पाठ – 3
मुद्रा और साख
In this post we have given the detailed notes of class 10 Social Science (Economics) chapter 3 Money and Credit in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (अर्थशास्त्र) के पाठ 3 मुद्रा और साख के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है।
| Board | CBSE Board, JAC Board, RBSE Board, MPBSE Board, UBSE Board |
| Textbook | NCERT — Understanding Economic Development (Reprint 2026-27) |
| Class | Class 10 |
| Subject | Social Science (Economics) |
| Chapter no. | Chapter 3 |
| Chapter Name | मुद्रा और साख (Money and Credit) |
| Category | Class 10 SST Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 3, मुद्रा और साख
मुद्रा की भूमिका
हमारे दैनिक जीवन में अधिकांश लेन-देन मुद्रा (Money) के रूप में होते हैं। श्रमिक को मज़दूरी मुद्रा में मिलती है, दुकानदार वस्तुओं को मुद्रा के बदले बेचता है, और परिवार अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मुद्रा का उपयोग करता है। परंतु ऐसा हमेशा नहीं था — मुद्रा के प्रचलन में आने से पहले वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System) के अंतर्गत वस्तुओं का सीधे वस्तुओं से आदान-प्रदान होता था।
वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System) और आवश्यकताओं का दोहरा संयोग
वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System): वह व्यवस्था जिसमें वस्तुओं का सीधे वस्तुओं के बदले आदान-प्रदान किया जाता है, बिना किसी मुद्रा के माध्यम के उपयोग के।
वस्तु-विनिमय प्रणाली में सबसे बड़ी समस्या आवश्यकताओं के दोहरे संयोग (Double Coincidence of Wants) की थी।
आवश्यकताओं का दोहरा संयोग (Double Coincidence of Wants): इसका अर्थ है कि जो वस्तु एक व्यक्ति के पास है और जिसे वह बेचना चाहता है, वही वस्तु दूसरे व्यक्ति को चाहिए हो, और साथ ही दूसरे व्यक्ति के पास जो वस्तु है, वह पहले व्यक्ति को चाहिए हो। उदाहरण के लिए, यदि किसी किसान के पास गेहूँ है और उसे जूते चाहिए, तो उसे ऐसे व्यक्ति की तलाश करनी होगी जिसके पास जूते हों और जिसे गेहूँ चाहिए हो। ऐसा संयोग होना कठिन और समय लेने वाला था, जिससे व्यापार सीमित और असुविधाजनक हो जाता था।
मुद्रा इस समस्या को कैसे हल करती है
मुद्रा एक ऐसा माध्यम है जो विनिमय (क्रय-विक्रय) की प्रक्रिया में एक बिचौलिये के रूप में कार्य करती है, इसीलिए इसे विनिमय का माध्यम (Medium of Exchange) कहा जाता है। मुद्रा के आने से आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या समाप्त हो गई। अब विक्रेता अपनी वस्तु मुद्रा के बदले बेच सकता है और उसी मुद्रा से अपनी आवश्यकता की कोई भी अन्य वस्तु खरीद सकता है। इस प्रकार मुद्रा क्रय (खरीदना) और विक्रय (बेचना) की क्रियाओं को अलग-अलग कर देती है, जिससे वस्तु-विनिमय प्रणाली की बाधाएँ दूर हो जाती हैं और व्यापार आसान बन जाता है।
मुद्रा के आधुनिक स्वरूप
आधुनिक अर्थव्यवस्था में मुद्रा के मुख्यतः दो रूप प्रचलन में हैं — मुद्रा (सिक्के) तथा कागज़ी नोट।
करेंसी — सिक्के और कागज़ी नोट
