पाठ – 6
विनिर्माण उद्योग
In this post we have given the detailed notes of class 10 Social Science (Geography) chapter 6 Manufacturing Industries in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (भूगोल) के पाठ 6 विनिर्माण उद्योग के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है।
| Board | CBSE Board, JAC Board, RBSE Board, MPBSE Board, UBSE Board |
| Textbook | NCERT — Contemporary India-II (Reprint 2026-27) |
| Class | Class 10 |
| Subject | Social Science (Geography) |
| Chapter no. | Chapter 6 |
| Chapter Name | विनिर्माण उद्योग (Manufacturing Industries) |
| Category | Class 10 SST Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 6, विनिर्माण उद्योग
विनिर्माण का महत्व
विनिर्माण (Manufacturing): कच्चे माल (raw materials) को मशीनों की सहायता से मूल्यवान तथा अधिक उपयोगी वस्तुओं में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को विनिर्माण कहते हैं। उदाहरण के लिए, कपास से सूती धागा, धागे से कपड़ा तथा कपड़े से वस्त्र बनाना विनिर्माण की श्रेणी में आता है।
विनिर्माण उद्योगों को किसी भी देश के आर्थिक विकास की रीढ़ (backbone) माना जाता है, क्योंकि –
- विनिर्माण उद्योग कृषि पर निर्भरता को घटाकर राष्ट्रीय आय (national income) में वृद्धि करते हैं तथा रोजगार के नए अवसर उत्पन्न करते हैं, जिससे गरीबी और बेरोजगारी को दूर किया जा सकता है।
- ये उद्योग कृषि को आधुनिक बनाने में सहायक होते हैं, जो कृषि पर पड़ने वाले जनसंख्या के दबाव को कम करता है। कृषि क्षेत्र भी उद्योगों को कच्चा माल तथा बाजार उपलब्ध कराने के साथ-साथ उनसे उत्पादित वस्तुएँ जैसे उर्वरक, कीटनाशक, मशीनरी आदि प्राप्त करता है।
- विनिर्मित वस्तुओं का निर्यात करके विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है, जिससे व्यापार संतुलन (trade balance) सुधरता है।
- जो देश कच्चे माल को निर्यात करते हैं और तैयार माल आयात करते हैं, वे निर्धन बने रहते हैं, जबकि जो देश कच्चे माल को मूल्यवान वस्तुओं में बदलकर निर्यात करते हैं, वे समृद्ध होते हैं। यही कारण है कि सभी देश विनिर्माण उद्योगों को विकसित करने का प्रयास करते हैं।
- विनिर्माण उद्योग एक ऐसे समाज के निर्माण में सहायक होते हैं जिसमें निर्धनता तथा बेरोजगारी न हो और सभी नागरिकों का जीवन-स्तर ऊँचा हो।
उदाहरण – द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात जापान तथा हाल ही के दशकों में दक्षिण कोरिया का तीव्र आर्थिक विकास विनिर्माण उद्योगों के कारण ही संभव हो सका। इन देशों ने विनिर्माण को प्राथमिकता देकर अपनी अर्थव्यवस्था को औद्योगीकृत किया और विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बनाया। भारत में भी औद्योगीकरण (industrialisation) एवं आर्थिक विकास (economic development) एक-दूसरे के पर्याय माने जाते हैं।
औद्योगिक अवस्थिति (Industrial Location)
किसी उद्योग की अवस्थिति (स्थान) अनेक कारकों से प्रभावित होती है, जैसे कच्चे माल, श्रम, पूँजी, शक्ति (ऊर्जा) तथा बाजार की उपलब्धता। ये कारक व्यक्तिगत रूप से या एक साथ किसी स्थान पर उद्योग स्थापित करने के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं।
