पाठ – 4
कृषि
In this post we have given the detailed notes of class 10 Social Science (Geography) chapter 4 Agriculture in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (भूगोल) के पाठ 4 कृषि के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है।
| Board | CBSE Board, JAC Board, RBSE Board, MPBSE Board, UBSE Board |
| Textbook | NCERT — Contemporary India-II (Reprint 2026-27) |
| Class | Class 10 |
| Subject | Social Science (Geography) |
| Chapter no. | Chapter 4 |
| Chapter Name | कृषि (Agriculture) |
| Category | Class 10 SST Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 4, कृषि
कृषि का महत्व
भारत एक कृषि प्रधान देश है। हमारी अर्थव्यवस्था कृषि क्षेत्र (agricultural sector) पर बहुत हद तक निर्भर है, क्योंकि यह देश की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या को रोज़गार और आजीविका प्रदान करती है। कृषि प्राथमिक क्रियाकलाप (primary activity) है जो खाद्यान्न (food grains) उत्पन्न करती है और साथ ही कच्चा माल जैसे — कपास, गन्ना, रबर आदि उद्योगों के लिए भी उपलब्ध कराती है। भारत में कृषि केवल एक आर्थिक क्रियाकलाप ही नहीं है, बल्कि यह विशाल जनसंख्या के भरण-पोषण के लिए आवश्यक है।
कृषि के प्रकार (Types of Farming)
भूमि की उपलब्धता तथा जनसंख्या के दबाव में भिन्नता के कारण कृषि पद्धतियाँ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में बदलती रहती हैं। भारत में मुख्यतः निम्नलिखित प्रकार की कृषि प्रचलित है:
1. प्राचीन निर्वाह कृषि (Primitive Subsistence Farming)
यह अभी भी विश्व के कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है, जिसमें उत्तर-पूर्वी भारत के कुछ भाग शामिल हैं। इस कृषि में परिवार के श्रम का प्रयोग किया जाता है तथा उत्पादन मुख्यतः प्राकृतिक उर्वरता (natural fertility) और पर्यावरण की उपयुक्तता पर निर्भर करता है। इसे ‘स्थानांतरी कृषि’ (shifting cultivation) भी कहते हैं।
झूम खेती (Slash and Burn Agriculture): इसमें किसान भूमि के एक टुकड़े को साफ करता है, वनस्पति को काटकर जलाता है तथा उस भूमि पर खेती करता है। कुछ वर्षों तक उपयोग करने के बाद जब भूमि की उर्वरता कम हो जाती है तो किसान उस भूमि को छोड़कर नई भूमि की ओर चला जाता है। इसे अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है — असम में ‘झूम’, केरल में ‘पोनम’, आंध्र प्रदेश व ओडिशा में ‘पोडु’, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में ‘बेवर’ व ‘दहिया’, तथा हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड में ‘खिल’।
2. गहन निर्वाह कृषि (Intensive Subsistence Farming)
यह श्रम-गहन (labour intensive) कृषि है, जो अधिक जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्रों में प्रचलित है। इसमें उच्च जैव-रासायनिक निवेश (biochemical inputs) तथा सिंचाई (irrigation) की सहायता से एक ही भूमि के टुकड़े पर बार-बार फसलें उगाई जाती हैं ताकि अधिकतम उत्पादन प्राप्त हो सके। भूमि पर जनसंख्या के दबाव के कारण जोतों (holdings) का आकार बहुत छोटा होता है और किसान अपनी भूमि क्षमता से अधिक उपयोग करते हैं।
3. वाणिज्यिक खेती (Commercial Farming)
इसमें आधुनिक निवेशों (modern inputs) जैसे — उच्च उत्पादन देने वाले बीज (HYV seeds), रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक तथा सिंचाई का प्रयोग अधिक होता है ताकि उत्पादकता बढ़ाई जा सके। फसल की व्यावसायीकरण (commercialisation) की मात्रा एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भिन्न होती है — जैसे पंजाब में चावल एक वाणिज्यिक फसल है, जबकि ओडिशा में यह निर्वाह फसल है।
