पाठ – 1
संसाधन एवं विकास
In this post we have given the detailed notes of class 10 Social Science (Geography) chapter 1 Resources and Development in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (भूगोल) के पाठ 1 संसाधन एवं विकास के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है।
| Board | CBSE Board, JAC Board, RBSE Board, MPBSE Board, UBSE Board |
| Textbook | NCERT — Contemporary India-II (Reprint 2026-27) |
| Class | Class 10 |
| Subject | Social Science (Geography) |
| Chapter no. | Chapter 1 |
| Chapter Name | संसाधन एवं विकास (Resources and Development) |
| Category | Class 10 SST Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 1, संसाधन एवं विकास
संसाधन क्या है?
संसाधन (Resource): हमारे पर्यावरण में पाई जाने वाली प्रत्येक वह वस्तु जो मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकती है और जो प्रौद्योगिकी की दृष्टि से सुगम्य (accessible), आर्थिक दृष्टि से व्यवहार्य (feasible) तथा सांस्कृतिक दृष्टि से स्वीकार्य (culturally acceptable) हो, संसाधन कहलाती है।
मनुष्य भी एक संसाधन है, क्योंकि वह अपनी बुद्धि, कौशल और तकनीक से प्रकृति में उपलब्ध वस्तुओं को उपयोगी बनाकर उनका मूल्य बढ़ाता है। इसीलिए मनुष्य को भी ‘मानव संसाधन’ कहा जाता है — वह स्वयं भी एक संसाधन है और अन्य संसाधनों का निर्माता भी।
वस्तुएँ संसाधन बनने के लिए तीन शर्तों को पूरा करती हैं:
- तकनीकी रूप से सुगम्य (Technologically accessible): उसे प्राप्त करने और उपयोग में लाने की तकनीक उपलब्ध होनी चाहिए।
- आर्थिक रूप से व्यवहार्य (Economically feasible): उसे प्राप्त करने की लागत उतनी अधिक न हो कि लाभ न मिले।
- सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य (Culturally acceptable): समाज उसके उपयोग को स्वीकार करे।
मानव और पर्यावरण के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है। मनुष्य पर्यावरण से अंतःक्रिया करते हुए स्थान, मनुष्यों की आवश्यकताओं और उनकी उपयोग करने योग्य तकनीकी क्षमता के साथ-साथ इनके प्रति उनकी सांस्कृतिक विकास की अवस्था के अनुसार पदार्थों को संसाधन के रूप में परिवर्तित करते हैं।
संसाधनों का वर्गीकरण
संसाधनों को उत्पत्ति, समाप्यता, स्वामित्व तथा विकास की स्थिति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।
(क) उत्पत्ति के आधार पर
- प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources): प्रकृति से सीधे प्राप्त होने वाले संसाधन, जैसे — भूमि, जल, वायु, खनिज, वन, मृदा आदि।
- मानव-निर्मित संसाधन (Human-made Resources): जब प्राकृतिक पदार्थों को मनुष्य अपनी तकनीक और उपयोग के माध्यम से उपयोगी संसाधन में बदल देता है, जैसे — भवन, मशीनें, सड़कें, पुल, प्रौद्योगिकी।
- मानव संसाधन (Human Resources): मनुष्यों की संख्या, उनका कौशल, शिक्षा-स्तर, स्वास्थ्य और सृजनात्मक क्षमता — मानव संसाधन कहलाते हैं। मानव अपने ज्ञान, कौशल तथा तकनीक द्वारा प्रकृति में उपलब्ध पदार्थों को संसाधन में बदलता है, इसलिए मनुष्य को स्वयं एक ‘संसाधन’ माना जाता है।
(ख) समाप्यता के आधार पर