औद्योगिक अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक
- कच्चे माल की उपलब्धता: जो उद्योग भारी, शीघ्र नष्ट होने वाले (perishable) या ऐसे कच्चे माल पर आधारित होते हैं जिनका भार प्रसंस्करण के बाद घट जाता है, वे प्रायः कच्चे माल के स्रोत के निकट स्थापित किए जाते हैं। उदाहरण – चीनी उद्योग, लौह-इस्पात उद्योग।
- श्रम (Labour): पर्याप्त मात्रा में कुशल तथा अकुशल श्रमिकों की उपलब्धता उद्योगों को आकर्षित करती है।
- पूँजी (Capital): उद्योग स्थापित करने तथा उसे चलाने के लिए पूँजी निवेश आवश्यक है, अतः वित्तीय संस्थानों तथा बैंकों की उपलब्धता महत्वपूर्ण है।
- शक्ति/ऊर्जा (Power): कोयला, विद्युत, पेट्रोलियम जैसे ऊर्जा स्रोतों की निकटता उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करती है।
- बाजार (Market): तैयार माल की बिक्री के लिए निकटवर्ती एवं विस्तृत बाजार का होना आवश्यक है, जिससे परिवहन लागत कम हो और मुनाफा बढ़े।
- इनके अतिरिक्त परिवहन एवं संचार सुविधाएँ, सरकार की नीतियाँ (जैसे कर में छूट) भी उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करती हैं।
समूहन अर्थव्यवस्था तथा औद्योगिक पट्टी
समूहन अर्थव्यवस्था (Agglomeration Economies): प्रारंभिक अवस्था में उद्योग अनुकूल कारकों के कारण किसी स्थान पर स्थापित होते हैं, परंतु बाद में शहरीकरण के कारण अनेक अन्य उद्योग भी वहाँ आ जाते हैं, ताकि वे बड़े बाजार से मिलने वाले लाभ (जिन्हें समूहन अर्थव्यवस्था कहा जाता है) का लाभ उठा सकें। इससे धीरे-धीरे एक औद्योगिक पट्टी अथवा प्रदेश (Industrial Belt/Region) का विकास होता है।
उद्योगों का वर्गीकरण
उद्योगों को उनके आकार, कच्चे माल, स्वामित्व तथा उत्पाद की प्रकृति के आधार पर विभिन्न वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।
1. प्रयुक्त कच्चे माल के आधार पर
- कृषि-आधारित उद्योग (Agro-based Industries): जो उद्योग अपने कच्चे माल के लिए कृषि उत्पादों पर निर्भर रहते हैं, जैसे सूती वस्त्र, पटसन (जूट), रेशमी वस्त्र, ऊनी वस्त्र, चीनी तथा वनस्पति तेल उद्योग।
- खनिज-आधारित उद्योग (Mineral-based Industries): जो उद्योग खनिज अयस्कों को कच्चे माल के रूप में प्रयोग करते हैं, जैसे लौह-इस्पात उद्योग (धातु आधारित) तथा सीमेंट व मृदा उद्योग (गैर-धात्विक खनिज आधारित)।
- वन-आधारित उद्योग (Forest-based Industries): जिनमें वनों से प्राप्त कच्चा माल प्रयोग होता है, जैसे कागज, फर्नीचर, लाख आदि उद्योग।
2. मुख्य भूमिका के आधार पर
- आधारभूत/भारी उद्योग (Basic/Heavy Industries): जिनके उत्पाद अन्य उद्योगों में कच्चे माल के रूप में प्रयोग होते हैं, जैसे लौह-इस्पात उद्योग, ताँबा प्रगलन (Copper Smelting) तथा एल्युमिनियम प्रगलन।
- उपभोक्ता उद्योग (Consumer Industries): जो उत्पाद सीधे उपभोक्ताओं द्वारा प्रयोग किए जाते हैं, जैसे टूथपेस्ट, साबुन, कागज, इलेक्ट्रिक पंखे आदि बनाने वाले उद्योग।
3. पूँजी विनियोग के आधार पर
- लघु उद्योग (Small-scale Industry): ऐसे उद्योग जिनमें पूँजी विनियोग की सीमा (2018 में) एक करोड़ रुपये तक निर्धारित है।
