पाठ – 4
औद्योगीकरण का युग
In this post we have given the detailed notes of class 10 Social Science (History) chapter 4 The Age of Industrialisation in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (इतिहास) के पाठ 4 औद्योगीकरण का युग के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है।
⚠️ CBSE 2026-27 नोट: यह पूरा पाठ CBSE बोर्ड परीक्षा में नहीं आएगा — यह केवल आंतरिक/पीरियोडिक मूल्यांकन (Periodic/Internal Assessment) में है। अन्य राज्य बोर्डों में यह अब भी पूरी तरह पूछा जाता है, इसलिए नीचे पूरे नोट्स दिए गए हैं।
| Board | CBSE Board, JAC Board, RBSE Board, MPBSE Board, UBSE Board |
| Textbook | NCERT — India and the Contemporary World-II (Reprint 2026-27) |
| Class | Class 10 |
| Subject | Social Science (History) |
| Chapter no. | Chapter 4 |
| Chapter Name | औद्योगीकरण का युग (The Age of Industrialisation) |
| Category | Class 10 SST Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 4, औद्योगीकरण का युग
औद्योगिक क्रांति से पहले
प्रायः यह माना जाता है कि औद्योगीकरण की शुरुआत तभी हुई जब पहली फैक्ट्रियाँ स्थापित हुईं। परंतु इंग्लैंड में फैक्ट्रियों के आने से बहुत पहले भी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होता था, जो फैक्ट्रियों पर आधारित नहीं था। इस चरण को प्रोटो-औद्योगीकरण (Proto-industrialisation) कहा जाता है।
प्रोटो-औद्योगीकरण: औद्योगीकरण का वह चरण जो फैक्ट्रियों पर आधारित नहीं था, बल्कि मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के लिए उत्पादन पर आधारित था — यह उत्पादन ग्रामीण क्षेत्रों में, घरों में होता था, न कि पंजीकृत फैक्ट्रियों में।
सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में यूरोप के कस्बों के व्यापारी गाँवों की ओर जाने लगे। वे किसानों और कारीगरों को पैसा देकर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के लिए माल तैयार करने के लिए प्रेरित करते थे। जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार बढ़ा और विभिन्न भागों में उपनिवेश स्थापित हुए, माल की माँग बढ़ने लगी। व्यापारी शहरों के भीतर उत्पादन आसानी से नहीं बढ़ा सकते थे क्योंकि:
- शहरी शिल्प तथा व्यापारिक संघ (trade guilds) शक्तिशाली थे — वे कारीगरों को प्रशिक्षित करते, उत्पादन पर नियंत्रण रखते, प्रतिस्पर्धा व कीमतों को नियंत्रित करते तथा नए लोगों के व्यापार में प्रवेश को सीमित करते थे।
- शासकों ने अलग-अलग गिल्डों को विशेष उत्पादों के उत्पादन और व्यापार का एकाधिकार (monopoly) दे रखा था, जिससे नए व्यापारियों के लिए शहरों में व्यवसाय शुरू करना कठिन था।
इसलिए व्यापारी गाँवों की ओर मुड़े। ग्रामीण क्षेत्रों के किसान और कारीगर भी व्यापारियों के लिए काम करने को तैयार थे, क्योंकि खुले खेत गायब हो रहे थे और सामुदायिक भूमि (commons) की घेराबंदी (enclosure) हो रही थी, जिससे गरीब किसानों को आय के वैकल्पिक साधन ढूँढ़ने पड़े। जब व्यापारी उनके पास ऑर्डर लेकर आए, तो परिवार खुशी-खुशी राज़ी हो गए, क्योंकि इससे वे गाँव में रहकर खेती के साथ-साथ अन्य काम भी कर सकते थे।
पुटिंग-आउट प्रणाली (Putting-Out System)
इस प्रणाली के अंतर्गत इंग्लैंड का व्यापारी वस्त्र-निर्माता (merchant clothier) ऊन व्यापारी से ऊन खरीदकर कातने वालों (spinners) को देता था; कता हुआ धागा बुनकरों के पास जाता, फिर फुलर (fullers) व अंत में रंगरेज़ (dyers) के पास। कपड़े की अंतिम फिनिशिंग लंदन में की जाती थी, जहाँ से इसे निर्यात किया जाता। इस प्रणाली में शहर और गाँव के बीच घनिष्ठ संबंध विकसित हुआ — व्यापारी शहरों में रहते थे परंतु अधिकांश काम गाँवों में होता था।
प्रत्येक व्यापारी गाँवों में बिखरे सैकड़ों मज़दूरों के काम को नियंत्रित करता था — अक्सर पूरा किसान परिवार, स्त्री-पुरुष व बच्चे सभी, कताई, बुनाई, कार्डिंग, रंगाई और फिनिशिंग जैसे विभिन्न चरणों में लगे रहते थे। इस प्रणाली ने व्यापारियों को एक बड़ा, लचीला और सस्ता श्रम-बल उपलब्ध कराया, जबकि शहरों में गिल्डों की पाबंदियाँ अब भी लागू थीं।
औद्योगिक परिवर्तन की गति
आमतौर पर यह माना जाता है कि ब्रिटेन में औद्योगीकरण का अर्थ था हाथ के उत्पादन पर फैक्ट्रियों की और मानव श्रम पर मशीनों की तीव्र व अचानक विजय। परंतु ऐतिहासिक प्रमाण दिखाते हैं कि यह परिवर्तन सामान्यतः समझी जाने वाली गति से कहीं धीमा था।
फैक्ट्रियों के हावी होने में देरी क्यों हुई?