- नवीकरणीय संसाधन (Renewable Resources): ऐसे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनः प्राप्त किया जा सकता है और जिनका पुनर्चक्रण संभव है, जैसे — सौर व पवन ऊर्जा, जल, वन तथा वन्य जीवन।
- अनवीकरणीय संसाधन (Non-Renewable Resources): ऐसे संसाधन जिनके निर्माण में लाखों वर्ष लगते हैं तथा जिनका भंडार सीमित है, जैसे — जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम)।
(ग) स्वामित्व के आधार पर
- व्यक्तिगत संसाधन (Individual Resources): ऐसे संसाधन जो व्यक्तियों के स्वामित्व में होते हैं, जैसे — भूखंड, मकान, बाग-बगीचे, कुँए, तालाब आदि जो निजी भूमि पर स्थित हों।
- सामुदायिक संसाधन (Community Resources): ऐसे संसाधन जो समुदाय के सभी सदस्यों को उपलब्ध होते हैं, जैसे — गाँव का चारागाह, श्मशान भूमि, सार्वजनिक पार्क, खेल के मैदान, तालाब।
- राष्ट्रीय संसाधन (National Resources): देश की सीमा के अंतर्गत आने वाले सभी संसाधन राष्ट्रीय संसाधन कहलाते हैं — भूमि, जल, वन, वन्य जीव, खनिज आदि। कानूनी रूप से देश के भू-भाग की सीमा से लेकर 12 समुद्री मील (नॉटिकल माइल) तक फैले महासागरीय क्षेत्र और उसमें उपलब्ध सभी संसाधन भी सरकार अर्थात राष्ट्र की सम्पत्ति हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय संसाधन (International Resources): कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ भी संसाधनों को नियंत्रित करती हैं। किसी भी देश की समुद्र तट रेखा से 200 समुद्री मील से परे का सागरीय क्षेत्र ‘खुले महासागर’ के रूप में जाना जाता है, जिस पर किसी एक देश का अधिकार नहीं होता। इन संसाधनों के प्रयोग हेतु अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति आवश्यक होती है।
(घ) विकास की स्थिति के आधार पर
- संभाव्य संसाधन (Potential Resources): ऐसे संसाधन जो किसी क्षेत्र में उपलब्ध तो होते हैं परंतु उनका उपयोग अभी आरंभ नहीं किया गया है, जैसे — राजस्थान व गुजरात में सौर तथा पवन ऊर्जा की प्रबल संभावनाएँ।
- विकसित संसाधन (Developed Resources): वे संसाधन जिनके सर्वेक्षण के पश्चात उनकी गुणवत्ता और मात्रा निर्धारित कर उपयोग में लाया जाता है। विकसित संसाधनों का उपयोग तकनीक पर निर्भर करता है।
- भंडार (Stock): वे पदार्थ जो पर्यावरण में उपलब्ध हैं और मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं, परंतु मनुष्य के पास उपयुक्त तकनीक के अभाव में उनका उपयोग नहीं कर पाते, भंडार कहलाते हैं — जैसे जल दो अणु हाइड्रोजन तथा एक अणु ऑक्सीजन से मिलकर बना होता है, जिससे हाइड्रोजन को ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, परंतु उपयुक्त तकनीकी ज्ञान के अभाव में हाइड्रोजन एक भंडार बना हुआ है।
- संचित कोष / निक्षेप (Reserves): भंडार का वह भाग जिसे उपलब्ध तकनीक से प्रयोग में लाया जा सकता है परंतु उसका उपयोग अभी प्रारंभ नहीं किया गया है, संचित कोष कहलाता है — जैसे नदियों का जल जिसका उपयोग विद्युत उत्पादन के लिए किया जा सकता है, परंतु अभी तक ऐसा नहीं किया गया।
संसाधन नियोजन की आवश्यकता
संसाधन किसी भी विकास के लिए मूल्यवान होते हैं, परंतु प्रकृति में उपलब्ध यह विविधता अलग-अलग समय व स्थान में बहुत असमान रूप से वितरित है। किसी क्षेत्र में कुछ प्रकार के संसाधनों की प्रचुरता है परंतु अन्य महत्वपूर्ण संसाधनों की कमी है। उदाहरण के लिए —