बागाती कृषि (Plantation Agriculture): यह भी एक प्रकार की वाणिज्यिक खेती है, जिसमें एकल फसल (single crop) को बड़े क्षेत्रफल में उगाया जाता है। इसमें पूँजी गहन निवेश (capital intensive inputs), वैज्ञानिक तकनीक, प्रवासी मज़दूर (migrant labour) तथा बेहतर प्रबंधन का प्रयोग होता है। उत्पादन मुख्यतः कारखानों में प्रयोग हेतु होता है, अतः अच्छे परिवहन व संचार नेटवर्क की आवश्यकता होती है जो उत्पाद को फैक्ट्री और बाज़ार से जोड़ता है। चाय, कॉफी, रबर, गन्ना, केला आदि बागाती फसलों के प्रमुख उदाहरण हैं।
फसल ऋतुएँ (Cropping Pattern)
भारत में तीन प्रमुख फसल ऋतुएँ पाई जाती हैं — खरीफ, रबी तथा जायद।
| ऋतु | समयावधि | प्रमुख फसलें |
| खरीफ (Kharif) | जून–सितंबर (दक्षिण-पश्चिम मानसून के साथ) | चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा, तुअर (अरहर), मूंग, उड़द, कपास, जूट, मूंगफली, सोयाबीन |
| रबी (Rabi) | अक्टूबर–मार्च (शीत ऋतु में बोई और मार्च-अप्रैल में काटी जाती है) | गेहूँ, चना, मटर, सरसों, जौ, अलसी |
| जायद (Zaid) | मार्च–जून (रबी व खरीफ के बीच की छोटी ऋतु) | तरबूज, खरबूजा, खीरा, सब्ज़ियाँ, चारे की फसलें, तथा सिंचित क्षेत्रों में मूंगफली |
पंजाब व हरियाणा जैसे राज्यों में तीव्र सिंचाई (assured irrigation) की सुविधा के कारण चावल-गेहूँ चक्र (rice-wheat rotation) प्रचलित है, जिससे भूमि की उर्वरता पर दबाव पड़ता है।
प्रमुख फसलें (Major Crops)
चावल (Rice)
भारत में चावल खाद्यान्न फसलों में सबसे महत्वपूर्ण है। यह भारत की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से का मुख्य भोजन है। यह खरीफ फसल है जिसे उच्च तापमान (25°C से अधिक) तथा उच्च आर्द्रता (100 सेमी से अधिक वर्षा) की आवश्यकता होती है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में यह नहरों व नलकूपों की सहायता से उगाई जाती है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश है। प्रमुख उत्पादक राज्य हैं — पश्चिम बंगाल, पंजाब, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, छत्तीसगढ़, उड़ीसा तथा हरियाणा।
गेहूँ (Wheat)
गेहूँ भारत की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है और उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम भारत के लोगों का मुख्य भोजन है। यह शीत ऋतु (winter/rabi) की फसल है, जिसे बुवाई के समय ठंडी जलवायु तथा पकने के समय तेज़ धूप की आवश्यकता होती है। इसे 50–75 सेमी वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है, जो अच्छी तरह वितरित हो। इसकी दो प्रमुख कृषि-जलवायु परिस्थितियाँ हैं — गंगा-सतलुज मैदान का पश्चिमी भाग तथा काली मिट्टी का क्षेत्र (दक्षिण-पश्चिम)। प्रमुख उत्पादक राज्य — उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, बिहार तथा राजस्थान।
मोटे अनाज (Millets)
मोटे अनाज भी उच्च पोषण-मूल्य वाली फसलें हैं। ज्वार, बाजरा तथा रागी इनमें प्रमुख हैं, जो ‘निर्धनों का अनाज’ (poor man’s crops) भी कहलाते हैं क्योंकि ये कठोर जलवायु व निम्न उर्वरता वाली भूमि में भी उगाए जा सकते हैं।
- ज्वार (Jowar): यह क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। यह मुख्यतः वर्षा सिंचित क्षेत्र (rainfed area) में उगाई जाती है और इसे अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। मुख्य उत्पादक राज्य — महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा तमिलनाडु।
