पाठ – 2
वन एवं वन्य जीव संसाधन
In this post we have given the detailed notes of class 10 Social Science (Geography) chapter 2 Forest and Wildlife Resources in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (भूगोल) के पाठ 2 वन एवं वन्य जीव संसाधन के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है।
| Board | CBSE Board, JAC Board, RBSE Board, MPBSE Board, UBSE Board |
| Textbook | NCERT — Contemporary India-II (Reprint 2026-27) |
| Class | Class 10 |
| Subject | Social Science (Geography) |
| Chapter no. | Chapter 2 |
| Chapter Name | वन एवं वन्य जीव संसाधन (Forest and Wildlife Resources) |
| Category | Class 10 SST Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 2, वन एवं वन्य जीव संसाधन
भारत की जैव विविधता (Biodiversity)
भारत विश्व के उन गिने-चुने देशों में से एक है जिन्हें मेगा बायोडायवर्सिटी (Mega Biodiversity) राष्ट्र कहा जाता है। विश्व में जैव विविधता से समृद्ध 12 मेगा बायोडायवर्सिटी देश हैं, और भारत उनमें से एक है। विश्व स्तर पर पहचाने गए 34 जैव विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspots) में से 4 भारत में स्थित हैं — हिमालय, पश्चिमी घाट, इंडो-बर्मा क्षेत्र (पूर्वोत्तर भारत) और सुंदालैंड (निकोबार द्वीप समूह)।
जैव विविधता (Biodiversity): किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले पेड़-पौधों (वनस्पति/Flora) और जीव-जंतुओं (जीव-जगत/Fauna) की विविधता को जैव विविधता कहते हैं।
भारत में विश्व के दर्ज किए गए कुल पादप स्वरूपों का लगभग 8 प्रतिशत भाग पाया जाता है, जो लगभग 47,000 पादप प्रजातियों के रूप में विद्यमान है। भारत में फूल वाले पौधों (Flowering Plants) की लगभग 15,000 प्रजातियाँ हैं, जो विश्व में फूल वाले पौधों की कुल प्रजातियों का 6 प्रतिशत है। जन्तु जगत की बात करें तो भारत में लगभग 89,000 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसके अतिरिक्त कीटों (Insects) की लगभग 68,389 प्रजातियाँ यहाँ मौजूद हैं। हमारे देश में जाने-पहचाने उभयचरों (Amphibians), सरीसृपों (Reptiles) एवं स्तनधारियों (Mammals) की क्रमशः 5.4, 5.1 तथा 8.6 प्रतिशत प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
बहुत-सी प्रजातियाँ ऐसी हैं जिनकी अभी तक खोज और वर्गीकरण ही नहीं हो पाया है। वैज्ञानिकों के अनुसार अभी लगभग 20,000 पादप प्रजातियों और अनेक जन्तु प्रजातियों की खोज होनी शेष है।
लुप्त होती वनस्पति एवं जीव-जंतु (Vanishing Flora and Fauna)
प्राकृतिक वास (Habitat) के विनाश, पूर्ण विनाश (Total Destruction) एवं अत्यधिक दोहन (Over-exploitation) के कारण भारत में कई पौधों और जीवों की प्रजातियाँ संकट में हैं। वैज्ञानिक अनुमान के अनुसार पिछले 200 वर्षों में लगभग 1,300 पौधों की प्रजातियाँ विलुप्त हो चुकी हैं। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (Botanical Survey of India) एवं भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (Zoological Survey of India) के अनुसार भारत में पादप प्रजातियों में से लगभग 10 प्रतिशत संकटग्रस्त (Threatened) हैं, और कई तो लुप्तप्राय (Endangered) होने की कगार पर हैं।
वनों के अत्यधिक दोहन के कारण कम-से-कम 1,500 पादप प्रजातियाँ ऐसी हैं जो संकट में मानी जाती हैं। इसी प्रकार कई पशु प्रजातियाँ भी लगातार घट रही हैं — जैसे एशियाई हाथी, एक-सींग वाला गैंडा, तथा भारतीय बाघ।
प्रजातियों का वर्गीकरण (Categorisation of Species)
अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (International Union for Conservation of Nature and Natural Resources — IUCN) पौधों और जानवरों की प्रजातियों को विभिन्न वर्गों में वर्गीकृत करता है:
1. सामान्य प्रजातियाँ (Normal Species)
वे प्रजातियाँ जिनकी जनसंख्या इतनी है कि उनके जीवन-यापन के लिए पर्याप्त है, जैसे — पशु (Cattle), साल (Sal), चीड़ (Pine)।
2. संकटग्रस्त/लुप्तप्राय प्रजातियाँ (Endangered Species)
वे प्रजातियाँ जो विलुप्त होने के कगार पर हैं, जिनकी संख्या इतनी कम हो गई है कि यदि उनके जीवन को प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाने के प्रयास न हुए तो वे शीघ्र ही समाप्त हो सकती हैं, जैसे — काला हिरण (Black Buck), मगरमच्छ (Crocodile), भारतीय जंगली गधा (Indian Wild Ass), भारतीय गैंडा (Indian Rhino), लॉयन टेल्ड मकाक (Lion-tailed Macaque), संगाई हिरण (Sangai Deer)।
3. सुभेद्य प्रजातियाँ (Vulnerable Species)
वे प्रजातियाँ जिनकी जनसंख्या इतनी घट गई है कि यदि उन्हें संरक्षण के प्रयासों से बचाया न गया, तो वे संकटग्रस्त श्रेणी में जा सकती हैं, जैसे — नीली भेड़ (Blue Sheep), एशियाई हाथी (Asiatic Elephant), गंगा डॉल्फिन (Gangetic Dolphin)।
4. दुर्लभ प्रजातियाँ (Rare Species)
ऐसी प्रजातियाँ जिनकी जनसंख्या बहुत कम है, ये संकटग्रस्त या सुभेद्य श्रेणी में जा सकती हैं यदि इन पर घटित होने वाले नकारात्मक कारक जारी रहें, जैसे — हिमालयी भूरा भालू (Himalayan Brown Bear), जंगली एशियाई भैंस (Wild Asiatic Buffalo), रेगिस्तानी लोमड़ी (Desert Fox), हॉर्नबिल (Hornbill)।
5. स्थानिक प्रजातियाँ (Endemic Species)
ऐसी प्रजातियाँ जो केवल किसी विशेष क्षेत्र में ही पाई जाती हैं, ये सामान्यतः प्राकृतिक या भौगोलिक सीमाओं जैसे पर्वतों, द्वीपों, नदियों आदि तक सीमित होती हैं, जैसे — अंडमान टील (Andaman Teal), निकोबार कबूतर (Nicobar Pigeon), अंडमान वुड पिजन (Andaman Wild Pigeon), मिथुन (Mithun — अरुणाचल प्रदेश)।
6. विलुप्त प्रजातियाँ (Extinct Species)
वे प्रजातियाँ जो अपने प्राकृतिक वास से पूर्णतः लुप्त हो चुकी हैं और अब पृथ्वी पर कहीं नहीं पाई जातीं, जैसे — एशियाई चीता (Asiatic Cheetah), गुलाबी सिर वाली बत्तख (Pink Head Duck)।
ध्यान दें: कोई प्रजाति स्थानीय (Local), प्रादेशिक (Regional), राष्ट्रीय (National), महाद्वीपीय (Continental) या विश्व-स्तर (Global) — किसी भी स्तर पर विलुप्त हो सकती है।
जैव विविधता की क्षति के कारण (Causes of Biodiversity Loss)
1. वास स्थान का विनाश (Habitat Destruction)
कृषि विस्तार, विकास परियोजनाओं, बड़े बांधों के निर्माण, खनन तथा शहरीकरण जैसी गतिविधियों के कारण वनों एवं प्राकृतिक आवासों का बड़े पैमाने पर विनाश हो रहा है, जिससे जीवों को अपना प्राकृतिक वास छोड़ना पड़ता है।
2. शिकार (Hunting)
कीमती खाल, हड्डियों, मांस तथा अन्य उत्पादों के लोभ में मनुष्यों द्वारा जानवरों का अवैध शिकार जैव विविधता की हानि का प्रमुख कारण है।
3. अत्यधिक दोहन (Over-exploitation)
वन एवं वन्य संसाधनों का व्यावसायिक लाभ हेतु आवश्यकता से अधिक उपयोग जैव विविधता को क्षति पहुँचाता है — जैसे अत्यधिक मछली पकड़ना (Overfishing), लकड़ी की अत्यधिक कटाई।
4. पर्यावरण प्रदूषण (Environmental Pollution)
वायु, जल और मृदा प्रदूषण से पेड़-पौधों तथा जीव-जंतुओं का प्राकृतिक जीवन प्रभावित होता है, जिससे कई प्रजातियाँ संकट में पड़ जाती हैं।
5. विषाक्तीकरण (Poisoning)
कृषि में उपयोग किए जाने वाले कीटनाशकों तथा रासायनिक खादों से भूमि और जल स्रोत विषाक्त हो जाते हैं, जिनका दुष्प्रभाव वन्य जीवों पर पड़ता है।
6. वनों की आग (Forest Fires)
प्राकृतिक या मानव-जनित वनाग्नि से बड़े क्षेत्रफल के वन एवं उसमें रहने वाले जीव-जंतु नष्ट हो जाते हैं।
वन एवं वन्य जीवन के संरक्षण का महत्व (Importance of Conservation)
वन एवं वन्य जीवन के संरक्षण से जैविक विविधता एवं हमारी जीवन-प्रणालियों को बनाए रखने में सहायता मिलती है। इसके तीन प्रमुख कारण हैं:
1. आनुवंशिक कारण (Genetic Reasons)
वन्य जीव एवं वनस्पति में पाई जाने वाली विविधता आनुवंशिक (Genetic) महत्व की है, जो भविष्य में नई प्रजातियों के विकास तथा चिकित्सा एवं कृषि अनुसंधान में उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
2. पारिस्थितिक कारण (Ecological Reasons)
प्रकृति में सभी जीव-जंतु एवं वनस्पति एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं तथा पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) बनाए रखने में सहायक होते हैं। किसी एक प्रजाति के लुप्त होने से पूरी खाद्य श्रृंखला (Food Chain) प्रभावित हो सकती है।
3. आर्थिक कारण (Economic Reasons)
वन एवं वन्य जीव संसाधन आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं — इनसे इमारती लकड़ी, ईंधन, चारा, औषधीय पौधे, रबड़, गोंद आदि प्राप्त होते हैं, जो लाखों लोगों की आजीविका का साधन हैं।
वनों के प्रकार एवं प्रबंधन (Forest Types and Management)
भारत सरकार के अभिलेखों के अनुसार वनों को उनके स्वामित्व एवं प्रबंधन के आधार पर तीन वर्गों में बाँटा गया है:
1. आरक्षित वन (Reserved Forests)
देश के आधे से अधिक वन क्षेत्र को आरक्षित वन घोषित किया गया है। ये सबसे मूल्यवान वन माने जाते हैं जो लकड़ी एवं अन्य वन उत्पादों के संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। मध्य प्रदेश (अब छत्तीसगढ़ सहित) में सबसे अधिक क्षेत्रफल आरक्षित वनों के अंतर्गत है।
2. संरक्षित वन (Protected Forests)
वन विभाग द्वारा संरक्षित इन वनों का लगभग एक-तिहाई भाग वन क्षेत्र इसी वर्ग में आता है। इन वनों को आगे और अधिक कटाई से बचाया जाता है। जम्मू-कश्मीर में सर्वाधिक क्षेत्रफल संरक्षित वनों के अंतर्गत है।
3. अवर्गीकृत वन (Unclassed Forests)
ऐसे वन एवं बंजर भूमि, जिनका स्वामित्व सरकार, व्यक्तियों तथा समुदायों के पास है, अवर्गीकृत वन कहलाते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों तथा गुजरात के कुछ भागों में अधिकांश वन इसी श्रेणी में आते हैं।
आरक्षित एवं संरक्षित वनों को स्थायी वन (Permanent Forest Estates) कहा जाता है, जिन्हें लकड़ी एवं अन्य वन उत्पादों के उत्पादन तथा पारिस्थितिक कारणों से संरक्षित रखा जाता है। मध्य प्रदेश में देश के अन्य किसी भी राज्य की तुलना में सबसे अधिक स्थायी वन क्षेत्र है, जो राज्य के कुल वन क्षेत्र का 75 प्रतिशत है।
समुदाय एवं वन संरक्षण (Community and Conservation)
भारत में वन एवं वन्य जीव संरक्षण की एक लंबी परंपरा रही है, जिसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी महत्वपूर्ण रही है।
सरिस्का बाघ अभयारण्य एवं गूजर समुदाय
राजस्थान के सरिस्का बाघ अभयारण्य (Sariska Tiger Reserve) में रहने वाले गूजर समुदाय के लोगों ने खनन कार्यों के विरुद्ध संघर्ष किया, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने बंद करने का आदेश दिया था। यह उदाहरण दर्शाता है कि स्थानीय समुदाय भी वन एवं वन्य जीवन के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।
चिपको आंदोलन (Chipko Movement)
यह आंदोलन हिमालय क्षेत्र में वनों की कटाई रोकने के लिए एक सफल जन-आंदोलन के रूप में उभरा। इस आंदोलन में ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर उनकी कटाई का विरोध किया। इसने वनों की व्यावसायिक कटाई पर पुनर्विचार करने के लिए सरकार को बाध्य किया और कई क्षेत्रों में सामुदायिक वानिकी (Community Forestry) को प्रोत्साहन मिला।
बिश्नोई समुदाय एवं अमृता देवी का बलिदान
राजस्थान का बिश्नोई समुदाय वृक्षों एवं वन्य जीवों के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है। 1731 में जोधपुर के निकट अमृता देवी बिश्नोई ने 363 अन्य लोगों के साथ पेड़ों की रक्षा करते हुए अपना बलिदान दिया था। तभी से भारत सरकार ने वन्य जीव संरक्षण में उत्कृष्ट सेवा हेतु ‘अमृता देवी बिश्नोई वन्य जीव संरक्षण पुरस्कार’ आरंभ किया है, जो व्यक्तियों या समुदायों को दिया जाता है।
