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भारत में राष्ट्रवाद Notes || Class 10 Social Science History Chapter 2 in Hindi ||

Posted on August 17, 2026 by

पाठ – 2

भारत में राष्ट्रवाद

In this post we have given the detailed notes of class 10 Social Science (History) chapter 2 Nationalism in India in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 board exams.

इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (इतिहास) के पाठ 2 भारत में राष्ट्रवाद के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है।

BoardCBSE Board, JAC Board, RBSE Board, MPBSE Board, UBSE Board
TextbookNCERT — India and the Contemporary World-II (Reprint 2026-27)
ClassClass 10
SubjectSocial Science (History)
Chapter no.Chapter 2
Chapter Nameभारत में राष्ट्रवाद (Nationalism in India)
CategoryClass 10 SST Notes in Hindi
MediumHindi
Class 10 Social Science Chapter 2 भारत में राष्ट्रवाद Notes in Hindi
Explore the topics
पाठ – 2
भारत में राष्ट्रवाद
पाठ 2, भारत में राष्ट्रवाद
प्रथम विश्व युद्ध और भारतीय राष्ट्रवाद
सत्याग्रह का विचार
1. चंपारण (बिहार), 1917
2. खेड़ा (गुजरात), 1917
3. अहमदाबाद, 1918
रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919)
खिलाफत आंदोलन और असहयोग की शुरुआत क्यों
असहयोग-खिलाफत आंदोलन क्यों?
असहयोग आंदोलन का शहरों में विस्तार
चौरी चौरा कांड और आंदोलन की वापसी
आंदोलन में विभिन्न सामाजिक धाराएँ
1. अवध के किसान — बाबा रामचंद्र
2. गुडेम पहाड़ियों के आदिवासी — अल्लूरी सीताराम राजू
3. बागान मज़दूर (Plantation Workers)
साइमन कमीशन (1928)
नमक मार्च (दांडी यात्रा) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930)
सविनय अवज्ञा आंदोलन को विभिन्न वर्गों ने कैसे देखा
धनी किसान समुदाय
गरीब किसान
व्यापारिक वर्ग
औद्योगिक श्रमिक वर्ग
महिलाओं की भागीदारी
सविनय अवज्ञा आंदोलन की सीमाएँ
अछूत (दलित) समुदाय और गांधी-अंबेडकर मतभेद
मुस्लिम राजनीतिक संगठन और पृथक निर्वाचिका
सामूहिक अपनत्व की भावना (The Sense of Collective Belonging)
भारत माता की छवि
लोककथाएँ और गीत
प्रतीकों का महत्व
इतिहास की पुनर्व्याख्या
मुख्य बिंदु

पाठ 2, भारत में राष्ट्रवाद

प्रथम विश्व युद्ध और भारतीय राष्ट्रवाद

आधुनिक राष्ट्रवाद यूरोप में राष्ट्र-राज्य (nation-state) के उदय के साथ जुड़ा हुआ है। भारत जैसे उपनिवेशों में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष के दौरान लोगों को एक साझा राष्ट्रीय पहचान के सूत्र में बाँधा गया। यह प्रक्रिया विभिन्न सामाजिक समूहों — किसान, कारीगर, मज़दूर — को एक साझा संघर्ष में एकजुट करती थी, पर हर समूह के लिए स्वतंत्रता का अर्थ अलग-अलग था।

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने भारत में एक नई आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा की:

  • युद्ध के कारण रक्षा-व्यय भारी मात्रा में बढ़ा, जिसे युद्ध-ऋणों (war loans) व बढ़े हुए करों से पूरा किया गया। सीमा शुल्क बढ़ाए गए तथा आयकर (income tax) की शुरुआत हुई।
  • युद्ध के दौरान बड़े पैमाने पर सैन्य भर्ती के लिए ग्रामीण क्षेत्रों पर दबाव डाला गया, जिससे कई क्षेत्रों में विद्रोह भी हुए।
  • 1913-18 के बीच अनाज की कीमतें दोगुनी हो गईं, जिससे आम जनता को भारी कठिनाई हुई तथा मुनाफ़ाखोरों की चाँदी हुई।
  • 1918-19 और 1920-21 में फसल खराब होने से भोजन की भारी कमी हुई। इसी दौरान फैले इन्फ्लुएंज़ा महामारी ने लाखों लोगों की जान ले ली।
  • लोगों को आशा थी कि युद्ध की समाप्ति के बाद उनके कष्ट कम होंगे, परंतु ऐसा नहीं हुआ, जिससे व्यापक असंतोष फैला।

