पाठ – 3
भूमंडलीकृत विश्व का बनना
In this post we have given the detailed notes of class 10 Social Science (History) chapter 3 The Making of a Global World in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (इतिहास) के पाठ 3 भूमंडलीकृत विश्व का बनना के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है।
⚠️ CBSE 2026-27 नोट: CBSE बोर्ड परीक्षा में इस पाठ का सिर्फ शुरुआती हिस्सा (1 से 1.3 तक — पूर्व-आधुनिक विश्व, रेशम मार्ग, भोजन की यात्रा, विजय-रोग-व्यापार) पूछा जाएगा। बाकी हिस्सा (उन्नीसवीं सदी, दो विश्व युद्धों के बीच की अर्थव्यवस्था, विश्व व्यवस्था का पुनर्निर्माण) CBSE में प्रोजेक्ट वर्क है, पर कुछ राज्य बोर्डों में यह अब भी पूरा पूछा जाता है, इसलिए नीचे पूरा पाठ दिया गया है।
| Board | CBSE Board, JAC Board, RBSE Board, MPBSE Board, UBSE Board |
| Textbook | NCERT — India and the Contemporary World-II (Reprint 2026-27) |
| Class | Class 10 |
| Subject | Social Science (History) |
| Chapter no. | Chapter 3 |
| Chapter Name | भूमंडलीकृत विश्व का बनना (The Making of a Global World) |
| Category | Class 10 SST Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 3, भूमंडलीकृत विश्व का बनना
भूमंडलीकरण (Globalisation) क्या है?
भूमंडलीकरण (Globalisation): वह प्रक्रिया जिसके माध्यम से विश्व की अर्थव्यवस्थाएँ, संस्कृतियाँ और समाज व्यापार, प्रवास (migration), निवेश और विचारों के आदान-प्रदान से आपस में जुड़ जाते हैं। यह कोई हाल की घटना नहीं है — इसकी जड़ें सदियों पुरानी हैं। इस अध्याय में हम देखेंगे कि आज का भूमंडलीकृत विश्व कैसे बना — प्राचीन व्यापार मार्गों से लेकर आधुनिक विश्व व्यापार संगठन (WTO) तक।
परीक्षा टिप: नीचे दिया गया भाग “1. पूर्व-आधुनिक विश्व” (उप-भाग 1 से 1.3) CBSE बोर्ड परीक्षा के लिए है। इसके बाद का भाग प्रोजेक्ट वर्क है।
✅ 1. पूर्व-आधुनिक विश्व (The Pre-modern World) — CBSE परीक्षा में शामिल
भूमंडलीकरण का अर्थ है एक आर्थिक तंत्र का निर्माण, जो दुनिया के दूर-दराज़ हिस्सों को आपस में जोड़ता है। परंतु दूर स्थानों को जोड़ने वाले व्यापार, प्रवास, लोगों की आवाजाही, पूँजी का आना-जाना — यह सब सदियों पहले से चला आ रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का पश्चिम एशिया से व्यापारिक संबंध पुरातात्विक प्रमाणों से भी सिद्ध होता है।
3,000 वर्ष से भी पहले तटीय व्यापारियों द्वारा कौड़ी (Cowries) का प्रयोग मुद्रा के रूप में होता था और यह मालदीव द्वीप से लेकर चीन तथा पूर्वी अफ्रीका तक फैला हुआ था। बीमारियों (diseases) के फैलने का इतिहास भी उतना ही पुराना है जितना कि दूर देशों के बीच व्यापार का। इससे यह पता चलता है कि प्राचीन काल से ही विश्व के अलग-अलग हिस्से आपस में जुड़े हुए थे, चाहे यह जुड़ाव व्यापार के माध्यम से हो, प्रवास के माध्यम से हो, या रोगाणुओं (pathogens) के फैलने के माध्यम से।
1.1 सिल्क रूट्स (रेशम मार्ग) — प्राचीन व्यापार से जुड़ाव
सिल्क रूट्स (Silk Routes): प्राचीन व्यापार मार्गों का जाल जो एशिया को यूरोप और उत्तरी अफ्रीका से जोड़ता था, जिसका नाम चीन से भेजे जाने वाले रेशम (silk) के व्यापार पर पड़ा। यह मार्ग हज़ारों वर्षों से चीन को पश्चिमी एशिया और यूरोप से तथा उत्तरी अफ्रीका से भी जोड़ता आया है।