- 1840 के दशक तक ब्रिटेन के सबसे गतिशील उद्योग सूती वस्त्र और धातु जैसे प्रतीकात्मक उद्योग नहीं थे, बल्कि खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण कार्य, मिट्टी के बर्तन, काँच का काम, चमड़ा रंगाई और फर्नीचर जैसे साधारण व लघु उद्योग थे, जो मुख्यतः हाथ के श्रम से ही बढ़ते रहे।
- नई तकनीक महँगी थी और व्यापारी-उद्योगपति उसे अपनाने में सावधानी बरतते थे। मशीनें अक्सर खराब हो जाती थीं और उनकी मरम्मत महँगी पड़ती थी। ये मशीनें उतनी प्रभावी नहीं थीं जितना उनके आविष्कारक और निर्माता दावा करते थे।
- उदाहरण के लिए, जेम्स वाट के भाप इंजन (steam engine) का पेटेंट 1781 में हुआ था, परंतु निर्माता कंपनी बोल्टन एंड वाट को इन नई मशीनों को बड़े पैमाने पर बेचने में कई दशक लग गए।
- कई उद्योगों में मज़दूरों की माँग मौसमी (seasonal) थी — जैसे बुक-बाइंडर और प्रिंटर को केवल कुछ महीनों के लिए अतिरिक्त हाथों की ज़रूरत होती थी। जहाँ काम मौसमी होता, वहाँ उद्योगपति मशीनों में निवेश करने के बजाय मौसम-भर के लिए मज़दूर रखना अधिक पसंद करते थे।
ट्रेड यूनियनों का श्रम-बचाने वाली तकनीक का विरोध
विक्टोरियन ब्रिटेन में मानव श्रम पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध था। मज़दूरी कम थी, इसलिए मालिकों के पास महँगी और भारी पूँजी-निवेश वाली मशीनें लगाने का कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं था। उद्योगपतियों को उपलब्ध मशीनें प्रायः खरीदने में महँगी और रखरखाव में कठिन लगती थीं। जिन उद्योगों में माँग घटती-बढ़ती रहती थी, वहाँ पूँजीपति आवश्यकतानुसार मज़दूर रखना और हटाना अधिक सुविधाजनक समझते थे, बजाय इसके कि मंदी के मौसम में बेकार पड़ी रहने वाली मशीनों में पैसा लगाएँ।
इसके अलावा, कई प्रकार की वस्तुएँ केवल हाथ के श्रम से ही बनाई जा सकती थीं — मशीन से बना माल एक-जैसा दिखता था और हाथ से बने माल की बेहतर फिनिशिंग का मुकाबला नहीं कर पाता था। उदाहरणस्वरूप, ब्रिटेन की गनमेकर्स कंपनी (Gunmakers’ Company) को विशेष कौशल की आवश्यकता होती थी, और विक्टोरियन बाज़ार के खरीदार डिज़ाइन, सजावट व आकार में विविधता चाहते थे, जो मशीन से बने माल में संभव नहीं था।
मौसमी उद्योग तथा अभिजात वर्ग की हस्तनिर्मित वस्तुओं के प्रति रुचि
विक्टोरियन ब्रिटेन में उच्च वर्ग — अभिजात वर्ग (aristocracy) और बुर्जुआ वर्ग (bourgeoisie) — हाथ से बनी वस्तुओं को प्राथमिकता देते थे। हस्तनिर्मित उत्पाद परिष्कार (refinement) और उच्च वर्ग का प्रतीक बन गए थे। ये उत्पाद बेहतर फिनिश वाले, व्यक्तिगत रूप से बनाए गए और सावधानी से डिज़ाइन किए गए होते थे, जबकि मशीन से बना माल निर्यात बाज़ारों और उपनिवेशों के लिए बनाया जाता था।
वास्तव में गैर-यांत्रिक क्षेत्रों (non-mechanised sectors) में उच्च वृद्धि दर्ज हुई और इन उद्योगों में बड़ी संख्या में हाथ का श्रम लगा रहा। जहाँ मशीनें उपयोग होती भी थीं, वहाँ भी उन्हें बनाने में बहुत बड़ी संख्या में कुशल कारीगरों की आवश्यकता होती थी।
हाथ का श्रम और भाप शक्ति (Steam Power)
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में भी ब्रिटेन में श्रम की कमी नहीं थी। मज़दूरी सस्ती थी, इसलिए मालिकों को मशीनों की ओर जाने की ज़रूरत महसूस नहीं होती थी। अधिकांश उद्योगों में साधारण औज़ार और छोटी मशीनें प्रयोग होती थीं, जिनमें भारी पूँजी की आवश्यकता नहीं होती थी और जो हाथ के श्रमिकों की उत्पादकता बढ़ाने में सहायक थीं।