सत्याग्रह का विचार

मोहनदास करमचंद गांधी जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे, जहाँ उन्होंने नस्लभेदी शासन के विरुद्ध एक अनोखी शैली के आंदोलन का प्रयोग सफलतापूर्वक किया था।

सत्याग्रह (Satyagraha): यह विचार सत्य (truth) की शक्ति पर बल देता है तथा सत्य के लिए संघर्षरत लोगों को अपने पक्ष में एकजुट करने की आवश्यकता पर ज़ोर देता है। गांधीजी के अनुसार यदि उद्देश्य सच्चा है, कारण न्यायसंगत है, तो अत्याचारी के विरुद्ध हिंसा की आवश्यकता नहीं — बिना प्रतिशोध की भावना के सत्याग्रह द्वारा संघर्ष जीता जा सकता है। सभी लोगों में, यहाँ तक कि अत्याचारी में भी, उसे सत्य को देखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है — क्रोध और हिंसा के बजाय अहिंसा (non-violence) और शांति से।

भारत लौटने के बाद गांधीजी ने अलग-अलग स्थानों पर सफलतापूर्वक सत्याग्रह आंदोलन चलाए:

1. चंपारण (बिहार), 1917

गांधीजी नील (indigo) की खेती करने वाले किसानों को दमनकारी बागान व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष के लिए प्रेरित करने चंपारण गए।

2. खेड़ा (गुजरात), 1917

खेड़ा जिले में फसल खराब होने और महामारी के कारण किसान लगान (revenue) चुकाने में असमर्थ थे। गांधीजी ने यहाँ किसानों के समर्थन में लगान माफ़ी के लिए सत्याग्रह चलाया।

3. अहमदाबाद, 1918

गांधीजी ने सूती मिल मज़दूरों के लिए एक सत्याग्रह आंदोलन चलाकर बेहतर काम की परिस्थितियों की माँग का समर्थन किया।

रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919)

1919 में गांधीजी ने एक व्यापक अभियान चलाने का निर्णय लिया — दमनकारी रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act, 1919) के विरुद्ध, जो इंपीरियल विधान परिषद (Imperial Legislative Council) में भारतीय सदस्यों के प्रबल विरोध के बावजूद जल्दबाज़ी में पारित किया गया था।

रॉलेट एक्ट: इस कानून ने ब्रिटिश सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को दबाने की भारी शक्तियाँ दीं तथा दो वर्षों तक बिना किसी मुकदमे के राजनीतिक बंदियों को नज़रबंद रखने की अनुमति दी।

गांधीजी ने इसके विरुद्ध एक अखिल भारतीय हड़ताल (hartal) का आह्वान किया। शहरों में जुलूस निकाले गए, रेलवे कार्यशालाएँ बंद हुईं और मज़दूर हड़ताल पर गए। सरकार ने राष्ट्रवादियों को दबाने के लिए दमनकारी उपाय अपनाए।

जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919): स्थानीय नेताओं को गिरफ़्तार करने और अमृतसर में मार्शल लॉ (martial law) लागू करने के विरोध में लोग जलियांवाला बाग में एकत्रित हुए। जनरल डायर ने इस बंद स्थान में घुसकर, एकत्रित निहत्थी भीड़ पर बिना चेतावनी दिए गोली चलवा दी, जिससे सैकड़ों लोग मारे गए। इस हत्याकांड ने पूरे देश में भारी हड़तालों और झड़पों को जन्म दिया, जिसके बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया, यह महसूस करते हुए कि जनता हिंसक हो चुकी थी और सत्याग्रह के लिए प्रशिक्षण अभी अधूरा था।

खिलाफत आंदोलन और असहयोग की शुरुआत क्यों

गांधीजी को लगा कि रॉलेट सत्याग्रह जैसे स्थानीय आंदोलनों की तुलना में एक व्यापक जन-आंदोलन की आवश्यकता है, और भारत में हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना ऐसा आंदोलन संभव नहीं। इसके लिए उन्होंने खिलाफत मुद्दे का सहारा लिया।