पुरातत्वविदों ने कई ऐसे “सिल्क रूट्स” खोजे हैं — जल और थल दोनों से — जिन्होंने एशिया के विशाल क्षेत्रों को आपस में जोड़ा और एशिया को यूरोप व उत्तरी अफ्रीका से जोड़ा। इन मार्गों का नाम चीन से पश्चिम की ओर जाने वाले रेशमी वस्त्रों के व्यापार के कारण पड़ा, हालांकि इन मार्गों से रेशम के अलावा और भी बहुत कुछ ले जाया जाता था।
- चीनी मिट्टी के बर्तन (Chinese pottery) पश्चिम की ओर जाती थी, और वहाँ से कीमती धातुएँ — सोना व चाँदी — पूर्व की ओर जाती थीं।
- पूर्व-आधुनिक वस्त्र व्यापार का सबसे अच्छा उदाहरण है — भारत से रेशमी वस्त्रों के अतिरिक्त सूती वस्त्र (cotton textiles) तथा मसाले (काली मिर्च, चाय, इलायची) दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य एशिया को भी निर्यात किए जाते थे।
- इन्हीं मार्गों के साथ-साथ प्रारंभिक ईसाई धर्म प्रचारक (Christian missionaries) और बाद में मुस्लिम प्रचारक भी पूर्व की ओर यात्रा करते थे।
- बौद्ध भिक्षु भी इन्हीं मार्गों से एशिया के एक हिस्से से दूसरे हिस्से की यात्रा करते थे।
1.2 भोजन ने भी यात्राएँ कीं: स्पघेटी और आलू
व्यापार और प्रवास (migration) की कहानी में भोजन एक दिलचस्प उदाहरण है। कई इतिहासकार सुझाव देते हैं कि नूडल्स (noodles) चीन से पश्चिम की ओर यात्रा करके इटली की स्पघेटी (spaghetti) बने, हालांकि इसके प्रमाण अनिश्चित हैं। यह भी संभव है कि दोनों एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से विकसित हुए हों।
बहुत सी हमारी परिचित खाद्य वस्तुएँ, जैसे — आलू (potato), सोया (soya), मूँगफली (groundnut), मक्का (maize), टमाटर (tomato), मिर्च (chilli) — कोलंबस के अमेरिका पहुँचने से पहले वहाँ मौजूद नहीं थीं। यह यूरोपियों द्वारा अमेरिका की “खोज” के बाद ही यूरोप और एशिया में पहुँचे।
आयरिश अकाल (Irish Famine): यूरोप के गरीबों का भोजन बेहतर हुआ जब वे सस्ते आलू खाने लगे। आयरलैंड इतना गरीब था कि वहाँ के बहुत से लोग सिर्फ आलू पर ही जीवित रहते थे। सन् 1845-49 के बीच जब आलू की फसल एक रोग (potato blight) से नष्ट हो गई, तो हज़ारों लोग भूख से मर गए। इसे “आयरिश अकाल” (Irish Famine) कहा जाता है — इसमें लगभग 10 लाख लोगों की मृत्यु हो गई।
1.3 विजय, रोग और व्यापार (Conquest, Disease and Trade)
सोलहवीं शताब्दी में यूरोपीय नाविकों ने पूरे विश्व के महासागरों का चक्कर लगाने का रास्ता खोज निकाला और अमेरिका महाद्वीप की “खोज” की। अमेरिका के विशाल संसाधनों — भूमि व खनिजों — ने विश्व व्यापार और अर्थव्यवस्था को बदल कर रख दिया।
अमेरिका पर विजय का मुख्य कारण हथियार नहीं, बल्कि रोग (disease) थे। स्पेन के विजेता (conquistadors) जो अमेरिका पहुँचे, वे अपने साथ चेचक (smallpox) जैसे कीटाणु (germs) लेकर आए थे, जिनके प्रति यूरोप में रोग-प्रतिरोधक क्षमता (immunity) विकसित हो चुकी थी। लेकिन अमेरिका के मूल निवासी (native Americans) इन नई बीमारियों से पूर्णतः अपरिचित थे — इसलिए इनका कोई प्रतिरोध (immunity) उनके शरीर में नहीं था।
चेचक “विजेता” के रूप में: स्मॉलपॉक्स विशेष रूप से एक घातक हथियार साबित हुआ। एक बार जब यह किसी क्षेत्र में फैलता, तो वहाँ की पूरी की पूरी बस्तियों का सफाया कर देता और आगे बढ़ते सैनिकों के लिए रास्ता स्वयं ही साफ कर देता। इसीलिए इतिहासकार स्मॉलपॉक्स को अमेरिका की विजय का असली “विजेता” (conqueror) मानते हैं — यूरोपीय हथियारों से भी अधिक प्रभावी।