पुराने उद्योगों से बेरोज़गार हुए मज़दूरों को नए उद्योग आसानी से समाहित नहीं कर पाते थे। अधिकांश नए उद्योग गाँवों में स्थित थे, पारंपरिक शहरी शिल्प-केंद्रों से दूर। गाँवों में उपलब्ध श्रम को नए उद्योगों की बजाय समृद्ध किसान ही अपने खेतों में लगा लेते थे। साथ ही, कई व्यवसायों में काम की मौसमी प्रकृति के कारण मज़दूर वर्ष-भर एक काम से दूसरे काम में जाते रहते थे — जिससे भाप-चालित मशीनों की तुलना में हाथ के श्रम पर निर्भरता बनी रही।
औद्योगिक श्रमिकों का जीवन
बाज़ार में श्रम की अधिकता ने मज़दूरों के जीवन को गहराई से प्रभावित किया।
- बेरोज़गारी: काम खोजने वालों की संख्या उपलब्ध नौकरियों से अधिक थी। अधिकांश काम मौसमी होने के कारण मज़दूर वर्ष के एक बड़े हिस्से में बेकार रहते थे। कुछ लोग जीवन-यापन के लिए इधर-उधर के छोटे-मोटे काम करते थे, तो कई मौसम खत्म होते ही गाँव लौटने को मजबूर हो जाते थे।
- मौसम पर निर्भर मज़दूरी: मज़दूरों की मज़दूरी मौसमी काम और माँग के अनुसार घटती-बढ़ती रहती थी। उन्नीसवीं सदी के मध्य के बाद औसत मज़दूरी दर में वृद्धि तो हुई, परंतु इसमें अलग-अलग व्यवसायों के बीच बड़ा अंतर छिपा था — और बेरोज़गारी के डर ने मज़दूरों को नई तकनीक के प्रति शत्रुतापूर्ण बना दिया।
- स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny): जब ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी शुरू की गई, तो हाथ से कताई करके जीवन-यापन करने वाली स्त्रियों ने इन नई मशीनों पर हमला करना शुरू कर दिया, क्योंकि इससे उनका रोज़गार घट रहा था और आजीविका पर खतरा मंडरा रहा था।
- लुडाइट आंदोलन (Luddites): रोज़गार छीनने वाली मशीनों के प्रति मज़दूरों की शत्रुता लुडाइट आंदोलन (काल्पनिक व्यक्ति नेड लुड के नाम पर) के रूप में याद की जाती है, जिसमें मज़दूरों ने विरोधस्वरूप श्रम-बचाने वाली मशीनों को नष्ट कर दिया, क्योंकि उन्हें रोज़गार छिनने और मज़दूरी घटने का डर था, क्योंकि इन मशीनों को चलाने के लिए कम मज़दूरों की आवश्यकता होती थी।
औद्योगीकरण होने के बाद भी शुरुआत में औद्योगिक वृद्धि धीमी थी और रोज़गार सृजन की दर भी धीमी थी, इसलिए औद्योगीकरण से तुरंत और व्यापक रोज़गार की उम्मीद लंबे समय तक अधूरी रही।
उपनिवेशों में औद्योगीकरण
उपनिवेशों में औद्योगीकरण की कहानी ब्रिटेन से अलग थी। भारत जैसे उपनिवेशों में यूरोपीय लोगों के आने से बहुत पहले से ही शिल्प उत्पादन की समृद्ध परंपरा थी, विशेषकर सूती और रेशमी वस्त्रों में। जब ब्रिटिश उद्योगों का विकास हुआ और मैनचेस्टर व अन्य केंद्रों में यंत्रीकृत तरीके से सूती उत्पादन बढ़ा, तो इसका भारतीय वस्त्र उत्पादकों पर सीधा और विनाशकारी प्रभाव पड़ा।
कपास और भारतीय वस्त्र उद्योग का पतन
- ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के बाद अपनी शक्ति का प्रयोग व्यापार पर एकाधिकार जमाने के लिए किया — उसने भारतीय बुनकरों पर शर्तें थोपीं, उन्हें कम व निश्चित कीमतों पर कंपनी को कपड़ा बेचने के लिए बाध्य किया, और अन्य खरीदारों से लेन-देन करने से रोका।
- बुनकरों को अक्सर कंपनी के एजेंटों के साथ ठेके (गोमस्ता प्रणाली) में बाँध दिया जाता था और अग्रिम राशि (advance) दी जाती थी, जिससे वे केवल कंपनी के लिए, प्रायः अनुचित कीमतों पर, उत्पादन करने को मजबूर हो जाते थे।
- ब्रिटेन में औद्योगिक उत्पादन बढ़ने के साथ मैनचेस्टर में फैक्ट्री-निर्मित सूती वस्त्र भारतीय बाज़ार में भर गए और भारतीय हस्तनिर्मित कपड़े की कीमत को नीचे धकेल दिया।