- बाजरा (Bajra): यह रेतीली मिट्टी तथा उथली काली मिट्टी में अच्छी तरह उगता है। मुख्य उत्पादक राज्य — राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश तथा हरियाणा।
- रागी (Ragi): यह शुष्क क्षेत्रों की फसल है जो लाल, काली, रेतीली, दुमट व छिछली काली मिट्टी में अच्छी तरह उगती है। मुख्य उत्पादक राज्य — कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, झारखंड तथा अरुणाचल प्रदेश।
मक्का (Maize)
मक्का का उपयोग खाद्य तथा पशु-चारा — दोनों रूपों में होता है। यह खरीफ फसल है जिसे 21°C से 27°C के मध्य तापमान तथा पुरानी जलोढ़ मिट्टी (old alluvial soil) में अच्छी वृद्धि प्राप्त होती है। कुछ राज्यों में इसे रबी ऋतु में भी उगाया जाता है। मुख्य उत्पादक राज्य — कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश तथा मध्य प्रदेश।
दालें (Pulses)
भारत विश्व का सबसे बड़ा दलहन उत्पादक तथा उपभोक्ता देश है। तुअर (अरहर), उड़द, मूंग, मसूर, चना तथा मटर इनमें प्रमुख हैं। ये फलीदार फसलें (leguminous crops) हैं जो वायुमंडल से नाइट्रोजन ग्रहण कर मिट्टी की उर्वरता को पुनर्स्थापित करती हैं, अतः इन्हें प्रायः अन्य फसलों के साथ चक्र (rotation) में उगाया जाता है। इन्हें कम नमी की आवश्यकता होती है और ये शुष्क परिस्थितियों में भी टिक सकती हैं। मुख्य उत्पादक राज्य — मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक।
खाद्यान्न के अतिरिक्त अन्य खाद्य फसलें
गन्ना (Sugarcane)
गन्ना एक उष्णकटिबंधीय (tropical) तथा उपोष्णकटिबंधीय (sub-tropical) फसल है। इसे उष्ण तथा आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है, जिसमें तापमान 21°C से 27°C तथा वार्षिक वर्षा 75 सेमी से 100 सेमी के मध्य होनी चाहिए। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक देश है। इससे चीनी, गुड़, खांडसारी (khandsari) तथा शीरा (molasses) प्राप्त होते हैं। मुख्य उत्पादक राज्य — उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश तथा बिहार।
तिलहन (Oilseeds)
भारत विश्व के सबसे बड़े तिलहन उत्पादक देशों में से एक है। मुख्य तिलहन फसलें — मूंगफली (groundnut), सरसों (mustard), नारियल (coconut), तिल (sesamum), सोयाबीन (soyabean) तथा अरंडी के बीज (castor seeds) हैं।
- मूंगफली: भारत की सबसे बड़ी तिलहन फसल, जो कुल तिलहन उत्पादन का लगभग आधा भाग बनाती है। यह खरीफ फसल है, मुख्यतः गुजरात, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु में उगाई जाती है।
- सरसों: यह रबी फसल है जो मुख्यतः मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में उगाई जाती है।
- नारियल: यह उष्णकटिबंधीय फसल है, मुख्यतः केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक तथा गोवा जैसे तटीय राज्यों में उगाई जाती है।
चाय (Tea)
चाय एक बागाती फसल (plantation crop) है, जिसका मूल स्थान (origin) चीन के जंगलों में माना जाता है। इसकी खेती के लिए उष्ण व आर्द्र जलवायु, गहरी उपजाऊ मिट्टी जिसमें ह्यूमस व जैव पदार्थ हों, तथा अच्छी जल-निकासी (drainage) आवश्यक है। बार-बार वर्षा वर्ष भर उत्पादन में सहायक होती है। यह श्रम-गहन उद्योग है। मुख्य उत्पादक राज्य — असम, पश्चिम बंगाल की पहाड़ियाँ (दार्जिलिंग व जलपाईगुड़ी) तथा तमिलनाडु व केरल की नीलगिरि पहाड़ियाँ।
कॉफी (Coffee)
