पाठ – 5
खनिज तथा ऊर्जा संसाधन
In this post we have given the detailed notes of class 10 Social Science (Geography) chapter 5 Minerals and Energy Resources in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (भूगोल) के पाठ 5 खनिज तथा ऊर्जा संसाधन के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है।
| Board | CBSE Board, JAC Board, RBSE Board, MPBSE Board, UBSE Board |
| Textbook | NCERT — Contemporary India-II (Reprint 2026-27) |
| Class | Class 10 |
| Subject | Social Science (Geography) |
| Chapter no. | Chapter 5 |
| Chapter Name | खनिज तथा ऊर्जा संसाधन (Minerals and Energy Resources) |
| Category | Class 10 SST Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 5, खनिज तथा ऊर्जा संसाधन
खनिज क्या है?
खनिज एक सजातीय (homogeneous) पदार्थ है जो प्राकृतिक रूप से पाया जाता है तथा जिसकी एक निश्चित आंतरिक संरचना होती है। खनिज प्रकृति में विभिन्न रूपों में पाए जाते हैं, सबसे कठोर हीरे से लेकर सबसे मुलायम टेल्क तक।
- भूवैज्ञानिकों के अनुसार खनिज “एक निश्चित आंतरिक संरचना वाला सजातीय प्राकृतिक पदार्थ” है।
- खनिज सामान्यतः “अयस्क (ores)” में पाए जाते हैं। अयस्क शब्द का प्रयोग किसी खनिज के अन्य तत्वों के साथ मिश्रित संचयन के लिए किया जाता है।
- अयस्क का निष्कर्षण उसकी सांद्रता (concentration) और निष्कर्षण की सरलता पर निर्भर करता है।
खनिजों की विशेषताएँ
- प्रत्येक खनिज का एक निश्चित रासायनिक संगठन (chemical composition) होता है, जिसे किसी भी ज्ञात भौतिक अथवा रासायनिक विधि से उप-विभाजित नहीं किया जा सकता।
- अब तक 2,000 से अधिक खनिजों की पहचान की जा चुकी है, लेकिन केवल कुछ ही अधिकांश चट्टानों में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
- खनिज सामान्यतः चट्टानों से संबंधित होते हैं; वे किस प्रकार की चट्टान में मिलेंगे यह उनके निर्माण की प्रक्रिया पर निर्भर करता है।
खनिजों की प्राप्ति के तरीके (Mode of Occurrence)
खनिज सामान्यतः पृथ्वी की पर्पटी (crust) में निम्नलिखित रूपों में पाए जाते हैं:
1. आग्नेय एवं कायांतरित चट्टानों में
- खनिज दरारों, संधियों (crevices), भ्रंशों (faults) या जोड़ों में मिल सकते हैं। छोटे निक्षेपों को शिराएँ (veins) तथा बड़े निक्षेपों को पट्टी अथवा लॉड (lodes) कहा जाता है।
- अधिकांश मामलों में जब खनिज द्रव अथवा गलित एवं गैसीय रूप में ऊपर की ओर धकेले जाते हैं, तो वे दरारों से होते हुए ऊपर आते हैं।
- ऊपर उठते समय ये ठंडे होकर ठोस बन जाते हैं। उदाहरण: टिन, तांबा, जस्ता तथा सीसा।
2. अवसादी चट्टानों में
- कई खनिज परतों अथवा संस्तरों (beds/layers) के रूप में पाए जाते हैं। इनका निर्माण निक्षेपण, संचयन तथा क्षैतिज स्तरों में सांद्रण के फलस्वरूप होता है।
- ये गुरुत्वाकर्षण तथा दबाव के कारण इस रूप में पाए जाते हैं, तथा वाष्पीकरण के फलस्वरूप भी बन सकते हैं, विशेषकर जिप्सम, पोटाश लवण तथा सोडियम लवण के मामले में।
- कोयला तथा लौह अयस्क के कुछ रूप कार्बनिक पदार्थों के संचयन तथा लंबे समय तक संपीडन से बने हैं।
3. सतही चट्टानों का अपघटन (Decomposition)
- चट्टानों का अपघटन, घुलनशील तत्वों का निष्कासन, तथा बचे हुए अघुलनशील पदार्थ अवशिष्ट खनिज (residual minerals) बनाते हैं।
- इस प्रकार के निक्षेप उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
