेत्र (Balkans) था। इस भौगोलिक क्षेत्र में वर्तमान रोमानिया, बुल्गारिया, अल्बानिया, बोस्निया-हर्ज़ेगोविना, मैसिडोनिया, क्रोएशिया, स्लोवेनिया, सर्बिया व मॉन्टेनेग्रो जैसे देश सम्मिलित थे, जिनकी जनसंख्या में जातीय-धार्मिक विविधता व्यापक रूप से थी।
- इस क्षेत्र का अधिकांश भाग तुर्क साम्राज्य (Ottoman Empire) के अधीन था।
- 19वीं व 20वीं शताब्दी में रोमांटिक राष्ट्रवाद (romantic nationalism) के प्रसार के साथ बाल्कन क्षेत्र में जातीयता के आधार पर आत्म-निर्धारण (self-determination) की माँग तीव्र हुई, तथा तुर्क साम्राज्य के विघटन के साथ यह क्षेत्र अत्यंत अस्थिर हो गया।
- बाल्कन के विभिन्न राष्ट्रों ने अपनी स्वतंत्रता या क्षेत्रीय विस्तार के लिए एक-दूसरे के विरुद्ध संघर्ष किया, जिससे यह क्षेत्र निरंतर तनाव व युद्धों का केंद्र बना रहा।
- इसके साथ ही रूस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी तथा ब्रिटेन जैसी बड़ी यूरोपीय शक्तियाँ भी इस क्षेत्र में अपने-अपने व्यापारिक व सामरिक हितों की पूर्ति के लिए प्रतिस्पर्धा करने लगीं।
इन प्रतिस्पर्धी राष्ट्रवादी तनावों की परस्पर उलझन ने बाल्कन क्षेत्र को अत्यंत विस्फोटक बना दिया, तथा एक श्रृंखलाबद्ध युद्धों के बाद अंततः यह क्षेत्र प्रथम विश्व युद्ध (First World War) के आरंभ का कारण बना। इस प्रकार, जो राष्ट्रवाद कभी लोगों को एकजुट करने व स्वतंत्रता दिलाने वाली शक्ति था, वही आगे चलकर यूरोपीय राष्ट्रों के बीच संघर्ष व युद्ध का प्रमुख स्रोत बन गया।
मुख्य बिंदु (Key Points)
- राष्ट्रवाद वह भावना है जिसके अंतर्गत लोग साझा इतिहास, भाषा व संस्कृति के आधार पर स्वयं को एक राष्ट्र मानते हैं।
- फ्रांसीसी क्रांति (1789) ने पहली बार ‘ला पात्री’ और ‘ले सितोयें’ जैसे विचारों के माध्यम से राष्ट्रवाद को जन्म दिया।
- नेपोलियन की नागरिक संहिता (1804) ने कानून के समक्ष समानता स्थापित की तथा यूरोप में एकसमान कानूनी व्यवस्था फैलाई, परंतु उच्च कराधान व जबरन भर्ती से जनता का असंतोष भी बढ़ाया।
- उदार मध्यम वर्ग ने संविधान, प्रतिनिधि सरकार तथा राष्ट्र-राज्य की माँग की।
- फ्रैंकफर्ट संसद (1848) जर्मन एकीकरण का प्रथम प्रयास था, परंतु यह असफल रहा।
- जर्मनी का एकीकरण बिस्मार्क के नेतृत्व में 1871 में प्रशिया के नेतृत्व में हुआ, जिसमें सैन्य शक्ति की प्रमुख भूमिका रही।
- इटली का एकीकरण मैज़िनी, कैवूर व गैरीबॉल्डी के संयुक्त प्रयासों से 1861 में हुआ।
- ब्रिटेन में राष्ट्र-निर्माण एक क्रमिक, लंबी प्रक्रिया थी, कोई क्रांति नहीं।
- मारिआन (फ्रांस) व जर्मानिया (जर्मनी) राष्ट्र के स्त्री-प्रतीक (allegories) थे, जिनके माध्यम से राष्ट्रीय भावना को दृश्य रूप दिया गया।
- बाल्कन क्षेत्र में उग्र राष्ट्रवाद, जातीय संघर्ष और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ने प्रथम विश्व युद्ध की भूमिका तैयार की।
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