- वृहत/बड़े उद्योग (Large-scale Industry): जिनमें पूँजी विनियोग की सीमा एक करोड़ रुपये से अधिक होती है।
4. स्वामित्व के आधार पर
- सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector): सरकार के स्वामित्व वाले उद्योग, जैसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL), स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL)।
- निजी क्षेत्र (Private Sector): एक व्यक्ति या समूह के स्वामित्व वाले उद्योग, जैसे टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO)।
- संयुक्त क्षेत्र (Joint Sector): सरकार तथा किसी व्यक्ति/समूह के संयुक्त स्वामित्व वाले उद्योग, जैसे ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL)।
- सहकारी क्षेत्र (Cooperative Sector): कच्चे माल के उत्पादकों, आपूर्तिकर्ताओं, श्रमिकों अथवा उपभोक्ताओं द्वारा संसाधनों को एकत्र करके स्थापित उद्योग, जैसे महाराष्ट्र का सहकारी चीनी उद्योग एवं गुजरात की अमूल (AMUL)।
कृषि-आधारित उद्योग
सूती वस्त्र उद्योग (Cotton Textile Industry)
भारत में सूती वस्त्र उद्योग का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। भारतीय हाथ से काते गए धागे (हैंडस्पन) तथा हाथ से बुने गए कपड़े (हैंडवोवन) की गुणवत्ता विश्वप्रसिद्ध थी। यह भारत का एकमात्र ऐसा उद्योग है जो कच्चे माल से लेकर तैयार माल तक अर्थात कपास से लेकर उच्च मूल्यवर्धित उत्पादों तक, आत्मनिर्भर तथा पूर्ण है।
- देश की पहली आधुनिक सूती वस्त्र मिल 1854 में मुंबई में स्थापित हुई थी। अनुकूल जलवायु, कच्चे माल की उपलब्धता, बंदरगाह की निकटता, पूँजी, बाजार तथा प्रशिक्षित श्रमिकों के कारण महाराष्ट्र एवं गुजरात इस उद्योग के प्रमुख केंद्र बने।
- सूती वस्त्र उद्योग हथकरघा (handloom), विद्युत करघा (powerloom) तथा मिल क्षेत्रकों में विभाजित है, जिसमें विकेंद्रीकृत क्षेत्र (हथकरघा एवं विद्युत करघा) का देश के कुल वस्त्र उत्पादन में सबसे बड़ा योगदान है।
- वर्तमान में भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक तथा निर्यातक देश है, फिर भी इस उद्योग को कच्चे माल की गुणवत्ता, अनियमित विद्युत आपूर्ति तथा पुरानी तकनीक जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
पटसन (जूट) वस्त्र उद्योग (Jute Textile Industry)
भारत विश्व का सबसे बड़ा कच्चे पटसन तथा पटसन उत्पादों का उत्पादक देश है और चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है।
- पटसन उद्योग मुख्यतः पश्चिम बंगाल में हुगली नदी के तट पर केंद्रित है। इसका कारण सस्ती जल परिवहन सुविधा, रेल, सड़क तथा जलमार्गों का जाल, कोलकाता का बंदरगाह, कच्चे पटसन की निकटता तथा सस्ते श्रमिकों की प्रचुरता है।
- पश्चिम बंगाल की उपजाऊ गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा भूमि तथा अनुकूल जलवायु के कारण पटसन को ‘स्वर्ण रेशा’ (Golden Fibre) कहा जाता है, और यह क्षेत्र पटसन की खेती के लिए आदर्श माना जाता है।
- सिंथेटिक फाइबर की बढ़ती माँग तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा (बांग्लादेश, ब्राजील, फिलीपींस, थाईलैंड जैसे देशों से) के कारण इस उद्योग की माँग घट रही है। सरकार ने राष्ट्रीय पटसन नीति 2005 लागू करके उत्पादकता बढ़ाने, गुणवत्ता सुधारने तथा विविधीकरण को बढ़ावा देने का प्रयास किया है।