- सिक्के (Coins): धातु से बनी मुद्रा, जो छोटे मूल्य के लेन-देन में उपयोग होती है।
- कागज़ी नोट (Paper Notes): कागज़ पर छपी मुद्रा, जो आज के लेन-देन का प्रमुख साधन है।
आधुनिक मुद्रा की विशेषता यह है कि यह स्वयं में उपयोगी नहीं है — अर्थात एक ₹100 का नोट न तो खाया जा सकता है और न ही पहना जा सकता है, फिर भी हर कोई इसे स्वीकार करता है क्योंकि सरकार ने इसे मुद्रा के रूप में प्राधिकृत (authorise) किया है।
भारत में मुद्रा जारी करने का अधिकार — भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI)
भारत में करेंसी नोट भारत सरकार की ओर से भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India — RBI) द्वारा जारी किए जाते हैं। भारत के किसी भी कानून के अंतर्गत RBI के अतिरिक्त कोई अन्य व्यक्ति या संस्था मुद्रा जारी नहीं कर सकती। भारतीय कानून के अनुसार, इन नोटों को भुगतान के साधन के रूप में स्वीकार करने से इनकार नहीं किया जा सकता, अर्थात किसी लेन-देन के निपटारे के लिए इन्हें स्वीकार करना अनिवार्य है।
मुद्रा विनिमय के माध्यम के रूप में क्यों स्वीकार्य है? मुद्रा को विनिमय के माध्यम के रूप में इसलिए स्वीकार किया जाता है क्योंकि सरकार इसका प्राधिकार (authorisation) देती है। भारत में केवल RBI द्वारा जारी की गई करेंसी को ही कानूनी मान्यता प्राप्त है, इसलिए हर व्यक्ति इसे भुगतान के रूप में स्वीकार करता है।
बैंकों में जमा (Deposits) और मुद्रा के अन्य रूप
लोग अपनी बचत का एक बड़ा हिस्सा बैंकों में जमा (Deposit) के रूप में रखते हैं, क्योंकि वहाँ यह सुरक्षित रहता है और उन्हें ब्याज (Interest) भी मिलता है। जमाकर्ता आवश्यकता पड़ने पर बैंक से अपनी मुद्रा वापस माँग सकते हैं — इसीलिए इन जमाओं को माँग जमा (Demand Deposits) कहा जाता है। बैंक चेक (Cheque) की सुविधा भी देते हैं, जिसके माध्यम से खाताधारक बिना नकद (Cash) मुद्रा के भुगतान कर सकता है। चूँकि माँग जमा को भी विनिमय के माध्यम के रूप में उपयोग किया जा सकता है, इसलिए इन्हें भी मुद्रा का एक रूप माना जाता है।
ऋण (साख) और ऋण-प्रलेख (Loan Agreement)
साख/ऋण (Credit): साख या ऋण एक ऐसा समझौता है जिसमें ऋणदाता (Lender) ऋणी (Borrower) को मुद्रा, वस्तुएँ या सेवाएँ इस शर्त पर उपलब्ध कराता है कि भविष्य में उसका भुगतान किया जाएगा।
कोई भी ऋण-समझौता (Loan Agreement) कुछ शर्तों पर आधारित होता है, जिन्हें ऋण की शर्तें (Terms of Credit) कहा जाता है। ये शर्तें निम्नलिखित तत्वों को निर्धारित करती हैं:
- ब्याज दर (Interest Rate): ऋण पर लिया जाने वाला अतिरिक्त शुल्क, जो ऋणी को मूल राशि के साथ चुकाना होता है।
- प्रतिभूति/जमानत (Collateral/Security): ऐसी संपत्ति जिसका स्वामी ऋणी होता है और जिसे वह ऋणदाता के पास तब तक गिरवी रखता है, जब तक ऋण की अदायगी न हो जाए। यदि ऋणी ऋण नहीं चुका पाता, तो ऋणदाता को इस प्रतिभूति को बेचकर अपनी राशि वसूल करने का अधिकार होता है। उदाहरण — भूमि, इमारत, गाड़ी, पशुधन (livestock), बैंक जमा के दस्तावेज़ आदि।
- दस्तावेज़ीकरण (Documentation): ऋण से जुड़े कागज़ात, जिनमें ऋणी और ऋणदाता की पहचान, ऋण राशि, शर्तें आदि दर्ज होती हैं।