- झारखंड राज्य खनिज संसाधनों में धनी है, परंतु कृषि भूमि की दृष्टि से निर्धन है।
- अरुणाचल प्रदेश में प्रचुर मात्रा में जल संसाधन उपलब्ध हैं, परंतु आधारभूत संरचनात्मक विकास का अभाव है।
- राजस्थान में सौर तथा पवन ऊर्जा के प्रचुर स्रोत हैं, परंतु जल संसाधनों का अभाव है।
इसलिए यह अनिवार्य है कि राष्ट्रीय स्तर, प्रांतीय स्तर, स्थानीय स्तर पर संसाधनों के नियोजन को संतुलित तरीके से करने की आवश्यकता है। संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग तथा उनका संरक्षण अति आवश्यक है, ताकि भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं को भी पूरा किया जा सके।
भारत में संसाधन नियोजन
भारत में विभिन्न प्रकार के संसाधन विभिन्न रूपों में विभिन्न भागों में पाए जाते हैं। कुछ क्षेत्र संसाधनों की दृष्टि से बहुत समृद्ध हैं तो कुछ क्षेत्रों में कुछ महत्वपूर्ण संसाधनों का सर्वथा अभाव है। इसलिए राष्ट्रीय, राज्य, क्षेत्रीय व स्थानीय स्तर पर संसाधन नियोजन एक विवेकपूर्ण उपाय है।
भारत में संसाधन नियोजन की जटिल प्रक्रिया में निम्नलिखित तीन चरण सम्मिलित हैं:
- प्रथम चरण: देश के विभिन्न प्रदेशों में उपलब्ध संसाधनों की पहचान करने के लिए सर्वेक्षण, मानचित्रण करना तथा गुणात्मक व मात्रात्मक आकलन एवं मापन के लिए प्रौद्योगिकीय संस्थाओं और सर्वेक्षण विधियों को स्थापित करना।
- द्वितीय चरण: संसाधन विकास योजनाओं के क्रियान्वयन तथा मैट्रिक्स से जुड़ी उपयुक्त संस्थागत संरचना की योजना बनाना।
- तृतीय चरण: संसाधन विकास योजनाओं का राष्ट्रीय विकास योजनाओं के साथ तालमेल बिठाना।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत ने संसाधन नियोजन को अपनाया, परंतु उचित संसाधन नियोजन के अभाव में असमान विकास हुआ है। भारत के कुछ प्रदेश तकनीकी व संस्थागत परिवर्तन के कारण अत्यंत विकसित रहे हैं, जबकि कुछ प्रदेश अभी भी पिछड़े हुए हैं। हमारे देश में कुछ ऐसे प्रदेश भी हैं जो संसाधन संपन्न हैं परंतु आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं — इसका मुख्य कारण संसाधन विकास तकनीक का अभाव है।
संसाधन विकास
संसाधनों का विवेकहीन उपयोग विश्व में कई समस्याओं का कारण बना है — जैसे संसाधनों का ह्रास, सामाजिक असमानता, वैश्विक पारिस्थितिक तंत्र का संकट (ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण, पर्यावरणीय प्रदूषण एवं भूमि निम्नीकरण)। अतः संसाधन विकास का अर्थ है कि विवेकपूर्ण उपयोग द्वारा संसाधनों का सतत् पोषणीय (sustainable) आर्थिक विकास किया जाए।
संसाधनों का असमान विभाजन केवल विभिन्न देशों में ही नहीं बल्कि किसी एक ही देश में सामाजिक समूहों के मध्य भी पाया जाता है। कुछ लोग विशाल भू-सम्पदा एवं संसाधनों के स्वामी होते हैं जबकि अधिकांश लोग अपने जीवन-यापन के लिए इन संसाधनों पर निर्भर हैं, फिर भी उनके पास बहुत ही कम संसाधन उपलब्ध हैं। कुछ लोग स्वार्थ के लिए बहुत अधिक मात्रा में संसाधनों का उपभोग कर रहे हैं और इससे निम्नलिखित समस्याएँ उत्पन्न होती हैं:
- संसाधनों का हृास (Depletion of resources)
- समाज में विभिन्न वर्गों के मध्य असमानता (Socio-economic inequality)