खिलाफत आंदोलन: प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार की अफ़वाहों से मुस्लिम समुदाय में चिंता फैली कि विजयी यूरोपीय शक्तियाँ तुर्की के धार्मिक प्रमुख ख़लीफ़ा (Khalifa) पर कठोर शांति संधि थोप देंगी। ख़लीफ़ा की अस्थायी शक्तियों की रक्षा के लिए मार्च 1919 में बंबई में एक खिलाफत समिति का गठन हुआ, जिसका नेतृत्व मोहम्मद अली और शौकत अली भाइयों ने किया। गांधीजी ने खिलाफत के मुद्दे को एक साझा प्लेटफ़ार्म बनाने और हिंदू-मुस्लिम एकता के तहत राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक बनाने के अवसर के रूप में देखा।

सितंबर 1920 में कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस ने खिलाफत के समर्थन और स्वराज (Swaraj) की प्राप्ति के लिए असहयोग आंदोलन शुरू करने का प्रस्ताव पारित किया।

असहयोग-खिलाफत आंदोलन क्यों?

अपनी पुस्तिका हिन्द स्वराज (1909) में गांधीजी ने कहा था कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही टिका हुआ है। यदि भारतीय सहयोग देना बंद कर दें तो एक वर्ष के भीतर स्वराज प्राप्त हो सकता है। इस विचार का प्रस्ताव था:

  • सरकारी शिक्षण संस्थाओं, न्यायालयों का बहिष्कार, विदेशी वस्त्रों का त्याग।
  • यदि इन सभी का बहिष्कार होगा तो असहयोग एक आंदोलन में बदल जाएगा।
  • इसके बाद ही सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience) — कर न चुकाना — शुरू किया जाना था।

गांधीजी और कांग्रेस के नेताओं ने चरणबद्ध कार्यक्रम की घोषणा की — प्रथम चरण में केवल स्कूल-कॉलेज, कचहरी, सरकारी नौकरियों, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार तथा स्वदेशी को अपनाना शामिल था; बाद में जन-आंदोलन तेज़ होने पर सविनय अवज्ञा प्रारंभ की जानी थी।

असहयोग आंदोलन का शहरों में विस्तार

यह आंदोलन जनवरी 1921 में आरंभ हुआ। शहरी मध्यवर्ग की व्यापक भागीदारी हुई:

  • हज़ारों विद्यार्थियों, अध्यापकों व प्रधानाचार्यों ने सरकारी शिक्षण संस्थाओं को छोड़ दिया।
  • कई वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी।
  • अधिकांश प्रांतों में परिषद चुनावों (council elections) का बहिष्कार किया गया।
  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार हुआ — विदेशी कपड़ों की सार्वजनिक होली जलाई गई, शराब की दुकानों पर धरना दिया गया।
  • 1921-22 में विदेशी वस्त्रों का आयात आधा हो गया, इसका मूल्य ₹102 करोड़ से गिरकर ₹57 करोड़ रह गया। कई स्थानों पर व्यापारियों ने विदेशी माल का व्यापार करने या उसमें वित्त लगाने से इनकार कर दिया।

परंतु आंदोलन धीरे-धीरे धीमा पड़ने लगा, क्योंकि:

  • खादी के कपड़े महँगे थे और गरीब लोग खरीद नहीं पाते थे, इसलिए वे पुराने कपड़े ही पहनते रहे।
  • राष्ट्रीय स्कूल-कॉलेजों की कमी के कारण विद्यार्थी व अध्यापक धीरे-धीरे वापस सरकारी संस्थाओं में लौटने लगे।
  • वकील भी अपने पेशे में लौट आए क्योंकि राष्ट्रीय न्यायालयों में उतना काम नहीं था।

चौरी चौरा कांड और आंदोलन की वापसी

1922 तक गांधीजी को महसूस हुआ कि आंदोलन अब सविनय अवज्ञा की ओर बढ़ने के लिए तैयार है। परंतु फ़रवरी 1922 में उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा (गोरखपुर) में एक हिंसक घटना हुई — एक उत्तेजित भीड़ ने स्थानीय पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें कई पुलिसकर्मी मारे गए।

इस हिंसा की खबर सुनकर गांधीजी ने चिंतित होकर असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। उन्हें लगा कि सत्याग्रहियों को व्यापक जन-आंदोलन शुरू करने से पहले उचित प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