पेरू में स्पेनिश विजेता अकेले सैन्य बल के दम पर विजय हासिल नहीं कर सके थे — रोग ने उनके लिए यह काम पहले ही कर दिया था। अमेरिका की खोज से पहले लोग सोचते थे कि विश्व के महासागर स्थलीय (land) मार्गों से नहीं जुड़े हैं, परंतु अब यह साबित हो गया कि सभी महासागर आपस में जुड़े हुए हैं और कोई भी एक हिस्सा अलग-थलग नहीं है।
अमेरिका से यूरोप की ओर सोना-चाँदी: पेरू और मेक्सिको की खदानों से निकाला गया बहुमूल्य धातु (सोना और चाँदी) यूरोप की समृद्धि को बढ़ाता था और उसके अटलांटिक व्यापार (Atlantic trade) को वित्तपोषित (finance) करता था। सत्रहवीं शताब्दी तक पुर्तगाली और स्पेनिश खजाना (treasury) अमेरिकी खानों से आने वाले सोने-चाँदी पर निर्भर था।
यूरोप से अफ्रीका की ओर — दास व्यापार (Slave Trade): अमेरिका के विशाल खेतों और खदानों में काम करने के लिए मज़दूरों की भारी कमी थी, क्योंकि मूल निवासी रोगों से पहले ही मारे जा चुके थे। इसलिए यूरोपीय लोग अफ्रीका से लाखों दासों (slaves) को जबरन पकड़कर अमेरिका ले गए, ताकि वहाँ खेतों में काम कराया जा सके। इस प्रकार सोलहवीं शताब्दी तक यूरोप, एशिया, अफ्रीका और अमेरिका के बीच व्यापार, प्रवास और आवाजाही का एक जटिल जाल बन चुका था।
📌 यहाँ तक CBSE बोर्ड परीक्षा का सिलेबस समाप्त होता है (उप-भाग 1 से 1.3)। नीचे दिया गया शेष भाग CBSE में प्रोजेक्ट वर्क के अंतर्गत आता है, परंतु JAC, RBSE, MPBSE व UBSE जैसे कुछ राज्य बोर्डों में पूरा पाठ परीक्षा में पूछा जा सकता है, इसलिए विद्यार्थियों की सुविधा के लिए यह यहाँ पूरा दिया गया है।
🟡 2. उन्नीसवीं सदी (1815-1914) — CBSE में प्रोजेक्ट वर्क
उन्नीसवीं सदी (1815 से 1914 तक) में विश्व व्यापार, प्रवास और पूँजी की आवाजाही में जबरदस्त वृद्धि हुई। इस दौर की तीन मुख्य विशेषताएँ थीं — वस्तुओं का प्रवाह (flow of trade), श्रम का प्रवाह (flow of labour/migration) और पूँजी का प्रवाह (flow of capital)।
अर्थव्यवस्था और प्रौद्योगिकी की भूमिका
उन्नीसवीं सदी में इंग्लैंड में जनसंख्या तेज़ी से बढ़ी, जिसके कारण खाद्यान्न की माँग बढ़ी। कृषि योग्य भूमि सीमित होने के कारण भोजन का आयात ज़रूरी हो गया। ब्रिटेन में “कॉर्न लॉज़” (Corn Laws) लागू थे, जो सस्ते अनाज के आयात को रोकते थे। जब इन कानूनों को निरस्त (abolish) कर दिया गया, तो बाहर से भोजन का आयात ब्रिटेन में पहले से भी सस्ता हो गया।
इससे ब्रिटेन में खाद्यान्न की खपत बढ़ी। इस बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए, दुनिया भर में — पूर्वी यूरोप, रूस, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में — कृषि भूमि साफ की गई और खेती का विस्तार हुआ, ताकि ब्रिटेन को अनाज निर्यात किया जा सके।
प्रौद्योगिकी की भूमिका:
- रेलवे (Railways): दूरस्थ कृषि क्षेत्रों को बंदरगाहों से जोड़ने के लिए नई रेल लाइनें बिछाई गईं।
- स्टीमशिप (Steamships): नई और तेज़ भाप से चलने वाली जलयान सेवाओं ने माल को तेज़ी और सस्ते में समुद्र पार भेजना संभव बनाया।
- टेलीग्राफ (Telegraph): तार-संचार के आविष्कार ने दूर स्थित बाज़ारों के बीच जानकारी का तेज़ी से आदान-प्रदान संभव बनाया।