- औपनिवेशिक नीति ने भारतीय कपड़े पर ब्रिटेन में प्रवेश करते समय भारी आयात शुल्क (import duty) लगाया, जबकि ब्रिटिश कपड़े को भारत में कम या बिना शुल्क के प्रवेश मिलता था — इस असमान शुल्क नीति (unequal tariff) ने भारतीय निर्यात को अपंग बना दिया और बुनकरों की आजीविका को नष्ट कर दिया।
- उन्नीसवीं सदी के अंत तक भारतीय वस्त्रों का फलता-फूलता निर्यात व्यापार लगभग समाप्त हो चुका था, और हज़ारों बुनकर बेरोज़गार हो गए, जिससे कई लोगों को पलायन करना पड़ा या कृषि-मज़दूरी अपनानी पड़ी।
ईस्ट इंडिया कंपनी और व्यापार
राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए निर्यात हेतु माल की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करना कठिन था, क्योंकि उसे बाज़ार में अन्य व्यापारिक कंपनियों से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता था। 1765 में बंगाल में राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करने के बाद कंपनी ने कपड़ा व्यापार से जुड़े मौजूदा व्यापारियों व दलालों को हटा दिया, बुनकरों पर नियंत्रण कड़ा किया, तथा बुनकरों की निगरानी, आपूर्ति संग्रहण व कपड़े की गुणवत्ता जाँचने के लिए गोमस्ता नामक वेतनभोगी कर्मचारी नियुक्त किया। बुनकरों की खुले बाज़ार में बेचने की स्वतंत्रता छिन गई और उन्हें प्रायः यह शपथ-पत्र (bond) भरने पर मजबूर किया जाता था कि वे केवल गोमस्ता के माध्यम से कंपनी को ही कपड़ा देंगे।
भारतीय वस्त्रों का युग
यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के युग से पहले भारतीय रेशमी और सूती माल अंतरराष्ट्रीय वस्त्र बाज़ार पर हावी था। मोटा सूती कपड़ा देश के कई भागों में बनता था, जबकि बारीक किस्में, विशेषकर बंगाल की, दुनिया-भर में प्रसिद्ध थीं। बंगाल का रेशम भी एशियाई और यूरोपीय बाज़ारों में उतना ही लोकप्रिय था।
- भारतीय वस्त्र — गुजरात का रेशम, कोरोमंडल तट और बंगाल की सूती वस्त्र — सदियों से पश्चिमी और दक्षिण-पूर्व एशियाई बाज़ारों में निर्यात होते थे।
- 1498 में वास्को दा गामा (Vasco da Gama) द्वारा भारत के लिए नए समुद्री मार्ग की खोज ने यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के लिए व्यापार की नई संभावनाएँ खोल दीं, और वे धीरे-धीरे भारतीय वस्त्र व्यापार में पैर जमाने लगीं।
- समय के साथ पुर्तगाली, डच, अंग्रेज़ और फ्रांसीसी जैसी विभिन्न यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों ने भारत के तटीय क्षेत्रों में व्यापारिक चौकियाँ (trading posts) स्थापित कीं और लाभदायक भारतीय वस्त्र व्यापार में हिस्सेदारी के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करने लगीं।
- व्यापारी बुनकरों को उनके उत्पादन के लिए अग्रिम भुगतान देकर कपड़ा प्राप्त करते थे, और इस प्रणाली के ज़रिये बुनकरों पर काफी हद तक नियंत्रण भी हासिल कर लेते थे।
पुराने व्यापारिक केंद्रों का पतन, नए बंदरगाहों का उदय
नौसैनिक शक्ति के सहारे यूरोपीय सत्ता के विस्तार के साथ पुराने व्यापारिक केंद्र क्षीण होने लगे, जबकि यूरोपीय कंपनियों द्वारा नियंत्रित नए बंदरगाहों का विकास हुआ, जो भारतीय बाज़ारों पर पश्चिम के बढ़ते वर्चस्व को दर्शाता था।
- सूरत (Surat) और हुगली (Hoogly) बंदरगाहों का पतन हुआ, क्योंकि स्थानीय व्यापारियों और महाजनों (bankers) का व्यापार घटता गया और यूरोपीय कंपनियों के बढ़ते वर्चस्व तथा व्यापार के नए बंदरगाहों की ओर स्थानांतरण के कारण उनकी साख (credit) भी कमज़ोर पड़ गई।