आंदोलन में विभिन्न सामाजिक धाराएँ

असहयोग-खिलाफत आंदोलन एक साथ शुरू हुआ, लेकिन देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग सामाजिक समूहों ने इसमें भाग लिया, और हर समूह के लिए ‘स्वराज’ का अर्थ भिन्न था।

1. अवध के किसान — बाबा रामचंद्र

अवध (उत्तर प्रदेश) में किसानों का आंदोलन तालुकदारों और ज़मींदारों के विरुद्ध था, जो भारी लगान वसूलते थे और किसानों को बेगार (forced labour, बेगार) करने पर मजबूर करते थे। किसानों की माँग थी — लगान में कमी, बेगार का उन्मूलन, तथा दमनकारी ज़मींदारों का सामाजिक बहिष्कार। इस आंदोलन का नेतृत्व बाबा रामचंद्र ने किया — एक पूर्व गिरमिटिया मज़दूर जो फ़िजी से लौटे थे। 1920 में जवाहरलाल नेहरू, बाबा रामचंद्र व अन्य ने गाँवों का दौरा कर किसान परिस्थितियों को समझा और अवध किसान सभा का गठन हुआ। जून 1920 तक सभा की शाखाओं की संख्या 300 से अधिक हो गई। यह आंदोलन कांग्रेस के आंदोलन से जुड़ा तो अवश्य था, परंतु इसने अपने ढंग से बढ़ना जारी रखा — कई स्थानों पर तालुकदारों व व्यापारियों के घरों पर हमले हुए, बाज़ार लूटे गए तथा अनाज के भंडारों पर कब्ज़ा किया गया।

2. गुडेम पहाड़ियों के आदिवासी — अल्लूरी सीताराम राजू

आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों (Gudem Hills) के आदिवासियों ने असहयोग आंदोलन की एक अलग व्याख्या की। यहाँ औपनिवेशिक सरकार ने आदिवासियों को जंगलों में परंपरागत घुमंतू खेती (झूम खेती) करने से रोक दिया था तथा बड़े क्षेत्रों को आरक्षित वनों (reserved forests) में बदल दिया, जिससे आदिवासियों की आजीविका पर संकट आया। इसके अतिरिक्त बेगार पर आधारित सड़क-निर्माण योजनाओं ने भी उनमें गहरा असंतोष भर दिया।

आदिवासियों का मानना था कि इस अन्याय के विरुद्ध विद्रोह करके वे ‘स्वराज’ प्राप्त कर सकते हैं तथा अपनी परंपरागत स्वायत्तता पुनः स्थापित कर सकते हैं। इस विद्रोह का नेतृत्व अल्लूरी सीताराम राजू ने किया, जो स्वयं को गांधीजी का अनुयायी बताते थे और खादी पहनने व शराब त्यागने पर बल देते थे, परंतु वे यह भी मानते थे कि सशस्त्र विद्रोह के बिना अंग्रेज़ी राज का अंत नहीं होगा। राजू और उनके अनुयायियों ने 1924 में पुलिस थानों पर हमले किए, अंग्रेज़ अधिकारियों पर आक्रमण किया तथा गुरिल्ला युद्ध (guerrilla warfare) चलाया। राजू को अंततः पकड़कर मार दिया गया, परंतु वे आदिवासी क्षेत्र में लोक-नायक (folk hero) बन गए।

3. बागान मज़दूर (Plantation Workers)

असम के चाय बागानों के मज़दूरों के लिए ‘स्वतंत्रता’ का अर्थ था बागान की सीमाओं के भीतर से बाहर निकलने की आज़ादी, जहाँ 1859 के इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट (Inland Emigration Act) के तहत उन्हें बिना अनुमति के चाय बागान छोड़ने पर रोक थी। असहयोग आंदोलन की खबर सुनकर हज़ारों मज़दूरों ने बागान मालिकों की अवज्ञा की, अपने घरों की ओर पलायन शुरू कर दिया — उनका मानना था कि गांधीराज आने वाला है और सभी को अपने गाँव में ज़मीन मिलेगी। परंतु वे बीच रास्ते में ही फँस गए, क्योंकि रेलवे कर्मचारियों की हड़ताल के कारण रेल व स्टीमर सेवाएँ ठप्प हो गई थीं; पुलिस ने उन्हें रोककर बुरी तरह पीटा।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि किसान, आदिवासी और मज़दूर अपने-अपने ढंग से ‘स्वराज’, ‘गांधी’ और ‘असहयोग’ के विचार की व्याख्या अपनी स्थानीय ज़रूरतों के अनुसार करते थे — यह आंदोलन एक समान विचार की श्रृंखला नहीं, बल्कि विविध आकांक्षाओं का समूह था।