- रेफ्रिजरेटेड जहाज़ (Refrigerated Ships): इन जहाज़ों के आविष्कार से जल्दी खराब होने वाला माँस (perishable meat) भी दूर देशों तक ताज़ा भेजा जा सकता था, जिससे यूरोप में मांस की कीमतें कम हुईं और गरीबों का आहार बेहतर हुआ।
इन सभी तकनीकी परिवर्तनों ने मिलकर विश्व अर्थव्यवस्था को गहराई से आपस में जोड़ दिया।
उपनिवेशवाद और रिंडरपेस्ट (Rinderpest) — अफ्रीका में पशु-प्लेग
रिंडरपेस्ट (Rinderpest): मवेशियों (cattle) में फैलने वाली एक बेहद घातक और तेज़ी से फैलने वाली प्लेग (बीमारी), जिसने 1890 के दशक में अफ्रीका में तबाही मचाई।
अफ्रीका के पास विशाल भूमि और अपेक्षाकृत कम जनसंख्या थी। अफ्रीकियों के पास आजीविका के कई साधन थे, जैसे पशुपालन और भूमि आधारित संसाधन। यूरोपीय उपनिवेशवादियों को अफ्रीका में मज़दूर (जैसे खानों और बागानों में काम के लिए) प्राप्त करना कठिन था, क्योंकि अफ्रीकियों के पास अपनी आजीविका के अन्य साधन उपलब्ध थे।
1880 के दशक में पूर्वी अफ्रीका के लिए भेजे गए संक्रमित मवेशियों से रिंडरपेस्ट फैला। इसने अफ्रीका के 90% मवेशियों को मार डाला, जिससे अफ्रीकियों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा नष्ट हो गई। इससे यूरोपीय उपनिवेशवादियों को अफ्रीकियों पर नियंत्रण करना आसान हो गया — जो अब मज़दूरी करने के लिए मजबूर हो गए, क्योंकि उनके पशुधन (livestock) समाप्त हो चुके थे। इस प्रकार रिंडरपेस्ट ने उपनिवेशवादियों को अफ्रीका पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में परोक्ष रूप से मदद की।
भारत से गिरमिटिया मज़दूरों का प्रवास (Indentured Labour Migration)
गिरमिटिया मज़दूर (Indentured Labourer): एक बंधुआ मज़दूर, जो एक निश्चित अवधि (जैसे 5 वर्ष) के लिए अनुबंध (contract) पर हस्ताक्षर करके, अपने नियोक्ता (employer) की यात्रा का खर्च चुकाने के बदले उसके लिए काम करने को बाध्य होता था।
उन्नीसवीं सदी में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के हज़ारों गरीब किसान और मज़दूर गिरमिटिया मज़दूर के रूप में मॉरीशस, वेस्ट इंडीज़ (कैरिबियन), फिजी, श्रीलंका और मलाया जैसे दूर देशों में गए, ताकि बागानों (plantations), खानों और सड़क-रेल निर्माण परियोजनाओं में काम कर सकें।
- यह प्रवास तब हुआ जब गुलामी (slavery) को समाप्त कर दिया गया था और बागान मालिकों को नए मज़दूरों की सख्त ज़रूरत थी।
- ग्रामीण भारत में हस्तशिल्प उद्योगों (cottage industries) के पतन, ज़मीन के किराए (rents) में वृद्धि और उपनिवेशी शासकों द्वारा जंगलों को साफ करने से गरीब किसान अपनी ज़मीन खोने लगे — जिसके कारण उन्हें मजबूरी में यह गिरमिटिया मज़दूरी करनी पड़ी।
- भर्ती करने वाले एजेंट (recruiting agents) गरीब मज़दूरों को झूठे वादे और लालच देकर बहका ले जाते थे, जबकि हकीकत में गिरमिटिया मज़दूरों का जीवन बहुत ही कठिन होता था।
- त्रिनिदाद में “होसे” (Hosay) त्यौहार और कैरिबियाई “चटनी संगीत” (Chutney music) जैसी नई सांस्कृतिक परंपराएँ इन्हीं गिरमिटिया मज़दूरों की सांस्कृतिक विरासत से उपजीं।
भारत का व्यापार, औपनिवेशिक जुड़ाव और घर वापसी आय (Home Charges)