- 1750 के दशक तक इन पुराने बंदरगाहों से निर्यात नाटकीय रूप से गिर चुका था, और दोनों नगरों ने अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक नेटवर्क में अपना पुराना महत्व खो दिया।
- ब्रिटिश नियंत्रण में नए बंदरगाह बॉम्बे (Bombay) और कलकत्ता (Calcutta) तेज़ी से विकसित हुए। इन नए बंदरगाहों से होने वाला व्यापार यूरोपीय कंपनियों के नियंत्रण में आ गया और यूरोपीय जहाज़ों के ज़रिये होने लगा, जिससे यूरोपीय व्यापारियों और जहाज़ मालिकों को भारतीय व्यापार पर अधिक नियंत्रण मिल गया।
- पहले स्वतंत्र रूप से काम करने वाले भारतीय व्यापारी और कारीगर अब उस व्यापारिक व्यवस्था के हाशिये पर धकेल दिए गए, जिसे यूरोपीय लोग पूरी तरह नियंत्रित कर रहे थे।
भारतीय सूती मिल उद्योग का विकास
भारत की पहली सूती मिल 1854 में बॉम्बे में स्थापित हुई और इसने 1856 में उत्पादन शुरू किया। इसके बाद तेज़ी से और मिलें स्थापित हुईं, और 1862 तक चार मिलें कार्यरत हो चुकी थीं। बंदरगाह सुविधा, आस-पास के क्षेत्र से कच्चे कपास की उपलब्धता, तथा आस-पास के क्षेत्रों से श्रमिकों की पहुँच के कारण बॉम्बे शीघ्र ही भारतीय सूती मिल उद्योग का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
- अहमदाबाद में पहली कताई व बुनाई मिल 1861 में शुरू हुई, और यह शहर बाद में एक और प्रमुख वस्त्र-केंद्र बना, जिसे कभी-कभी “भारत का मैनचेस्टर” भी कहा जाता है।
- कानपुर की पहली मिल — एल्गिन मिल (Elgin Mill) — लगभग इसी समय शुरू हुई, जिससे उत्तर भारत में औद्योगिक विकास की नींव पड़ी।
- 1905 में बंगाल-विभाजन के बाद चले स्वदेशी आंदोलन से सूती मिल उद्योग की वृद्धि को ज़बरदस्त बढ़ावा मिला। राष्ट्रवादी नेताओं ने लोगों से विदेशी कपड़े का बहिष्कार कर केवल भारतीय (स्वदेशी) माल अपनाने का आह्वान किया, जिससे भारतीय मिलों में बने कपड़े की माँग तेज़ी से बढ़ी।
- प्रथम विश्व युद्ध ने भारतीय मिलों को और अधिक बढ़ावा दिया, क्योंकि ब्रिटेन से आयात घट गया और भारतीय मिलों को युद्ध की ज़रूरतों के लिए कपड़ा आपूर्ति के बड़े ऑर्डर मिले।
लघु उद्योगों की प्रधानता
फैक्ट्रियाँ अर्थव्यवस्था का एक दिखाई देने वाला हिस्सा तो बन गईं, परंतु औद्योगिक उत्पादन इससे कहीं अधिक जटिल था।
- बड़ी औद्योगीकृत फैक्ट्रियों के साथ-साथ अनेक छोटे कारखाने और घरेलू इकाइयाँ भी मौजूद थीं, जो देश में अधिकांश निर्मित वस्तुओं का उत्पादन जारी रखे हुए थीं।
- बीसवीं सदी के आरंभ में कुल औद्योगिक श्रम-शक्ति का केवल एक छोटा प्रतिशत ही पंजीकृत फैक्ट्रियों में काम करता था; शेष लघु-स्तरीय उत्पादन में लगे थे, जो अपंजीकृत घरेलू और कारखाना इकाइयों में काम करते थे।
- 1930-40 के दशक में भी भारत की कुल औद्योगिक श्रम-शक्ति का पाँच प्रतिशत से भी कम हिस्सा पंजीकृत फैक्ट्रियों में नियोजित था — शेष लोग साधारण औज़ारों व हस्त-तकनीकों का प्रयोग करते हुए छोटे कारखानों, कुटीर इकाइयों या घरेलू श्रमिक के रूप में काम करते थे।
फैक्ट्रियों की स्थापना
भारत में फैक्ट्रियों की स्थापना एक क्रमिक और असमान प्रक्रिया थी।
- 1854: बॉम्बे में पहली सूती मिल स्थापित हुई।
- 1855: बंगाल में, कलकत्ता के पास रिशरा (Rishra) में पहली जूट मिल स्थापित हुई, जिससे भारत में आधुनिक जूट उद्योग की शुरुआत हुई।
- अगले दो दशकों में हुगली नदी के किनारे बीस से अधिक जूट मिलें स्थापित हुईं, जिनमें से अधिकांश यूरोपीय स्वामित्व में थीं, जो बंगाल में उगने वाले प्रचुर कच्चे जूट का लाभ उठाती थीं।