- वैश्विक पारिस्थितिक संकट — जैसे भूमंडलीय ऊष्मीकरण (global warming), ओज़ोन क्षरण (ozone depletion), पर्यावरण प्रदूषण, भूमि निम्नीकरण (land degradation)
अतः धरातल पर संसाधनों की समानता, उनकी उपलब्धता तथा गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए संसाधनों का सतत् पोषणीय विकास (sustainable development) समय की मांग है।
अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ — सतत पोषणीय विकास की अवधारणा
- 1968 — रोम क्लब (Club of Rome): संसाधनों के अंधाधुंध व अविवेकपूर्ण उपयोग के प्रति सर्वप्रथम आवाज़ उठाई गई।
- 1987 — ब्रंटलैंड कमीशन (Brundtland Commission): इस रिपोर्ट में सतत् पोषणीय विकास (Sustainable Development) की अवधारणा प्रस्तुत की गई, जिसका आशय है — “पर्यावरणीय दृष्टिकोण जो वर्तमान की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने की क्षमता से समझौता किए बिना विकास करे।”
- 1992 — रियो डी जेनेरियो पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit): ब्राज़ील के रियो डी जेनेरियो शहर में विश्व के 100 से अधिक राष्ट्राध्यक्षों ने वैश्विक पर्यावरणीय समस्याओं पर चर्चा हेतु “पृथ्वी सम्मेलन” (Earth Summit) में भाग लिया। इसमें जलवायु परिवर्तन एवं जैव विविधता से सम्बंधित समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए तथा वन सिद्धांतों (Forest Principles) का समर्थन किया गया। इसी सम्मेलन में सतत पोषणीय विकास प्राप्ति हेतु ‘एजेंडा 21‘ (Agenda 21) घोषणा-पत्र स्वीकृत किया गया, जिसका उद्देश्य विश्व स्तर पर बढ़ते पर्यावरणीय विनाश, गरीबी व बीमारियों को रोकने हेतु वैश्विक सहभागिता से सतत् पोषणीय विकास को प्राप्त करना है।
भूमि संसाधन (Land Resources)
भूमि एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। यह कृषि, वानिकी, खनन, भवन निर्माण जैसी मानवीय क्रियाओं के लिए आधार प्रदान करती है। भारत में मैदान लगभग 43 प्रतिशत भू-भाग पर विस्तृत हैं, जो सघन कृषि व अवसंरचना विकास के लिए अत्यंत उपयुक्त हैं। पहाड़ी क्षेत्र (लगभग 30 प्रतिशत) जल-प्रवाह को सुनिश्चित करते हैं तथा पर्यटन व पारिस्थितिकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, जबकि पठारी भाग (लगभग 27 प्रतिशत) खनिज, जीवाश्म ईंधन तथा वन संपदा का विशाल भंडार है।
भूमि उपयोग के प्रकार (Land-use Categories)
भूमि का उपयोग प्राकृतिक कारकों जैसे स्थलाकृति, जलवायु, मृदा प्रकार के साथ-साथ मानवीय कारकों — जनसंख्या घनत्व, तकनीकी क्षमता आदि से भी निर्धारित होता है। भूमि संसाधन आँकड़ों को मुख्यतः निम्न श्रेणियों में बाँटा जाता है:
- वन (Forests): देश के अंतर्गत वनाच्छादित क्षेत्र।
- कृषि हेतु अनुपलब्ध भूमि (Land not available for cultivation): इसके अंतर्गत दो प्रकार की भूमि आती है — (क) बंजर एवं व्यर्थ भूमि जिसे मौजूदा तकनीक से कृषि योग्य नहीं बनाया जा सकता (पहाड़ी, मरुस्थलीय भूमि आदि), (ख) अकृषि कार्यों में उपयोग की जाने वाली भूमि जैसे भवन, सड़क, उद्योग आदि — इसमें वृद्धि होती रहती है।
- अन्य अकृषित भूमि (Other Uncultivated Land): इसमें स्थायी चरागाह व चारागाह भूमि, विविध वृक्षों की फसलें व उपवन, कृषि योग्य व्यर्थ भूमि शामिल है। इनमें से कुछ भूमि को कई कृषि चक्रों के लिए परती छोड़ने पर पुनः कृषि योग्य बनाया जा सकता है।