साइमन कमीशन (1928)

1927 में ब्रिटेन में एक नई सरकार ने भारत में संवैधानिक व्यवस्था की समीक्षा हेतु सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक वैधानिक आयोग (Statutory Commission) गठित किया, जिसे साइमन कमीशन कहा जाता है। इस आयोग में सभी सदस्य ब्रिटिश थे — एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। जब यह आयोग 1928 में भारत पहुँचा तो उसका स्वागत “साइमन वापस जाओ (Simon Go Back)” के नारों के साथ हुआ। कांग्रेस, मुस्लिम लीग सहित लगभग सभी दलों ने इसका विरोध किया। लाहौर में इस विरोध-प्रदर्शन का नेतृत्व करते हुए लाला लाजपत राय पुलिस के लाठीचार्ज में गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।

नमक मार्च (दांडी यात्रा) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930)

दिसंबर 1929 में लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में ‘पूर्ण स्वराज’ (Purna Swaraj) का प्रस्ताव पारित किया। 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया, जिसमें लोगों से ‘पूर्ण स्वराज’ के लिए संघर्ष जारी रखने की शपथ ली गई।

गांधीजी ने एक ऐसी माँग खोजी जो पूरे देश को झकझोर सके — नमक (salt)। नमक भारत में हर घर की आवश्यक वस्तु था, पर उस पर सरकार का एकाधिकार था तथा भारी कर लगाया जाता था। गांधीजी ने 31 जनवरी 1930 को वायसराय इरविन को एक पत्र लिखा जिसमें 11 माँगें रखीं, सबसे महत्वपूर्ण नमक कर की समाप्ति। जब यह अल्टीमेटम असफल रहा तो गांधीजी ने अपने 78 विश्वस्त स्वयंसेवकों के साथ 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से दांडी (गुजरात) तक 240 मील की प्रसिद्ध दांडी यात्रा (Dandi March) शुरू की। वे प्रतिदिन लगभग 10 मील चले। 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचकर गांधीजी ने समुद्र-जल से नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा, जिससे व्यापक स्तर पर सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ हुआ।

सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement): यह असहयोग आंदोलन से आगे की एक कड़ी थी। जहाँ असहयोग आंदोलन में लोगों से केवल सहयोग वापस लेने को कहा गया था, वहीं इस आंदोलन में लोगों से औपनिवेशिक कानूनों को खुलेआम तोड़ने का आह्वान किया गया — जंगल के कानूनों का उल्लंघन, नमक कानून तोड़ना, विदेशी कपड़ों तथा शराब की दुकानों पर धरना, तथा लगान व चौकीदारी कर न चुकाना।

इस आंदोलन में बड़े पैमाने पर लोगों ने भाग लिया — किसान, व्यापारी, महिलाएँ। सरकार ने कठोर दमन किया, गांधीजी सहित हज़ारों नेताओं को गिरफ़्तार किया गया।

1931 में गांधी-इरविन समझौता (Gandhi-Irwin Pact) हुआ, जिसके तहत गांधीजी ने आंदोलन स्थगित किया और दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन (Round Table Conference) में भाग लेने लंदन गए। सम्मेलन असफल रहा, अतः गांधीजी वापस लौटकर सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः शुरू किया, पर सरकार के कठोर दमन के आगे यह 1934 तक धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ गया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन को विभिन्न वर्गों ने कैसे देखा

धनी किसान समुदाय

गुजरात के पटीदार तथा उत्तर प्रदेश के जाट जैसे समृद्ध किसान समुदाय, जो व्यापारिक फसलें उगाते थे तथा मंदी और गिरती कीमतों से अत्यंत प्रभावित थे, आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए। इनकी मुख्य माँग थी — लगान में कमी। इन्होंने पूर्ण स्वराज की माँग के प्रति अपनी निष्ठा दिखाई, परंतु जब 1931 में आंदोलन बिना लगान की दर घटाए वापस लिया गया, तो ये निराश हुए और 1932 में आंदोलन के दूसरे चरण में उन्होंने भागीदारी से इनकार कर दिया।