- 1860 के दशक तक कानपुर में एल्गिन मिल शुरू हो चुकी थी, और एक दशक बाद अहमदाबाद में सूती मिलें स्थापित हुईं।
- मद्रास (Madras) की पहली सूती मिल ने 1874 में उत्पादन शुरू किया।
आरंभिक उद्यमी (Early Entrepreneurs)
औपनिवेशिक भारत में उद्योगों की वृद्धि, कई भारतीय उद्यमियों के उदय से घनिष्ठ रूप से जुड़ी थी, जिन्होंने औद्योगिक उत्पादन में उतरने से पहले व्यापार के माध्यम से पूँजी अर्जित की थी।
| उद्यमी | योगदान |
| द्वारकानाथ टैगोर (Dwarkanath Tagore) | चीन के साथ व्यापार और नील (indigo) के निर्यात से धन अर्जित किया, इसके बाद 1830-40 के दशक में शिपिंग, खनन व बागान (plantations) क्षेत्रों में छह संयुक्त-स्टॉक कंपनियाँ स्थापित कीं। |
| दिनशॉ पेटिट (Dinshaw Petit) | चीन व्यापार से धन अर्जित करने के बाद औद्योगिक निवेश की ओर मुड़े, तथा 1860-70 के दशक में बॉम्बे में कई सूती मिलें स्थापित कीं। |
| जमशेदजी नौसरवानजी टाटा (Jamsetjee Tata) | चीन व्यापार पर अपना व्यावसायिक साम्राज्य खड़ा किया और आगे चलकर भारत में औद्योगिक उद्यम स्थापित किए — जिसके परिणामस्वरूप टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) की स्थापना हुई, जो भारतीय उद्योग की एक विशाल शक्ति बनी। |
| सेठ हुकुमचंद (Seth Hukumchand) | एक मारवाड़ी व्यवसायी, जिन्होंने 1917 में कलकत्ता में पहली भारतीय जूट मिल स्थापित की, ऐसे उद्योग में प्रवेश करते हुए जिस पर पहले लगभग पूरी तरह यूरोपीय प्रबंध अभिकरणों (Managing Agencies) का प्रभुत्व था। |
इनमें से कई उद्यमी पहले यूरोपीय कंपनियों के एजेंट के रूप में कार्य कर चुके थे — कारीगरों द्वारा बनाया माल निर्यात करना, या चीन को अफीम की आपूर्ति करना। जैसे-जैसे चीन के साथ व्यापार के अवसर कम होते गए, उन्होंने अपनी संचित पूँजी का उपयोग भारत के भीतर व्यापार बढ़ाने और औद्योगिक उद्यमों में निवेश करने के लिए किया।
मज़दूर कहाँ से आए?
फैक्ट्रियों की वृद्धि से औद्योगिक श्रम की माँग पैदा हुई। अधिकांश औद्योगिक क्षेत्रों में मज़दूर आस-पास के ज़िलों तथा अन्य क्षेत्रों से काम की तलाश में आते थे।
- मिल-मज़दूरों का एक बड़ा हिस्सा आस-पास के ज़िलों से, विशेषकर कृषि संकट व अकाल से प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों से तथा आय के कम विकल्पों वाले क्षेत्रों से, आया।
- उदाहरण के लिए, बॉम्बे की सूती मिलों में आधे से अधिक मज़दूर पड़ोसी ज़िले रत्नागिरी (Ratnagiri) से आते थे, जबकि अन्य शहरों की मिलें भी अपने आस-पास के कृषि क्षेत्रों से ही श्रम खींचती थीं।
- फैक्ट्री में नौकरी पाना अक्सर व्यक्तिगत संपर्क और नेटवर्क पर निर्भर करता था। काम खोजने वाले मज़दूर को आमतौर पर मिल में पहले से काम कर रहे किसी मित्र या रिश्तेदार के माध्यम से प्रवेश मिलता था, जो उसकी सिफ़ारिश जॉबर (jobber) से करता था।
जॉबर प्रणाली (Jobber System)
जॉबर: एक पुराना और भरोसेमंद कर्मचारी, जिसे उद्योगपति गाँवों से नए मज़दूरों की भर्ती करने, उन्हें शहर में बसने में सहायता करने, तथा आवश्यकता पड़ने पर उन्हें पैसे उपलब्ध कराने के लिए नियुक्त करते थे। इस प्रकार जॉबर नए मज़दूरों पर एक तरह का अधिकार व शक्ति रखने वाला व्यक्ति बन जाता था, और अक्सर नौकरी देने के बदले उपहार व पैसे माँगता था, जिससे वह मिल मालिक और श्रमिकों के बीच एक महत्वपूर्ण, और कभी-कभी शोषणकारी, कड़ी बन जाता था।
औद्योगिक विकास की विशेषताएँ
औपनिवेशिक भारत में औद्योगिक विकास एक विशिष्ट पैटर्न का अनुसरण करता था, जो यूरोपीय व्यवसायियों के हितों से आकार लेता था।