उन्नीसवीं सदी में भारत ब्रिटेन को कच्चे माल (जैसे कच्चा कपास) और खाद्यान्न निर्यात करता था, तथा ब्रिटेन में बने तैयार माल (manufactured goods) आयात करता था। भारत का ब्रिटेन के साथ व्यापार अधिशेष (trade surplus) होता था, परंतु इस अधिशेष का प्रयोग ब्रिटेन अपने अन्य देशों के साथ व्यापार घाटे (trade deficit) को संतुलित करने और “होम चार्जेज़” (Home Charges) — यानी प्रशासनिक व्यय, पेंशन और ऋण भुगतान — चुकाने में करता था। इस प्रकार भारत का व्यापार अधिशेष सीधे भारतीयों के लाभ के लिए प्रयोग नहीं होता था, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के वित्तीय ढाँचे को संभालने में खर्च होता था।
🟡 3. दो विश्व युद्धों के बीच की अर्थव्यवस्था (The Inter-war Economy) — CBSE में प्रोजेक्ट वर्क
प्रथम विश्व युद्ध और आर्थिक बदलाव (Wartime Transformations)
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) मुख्यतः यूरोप में लड़ा गया, परंतु इसका प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ा। यह पहला “आधुनिक औद्योगिक युद्ध” था, जिसमें मशीन गन, टैंक, वायुयान, रासायनिक हथियार आदि का बड़े पैमाने पर प्रयोग हुआ। लाखों लोग मारे गए और घायल हुए — अधिकतर पुरुष कामकाजी उम्र के थे।
- युद्ध ने पूरी अर्थव्यवस्थाओं को युद्ध-उत्पादन (war production) की ओर मोड़ दिया।
- पुरुषों की कमी होने के कारण महिलाओं ने बड़ी संख्या में कारखानों में काम करना शुरू किया।
- ब्रिटेन ने अमेरिका से भारी मात्रा में धन उधार लिया, जिससे युद्ध के बाद अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय ऋणदाता (creditor) बन गया, जबकि इससे पहले वह स्वयं एक ऋणी देश (debtor) था।
अमेरिका का उदय और मास प्रोडक्शन (Fordism)
युद्ध के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ी। हेनरी फोर्ड (Henry Ford), एक अमेरिकी कार निर्माता, ने असेंबली लाइन (assembly line) तकनीक अपनाई, जिससे कारों का उत्पादन बहुत तेज़ और सस्ता हो गया।
फोर्डवाद (Fordism): बड़े पैमाने पर मानकीकृत (standardised) उत्पादों का उत्पादन, जिसमें असेंबली-लाइन तकनीक का प्रयोग करके उत्पादन की लागत को कम किया जाता है और श्रमिकों को अपेक्षाकृत ऊँचा वेतन दिया जाता है ताकि वे भी उन्हीं वस्तुओं को खरीद सकें जिन्हें वे बनाते हैं।
इससे उत्पादन में भारी वृद्धि हुई और सामान सस्ते दामों पर उपलब्ध हुए। घरों में रेडियो, वाशिंग मशीन, फ्रिज जैसी वस्तुएँ आम होने लगीं। परंतु 1920 के दशक के अंत तक बाज़ार वस्तुओं से भर गए और माँग कम पड़ने लगी।
कृषि अतिउत्पादन और महामंदी (Great Depression, 1929)
महामंदी (Great Depression): 1929 में शुरू हुआ वैश्विक आर्थिक संकट, जो 1930 के दशक के मध्य तक चला और जिसमें उत्पादन, रोज़गार, आय और व्यापार में भारी गिरावट देखी गई।
1920 के दशक में कृषि उत्पादन में जनसंख्या वृद्धि से भी अधिक तेज़ी से वृद्धि हुई। इससे कृषि वस्तुओं की कीमतें गिरने लगीं और किसानों की आय घट गई। किसानों ने अपनी आय बनाए रखने के लिए और अधिक उत्पादन किया, जिससे कीमतें और गिरीं, जिससे बाज़ार में कृषि वस्तुओं का “अतिउत्पादन” (overproduction) हो गया।
महामंदी के प्रमुख कारण:
- कृषि अतिउत्पादन के कारण कीमतें गिरना और किसानों की आय में भारी कमी।
- अमेरिका के ऋणों पर निर्भर कई देशों की अर्थव्यवस्था — जब 1928-29 में अमेरिकी किसानों और व्यवसायों को कठिनाई हुई, तो अमेरिकी निवेशकों ने विदेशी ऋण वापस बुला लिए।