- परती भूमि (Fallow Lands): वह भूमि जो एक या एक से अधिक कृषि वर्षों तक कृषि रहित छोड़ी जाती है, ताकि भूमि प्राकृतिक रूप से अपनी उर्वरता पुनः प्राप्त कर सके। परती भूमि दो प्रकार की होती है — वर्तमान परती (एक वर्ष से कम) और पुरातन परती (एक से पाँच वर्ष तक कृषि रहित)।
- निवल बोया गया क्षेत्र (Net Sown Area): वह भूमि जिस पर फसलें बोई और काटी जाती हैं, निवल बोया गया क्षेत्र कहलाता है। जब किसी क्षेत्र में एक कृषि वर्ष में एक से अधिक बार फसल बोई जाती है तो उसे ‘सकल बोया गया क्षेत्र’ (gross cropped area) कहते हैं।
भूमि निम्नीकरण एवं संरक्षण उपाय (Land Degradation and Conservation)
भारत में भूमि निम्नीकरण के अनेक मानवजनित कारण हैं — वनोन्मूलन (deforestation), अतिपशुचारण (overgrazing), खनन एवं उत्खनन (mining and quarrying), तथा अत्यधिक सिंचाई से भूमि का लवणीकरण (salinisation)।
भूमि निम्नीकरण के प्रमुख कारण:
- खनन कार्य के बाद खनन स्थलों को न भरना, जिससे क्षेत्र में भू-कटाव व अवनयन बढ़ता है।
- पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अत्यधिक सिंचाई के कारण मृदा में लवणीकरण की समस्या।
- गुजरात, राजस्थान व मध्य प्रदेश के शुष्क व अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में अति पशुचारण भूमि निम्नीकरण का एक प्रमुख कारण है।
- झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश की खनन बहुल क्षेत्रों में औद्योगिक कचरे व अवशिष्ट पदार्थों के जल में मिलने से भूमि व जल संसाधन दोनों प्रभावित होते हैं।
भूमि निम्नीकरण रोकने के उपाय:
- वनरोपण (Afforestation): वृक्षारोपण द्वारा वनाच्छादन बढ़ाना, जिससे मृदा अपरदन रुके तथा पारिस्थितिक संतुलन बना रहे।
- भूमि सुधार / पुनर्ग्रहण (Land Reclamation): खनन कार्य के पश्चात खनन क्षेत्रों को उचित पुनः दावा प्रक्रिया द्वारा उपयोग योग्य बनाना।
- अतिपशुचारण नियंत्रण (Checking Overgrazing): चारागाह क्षेत्रों में पशुओं की संख्या नियंत्रित करना तथा घूर्णी चराई (rotational grazing) अपनाना।
- खनन नियंत्रण (Control of Mining): खनन गतिविधियों का उचित नियमन तथा खनन के पश्चात भूमि की समुचित बहाली सुनिश्चित करना।
- औद्योगिक कचरे व अवशिष्ट पदार्थों के जल के नियमन व उपचार द्वारा भूमि की गुणवत्ता को बनाए रखना।
मृदा एक संसाधन के रूप में (Soil as a Resource)
मृदा पृथ्वी की सतह की सबसे ऊपरी पतली परत है जिसमें जैविक व अजैविक दोनों प्रकार के तत्व सम्मिलित हैं। मृदा किसी भी अन्य प्राकृतिक संसाधन की तरह अत्यंत आवश्यक संसाधन है, जिसमें वनस्पति व अन्य जीव पल्लवित होते हैं। मृदा एक जीवंत तंत्र है — इसके निर्माण में लाखों वर्ष लगते हैं, इसलिए यह एक अत्यंत मूल्यवान संसाधन है।
मृदा निर्माण के कारक
- मूल आधारी चट्टानें (parent rocks/basement rocks)
- उच्चावच / धरातल (relief)
- जलवायु (climate)
- वनस्पति व अन्य जीव रूप (vegetation and other life forms)
- समय (time)
तापमान परिवर्तन, बहते हुए जल की क्रिया, पवन, हिमानी की क्रिया व अपक्षय (weathering) जैसे भौतिक व रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा शैल विखंडित होकर सूक्ष्म कणों का निर्माण करते हैं, जिनसे मृदा का निर्माण होता है। मृदा की संरचना में जलवायु प्रमुख कारक है।