चीनी उद्योग (Sugar Industry)
भारत गन्ने का उत्पादन तथा गुड़-खांडसारी उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान पर है, जबकि चीनी उत्पादन में यह ब्राजील के बाद दूसरे स्थान पर है।
- देश में लगभग आधी चीनी मिलें उत्तर प्रदेश, बिहार तथा महाराष्ट्र में स्थित हैं।
- हाल के वर्षों में इस उद्योग का स्थानांतरण उत्तर भारत (विशेषकर उत्तर प्रदेश) से महाराष्ट्र तथा प्रायद्वीपीय भारत (Peninsular India) की ओर हुआ है। इसके प्रमुख कारण हैं –
- प्रायद्वीपीय भारत में सुक्रोज (चीनी की मात्रा) की मात्रा अधिक होती है, क्योंकि यहाँ की ठंडी जलवायु गन्ने के पकने की अवधि को बढ़ा देती है।
- यहाँ की सहकारी समितियाँ अधिक कुशल हैं तथा गन्ना पेराई की अवधि भी उत्तर भारत की तुलना में लंबी होती है।
- दक्षिण भारत की मिलें आकार में बड़ी तथा आधुनिक तकनीक से सुसज्जित हैं।
- यह एक मौसमी उद्योग है, जिसकी अन्य समस्याओं में गन्ने की कम उत्पादकता, परिवहन में देरी के कारण सुक्रोज की मात्रा में कमी तथा पुरानी तकनीक शामिल हैं।
खनिज-आधारित उद्योग
लौह-इस्पात उद्योग (Iron and Steel Industry)
लौह-इस्पात उद्योग को समस्त उद्योगों की रीढ़ माना जाता है, क्योंकि यह अन्य सभी भारी, मध्यम एवं हल्के इंजीनियरिंग उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराता है।
- कच्चा माल: लौह अयस्क, कोकिंग कोयला (लगभग 4:2 के अनुपात में), चूना पत्थर, मैंगनीज तथा डोलोमाइट। इन सभी कच्चे मालों का भार अधिक होने के कारण यह उद्योग कच्चे माल के स्रोतों के निकट स्थापित किया जाता है।
- प्रमुख केंद्र: भिलाई (छत्तीसगढ़), दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल), बोकारो (झारखंड) तथा जमशेदपुर (झारखंड) – जहाँ 1907 में स्थापित टिस्को (TISCO) देश की सबसे पुरानी तथा सबसे बड़ी निजी क्षेत्र की इस्पात कंपनियों में से एक है। इसके अतिरिक्त राउरकेला (ओडिशा), भद्रावती एवं विजयनगर (कर्नाटक), सलेम (तमिलनाडु) भी प्रमुख केंद्र हैं।
- भारत कच्चा लौह अयस्क निर्यात करता है, परंतु तैयार इस्पात का आयात करता है, जो इस उद्योग की एक विडंबना है।
उद्योग की समस्याएँ
- उच्च लागत तथा सीमित उच्च कोटि के कोकिंग कोयले की उपलब्धता।
- कम श्रम उत्पादकता।
- अनियमित ऊर्जा (विद्युत) आपूर्ति।
- अवसंरचना (सड़क, रेल आदि परिवहन साधनों) का अभाव।
एल्युमिनियम प्रगलन उद्योग (Aluminium Smelting)
- यह भारत का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण धातुकर्म उद्योग (metallurgical industry) है। एल्युमिनियम हल्की, संक्षारण-रोधी (corrosion resistant), ऊष्मा की सुचालक, आघातवर्ध्य (malleable) होने के साथ-साथ लोहे के विकल्प के रूप में मिश्रधातु बनाने के लिए प्रयोग होती है।
- यह उद्योग बॉक्साइट (Bauxite) को कच्चे माल के रूप में प्रयोग करता है, जो एक अवसादी शैल (sedimentary rock) है, तथा भारी मात्रा में अबाधित विद्युत आपूर्ति की आवश्यकता होती है, इसलिए यह उद्योग बॉक्साइट खदानों तथा सस्ती विद्युत की उपलब्धता वाले स्थानों के निकट स्थापित किया जाता है।