गरीब किसान

गरीब भूमिहीन किसान केवल लगान में कमी से संतुष्ट नहीं थे — कई क्षेत्रों में वे चाहते थे कि उन्हें ज़मींदारों को दिया जाने वाला लगान माफ़ हो। वे कई मूलगामी (radical) आंदोलनों में शामिल हुए, जिनका नेतृत्व अक्सर समाजवादियों (socialists) और कम्युनिस्टों (communists) ने किया, हालाँकि कांग्रेस इन क्रांतिकारी माँगों को खुलकर समर्थन देने में हिचकिचाती थी, क्योंकि इससे अमीर किसान व ज़मींदार नाराज़ हो सकते थे।

व्यापारिक वर्ग

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने भारी मुनाफ़ा कमाया, और अपने व्यापार का विस्तार चाहते थे। उन्होंने औपनिवेशिक नीतियों का विरोध किया, जो भारतीय व्यापार के विकास को सीमित करती थीं। पूर्ण स्वराज्य को उन्होंने ऐसे युग के रूप में देखा जहाँ व्यापार व उद्योग पर लगे प्रतिबंध हटा दिए जाएँगे तथा विनिमय दर (exchange rate) पर स्वदेशी नियंत्रण होगा। वे स्वदेशी आंदोलन के प्रबल समर्थक थे तथा विदेशी वस्तुओं के आयात के विरोधी थे। 1927 में उन्होंने भारतीय औद्योगिक व वाणिज्यिक कांग्रेस (Indian Industrial and Commercial Congress) तथा 1927 में फिक्की (FICCI — Federation of Indian Chambers of Commerce and Industry) का गठन किया, तथा पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव व सविनय अवज्ञा आंदोलन को समर्थन दिया।

औद्योगिक श्रमिक वर्ग

औद्योगिक मज़दूर वर्ग सविनय अवज्ञा आंदोलन में बड़ी संख्या में शामिल नहीं हुआ, सिवाय कुछ क्षेत्रों जैसे नागपुर के — जहाँ मज़दूरों ने बहिष्कार आंदोलन में भाग लिया, विदेशी कपड़ों की होली जलाई। परंतु सामान्यतः कांग्रेस मज़दूरों की माँगों को अपने कार्यक्रम में शामिल करने में हिचकिचाई, यह सोचकर कि इससे व्यापारी वर्ग नाराज़ हो जाएँगे। फिर भी 1930 के दशक में कुछ मज़दूरों ने अपने-अपने तरीके से आंदोलन को अपनाया, जैसे — रेलवे कर्मचारी व बंदरगाह मज़दूरों की हड़तालें (1930 में छोटानागपुर टिन खान मज़दूर) — गांधीवादी विचारों को अपने ढंग से जोड़ते हुए।

महिलाओं की भागीदारी

सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी एक विशेष विशेषता थी। हज़ारों महिलाएँ गाँवों-कस्बों से निकलकर नमक कानून तोड़ने, धरना देने, विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों पर धरना देने में शामिल हुईं। गांधीजी इसे महिलाओं के कर्तव्य के रूप में देखते थे, परंतु उन्होंने महिलाओं को केवल गृहिणी की भूमिका में ही रखा — पहले उन्हें सत्याग्रह की मार्च में भाग लेने की अनुमति भी नहीं दी गई थी। महिलाओं की भागीदारी के बावजूद कांग्रेस संगठन में उन्हें किसी निर्णायक पद पर बहुत कम स्थान मिला।

सविनय अवज्ञा आंदोलन की सीमाएँ

अछूत (दलित) समुदाय और गांधी-अंबेडकर मतभेद

राष्ट्रीय आंदोलन में सभी सामाजिक समूह उत्साह से शामिल नहीं हुए। अछूत (Untouchables/Dalits) — जिन्हें गांधीजी ‘हरिजन’ अर्थात ईश्वर की संतान कहते थे — इस बड़े राजनीतिक बदलाव को अपनी सामाजिक स्थिति सुधारने के एक अवसर के रूप में देखते थे। कांग्रेस ने इन्हें अपने साथ लाने का प्रयास किया, गांधीजी ने घोषणा की कि स्वराज तब तक नहीं आ सकता जब तक अस्पृश्यता (untouchability) समाप्त नहीं होती। उन्होंने मंदिर प्रवेश आंदोलन तथा कुओं व सड़कों तक पहुँच के लिए संघर्ष किया।