- भुगतान का ढंग (Mode of Repayment): ऋण की राशि किस प्रकार और कितनी किश्तों में चुकाई जाएगी।
ये शर्तें ऋणदाता और ऋणी के आपसी संबंधों के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती हैं।
अर्थव्यवस्था में साख की भूमिका — दो उदाहरण
साख (ऋण) उत्पादन की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। नीचे दो उदाहरणों से यह समझा जा सकता है कि साख किसी को लाभ पहुँचा सकती है, तो किसी के लिए संकट का कारण भी बन सकती है।
उदाहरण 1 — औपचारिक क्षेत्र से ऋण (बैंक से गेहूँ उत्पादक किसान)
मान लीजिए एक किसान गेहूँ की फसल की बुवाई से पहले बैंक से उचित ब्याज दर पर ऋण लेता है, ताकि वह बीज, खाद और अन्य कृषि लागतों को पूरा कर सके। फसल तैयार होने पर वह अच्छी उपज बेचकर बैंक का ऋण चुका देता है और शेष लाभ से अगली बुवाई की तैयारी भी कर लेता है। इस प्रकार बैंक का सस्ता एवं समय पर मिला ऋण किसान के उत्पादन-चक्र को सुचारु रूप से चलाने में सहायक सिद्ध होता है।
उदाहरण 2 — अनौपचारिक क्षेत्र से ऋण (साहूकार से ऋण)
दूसरी ओर, यदि कोई किसान साहूकार (Moneylender) से बहुत ऊँची ब्याज दर पर ऋण लेता है और फसल खराब मौसम या अन्य किसी कारण से खराब हो जाती है, तो वह ऋण नहीं चुका पाता। ब्याज दर ऊँची होने के कारण उसका ऋण-भार लगातार बढ़ता जाता है, और उसे अपनी जमीन तक साहूकार को गिरवी रखनी पड़ सकती है या बेचनी पड़ सकती है। इस प्रकार अनौपचारिक क्षेत्र का महँगा ऋण किसान को कर्ज़ के जाल (Debt Trap) में फँसा सकता है।
दोनों उदाहरणों की तुलना
| आधार | औपचारिक क्षेत्र (बैंक/सहकारी समिति) | अनौपचारिक क्षेत्र (साहूकार) |
| ब्याज दर | कम/उचित | बहुत अधिक |
| निगरानी | RBI द्वारा नियंत्रित एवं पर्यवेक्षित | कोई नियामक निगरानी नहीं |
| शर्तें | पारदर्शी एवं निश्चित | प्रायः शोषणकारी |
| परिणाम | उत्पादन-चक्र में सहायक | कर्ज़ के जाल की आशंका |
औपचारिक तथा अनौपचारिक क्षेत्र के ऋण (Formal and Informal Sector Loans)
औपचारिक क्षेत्र के ऋण (Formal Sector Loans)
इसके अंतर्गत बैंक तथा सहकारी समितियाँ (Cooperatives) आती हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) इन संस्थाओं की गतिविधियों की निगरानी करता है। बैंक यह देखते हैं कि वे किस दर पर जमा स्वीकार करें और किस दर पर ऋण दें। RBI यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि बैंक अपनी जमाओं का एक निश्चित न्यूनतम भाग नकद के रूप में रखें, ताकि जमाकर्ताओं को असुविधा न हो, और सभी क्षेत्रों — छोटे किसानों, छोटे उद्योगों तथा छोटे कर्जदारों — को भी ऋण मिल सके, न कि केवल बड़े व्यवसायों को।
अनौपचारिक क्षेत्र के ऋण (Informal Sector Loans)
इसमें साहूकार, व्यापारी, नियोक्ता, रिश्तेदार तथा मित्र शामिल हैं। इस क्षेत्र में कोई संगठन ऋणदाताओं की गतिविधियों की निगरानी नहीं करता। वे अपनी इच्छानुसार ब्याज दर तय कर सकते हैं, जो अत्यधिक ऊँची भी हो सकती है। ऐसे ऋणों की शर्तें भी ऋणी के प्रतिकूल हो सकती हैं, जिससे उधार लेने की लागत बहुत अधिक हो जाती है।
औपचारिक क्षेत्र के ऋण के विस्तार की आवश्यकता क्यों है?