रासायनिक उद्योग (Chemical Industries)
- एशिया में भारत का रासायनिक उद्योग तीसरे स्थान पर तथा विश्व में बारहवें स्थान पर है। यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 3% योगदान देता है।
- इसे मुख्यतः दो भागों में बाँटा जाता है – अकार्बनिक रसायन (Inorganic Chemicals) जैसे गंधक अम्ल, नाइट्रिक अम्ल, क्षार, सोडा ऐश तथा कास्टिक सोडा, तथा कार्बनिक रसायन (Organic Chemicals) जैसे पेट्रो-रसायन, जो कृत्रिम रेशे, प्लास्टिक, सिंथेटिक रबड़, दवाइयों आदि के निर्माण में प्रयुक्त होते हैं।
- अकार्बनिक रसायन उद्योग देश भर में फैले हुए हैं, जबकि कार्बनिक रसायन उद्योग मुख्यतः तेलशोधक कारखानों (oil refineries) अथवा पेट्रो-रासायनिक संयंत्रों के निकट स्थापित होते हैं।
सूचना प्रौद्योगिकी तथा इलेक्ट्रॉनिक उद्योग
- इलेक्ट्रॉनिक उद्योग टेलीविजन, टेलीफोन, सेल्युलर टेलीकॉम, पेजर, कंप्यूटर से लेकर स्थानांतरित उपग्रहों में प्रयुक्त होने वाले अत्यंत परिष्कृत उपकरणों तक की विस्तृत श्रृंखला को समाहित करता है।
- इस उद्योग का सबसे महत्वपूर्ण उत्पाद कंप्यूटर है, जिसने सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में क्रांति ला दी है।
- बेंगलुरू (कर्नाटक) को भारत की ‘इलेक्ट्रॉनिक राजधानी’ (Electronic Capital of India) कहा जाता है। इसके अतिरिक्त मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ एवं कोयंबटूर भी इस उद्योग के अन्य प्रमुख केंद्र हैं।
- सॉफ्टवेयर उद्योग में देश का निर्यात तीव्र गति से बढ़ा है और इसने विदेशी मुद्रा अर्जन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस उद्योग ने बड़ी संख्या में रोजगार उत्पन्न किए हैं तथा शिक्षा एवं मनोरंजन क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए हैं। भारत में सॉफ्टवेयर उद्योग सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग का सबसे तीव्र गति से बढ़ने वाला उपक्षेत्र है।
औद्योगिक प्रदूषण तथा पर्यावरणीय क्षरण
उद्योग पर्यावरण को चार प्रमुख तरीकों से प्रदूषित करते हैं – वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण।
प्रदूषण के प्रकार
- वायु प्रदूषण (Air Pollution): वायुमंडल में अवांछित गैसों (सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड) की उपस्थिति के कारण होता है। रासायनिक तथा कागज उद्योग, ईंट-भट्टे, तेलशोधनशालाएँ इसके प्रमुख स्रोत हैं। यह मानव स्वास्थ्य, पशुओं, पौधों, भवनों तथा संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए हानिकारक है।
- जल प्रदूषण (Water Pollution): कारखानों से निकलने वाले जैविक तथा अजैविक औद्योगिक अपशिष्टों एवं रसायनों के जलस्रोतों में मिल जाने से होता है। कागज, लुगदी, रसायन, वस्त्र तथा रँगाई उद्योग, तेलशोधनशालाएँ, चमड़ा उद्योग तथा इलेक्ट्रोप्लेटिंग उद्योग जल में सीसा एवं पारे जैसे हानिकारक धातु उत्सर्जित करने वाले प्रमुख उद्योग हैं।
- तापीय प्रदूषण (Thermal Pollution): जब कारखानों तथा तापीय संयंत्रों से गर्म जल बिना ठंडा किए नदियों-तालाबों में छोड़ा जाता है, तो जल का तापमान बढ़ जाता है, जिससे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।
- ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution): औद्योगिक तथा निर्माण गतिविधियों, कारखाने की मशीनों, लकड़ी चीरने वाली आरी आदि से उत्पन्न होता है। इससे श्रवण दुर्बलता (hearing impairment), उच्च रक्तचाप, चिड़चिड़ापन तथा तनाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
प्रदूषण नियंत्रण के उपाय
- जल प्रदूषण नियंत्रण: जल के प्रयोग को न्यूनतम करना तथा एक ही जल को विभिन्न प्रक्रियाओं में बार-बार पुनःचक्रण (recycling) करना। वर्षा जल संचयन (rainwater harvesting) करके वर्षा जल को एकत्रित करना। कारखानों से निकलने वाले गर्म जल तथा अपशिष्टों को जलस्रोतों में छोड़ने से पहर उपचारित (treat) करना, जिसमें भौतिक, रासायनिक तथा जैविक विधियों का प्रयोग होता है।
- वायु प्रदूषण नियंत्रण: निम्न स्तर के कच्चे तेल एवं उच्च सल्फरयुक्त कोयले के स्थान पर धुआँरहित ईंधन (smokeless fuel) का प्रयोग करना। ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों के स्थान पर तेल अथवा गैस का प्रयोग बढ़ाना। कणिकीय पदार्थों (particulate matter) को हवा में मिलने से पहले रोकने के लिए भट्टियों में वैद्युत अवक्षेपित्र (Electrostatic Precipitators), फिल्टर तथा स्क्रबर (धूम्र-प्रक्षालक) जैसे उपकरणों का प्रयोग करना।
- ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण: मशीनों तथा उपकरणों में साइलेंसर (silencers) का प्रयोग करना, मशीनों का उचित रखरखाव तथा उन्हें तेल लगाना, आवाज सोखने वाली सामग्री का प्रयोग करना, तथा श्रमिकों को शोर वाले क्षेत्रों में कान बंद करने वाले उपकरण (earplugs/earphones) प्रदान करना।
- ठोस कचरे का सुरक्षित निस्तारण भी भूमि तथा जल प्रदूषण को रोकने के लिए आवश्यक है, जिसके लिए भू-भरण (land filling), पुनःचक्रण तथा जैविक खाद बनाने जैसी विधियाँ अपनाई जाती हैं।
मुख्य बिंदु
- विनिर्माण अर्थात कच्चे माल को अधिक मूल्यवान वस्तुओं में परिवर्तित करना, आर्थिक विकास का आधार है।
- औद्योगिक अवस्थिति कच्चे माल, श्रम, पूँजी, शक्ति तथा बाजार जैसे कारकों से निर्धारित होती है; समूहन अर्थव्यवस्था से औद्योगिक पट्टियों का विकास होता है।
- उद्योगों को कच्चे माल (कृषि/खनिज/वन आधारित), भूमिका (आधारभूत/उपभोक्ता), पूँजी विनियोग (लघु/वृहत) तथा स्वामित्व (सार्वजनिक/निजी/संयुक्त/सहकारी) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
- सूती वस्त्र उद्योग महाराष्ट्र-गुजरात में, पटसन उद्योग पश्चिम बंगाल में केंद्रित है; चीनी उद्योग उत्तर प्रदेश से महाराष्ट्र/प्रायद्वीपीय भारत की ओर स्थानांतरित हो रहा है।
- लौह-इस्पात उद्योग सभी उद्योगों की रीढ़ है; भिलाई, दुर्गापुर, बोकारो, जमशेदपुर इसके प्रमुख केंद्र हैं। एल्युमिनियम प्रगलन बॉक्साइट पर आधारित है।
- बेंगलुरू भारत की इलेक्ट्रॉनिक राजधानी है; सॉफ्टवेयर निर्यात देश की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली उद्योग शाखा है।
- वायु, जल, तापीय तथा ध्वनि प्रदूषण को न्यूनतम करने के लिए जल के पुनःचक्रण, वर्षा जल संचयन, धुआँरहित ईंधन, वैद्युत अवक्षेपित्र तथा साइलेंसर जैसे उपाय अपनाए जाते हैं।
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