परंतु कुछ दलित नेता, विशेष रूप से डॉ. भीमराव अंबेडकर, दलितों के लिए एक अलग राजनीतिक समाधान चाहते थे। उन्होंने 1930 में दलित वर्ग महासंघ (Depressed Classes Association) का आयोजन किया तथा दलितों के लिए अलग निर्वाचन-क्षेत्रों (separate electorates) की माँग रखी। जब ब्रिटिश सरकार ने अंबेडकर की माँग स्वीकार करते हुए 1932 में दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका प्रदान की, तो गांधीजी ने पूना (यरवदा जेल) में इसके विरोध में आमरण अनशन शुरू किया — उनका मानना था कि पृथक निर्वाचन-क्षेत्र दलितों को समाज से हमेशा के लिए अलग कर देंगे।

पूना पैक्ट (सितंबर 1932): गांधीजी के अनशन के दबाव में अंबेडकर को पृथक निर्वाचिका की माँग वापस लेनी पड़ी। इसके बदले प्रांतीय व केंद्रीय विधान परिषदों में दलितों के लिए आरक्षित सीटों (reserved seats) का प्रावधान किया गया, जिन्हें सामान्य निर्वाचकों द्वारा चुना जाना था। इस समझौते को पूना पैक्ट कहा जाता है। इसके बावजूद कांग्रेस के प्रयासों से दलित समुदाय राष्ट्रीय आंदोलन में पूरी तरह जुड़ नहीं सका।

मुस्लिम राजनीतिक संगठन और पृथक निर्वाचिका

1920 के दशक के मध्य के बाद से मुस्लिम राजनीतिक संगठनों में कांग्रेस से दूरी बढ़ने लगी। खिलाफत आंदोलन की समाप्ति और हिंदू संगठनों (शुद्धि आंदोलन) की सक्रियता के बाद कुछ मुस्लिम नेताओं में यह डर बढ़ा कि हिंदू-बहुल समाज में उनके धार्मिक-सांस्कृतिक अधिकार सुरक्षित नहीं रहेंगे।

1928 में जब मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट (Nehru Report) ने मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचिका के बजाय संयुक्त निर्वाचिका (joint electorates) का प्रस्ताव रखा तो मुस्लिम लीग के एक वर्ग को यह अस्वीकार्य लगा — वे केंद्रीय विधानसभा में आरक्षित सीटों के साथ पृथक निर्वाचिका बनाए रखना चाहते थे। इस कारण 1930 में जब सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ, तो कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सुलह की संभावनाएँ धूमिल हो गईं और आंदोलन में मुस्लिम समुदाय की सीमित भागीदारी रही, विशेषकर उत्तर प्रदेश जैसे प्रांतों में, जहाँ मुस्लिम मध्यवर्ग को यह डर था कि हिंदू-बहुल क्षेत्रों में उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम हो जाएगी।

सामूहिक अपनत्व की भावना (The Sense of Collective Belonging)

राष्ट्रवाद तब फैलता है जब विभिन्न समूहों के लोग एक साझा बंधन (एकजुटता) महसूस करते हैं। यह भावना कई सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से आई — लोककथाओं, गीतों, प्रतीकों तथा इतिहास की पुनर्व्याख्या के माध्यम से।

भारत माता की छवि

राष्ट्रवाद के विकास में सबसे शक्तिशाली प्रतीक भारत माता की छवि थी, जिसे सबसे पहले बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास में गढ़ा। बाद में अवनींद्रनाथ टैगोर ने भारत माता की एक प्रसिद्ध छवि चित्रित की, जिसमें उन्हें शांत, दिव्य और आध्यात्मिक रूप में दिखाया गया। इस भावनात्मक प्रतीक ने भारतीयों को अपनी मातृभूमि के प्रति भक्ति व एकता की भावना से जोड़ा।

लोककथाएँ और गीत

राष्ट्रवाद फैलाने के लिए लोककथाओं (folklore) का पुनरुद्धार किया गया। राष्ट्रवादियों ने लोक-गीत, लोक-कथाएँ इकट्ठा करने शुरू किए ताकि राष्ट्रीय इतिहास और लोक-संस्कृति की सही तस्वीर पेश की जा सके, और यह उपनिवेशवादियों द्वारा फैलाई गई विकृत जानकारी के विरुद्ध एक आंदोलन बन गया। बंगाल में लोक-गीत एकत्रित किए गए, और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपना प्रसिद्ध गीत ‘वंदे मातरम्’ रचा — जो 1870 के दशक में मातृभूमि की स्तुति के रूप में लिखा गया और स्वदेश-प्रेम (patriotism) का प्रबल गीत बना, जिसे स्वदेशी आंदोलन के दौरान व्यापक रूप से गाया गया।