मृदा का वर्गीकरण
- जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil): यह सबसे अधिक विस्तृत तथा महत्वपूर्ण मृदा है, जो सम्पूर्ण उत्तरी मैदान (सतलुज-गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी घाटियों) में पाई जाती है। यह जलोढ़ निक्षेपण द्वारा नदियों द्वारा बनाई जाती है। इसमें पोटाश, फास्फोरिक अम्ल व चूने की प्रचुरता होती है, परंतु नाइट्रोजन व ह्यूमस की कमी होती है। इसमें खादर (नवीन जलोढ़) व बांगर (पुरानी जलोढ़) दो प्रकार होते हैं। यह गन्ना, चावल, गेहूँ व अन्य दलहन फसलों के लिए अत्यंत उपजाऊ है।
- काली/रेगुर मृदा (Black/Regur Soil): यह दक्कन के पठार (महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात) में विस्तृत ज्वालामुखीय (लावा) चट्टानों से बनी है। इसे ‘कपासी मृदा’ या ‘रेगुर मृदा’ भी कहते हैं, क्योंकि यह कपास की खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त है। इसमें नमी धारण करने की उच्च क्षमता होती है तथा यह चूना, लौह, मैग्नीशियम व एल्युमिनियम से समृद्ध है, परंतु फास्फोरिक तत्वों की कमी होती है।
- लाल एवं पीली मृदा (Red and Yellow Soil): यह मृदा दक्कन के पठार के पूर्वी व दक्षिणी भाग में कम वर्षा वाले क्षेत्रों में आग्नेय व रूपांतरित चट्टानों से बनती है। इसका लाल रंग लौह अयस्क में लौह की मात्रा के कारण होता है और आर्द्र रूप में यह पीली दिखाई देती है।
- लैटेराइट मृदा (Laterite Soil): यह मृदा उच्च तापमान व अधिक वर्षा के कारण तीव्र निक्षालन (leaching) की प्रक्रिया से बनती है, जिससे इसमें चूने व सिलिका की मात्रा कम हो जाती है और लौह ऑक्साइड व एल्युमिनियम यौगिक अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाते हैं। यह कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और उड़ीसा की पहाड़ियों में पाई जाती है। जैविक पदार्थों की कमी होने पर भी उर्वरकों के उपयोग से यह काजू जैसी फसल के लिए उपयुक्त बन जाती है।
- शुष्क मृदा (Arid Soil): यह मृदा प्राकृतिक रूप से रंग में लाल से लेकर भूरी होती है। सामान्यतः यह रेतीली संरचना व लवणीय स्वभाव की होती है। कुछ क्षेत्रों में लवण की मात्रा इतनी अधिक होती है कि नमक बनाने के लिए इससे साधारण नमक भी निकाला जाता है। ह्यूमस व नमी की कमी के कारण निचली परतों में कंकर की तह का निर्माण होता है, जो जल का रिसाव रोकती है। सिंचाई कर व उर्वरक डालकर इस मृदा को कृषि योग्य बनाया जा सकता है।
- वन मृदा (Forest Soil): यह मृदा पर्याप्त वर्षा वाले पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है, जहाँ वनों की उपलब्धता है। घाटी के तल पर यह दोमट व सिल्टदार होती है, परंतु ऊपरी भागों में इसकी संरचना मोटे कणों वाली होती है। हिमालय के हिमाच्छादित भागों में यह मृदा अपरदन के अधीन है और अम्लीय व कम ह्यूमस वाली होती है।
मृदा अपरदन एवं मृदा संरक्षण (Soil Erosion and Soil Conservation)
मृदा अपरदन (Soil Erosion): मृदा के ऊपरी उपजाऊ आवरण का जल, पवन व मानवीय क्रियाओं द्वारा कटाव व स्थानांतरण मृदा अपरदन कहलाता है। मुख्यतः अनियोजित मानवीय क्रियाएँ जैसे — वनोन्मूलन, अतिपशुचारण, निर्माण कार्य व खनन इसके प्रमुख कारण हैं।