भारत में गरीब परिवारों को आज भी अपनी ऋण-आवश्यकताओं के एक बड़े हिस्से के लिए अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके पीछे प्रमुख कारण यह है कि:
- अनौपचारिक ऋणदाता प्रायः बहुत ऊँची ब्याज दर वसूलते हैं, जिससे ऋणी की अधिकांश आय ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाती है।
- ऊँची लागत का अर्थ है ऋणी की आय का एक बड़ा हिस्सा ऋण चुकाने में ही खर्च होना, जिससे उसके पास बचत के लिए बहुत कम राशि बचती है।
- कभी-कभी ऋण का बोझ इतना अधिक हो जाता है कि यह ऋणी को ऋण-जाल (Debt Trap) में फँसा देता है।
- अनौपचारिक क्षेत्र में शोषणकारी शर्तें, जैसे जमीन गिरवी रखवाना या बंधुआ श्रम (Bonded Labour) जैसी स्थितियाँ भी उत्पन्न हो सकती हैं।
इसीलिए यह आवश्यक है कि बैंक तथा सहकारी समितियों जैसे औपचारिक क्षेत्र के ऋणों का विस्तार हो, विशेषकर उन क्षेत्रों और वर्गों में जहाँ गरीब परिवार अभी भी साहूकारों पर निर्भर हैं। जब सस्ता एवं सुलभ ऋण उपलब्ध होगा, तो देश का समग्र आर्थिक विकास संभव हो सकेगा।
भारत में औपचारिक क्षेत्र की साख
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) बैंकों की कार्यप्रणाली की निगरानी करता है। RBI यह देखता है कि बैंक न केवल लाभजनक व्यवसायों तथा व्यापारियों को, बल्कि छोटे कृषकों, छोटे उद्योगों तथा छोटे कर्जदारों को भी उचित शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराएँ। समय-समय पर RBI द्वारा बैंकों की गतिविधियों की समीक्षा भी की जाती है कि वे नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं।
विकास के लिए सस्ता एवं वहनीय ऋण (Affordable Credit) अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे लोग खेती, छोटे व्यापार तथा अन्य उत्पादक गतिविधियों में निवेश कर पाते हैं, जिससे आय और रोज़गार दोनों में वृद्धि होती है। फिर भी, वर्तमान स्थिति यह है कि भारत में अधिकांश गरीब परिवार आज भी अपनी ऋण-आवश्यकताओं के लिए अनौपचारिक स्रोतों — जैसे साहूकार, रिश्तेदार और परिचित — पर निर्भर हैं, क्योंकि उन्हें औपचारिक ऋण आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाता। इसीलिए औपचारिक क्षेत्र के ऋण की पहुँच को गरीब और वंचित वर्गों तक बढ़ाना आज भी एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।
स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups — SHGs) — गरीबों के लिए साख की व्यवस्था
हाल के वर्षों में, गरीब परिवारों (विशेषकर महिलाओं) को समय पर तथा उचित शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराने के लिए स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups — SHGs) एक प्रभावी उपाय के रूप में उभरे हैं।
SHG का गठन और कार्यप्रणाली
- एक स्वयं सहायता समूह सामान्यतः 15-20 सदस्यों का समूह होता है, जिनमें अधिकांशतः एक ही क्षेत्र की महिलाएँ होती हैं।
- सदस्य नियमित रूप से अपनी छोटी-छोटी बचत को समूह में जमा करते हैं। इस प्रकार कुछ महीनों में समूह के पास एक सामूहिक कोष (Common Fund) एकत्रित हो जाता है।