- जिन देशों की अर्थव्यवस्था अमेरिकी ऋण पर निर्भर थी (जैसे यूरोप और लैटिन अमेरिका), वहाँ भी संकट फैल गया — बैंक बंद हुए, कारखाने बंद हुए, बेरोज़गारी बढ़ी।
- अमेरिका में 1929 में शेयर बाज़ार (stock market) धराशायी हो गया, जिससे दहशत फैल गई और निवेशकों ने अपने शेयर बेचने शुरू कर दिए।
प्रभाव: अमेरिका में बेरोज़गारी चरम पर पहुँच गई, बैंक दिवालिया हुए, कृषि क्षेत्र तबाह हुआ, और यह संकट विश्व के अधिकांश देशों में फैल गया।
भारत और महामंदी
महामंदी का सबसे गंभीर असर भारत में कृषि क्षेत्र पर पड़ा। भारत उस समय ब्रिटेन को कृषि उत्पाद निर्यात करता था। जैसे-जैसे वैश्विक कीमतें गिरीं, भारतीय कृषि वस्तुओं की कीमतें भी लगभग 50% तक गिर गईं। किसानों की आय बहुत कम हो गई, लेकिन औपनिवेशिक सरकार ने राजस्व (land revenue) की माँग कम नहीं की। इसके कारण किसान कर्ज़ में डूबते चले गए और गाँवों में गरीबी बढ़ी। हालाँकि इसी दौर में शहरी भारत को कुछ हद तक फायदा भी हुआ, क्योंकि सस्ते आयात से बचने के लिए सरकार ने संरक्षणवादी शुल्क (tariff protection) लगाए, जिससे भारतीय उद्योगों (जैसे कपड़ा उद्योग) को बढ़ावा मिला।
🟡 4. विश्व व्यवस्था का पुनर्निर्माण (Rebuilding a World Economy) — CBSE में प्रोजेक्ट वर्क
द्वितीय विश्व युद्ध और नई विश्व व्यवस्था की आवश्यकता
द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) ने विश्व की अर्थव्यवस्था और समाज को गहरा आघात पहुँचाया। युद्ध के बाद यह महसूस किया गया कि आर्थिक स्थिरता बनाए रखने और आर्थिक संकटों (जैसे महामंदी) की पुनरावृत्ति से बचने के लिए, दो मुख्य कार्य आवश्यक हैं — स्थिर विनिमय दरें (stable exchange rates) बनाए रखना और पूर्ण रोज़गार (full employment) सुनिश्चित करना।
ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (Bretton Woods Conference, 1944)
ब्रेटन वुड्स समझौता (Bretton Woods Agreement): जुलाई 1944 में अमेरिका के ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर 44 देशों के प्रतिनिधियों की एक बैठक हुई, जिसमें युद्ध के बाद की विश्व अर्थव्यवस्था को प्रबंधित करने के लिए एक ढाँचा तैयार किया गया।
इस सम्मेलन में दो महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की स्थापना हुई:
- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund — IMF): सदस्य देशों के अल्पकालिक भुगतान असंतुलन (balance of payments) की समस्याओं से निपटने के लिए स्थापित।
- विश्व बैंक (World Bank): मूल रूप से “अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक” (International Bank for Reconstruction and Development) के नाम से स्थापित, जो युद्ध से तबाह देशों के पुनर्निर्माण के लिए दीर्घकालिक (long-term) कर्ज़ प्रदान करता था।
इस व्यवस्था में डॉलर को सोने (gold) से जोड़ा गया (डॉलर-गोल्ड मानक) और अन्य देशों की मुद्राएँ डॉलर से जुड़ी हुई थीं — इसे “ब्रेटन वुड्स व्यवस्था” (Bretton Woods System) कहा जाता है।
“स्वर्णिम युग” (Golden Age) और विकासशील देशों का उदय
1950 से 1970 के दशक के बीच का समय पश्चिमी औद्योगिक देशों तथा जापान के लिए तेज़ी से आर्थिक विकास का दौर था, जिसे “स्वर्णिम युग” (Golden Age) कहा जाता है — इस दौरान बेरोज़गारी बहुत कम रही और सामान्य नागरिकों का जीवन स्तर तेज़ी से सुधरा।