- उदाहरण: बॉक्साइट इसी प्रकार बनता है, साथ ही अवशिष्ट मिट्टी (residual clays) भी।
4. जलोढ़ निक्षेप (Placer Deposits)
- जो खनिज जलोढ़ निक्षेप के रूप में, घाटी के तल तथा पहाड़ियों की तलहटी की बालू में पाए जाते हैं, उन्हें प्लेसर निक्षेप कहा जाता है।
- ये निक्षेप वहाँ पाए जाते हैं जहाँ खनिज ऑक्सीकरण (oxidation) से गुजरे बिना तथा भारी होने के कारण जमा हो जाते हैं।
- इस रूप में पाए जाने वाले खनिजों के उदाहरण हैं — सोना, चांदी, टिन तथा प्लैटिनम।
5. महासागरीय जल में
- महासागरीय जल में अपार मात्रा में खनिज पाए जाते हैं, परंतु अधिकांश इतने तनु (dilute) होते हैं कि उनका आर्थिक रूप से निष्कर्षण संभव नहीं है।
- फिर भी, साधारण नमक, मैग्नीशियम तथा ब्रोमीन मुख्यतः महासागरीय जल से ही प्राप्त होते हैं।
- महासागरीय तल भी मैंगनीज पिंडों (manganese nodules) से समृद्ध हैं।
लौह खनिज (Ferrous Minerals)
लौह खनिज धात्विक खनिजों के कुल उत्पादन मूल्य का लगभग तीन-चौथाई भाग हैं। ये धात्विक (metallurgical) उद्योगों के विकास के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं।
लौह अयस्क (Iron Ore)
- लौह अयस्क एक आधारभूत खनिज है और औद्योगिक विकास की रीढ़ है।
- हेमेटाइट: सर्वोत्तम गुणवत्ता का लौह अयस्क, जिसमें 70 प्रतिशत तक शुद्ध लौह अंश होता है; इसमें चुंबकीय गुण होते हैं।
- मैग्नेटाइट: रासायनिक दृष्टि से सर्वाधिक मूल्यवान अयस्क, क्योंकि इसमें 72 प्रतिशत तक लौह अंश पाया जाता है।
- भारत में ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक तथा गोवा लौह अयस्क के प्रमुख उत्पादक हैं।
भारत की लौह अयस्क पेटियाँ
- ओडिशा-झारखंड पेटी: ओडिशा में उच्च कोटि का हेमेटाइट अयस्क मयूरभंज तथा केंदुझर जिलों की बादामपहाड़ खानों में पाया जाता है। झारखंड के सिंहभूम जिले में भी लौह अयस्क की खानें एक पेटी के रूप में मिलती हैं।
- दुर्ग-बस्तर-चंद्रपुर पेटी: यह छत्तीसगढ़ तथा महाराष्ट्र में स्थित है। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले की बैलाडीला पहाड़ी श्रेणी में अत्यंत उच्च कोटि का हेमेटाइट पाया जाता है।
- बेल्लारी-चित्रदुर्ग-चिकमगलूर-तुमकुर पेटी: कर्नाटक में स्थित है और यहाँ लौह अयस्क के विशाल भंडार हैं।
- महाराष्ट्र-गोवा पेटी: इसमें गोवा राज्य तथा महाराष्ट्र का रत्नागिरी जिला शामिल है; यद्यपि यहाँ का अयस्क अधिक उच्च कोटि का नहीं है, फिर भी इसका कुशलतापूर्वक दोहन किया जाता है।
मैंगनीज (Manganese)
- मैंगनीज का मुख्य उपयोग इस्पात तथा फेरो-मैंगनीज मिश्रधातु (alloy) के निर्माण में होता है।
- एक टन इस्पात के निर्माण के लिए लगभग 10 किग्रा मैंगनीज आवश्यक होता है।
- इसका प्रयोग विरंजक चूर्ण (bleaching powder), कीटनाशक तथा रंग-रोगन (paints) के निर्माण में भी किया जाता है।
- ओडिशा भारत में मैंगनीज अयस्क का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है।
अलौह खनिज (Non-Ferrous Minerals)
अलौह खनिजों के मामले में भारत का भंडार तथा उत्पादन बहुत संतोषजनक नहीं है। फिर भी तांबा, बॉक्साइट, सीसा, जस्ता तथा सोना जैसे खनिज उद्योगों में उपयोग किए जाते हैं।
तांबा (Copper)
- तांबा तन्य (malleable) तथा नमनीय (ductile) होता है और विद्युत का सुचालक है, इसलिए इसका उपयोग मुख्यतः विद्युत केबल, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा रासायनिक उद्योगों में होता है।
- मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा झारखंड भारत में तांबे के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं।
बॉक्साइट (Bauxite)
- बॉक्साइट के निक्षेप मुख्यतः टर्शियरी निक्षेपों में पाए जाते हैं तथा लेटराइट चट्टानों से जुड़े होते हैं, और प्रायद्वीपीय पठारी क्षेत्र में व्यापक रूप से फैले हैं।
- बॉक्साइट वह अयस्क है जिससे एल्युमिनियम का निर्माण होता है। एल्युमिनियम एक महत्वपूर्ण धातु है क्योंकि इसमें हल्केपन के साथ-साथ इस्पात जैसी मजबूती भी होती है।
- ओडिशा भारत में बॉक्साइट का सबसे बड़ा उत्पादक है, इसके बाद आंध्र प्रदेश, गुजरात तथा झारखंड का स्थान आता है।
चट्टानी खनिज — अभ्रक (Mica)
- अभ्रक कई परतों या पत्तियों (plates/leaves) से मिलकर बना होता है और आसानी से पतली चादरों में विभाजित हो जाता है।
- अभ्रक पारदर्शी, काला, हरा, लाल, पीला अथवा भूरा हो सकता है।
- अपनी उत्कृष्ट परावैद्युत क्षमता (di-electric strength), निम्न शक्ति-हानि गुणांक, विद्युतरोधी गुणों तथा उच्च वोल्टता को सहन करने की क्षमता के कारण, अभ्रक विद्युत तथा इलेक्ट्रॉनिक उद्योग में सबसे अनिवार्य खनिजों में से एक है।
- अभ्रक के निक्षेप झारखंड के छोटानागपुर पठार के उत्तरी किनारे पर, आंध्र प्रदेश के मध्य भाग में, तथा राजस्थान में अजमेर के आस-पास पाए जाते हैं।
- आंध्र प्रदेश की नेल्लोर अभ्रक पेटी भी अच्छी गुणवत्ता के अभ्रक के लिए प्रसिद्ध है।
खनिजों का संरक्षण (Conservation of Minerals)
- पृथ्वी की पर्पटी में कार्यशील खनिज निक्षेपों का कुल आयतन केवल 1 प्रतिशत ही है, और ये खनिज निक्षेप अनवीकरणीय (non-renewable) हैं तथा निरंतर उपयोग से समाप्त हो सकते हैं।
- समृद्ध खनिज भंडार लगातार घट रहे हैं, जिससे निष्कर्षण की लागत बढ़ती है और परिणामस्वरूप खनिजों की कीमत भी बढ़ जाती है।
- हमारे खनिज संसाधनों का नियोजित तथा सतत (sustainable) तरीके से उपयोग करने के लिए ठोस प्रयास आवश्यक हैं।
- निम्न कोटि के अयस्कों का कम लागत में उपयोग करने हेतु निरंतर बेहतर प्रौद्योगिकी विकसित करने की आवश्यकता है।
- धातुओं का पुनर्चक्रण (recycling), स्क्रैप धातु का उपयोग तथा खनिजों के स्थान पर विकल्पों (substitutes) का प्रयोग भी भविष्य के लिए खनिज संसाधनों के संरक्षण में सहायक होगा।
ऊर्जा संसाधन (Energy Resources)
ऊर्जा सभी गतिविधियों के लिए आवश्यक है। इसकी आवश्यकता भोजन पकाने, प्रकाश तथा ऊष्मा प्रदान करने, वाहनों को चलाने तथा उद्योगों में मशीनों को संचालित करने के लिए होती है। ऊर्जा कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस जैसे ईंधन खनिजों से, विद्युत से, तथा नाभिकीय ऊर्जा संसाधनों से उत्पन्न की जा सकती है।
परंपरागत ऊर्जा स्रोत (Conventional Sources)
- जलाऊ लकड़ी, कंडा (cattle dung cake), कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस तथा विद्युत (जलविद्युत एवं तापविद्युत दोनों)।
- ये स्रोत व्यापक रूप से प्रयुक्त होते हैं, अनवीकरणीय हैं (जलाऊ लकड़ी तथा जलविद्युत को छोड़कर), और जलाने पर प्रदूषण फैलाते हैं।
गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत (Non-Conventional Sources)
- सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, बायोगैस तथा नाभिकीय/परमाणु ऊर्जा।
- ये स्रोत नवीकरणीय (renewable), पर्यावरण के अनुकूल हैं और इन्हें भविष्य के ऊर्जा स्रोत माना जाता है।