- उन्नीसवीं सदी में स्थापित अधिकांश नए उद्योगों पर यूरोपीय प्रबंध अभिकरणों (European Managing Agencies) का नियंत्रण था। वे पूँजी जुटाते, संयुक्त-स्टॉक कंपनियाँ बनाते और उनका प्रबंधन करते थे — परंतु उनका निवेश मुख्यतः उन क्षेत्रों में होता था जहाँ कच्चे माल की सुनिश्चित आपूर्ति मिलती और जो निर्यात के लिए माल तैयार करते, जैसे चाय-कॉफी बागान, खनन, नील और जूट — न कि भारतीय बाज़ार के लिए वस्तुएँ बनाने में।
- इसके विपरीत, भारतीय व्यवसायी मुख्यतः सूती मिलों में निवेश करते थे, वे मैनचेस्टर के उच्चतम-गुणवत्ता वाले कपड़े से सीधी प्रतिस्पर्धा से बचते हुए मोटे सूती धागे और कपड़े के उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करते थे।
- प्रथम विश्व युद्ध तक भारत में औद्योगिक विकास काफी धीमा था और मुख्यतः सूती और जूट उद्योग तक सीमित था।
- प्रथम विश्व युद्ध ने एक नाटकीय रूप से नई स्थिति पैदा कर दी: ब्रिटिश मिलें युद्ध के लिए उत्पादन में व्यस्त हो गईं और पहले की तरह भारतीय बाज़ार को आपूर्ति नहीं कर पाईं। अचानक भारतीय मिलों को भी युद्ध की ज़रूरतों के लिए उत्पादन करना पड़ा — जूट की बोरियाँ, सेना की वर्दियों का कपड़ा, तंबू और चमड़े के जूते — जिससे भारतीय उद्योगों को बड़ा बढ़ावा मिला।
- युद्ध के वर्षों में औद्योगिक उत्पादन में उछाल आया, और युद्ध के बाद मैनचेस्टर भारतीय बाज़ार में अपनी पुरानी स्थिति फिर कभी हासिल नहीं कर पाया, जिससे भारतीय उद्योगों को, विशेषकर सूती उद्योग में, अपनी पकड़ मज़बूत करने और विस्तार करने का अवसर मिला।
लघु उद्योगों की प्रधानता बनी रही
फैक्ट्री उद्योगों की वृद्धि के बावजूद बड़े उद्योग अर्थव्यवस्था का केवल एक छोटा हिस्सा बने — अधिकांश रोज़गार लघु-स्तरीय उत्पादन इकाइयों में ही बना रहा।
- वास्तव में बीसवीं सदी में हस्तशिल्प उत्पादन का विस्तार हुआ, जहाँ बुनकर व कारीगर फ्लाई शटल करघे (fly shuttle looms) जैसी नई तकनीक अपनाकर, फैक्ट्री-आधारित उत्पादन में बदले बिना ही, अपनी उत्पादकता बढ़ाने लगे।
- बुनकरों और कारीगरों ने छोटे तकनीकी परिवर्तन अपनाए, जिससे वे अपनी स्वतंत्रता या पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह त्यागे बिना मिल उत्पादन का मुकाबला कर सके।
- बीसवीं सदी में हथकरघा (handloom) कपड़ा उत्पादन लगातार बढ़ता रहा — कुछ चरणों में तो यह मिल उद्योग की वृद्धि से भी आगे निकल गया — क्योंकि हथकरघा बुनकर प्रायः विशेष किस्मों और मोटे कपड़े का उत्पादन करते थे, जिनकी जगह मशीन-उत्पादन आसानी से नहीं ले पाता था।
माल का बाज़ार (The Market for Goods)
ब्रिटिश और भारतीय दोनों निर्माताओं ने अपने कपड़े का बाज़ार बढ़ाने के लिए कई तरीके अपनाए, और इसमें विज्ञापनों (advertisements) की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
- जब मैनचेस्टर के उद्योगपतियों ने भारत में कपड़ा बेचना शुरू किया, तो उन्होंने कपड़े के बंडलों पर लेबल लगाए जिन पर निर्माता का नाम व निर्माण-स्थल अंकित होता था, ताकि कपड़े को गुणवत्ता की पहचान मिले और भारतीय खरीदार उस पर भरोसा करें व उसे प्राथमिकता दें।
- लेबलों पर भारतीय पौराणिक कथाओं के देवी-देवताओं की छवियाँ भी छापी जाती थीं, यह मानते हुए कि इससे विदेशी उत्पाद भारतीय ग्राहकों को परिचित लगेगा और उसे दैवीय स्वीकृति व भारतीयता का भाव मिलेगा।