प्रतीकों का महत्व

स्वदेशी आंदोलन (1905) के दौरान एक तिरंगा झंडा (लाल, हरा और पीला) बनाया गया, जिस पर आठ प्रांतों को दर्शाते हुए कमल के फूल तथा एक अर्धचंद्र (हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक) अंकित थे। 1921 तक गांधीजी ने स्वराज ध्वज (स्वदेशी चरखे के साथ) तैयार किया। झंडा फहराना और उसके साथ जुलूस निकालना स्वयं में अवज्ञा तथा एकता का प्रतीक बन गया।

इतिहास की पुनर्व्याख्या

बीसवीं सदी की शुरुआत में भारतीयों ने भारत के गौरवशाली अतीत की, आधुनिक ब्रिटिश शासन के तहत हो रहे पतन के विपरीत, फिर से खोज करनी शुरू की। इतिहास-लेखन के माध्यम से भारतीयों को याद दिलाया गया कि प्राचीन काल में भारत ने कला, वास्तुकला, विज्ञान व गणित, धर्म व संस्कृति, व्यापार व वाणिज्य में महान उपलब्धियाँ हासिल कीं। यह गौरवशाली इतिहास इस विचार का विरोध करता था कि भारतीय पिछड़े व अयोग्य हैं तथा उन्हें उन्नति के लिए ब्रिटिश शासन की आवश्यकता है — इस प्रकार राष्ट्रीय गर्व की भावना जगाकर राष्ट्रवाद को बल मिला।

इन सभी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं — भारत माता की छवि, गीत-लोककथाएँ, प्रतीक तथा इतिहास की पुनर्व्याख्या — के माध्यम से भारतीयों में एक साझा सामूहिक पहचान की भावना विकसित हुई, जिसने राष्ट्रीय आंदोलन को शक्ति दी। परंतु यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह सामूहिक अपनत्व एकसमान नहीं था — विभिन्न समूहों के लिए इसका अर्थ भिन्न-भिन्न रहा, और यही असहमतियाँ आगे चलकर स्वतंत्र भारत की जटिल राजनीति को आकार देती रहीं।

मुख्य बिंदु

  • प्रथम विश्व युद्ध ने भारत में करों, महँगाई और महामारी के कारण व्यापक असंतोष पैदा किया।
  • गांधीजी ने चंपारण (1917), खेड़ा (1917) और अहमदाबाद (1918) में सफल सत्याग्रह आंदोलन चलाए।
  • रॉलेट एक्ट (1919) के विरोध में जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919) हुआ।
  • खिलाफत मुद्दे को आधार बनाकर 1920 में असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ, जो जनवरी 1921 में गति पकड़ा।
  • फरवरी 1922 में चौरी चौरा कांड के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया।
  • अवध के किसानों (बाबा रामचंद्र), गुडेम पहाड़ियों के आदिवासियों (अल्लूरी सीताराम राजू) और असम के बागान मज़दूरों ने आंदोलन को अपने-अपने ढंग से अपनाया।
  • 1928 में साइमन कमीशन का “साइमन वापस जाओ” के नारों से विरोध हुआ — इसमें कोई भारतीय सदस्य नहीं था।
  • 12 मार्च से 6 अप्रैल 1930 तक दांडी यात्रा हुई, जिसके साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ।
  • धनी किसान, गरीब किसान, व्यापारी वर्ग, औद्योगिक मज़दूर और महिलाओं ने आंदोलन को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा और भाग लिया।
  • डॉ. अंबेडकर ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका की माँग की; गांधीजी के अनशन के बाद 1932 में पूना पैक्ट हुआ, जिसमें आरक्षित सीटों का प्रावधान हुआ।
  • मुस्लिम राजनीतिक संगठनों की कांग्रेस से दूरी 1928 की नेहरू रिपोर्ट के बाद बढ़ी।
  • भारत माता की छवि, लोककथाओं-गीतों (वंदे मातरम्), तिरंगे झंडे और इतिहास की पुनर्व्याख्या से सामूहिक राष्ट्रीय पहचान की भावना विकसित हुई।

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