कोयला (Coal)
- कोयला एक जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) है जो लाखों वर्षों में वनस्पति के संचयन, दबने तथा संपीडन से बनता है।
- भारत में कोयला मुख्यतः दो युगों की चट्टान श्रेणियों में पाया जाता है — गोंडवाना, जो लगभग 200 मिलियन वर्ष से कुछ अधिक पुराना है, तथा टर्शियरी निक्षेप, जो लगभग 55 मिलियन वर्ष पुराने हैं।
- गोंडवाना कोयला निक्षेप दामोदर घाटी (पश्चिम बंगाल-झारखंड), गोदावरी, महानदी, सोन तथा वर्धा घाटियों में पाए जाते हैं।
- टर्शियरी कोयला मेघालय, असम, पश्चिम बंगाल तथा नागालैंड में मिलता है।
- कोयले का उपयोग तापविद्युत उत्पन्न करने तथा भट्टियों में लौह अयस्क को गलाने में किया जाता है।
- एंथ्रेसाइट (Anthracite): सर्वोच्च कोटि का कठोर कोयला।
- बिटुमिनस (Bituminous): गहरी परतों में पाया जाता है, अत्यधिक ऊष्मा तथा दबाव से बनता है — वाणिज्यिक उपयोग के लिए सबसे अधिक प्रयुक्त।
- लिग्नाइट (Lignite): निम्न कोटि का भूरा कोयला, नरम तथा अधिक नमी वाला। तमिलनाडु के नेवेली में मिलने वाले निक्षेपों का उपयोग विद्युत उत्पादन में होता है।
- पीट (Peat): निर्माण की प्रारंभिक अवस्था, कम कार्बन-अंश तथा कम ऊष्मीय क्षमता वाला।
पेट्रोलियम (Petroleum)
- पेट्रोलियम को “काला सोना” कहा जाता है। इसे प्रायः तरल स्वर्ण (liquid gold) भी कहा जाता है, क्योंकि इसका महत्व बहुत अधिक है।
- पेट्रोलियम शोधनशालाएँ (refineries) संश्लेषित वस्त्र, उर्वरक तथा अनेक रासायनिक उद्योगों के लिए एक “केंद्रीय उद्योग (nodal industry)” का कार्य करती हैं।
- प्राप्ति स्थान: भारत के पेट्रोलियम उत्पादन का लगभग 63 प्रतिशत मुंबई हाई से, 18 प्रतिशत गुजरात से तथा 16 प्रतिशत असम से प्राप्त होता है।
- गुजरात में अंकलेश्वर सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है। असम में डिगबोई, नहरकटिया तथा मोरन-हुगरीजान महत्वपूर्ण तेल क्षेत्र हैं।
- पेट्रोलियम का उपयोग वाहनों, औद्योगिक मशीनों को चलाने तथा उर्वरक, कृत्रिम रबर तथा अन्य कई रासायनिक उत्पाद बनाने में किया जाता है।
प्राकृतिक गैस (Natural Gas)
- प्राकृतिक गैस एक महत्वपूर्ण स्वच्छ तथा पर्यावरण के अनुकूल ईंधन स्रोत है, जो पेट्रोलियम के साथ अथवा उसके बिना भी पाया जाता है।
- इसका उपयोग ऊर्जा स्रोत के साथ-साथ पेट्रो-रसायन (petrochemical) उद्योग में कच्चे माल के रूप में भी किया जाता है।
- भारत के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस भंडार कृष्णा-गोदावरी द्रोणी (basin) में स्थित हैं।
- पश्चिमी तट के किनारे, मुंबई हाई तथा उससे जुड़े क्षेत्र, और गुजरात की खंभात की खाड़ी भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
- 1,700 किमी लंबी हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर (HBJ) देश-व्यापी गैस पाइपलाइन मुंबई हाई तथा बेसीन को पश्चिमी तथा उत्तरी भारत के उर्वरक, विद्युत तथा औद्योगिक परिसरों से जोड़ती है।
- इस पाइपलाइन ने गैस-आधारित उर्वरक तथा विद्युत उद्योगों के विकास को बड़ा प्रोत्साहन दिया है।
विद्युत (Electricity)
आज के युग में विद्युत का इतना व्यापक उपयोग है कि इसकी प्रति व्यक्ति खपत को विकास के सूचकांक के रूप में माना जाता है। विद्युत मुख्यतः दो तरीकों से उत्पन्न की जाती है:
1. जल-विद्युत (Hydro Electricity)