- समूह के सदस्य इसी कोष में से एक-दूसरे को छोटे-छोटे ऋण उपलब्ध कराते हैं, जिसके लिए बाज़ार की तुलना में कम ब्याज दर तय की जाती है।
- इन ऋणों के लिए किसी प्रतिभूति/जमानत (Collateral) की आवश्यकता नहीं होती — अर्थात ये ऋण जमानत-मुक्त (Collateral-free) होते हैं।
- ऋण किसे, कितनी राशि का, किस उद्देश्य के लिए और किन शर्तों पर दिया जाए — यह निर्णय समूह के सदस्य आपस में मिलकर लेते हैं।
- ऋण चुकाने की समय-सीमा तथा किश्तों को भी समूह स्वयं तय करता है, जिससे लचीलापन बना रहता है।
- नियमित बचत की आदत बनने के बाद बैंक भी SHG के नाम पर ऋण देने के लिए तैयार हो जाते हैं, बशर्ते समूह के पास पर्याप्त सामूहिक कोष हो और उसका रिकॉर्ड नियमित हो।
SHG से गरीब महिलाओं को होने वाले लाभ
- बिना जमानत के ससमय ऋण उपलब्ध होने से सदस्य साहूकारों के ऊँचे ब्याज-जाल से बच पाते हैं।
- महिलाएँ छोटे व्यवसाय (जैसे सिलाई, पशुपालन, दस्तकारी आदि) आरंभ कर सकती हैं और आत्मनिर्भर बन सकती हैं।
- समूह की बैठकों के माध्यम से महिलाओं में सामाजिक व आर्थिक मुद्दों पर जागरूकता बढ़ती है और उनकी निर्णय-क्षमता मज़बूत होती है।
- SHG गरीब परिवारों को अत्यधिक कर्ज़ के जाल से बाहर निकालने और उनकी सौदेबाज़ी की क्षमता (Bargaining Power) बढ़ाने में सहायक सिद्ध होते हैं।
- इस प्रकार SHG न केवल आर्थिक साख की व्यवस्था करते हैं, बल्कि महिलाओं के सामाजिक सशक्तिकरण (Social Empowerment) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मुख्य बिंदु
- वस्तु-विनिमय प्रणाली में आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या थी, जिसे मुद्रा ने हल किया।
- मुद्रा विनिमय के माध्यम के रूप में कार्य करती है और सरकार के प्राधिकार के कारण स्वीकार्य होती है।
- भारत में करेंसी नोट जारी करने का अधिकार केवल RBI के पास है।
- माँग जमा (Demand Deposits) भी मुद्रा का एक रूप माने जाते हैं।
- साख/ऋण एक समझौता है जिसकी शर्तों में ब्याज दर, प्रतिभूति, दस्तावेज़ीकरण तथा भुगतान का ढंग शामिल होते हैं।
- औपचारिक क्षेत्र (बैंक, सहकारी समितियाँ) के ऋण सस्ते और नियंत्रित होते हैं, जबकि अनौपचारिक क्षेत्र (साहूकार) के ऋण महँगे और शोषणकारी हो सकते हैं।
- RBI बैंकों की निगरानी करता है ताकि सस्ता व वहनीय ऋण उपलब्ध हो सके, फिर भी अधिकांश गरीब परिवार अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर हैं।
- स्वयं सहायता समूह (SHG) 15-20 सदस्यों (मुख्यतः महिलाओं) का समूह होते हैं, जो बचत व जमानत-मुक्त ऋण के माध्यम से गरीबों को आत्मनिर्भर बनाते हैं।
We hope that class 10 Social Science Chapter 3 मुद्रा और साख (Money and Credit) Notes in Hindi helped you. If you have any queries about class 10 Social Science Chapter 3 मुद्रा और साख Notes in Hindi or about any other Notes of class 10 Social Science in Hindi, so you can comment below. We will reach you as soon as possible…