- उन्नीसवीं सदी के अंत तक निर्माता अपने उत्पादों को लोकप्रिय बनाने के लिए कैलेंडर छपवाने लगे, क्योंकि जो लोग पढ़ नहीं सकते थे वे भी कैलेंडर पर बनी छवियों को पहचान सकते थे, और समाचार-पत्रों के विपरीत कैलेंडर घरों, चाय की दुकानों व दफ्तरों की दीवारों पर साल-भर टँगे रहते थे।
- देवी-देवताओं की छवियों का उपयोग केवल ब्रिटिश निर्माताओं ने ही नहीं, बल्कि भारतीय निर्माताओं ने भी अपने माल को आकर्षक और स्वीकार्य बनाने के लिए किया।
- जब भारतीय निर्माता अपने कपड़े या उत्पादों का विज्ञापन करते थे, तो वे एक अलग रणनीति अपनाते थे — माल बेचने के लिए राष्ट्रवादी संदेशों का खुलकर उपयोग किया जाता था, लोगों से भारतीय उत्पाद खरीदने पर राष्ट्रीय गर्व महसूस करने का आह्वान किया जाता था।
- स्वदेशी आंदोलन के दौरान निर्माताओं ने कपड़े के लेबल व कैलेंडरों पर राष्ट्रवादी नेताओं की छवियाँ छापीं, साथ ही केवल स्वदेशी माल खरीदने का आग्रह करने वाले नारे भी दिए, जिससे खरीदारी के कार्य को राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता के बड़े उद्देश्य से जोड़ा गया।
संक्षेप में: विज्ञापन और लेबल, ब्रिटिश व भारतीय दोनों उद्योगों के हाथों में, एक शक्तिशाली उपकरण बन गए, जिन्होंने यह आकार दिया कि उत्पादों को कैसे देखा, बेचा और उपभोग किया जाए — और उस समय के बदलते आर्थिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक विचारों को प्रतिबिंबित किया।
मुख्य बिंदु
- प्रोटो-औद्योगीकरण फैक्ट्रियों के विकास से पहले विश्व बाज़ार के लिए होने वाला औद्योगिक उत्पादन था, जो गाँवों में पुटिंग-आउट प्रणाली के ज़रिये होता था।
- ब्रिटेन में औद्योगिक परिवर्तन धीमा था — हाथ का श्रम, मौसमी उत्पादन और मज़दूरों का विरोध (लुडाइट) फैक्ट्रियों के प्रभुत्व में देरी का कारण बने।
- स्पिनिंग जेनी ने कताई की गति तो बढ़ाई परंतु हाथ के श्रम की माँग घटा दी, जिससे स्त्री-मज़दूरों में विरोध हुआ।
- औपनिवेशिक नीति, असमान शुल्क व्यवस्था और मैनचेस्टर के कपड़े से भरे भारतीय बाज़ार ने, विशेषकर ईस्ट इंडिया कंपनी की गोमस्ता प्रणाली के माध्यम से, भारत के पारंपरिक वस्त्र व्यापार को कुचल दिया।
- भारत का वस्त्र व्यापार कभी विश्व बाज़ार पर हावी था; वास्को दा गामा की यात्रा (1498) के बाद यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के आगमन से नियंत्रण धीरे-धीरे भारतीय व्यापारियों से छिनता गया।
- सूरत और हुगली का पतन हुआ; बॉम्बे और कलकत्ता नए औपनिवेशिक बंदरगाहों के रूप में उभरे।
- भारत की पहली सूती मिल 1854 में बॉम्बे में स्थापित हुई; पहली जूट मिल 1855 में बंगाल में स्थापित हुई।
- आरंभिक भारतीय उद्यमियों — द्वारकानाथ टैगोर, दिनशॉ पेटिट, जमशेदजी टाटा और सेठ हुकुमचंद — ने प्रायः चीन के साथ व्यापार से शुरुआत करते हुए औद्योगिक साम्राज्य खड़े किए।
- मज़दूर आस-पास के ज़िलों से औद्योगिक शहरों की ओर पलायन करते थे; भर्ती पर जॉबर प्रणाली का नियंत्रण था।
- यूरोपीय प्रबंध अभिकरणों का बागान व निर्यात-उन्मुख उद्योगों पर वर्चस्व था; सूती मिलों में भारतीय पूँजी का वर्चस्व था।
- स्वदेशी आंदोलन (1905) और प्रथम विश्व युद्ध ने भारतीय उद्योगों को बड़ा बढ़ावा दिया।
- फैक्ट्रियों की वृद्धि के बावजूद पूरे औपनिवेशिक काल में लघु व हस्तशिल्प उत्पादन ही प्रधान बना रहा।
- विज्ञापन, लेबल और कैलेंडर — भारतीय देवी-देवताओं व राष्ट्रवादी नेताओं की छवियों का उपयोग करते हुए — भारतीय खरीदारों तक कपड़ा पहुँचाने के शक्तिशाली उपकरण थे।
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