- परत अपरदन (Sheet Erosion): जल जब मृदा की ऊपरी परत को समान रूप से बहा ले जाता है।
- अवनालिका अपरदन (Gully Erosion): जल जब गहरी नालियों में बहता है, जिससे भूमि जोतने योग्य नहीं रहती। ऐसी भूमि को ‘बीहड़ भूमि’ कहा जाता है — जैसे चम्बल बेसिन में ‘खड्ड भूमि’ (badland)।
- वायु अपरदन (Wind Erosion): शुष्क व अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में तेज़ हवा द्वारा ऊपरी मृदा उड़ा ले जाई जाती है।
मृदा संरक्षण की विधियाँ:
- समोच्च रेखीय जुताई (Contour Ploughing): ढालनुमा भूमि पर समोच्च रेखाओं की दिशा में जुताई करने से जल के बहाव की गति धीमी हो जाती है, जिससे अपरदन कम होता है।
- सोपान कृषि / सीढ़ीदार खेत (Terrace Farming): पहाड़ी व पठारी ढालों को सीढ़ीनुमा खेतों में परिवर्तित कर कृषि करने से मृदा अपरदन को नियंत्रित किया जाता है — पश्चिमी व मध्य हिमालय के क्षेत्रों में यह विधि लोकप्रिय है।
- पट्टीदार कृषि (Strip Cropping): बड़े खेतों को पट्टियों में बाँटकर घास वाली पट्टियों के साथ-साथ फसलों को उगाना, जिससे पवन की गति टूटती है — इसे ‘पट्टी कृषि’ कहते हैं।
- वृक्षों की मेखला/रक्षक मेखला (Shelter Belts): तटीय व शुष्क क्षेत्रों में तेज़ हवाओं को रोकने के लिए वृक्षों की पंक्तियाँ लगाई जाती हैं। पश्चिमी भारत में बालू के टीलों को स्थिर करने के लिए वृक्षों की मेखलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- खेतों की मेड़बंदी करना, प्राकृतिक वनस्पति व वृक्षों की जड़ों द्वारा मृदा को बांधे रखना, तथा फसल चक्रण अपनाना भी मृदा संरक्षण में सहायक हैं।
मुख्य बिंदु
- प्रकृति में उपलब्ध वह वस्तु जो मानव आवश्यकताओं की पूर्ति करे तथा तकनीकी रूप से सुगम्य, आर्थिक रूप से व्यवहार्य व सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य हो, संसाधन कहलाती है।
- उत्पत्ति के आधार पर संसाधन प्राकृतिक, मानव-निर्मित व मानव संसाधन में; समाप्यता के आधार पर नवीकरणीय व अनवीकरणीय में विभाजित होते हैं।
- स्वामित्व के आधार पर संसाधन व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय होते हैं।
- विकास की स्थिति के आधार पर संसाधन संभाव्य, विकसित, भंडार व संचित कोष में वर्गीकृत किए जाते हैं।
- भारत में संसाधनों का वितरण असमान है, इसलिए राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर संसाधन नियोजन आवश्यक है — इसके तीन चरण हैं: पहचान/सर्वेक्षण, संस्थागत ढाँचा और राष्ट्रीय योजनाओं से तालमेल।
- 1968 के रोम क्लब, 1987 के ब्रंटलैंड कमीशन तथा 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन (एजेंडा 21) ने सतत् पोषणीय विकास की अवधारणा को बढ़ावा दिया।
- भूमि का उपयोग वन, कृषि हेतु अनुपलब्ध भूमि, अन्य अकृषित भूमि, परती भूमि तथा निवल बोए गए क्षेत्र में वर्गीकृत किया जाता है।
- भूमि निम्नीकरण को रोकने के उपाय हैं — वनरोपण, भूमि सुधार, अतिपशुचारण नियंत्रण व खनन नियंत्रण।
- मृदा के छह प्रमुख प्रकार हैं — जलोढ़, काली/रेगुर, लाल-पीली, लैटेराइट, शुष्क तथा वन मृदा।
- मृदा संरक्षण की प्रमुख विधियाँ हैं — समोच्च रेखीय जुताई, सोपान कृषि, पट्टीदार कृषि तथा रक्षक मेखला।
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