बीज बचाओ आंदोलन (Beej Bachao Andolan)
टिहरी (उत्तराखंड) में किसानों ने बीज बचाओ आंदोलन चलाया, जिसमें कीटनाशकों और रासायनिक खादों के प्रयोग के बिना कई प्रकार की देशी फसलों की विविधता को बचाने का सफल प्रयास किया गया।
संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management — JFM)
1988 की राष्ट्रीय वन नीति (National Forest Policy) के अंतर्गत संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) की अवधारणा सामने आई, जिसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी से क्षतिग्रस्त वनों का पुनर्जनन (Regeneration) किया जाता है। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण पश्चिम बंगाल का अरबारी (Arabari) क्षेत्र है, जहाँ 1972 में वन विभाग के सहयोग से स्थानीय समुदायों ने बुरी तरह क्षतिग्रस्त साल वन (Sal Forest) को पुनर्जीवित किया। इस योजना के तहत स्थानीय लोगों को वन उत्पादों तक पहुँच तथा लकड़ी की बिक्री से प्राप्त आय का 25 प्रतिशत हिस्सा दिया जाता है।
प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger)
भारत में बाघों की संख्या 20वीं सदी की शुरुआत में लगभग 55,000 थी, जो 1972 की जनगणना के अनुसार घटकर मात्र 1,827 रह गई। बाघों की संख्या में इस भारी गिरावट के मुख्य कारण थे:
- व्यावसायिक शिकार (Poaching) — विशेषकर खाल के लिए
- चीन तथा अन्य देशों में पारंपरिक चिकित्सा हेतु बाघ के अंगों की तस्करी
- प्राकृतिक वास का सिकुड़ना एवं विनाश
- शिकार-आधार (Prey Base) की कमी
इन खतरों को देखते हुए भारत सरकार ने 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger) नामक एक महत्वाकांक्षी योजना आरंभ की, जिसका उद्देश्य बाघों की घटती संख्या को रोकना तथा उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। इस परियोजना के अंतर्गत देशभर में विशेष बाघ अभयारण्य (Tiger Reserves) स्थापित किए गए, जैसे — कॉर्बेट (उत्तराखंड), सुंदरबन (पश्चिम बंगाल), बांदीपुर (कर्नाटक), सरिस्का (राजस्थान), मानस (असम), पेरियार (केरल) आदि। इन अभयारण्यों में कोर क्षेत्र (Core Area) को पूर्णतः संरक्षित रखा जाता है, जबकि बफर क्षेत्र (Buffer Area) में सीमित मानवीय गतिविधियों की अनुमति होती है। प्रोजेक्ट टाइगर के परिणामस्वरूप बाघों की संख्या में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, हालांकि अवैध शिकार आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
मुख्य बिंदु (Key Points to Remember)
- भारत विश्व के 12 मेगा बायोडायवर्सिटी देशों में से एक है तथा 4 वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट भारत में स्थित हैं।
- भारत में लगभग 47,000 पादप प्रजातियाँ तथा 89,000 जन्तु प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- IUCN के अनुसार प्रजातियों को सामान्य, संकटग्रस्त, सुभेद्य, दुर्लभ, स्थानिक तथा विलुप्त — छह श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है।
- जैव विविधता की हानि के मुख्य कारण हैं — वास स्थान का विनाश, शिकार, अत्यधिक दोहन, प्रदूषण, विषाक्तीकरण एवं वनाग्नि।
- वनों के संरक्षण के तीन प्रमुख कारण हैं — आनुवंशिक, पारिस्थितिक एवं आर्थिक।
- वनों को स्वामित्व के आधार पर आरक्षित, संरक्षित एवं अवर्गीकृत वनों में बाँटा गया है।
- चिपको आंदोलन, बिश्नोई समुदाय, बीज बचाओ आंदोलन तथा संयुक्त वन प्रबंधन (जैसे अरबारी, पश्चिम बंगाल) समुदाय आधारित संरक्षण के प्रमुख उदाहरण हैं।
- प्रोजेक्ट टाइगर 1973 में आरंभ किया गया था, ताकि बाघों की घटती संख्या को रोका जा सके।
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