- तेज बहते जल से उत्पन्न होती है, जो एक नवीकरणीय संसाधन है।
- भारत में भाखड़ा नांगल, दामोदर घाटी निगम, कोपिली जलविद्युत परियोजना जैसी अनेक बहुउद्देशीय परियोजनाएँ जलविद्युत उत्पन्न कर रही हैं।
2. ताप-विद्युत (Thermal Electricity)
- कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस का उपयोग करके उत्पन्न की जाती है।
- यह विद्युत उत्पादन हेतु अनवीकरणीय जीवाश्म ईंधनों का उपयोग करती है।
जलविद्युत तथा ताप-विद्युत दोनों ही आवश्यक हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि जलविद्युत पर्याप्त तथा निरंतर जल प्रवाह पर निर्भर करती है (जो मौसम के अनुसार बदलती रहती है), जबकि ताप-विद्युत ईंधन की निरंतर आपूर्ति पर निर्भर करती है।
गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत
गैर-परंपरागत स्रोतों की आवश्यकता
- ऊर्जा की बढ़ती खपत ने देश में एक गंभीर ऊर्जा संकट पैदा कर दिया है।
- जीवाश्म ईंधनों के बढ़ते उपयोग से प्रदूषण जैसी पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं।
- जीवाश्म ईंधन, जो लाखों वर्षों में बनते हैं, समाप्त होने योग्य (exhaustible) तथा अनवीकरणीय हैं, अतः इनका विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है।
- यह स्थिति सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, जैव-भार (biomass), अपशिष्ट पदार्थों से ऊर्जा तथा नाभिकीय ऊर्जा जैसे गैर-परंपरागत स्रोतों की ओर ध्यान केंद्रित करने की मांग करती है।
नाभिकीय अथवा परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy)
- यह परमाणुओं की संरचना में परिवर्तन करके प्राप्त की जाती है।
- झारखंड तथा राजस्थान की अरावली पहाड़ियों में उपलब्ध यूरेनियम तथा थोरियम का उपयोग नाभिकीय अथवा परमाणु ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।
- केरल की मोनाजाइट बालू (monazite sands) भी नाभिकीय ऊर्जा का एक स्रोत है।
सौर ऊर्जा (Solar Energy)
- भारत एक उष्णकटिबंधीय देश है, जहाँ सौर ऊर्जा के दोहन की अपार संभावनाएँ हैं।
- फोटोवोल्टिक तकनीक सूर्य के प्रकाश को सीधे विद्युत में परिवर्तित करती है।
- भारत का सबसे बड़ा सौर संयंत्र भुज के निकट माधापुर में स्थित है, जहाँ सौर ऊर्जा का उपयोग दूध के डिब्बों को स्टरलाइज करने में किया जाता है।
- सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय सौर मिशन (National Solar Mission) लागू किया जा रहा है।
पवन ऊर्जा (Wind Power)
- भारत में पवन ऊर्जा की अपार संभावनाएँ हैं, तथा देश का सबसे बड़ा पवन ऊर्जा फार्म समूह तमिलनाडु में नागरकोइल से मदुरई तक स्थित है।
- अन्य महत्वपूर्ण पवन ऊर्जा स्थल आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, केरल, महाराष्ट्र तथा लक्षद्वीप में स्थित हैं।
बायोगैस (Biogas)
- बायोगैस झाड़ियों, कृषि अपशिष्ट, पशु तथा मानव अपशिष्ट से बायोगैस संयंत्रों के माध्यम से उत्पन्न की जाती है।
- यह घरेलू उपयोग के लिए एक कुशल तथा पर्यावरण-अनुकूल ईंधन प्रदान करती है, तथा बचा हुआ अपघटित घोल (slurry) खाद के रूप में उपयोग होता है।
- ग्रामीण भारत में इन संयंत्रों को गोबर गैस संयंत्र के नाम से जाना जाता है।
ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy)
- महासागरीय ज्वार-भाटे का उपयोग विद्युत उत्पादन में किया जा सकता है। इसके लिए संकरे प्रवेश द्वारों (inlets) पर द्वार-बाँध (floodgate dams) बनाए जाते हैं।