भारत विश्व के कुल कॉफी उत्पादन का लगभग 3-4% उत्पादन करता है। भारत में अरेबिका किस्म (Arabica variety) उगाई जाती है, जो प्रारंभ में यमन से लायी गयी थी और यह अपनी सुगंधित गुणवत्ता के लिए विश्व भर में जानी जाती है। इसकी खेती मुख्यतः नीलगिरि की पहाड़ियों में — कर्नाटक, केरल तथा तमिलनाडु में होती है।
बागवानी फसलें (Horticulture Crops)
भारत फलों तथा सब्ज़ियों के उत्पादन में विश्व में अग्रणी है। भारत आम, केला, नारियल, काजू तथा अनेक फलों व सब्ज़ियों के उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह क्षेत्र किसानों की आय बढ़ाने तथा रोज़गार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
गैर-खाद्य फसलें (Non-Food Crops)
रबर (Rubber)
रबर एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक औद्योगिक कच्चा माल है। यह उष्णकटिबंधीय तथा अर्द्ध-उष्णकटिबंधीय फसल है, जिसे आर्द्र व उष्ण जलवायु में 25 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। मुख्य उत्पादक क्षेत्र — केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों की गारो पहाड़ियाँ।
रेशेदार फसलें (Fibre Crops)
भारत में चार प्रमुख रेशेदार फसलें उगाई जाती हैं — कपास, जूट, रेशम (silk रेशम कीट पालन/sericulture द्वारा) तथा सन (hemp)। इन्हें उनके स्रोत के आधार पर दो वर्गों में बाँटा जाता है — पादप रेशे (कपास व जूट) तथा प्राणिज रेशे (रेशम व ऊन)।
- कपास (Cotton): भारत कपास का उद्गम स्थल (origin) माना जाता है। इसे उगाने के लिए उच्च तापमान, हल्की वर्षा या सिंचाई, 210 दिन का पाला-मुक्त (frost-free) मौसम तथा तेज़ धूप की आवश्यकता होती है। यह काली मिट्टी में अच्छी तरह उगती है और खरीफ फसल है, जिसे पकने में 6 से 8 माह लगते हैं। मुख्य उत्पादक राज्य — महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब तथा तमिलनाडु।
- जूट (Jute): इसे ‘सुनहरा रेशा’ (golden fibre) कहा जाता है। यह अच्छी जल-निकासी वाली उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी में उगाया जाता है, जहाँ बाढ़ के बाद उर्वरता का नवीनीकरण होता रहता है। इसे उच्च तापमान की आवश्यकता होती है। मुख्य उत्पादक राज्य — पश्चिम बंगाल, बिहार तथा असम। थैले, रस्सी व अन्य वस्तुओं के निर्माण में इसका प्रयोग होता है, हालाँकि सिंथेटिक रेशों (synthetic fibres) से प्रतिस्पर्धा के कारण इसकी माँग घटी है।
प्रौद्योगिकीय तथा संस्थागत सुधार (Technological and Institutional Reforms)
भारतीय कृषि की उन्नति के लिए स्वतंत्रता के बाद अनेक प्रौद्योगिकीय व संस्थागत सुधार लागू किए गए हैं।
भूमि सुधार (Land Reforms)
स्वतंत्रता के समय हमारी कृषि व्यवस्था औपनिवेशिक शासकों (colonial masters) की शोषणकारी नीतियों से प्रभावित थी। इसे सुधारने के लिए भूमि सुधार सबसे पहली प्राथमिकता थी।
- जमींदारी प्रथा का उन्मूलन (Abolition of Zamindari): भूमि सुधार के अंतर्गत सर्वप्रथम जमींदारी प्रथा को समाप्त किया गया, ताकि किसानों को भूमि पर सीधा अधिकार मिल सके।
- जोतों का चकबंदीकरण (Consolidation of Holdings): छोटी व बिखरी हुई भूमि जोतों को एक साथ मिलाकर बड़ा तथा एकीकृत खेत बनाया गया, जिससे कृषि दक्षता बढ़ी।
- भूमि जोतों की अधिकतम सीमा तय की गयी (land ceiling) तथा भूमिहीनों में भूमि का पुनर्वितरण किया गया।
सहकारिता (Cooperation)
1960-61 में सरकार ने सहकारी समितियों (cooperative societies) की स्थापना पर बल दिया, जिससे किसानों को कम ब्याज दर पर ऋण, बीज, उर्वरक तथा अन्य आदान (inputs) उपलब्ध हो सकें।