इसी दौर में एशिया व अफ्रीका के कई देश यूरोपीय उपनिवेशवाद से आज़ाद हुए (डी-कॉलोनाइज़ेशन — decolonisation)। लेकिन आज़ादी के बाद भी इन नए स्वतंत्र देशों (developing countries) की अर्थव्यवस्थाएँ और समाज गरीबी और संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे। IMF और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं का ध्यान मुख्यतः औद्योगिक देशों पर केंद्रित था, इसलिए विकासशील देशों ने अपने आर्थिक विकास और उचित हिस्सेदारी के लिए संगठित होना शुरू किया — जैसे 77 का समूह (Group of 77 — G-77), जिसने एक नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic Order — NIEO) की माँग रखी।
गैट और विश्व व्यापार संगठन (GATT and WTO)
गैट (GATT — General Agreement on Tariffs and Trade): 1947 में स्थापित एक अंतरराष्ट्रीय समझौता, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर लगने वाले शुल्कों (tariffs) को कम करना और विश्व व्यापार को उदार (liberalise) बनाना था।
विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation — WTO): 1995 में गैट को बदलकर स्थापित एक अंतरराष्ट्रीय संगठन, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियमों को निर्धारित करता है और सदस्य देशों के बीच व्यापार से जुड़े विवादों को सुलझाता है। इसका उद्देश्य विश्व व्यापार को स्वतंत्र बनाना (free trade) है।
1970 के दशक के बाद पश्चिमी औद्योगिक देशों में बेरोज़गारी बढ़ी और वे विकासशील देशों में अपनी उत्पादन इकाइयाँ (production units) स्थापित करने लगे, क्योंकि वहाँ मज़दूरी सस्ती थी — इसे “मल्टीनेशनल कॉरपोरेशन” (Multinational Corporations — MNCs) का उदय कहा जाता है। इसी के साथ, चीन जैसे देशों ने विश्व अर्थव्यवस्था में फिर से प्रवेश किया और सस्ते विनिर्माण (manufacturing) का वैश्विक केंद्र बन गए।
📝 मुख्य बिंदु (Key Points to Remember)
- भूमंडलीकरण एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया है — यह सिल्क रूट्स जैसे प्राचीन व्यापार मार्गों से शुरू हुई।
- भोजन (आलू, स्पघेटी) ने भी दुनिया भर में यात्रा की और समाजों को बदल दिया; आयरिश अकाल (1845-49) आलू पर निर्भरता का दुखद परिणाम था।
- अमेरिका की “विजय” में मुख्य भूमिका स्मॉलपॉक्स जैसी बीमारियों ने निभाई, हथियारों ने नहीं।
- उन्नीसवीं सदी (1815-1914) में रेलवे, स्टीमशिप, टेलीग्राफ और रेफ्रिजरेटेड जहाज़ों ने विश्व व्यापार को क्रांतिकारी रूप से बदला।
- अफ्रीका में रिंडरपेस्ट (पशु-प्लेग) ने उपनिवेशवादियों को अफ्रीकियों पर नियंत्रण करने में मदद की।
- भारत से लाखों गरीब मज़दूर गिरमिटिया मज़दूर बनकर मॉरीशस, कैरिबियन और फिजी जैसे देशों में गए।
- हेनरी फोर्ड की असेंबली लाइन (फोर्डवाद) ने मास प्रोडक्शन को जन्म दिया, पर अतिउत्पादन ने 1929 की महामंदी को जन्म दिया।
- भारत में महामंदी के दौरान कृषि कीमतें लगभग 50% गिरीं, जिससे किसान कर्ज़ में डूब गए।
- 1944 के ब्रेटन वुड्स सम्मेलन ने IMF और विश्व बैंक की स्थापना की, ताकि युद्धोपरांत आर्थिक स्थिरता बनी रहे।
- 1995 में गैट की जगह विश्व व्यापार संगठन (WTO) ने ली, जो आज भी वैश्विक व्यापार के नियम तय करता है।
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