- भारत में गुजरात की खंभात की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी तथा पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र में ज्वारीय ऊर्जा की अपार संभावनाएँ हैं।
भूतापीय ऊर्जा (Geothermal Energy)
- भूतापीय ऊर्जा पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा का उपयोग करके उत्पन्न ऊष्मा तथा विद्युत को कहते हैं।
- भारत में सैकड़ों गर्म जल स्रोत (hot springs) हैं, जिनका उपयोग विद्युत उत्पादन के लिए किया जा सकता है।
- इस ऊर्जा के दोहन के लिए भारत में दो प्रायोगिक परियोजनाएँ स्थापित की गई हैं — एक हिमाचल प्रदेश के मणिकर्ण के निकट पार्वती घाटी में, तथा दूसरी लद्दाख की पुगा घाटी में।
ऊर्जा संसाधनों का संरक्षण
- ऊर्जा आर्थिक विकास की एक बुनियादी आवश्यकता है, तथा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र को ऊर्जा के निवेश की आवश्यकता होती है।
- आर्थिक विकास योजनाओं में देश के भीतर ऊर्जा संसाधनों के उत्पादन को बढ़ाने पर विशेष बल दिया जाता है।
- ऊर्जा संरक्षण को बढ़ावा देना तथा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के उपयोग में वृद्धि करना, दोनों ही एक सतत ऊर्जा नीति के आधार-स्तंभ हैं।
- अर्थव्यवस्था तथा पर्यावरण दोनों के हित में, हमें उपलब्ध ऊर्जा संसाधनों का संतुलित उपयोग करते हुए उनका संरक्षण करना चाहिए।
- अनावश्यक होने पर बिजली बंद करना, व्यक्तिगत वाहनों के स्थान पर सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना तथा ऊर्जा-दक्ष उपकरणों का उपयोग करना जैसे सरल कदम ऊर्जा संरक्षण में सहायक हो सकते हैं।
मुख्य बिंदु
- खनिज एक सजातीय, प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला पदार्थ है जिसकी निश्चित आंतरिक संरचना तथा निश्चित रासायनिक संगठन होता है।
- खनिज शिराओं/लॉड (आग्नेय व कायांतरित चट्टानों), परतों (अवसादी चट्टानों), सतही चट्टानों के अपघटन (बॉक्साइट), जलोढ़/प्लेसर निक्षेपों (सोना, टिन, प्लैटिनम) तथा महासागरीय जल (साधारण नमक, मैग्नीशियम, ब्रोमीन) में पाए जाते हैं।
- लौह खनिजों में लौह अयस्क (हेमेटाइट, मैग्नेटाइट) तथा मैंगनीज शामिल हैं; भारत की लौह अयस्क पेटियाँ हैं — ओडिशा-झारखंड, दुर्ग-बस्तर-चंद्रपुर, बेल्लारी-चित्रदुर्ग-चिकमगलूर-तुमकुर तथा महाराष्ट्र-गोवा।
- अलौह खनिजों में तांबा तथा बॉक्साइट शामिल हैं; अभ्रक एक चट्टानी खनिज है जो विद्युत उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- खनिज अनवीकरणीय हैं, अतः पुनर्चक्रण, विकल्पों के उपयोग तथा बेहतर प्रौद्योगिकी के माध्यम से इनका संरक्षण आवश्यक है।
- परंपरागत ऊर्जा स्रोत हैं — कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस तथा विद्युत (जल-विद्युत/ताप-विद्युत); गैर-परंपरागत स्रोत हैं — सौर, पवन, ज्वारीय, भूतापीय, बायोगैस तथा परमाणु ऊर्जा।
- गुणवत्ता के क्रम में कोयले के प्रकार हैं — एंथ्रेसाइट, बिटुमिनस, लिग्नाइट तथा पीट; गोंडवाना तथा टर्शियरी निक्षेप भारत की दो प्रमुख कोयला-युक्त श्रेणियाँ हैं।
- मुंबई हाई भारत का सबसे बड़ा पेट्रोलियम स्रोत है; HBJ पाइपलाइन पश्चिमी तथा उत्तरी भारत में प्राकृतिक गैस पहुँचाती है।
- राष्ट्रीय सौर मिशन सौर ऊर्जा को बढ़ावा देता है; तमिलनाडु पवन ऊर्जा में अग्रणी है; मणिकर्ण तथा पुगा घाटी में भूतापीय ऊर्जा का दोहन किया जाता है।
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