हरित क्रांति (Green Revolution)
1960 के दशक में हरित क्रांति के माध्यम से उच्च उत्पादन देने वाले किस्मों (High Yielding Varieties — HYV) के बीज, उर्वरक, कीटनाशक तथा सुनिश्चित सिंचाई का प्रयोग बढ़ाया गया, जिससे विशेषकर गेहूँ व चावल के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई। हालाँकि हरित क्रांति के लाभ असमान रूप से वितरित हुए — इसका सबसे अधिक लाभ पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे सिंचित क्षेत्रों को हुआ, जबकि वर्षा-सिंचित (rainfed) क्षेत्र इससे बहुत हद तक वंचित रह गए। इससे क्षेत्रीय असमानता (regional disparity) बढ़ी।
न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price — MSP)
सरकार द्वारा कुछ फसलों के लिए बुवाई से पहले न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती है, ताकि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिल सके तथा बाज़ार की उतार-चढ़ाव से सुरक्षा मिले।
फसल बीमा (Crop Insurance)
प्राकृतिक आपदाओं जैसे सूखा, बाढ़, चक्रवात, आग या कीट-प्रकोप से होने वाले फसल नुकसान से किसानों की सुरक्षा हेतु फसल बीमा की व्यवस्था की गयी है।
किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card — KCC)
किसान क्रेडिट कार्ड योजना के अंतर्गत किसानों को खेती की आवश्यकताओं जैसे बीज, उर्वरक, कीटनाशक आदि खरीदने के लिए समय पर ऋण उपलब्ध कराया जाता है।
व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना (Personal Accident Insurance Scheme — PAIS)
यह योजना किसानों को दुर्घटनावश हुई मृत्यु या स्थायी विकलांगता की स्थिति में वित्तीय सुरक्षा प्रदान करती है।
विशेष मौसम बुलेटिन (Special Weather Bulletins)
किसानों की सुविधा के लिए मौसम विभाग द्वारा किसानों के लिए विशेष मौसम बुलेटिन तथा कृषि पूर्वानुमान (agro-related programmes) रेडियो व टेलीविज़न पर प्रसारित किए जाते हैं, ताकि वे मौसम के अनुसार अपनी कृषि गतिविधियों की योजना बना सकें।
अन्य संस्थागत सहयोग
सरकार द्वारा कृषि विश्वविद्यालयों (agricultural universities), पशु चिकित्सा सेवाओं व पशु प्रजनन केंद्रों (veterinary services and animal breeding centres), बागवानी विकास (horticulture development), बेहतर भंडारण सुविधाओं (better storage facilities/warehousing) तथा ग्रामीण कृषि बाज़ार व बैंकिंग (rural market and banking facilities) व्यवस्था का विकास व सुदृढ़ीकरण किया गया है। इसके अतिरिक्त ‘किसान चैनल’ (Kissan Channel) जैसे दूरदर्शन कार्यक्रम प्रतिदिन किसानों को कृषि संबंधी जानकारी उपलब्ध कराते हैं।
राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान
कृषि भारत की सबसे बड़ी आजीविका प्रदाता (largest livelihood provider) गतिविधि है। यह देश की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार प्रदान करती है। हालाँकि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि क्षेत्र का योगदान समय के साथ घटता जा रहा है, फिर भी रोज़गार सृजन (employment generation) में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण बनी हुई है। कृषि उद्योगों को कच्चा माल भी उपलब्ध कराती है तथा निर्यात आय का भी एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
खाद्य सुरक्षा (Food Security)
हरित क्रांति के परिणामस्वरूप भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर (self-sufficient) हुआ है तथा खाद्यान्नों का पर्याप्त बफर स्टॉक (buffer stock) बनाया गया है, जिसका उपयोग खाद्य की कमी वाले क्षेत्रों में तथा कम आय वर्ग के लोगों को कम मूल्य पर वितरित करने के लिए किया जाता है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution System — PDS) के माध्यम से राशन की दुकानों (fair price shops) पर खाद्यान्न, चीनी तथा मिट्टी के तेल का वितरण किया जाता है, ताकि समाज के कमज़ोर वर्गों को उचित मूल्य पर आवश्यक वस्तुएँ मिल सकें।
वैश्वीकरण का कृषि पर प्रभाव (Impact of Globalisation on Agriculture)
विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation — WTO) की सदस्यता के फलस्वरूप भारतीय किसानों को विकसित देशों के किसानों के साथ प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। विकसित देशों की सरकारें अपने किसानों को भारी सब्सिडी (subsidy) प्रदान करती हैं, जिससे उनकी उपज का मूल्य कृत्रिम रूप से कम रह जाता है। इस कारण भारतीय किसानों को वैश्विक बाज़ार में गैर-प्रतिस्पर्धी मूल्य (non-competitive prices) मिलते हैं, जिससे उनकी आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके फलस्वरूप कृषि की लाभप्रदता (profitability) घट रही है और किसानों में आर्थिक असुरक्षा बढ़ी है।
सुधार के लिए आवश्यक कदम
भारतीय कृषि की स्थिति सुधारने के लिए सरकार को कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने की आवश्यकता है:
- सब्सिडी (subsidies) को युक्तिसंगत बनाना (rationalisation), ताकि इसका लाभ वास्तव में ज़रूरतमंद व छोटे किसानों तक पहुँच सके।
- सरकार को कुछ भूमिकाओं से पीछे हट जाना चाहिए, जैसे कृषि उत्पादों के विपणन (marketing) की व्यवस्था में, तथा इस क्षेत्र में निजी व सहकारी संस्थाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करना चाहिए।
- किसानों को बेहतर तकनीकी सहायता, ऋण सुविधा तथा बाज़ार पहुँच प्रदान करना।
- सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, विशेषकर वर्षा-सिंचित क्षेत्रों में।
- फसल विविधीकरण (crop diversification) को बढ़ावा देना ताकि केवल गेहूँ-चावल चक्र पर निर्भरता कम हो सके।
मुख्य बिंदु (Key Points to Remember)
- भारत में कृषि के मुख्यतः चार प्रकार हैं — प्राचीन निर्वाह कृषि, गहन निर्वाह कृषि, वाणिज्यिक खेती तथा बागाती कृषि।
- झूम खेती को अलग-अलग राज्यों में अलग नामों से जाना जाता है — असम में ‘झूम’, केरल में ‘पोनम’, मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ में ‘बेवर-दहिया’।
- भारत में तीन प्रमुख फसल ऋतुएँ हैं — खरीफ (जून-सितंबर), रबी (अक्टूबर-मार्च) तथा जायद (मार्च-जून)।
- चावल व गेहूँ भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसलें हैं; ज्वार, बाजरा व रागी मोटे अनाज कहलाते हैं।
- गन्ना, तिलहन, चाय, कॉफी तथा बागवानी फसलें खाद्यान्न के अतिरिक्त प्रमुख फसलें हैं।
- रबर तथा रेशेदार फसलें (कपास, जूट, रेशम, सन) गैर-खाद्य फसलों की श्रेणी में आती हैं।
- भूमि सुधार, सहकारिता, हरित क्रांति, न्यूनतम समर्थन मूल्य, फसल बीमा, किसान क्रेडिट कार्ड आदि प्रमुख प्रौद्योगिकीय व संस्थागत सुधार हैं।
- हरित क्रांति के लाभ मुख्यतः सिंचित क्षेत्रों (पंजाब, हरियाणा) तक सीमित रहे, जिससे क्षेत्रीय असमानता बढ़ी।
- बफर स्टॉक व सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रमुख साधन हैं।
- WTO सदस्यता तथा विकसित देशों की सब्सिडी नीतियों के कारण भारतीय किसानों को वैश्विक बाज़ार में गैर-प्रतिस्पर्धी मूल्य मिलते हैं।
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