पाठ – 1
सत्ता की साझेदारी
In this post we have given the detailed notes of class 10 Social Science (Political Science) chapter 1 Power-sharing in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 10 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान (राजनीति विज्ञान) के पाठ 1 सत्ता की साझेदारी के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 10 में है।
| Board | CBSE Board, JAC Board, RBSE Board, MPBSE Board, UBSE Board |
| Textbook | NCERT — Democratic Politics-II (Reprint 2026-27) |
| Class | Class 10 |
| Subject | Social Science (Political Science) |
| Chapter no. | Chapter 1 |
| Chapter Name | सत्ता की साझेदारी (Power-sharing) |
| Category | Class 10 SST Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 1, सत्ता की साझेदारी
परिचय
बेल्जियम और श्रीलंका दो पड़ोसी देश हैं, जो भारत की तुलना में आकार में बहुत छोटे हैं, परंतु इन दोनों देशों ने अपने यहाँ के विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता की साझेदारी के प्रश्न को बहुत अलग-अलग ढंग से सुलझाया है। बेल्जियम ने सत्ता की साझेदारी करके अपनी जनसंख्या की क्षेत्रीय और सांस्कृतिक विविधताओं को समायोजित करने में सफलता पाई है, जबकि श्रीलंका इस मामले में असफल रहा और परिणामस्वरूप वहाँ वर्षों तक गृह-युद्ध और पीड़ा झेलनी पड़ी। ये दोनों उदाहरण लोकतंत्र के सामने एक साझा प्रश्न खड़ा करते हैं — सत्ता को इस तरह कैसे साझा किया जाए कि देश सफलतापूर्वक चले और विभिन्न समूह संतुष्ट रहें?
प्रकरण अध्ययन 1: बेल्जियम
बेल्जियम की जातीय (एथनिक) संरचना
- बेल्जियम यूरोप का एक छोटा-सा देश है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 30,500 वर्ग किलोमीटर है और जनसंख्या लगभग एक करोड़ है — जो लगभग हरियाणा राज्य की जनसंख्या के बराबर है।
- डच भाषी क्षेत्र: देश के 59% लोग फ्लेमिश (Flemish) क्षेत्र में रहते हैं और डच (Dutch) भाषा बोलते हैं।
- फ्रेंच भाषी क्षेत्र: 40% लोग वैलोनिया (Wallonia) क्षेत्र में रहते हैं और फ्रेंच भाषा बोलते हैं।
- जर्मन भाषी अल्पसंख्यक: शेष 1% लोग जर्मन भाषा बोलते हैं।
- राजधानी ब्रसेल्स (Brussels) में 80% लोग फ्रेंच भाषा बोलते हैं और 20% डच भाषी हैं।
- फ्रेंच भाषी अल्पसंख्यक समुदाय अपेक्षाकृत धनी और शक्तिशाली था, जिसका डच भाषी समुदाय में विरोध था, क्योंकि उन्हें शिक्षा और आर्थिक विकास का लाभ काफी बाद में मिला। इससे 1950 और 1960 के दशकों में, विशेषकर ब्रसेल्स में, दोनों समुदायों के बीच तनाव उत्पन्न हुआ।
संवैधानिक संशोधनों (1970–1993) द्वारा समायोजन
बेल्जियम के नेताओं ने दोनों प्रमुख समुदायों के बीच के मतभेदों और संघर्षों को पहचाना तथा क्षेत्रीय भिन्नताओं और सांस्कृतिक विविधताओं के अस्तित्व को स्वीकार किया। 1970 से 1993 के बीच उन्होंने अपने संविधान में चार बार संशोधन किया, ताकि ऐसी व्यवस्था बनाई जा सके जिसमें सभी लोग एक ही देश में मिलजुल कर रह सकें। उन्होंने जो व्यवस्था बनाई, वह बेल्जियम की जटिल और बहुआयामी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सत्ता की साझेदारी का एक उत्तम उदाहरण है।
बेल्जियम के संविधान में एक विशिष्ट और नवीन संस्थागत व्यवस्था प्रदान की गई है, जिसके निम्नलिखित तत्व हैं —
- केंद्र सरकार में डच और फ्रेंच भाषी मंत्रियों की संख्या बराबर होती है। कुछ विशेष कानूनों को पारित करने के लिए दोनों भाषायी समूहों के सदस्यों के बहुमत का समर्थन आवश्यक होता है। इस व्यवस्था के कारण कोई भी एक समुदाय अकेले निर्णय नहीं ले सकता।
- केंद्र सरकार की अनेक शक्तियाँ देश के दोनों क्षेत्रों की राज्य सरकारों को सौंप दी गई हैं। शिक्षा, संस्कृति, भाषा जैसे विषय, जो केवल एक समुदाय से जुड़े होते हैं, उनके लिए केंद्र सरकार उत्तरदायी नहीं है।
- ब्रसेल्स में एक अलग सरकार है, जिसमें दोनों समुदायों को बराबर प्रतिनिधित्व दिया गया है। फ्रेंच भाषी लोगों ने ब्रसेल्स की क्षेत्रीय सरकार में डच भाषी लोगों के साथ बराबर प्रतिनिधित्व इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि डच भाषी लोगों ने केंद्र सरकार में बराबर प्रतिनिधित्व स्वीकार किया था।
- बेल्जियम में एक तीसरे प्रकार की सरकार भी है, जिसे “समुदाय सरकार” (Community Government) कहा जाता है। इसे डच, फ्रेंच और जर्मन भाषी समुदाय के लोग चुनते हैं, चाहे वे कहीं भी रहते हों। इस सरकार को सांस्कृतिक, शैक्षिक और भाषा-संबंधी मुद्दों पर अधिकार प्राप्त है।
परिणाम: सत्ता की साझेदारी की इस जटिल व्यवस्था ने बेल्जियम को दोनों प्रमुख समुदायों के बीच नागरिक संघर्ष से बचने में मदद की, और 1950 के दशक में जिस हिंसक विभाजन की आशंका बहुत लोगों ने जताई थी, वह नहीं हुआ।
प्रकरण अध्ययन 2: श्रीलंका
श्रीलंका की जनसंख्या संरचना
- श्रीलंका एक द्वीपीय देश है, जो बेल्जियम से भी छोटा है और तमिलनाडु के दक्षिणी तट से कुछ ही मील की दूरी पर स्थित है। इसकी जनसंख्या लगभग दो करोड़ है।
- सिंहली भाषी: कुल जनसंख्या का 74%, जो अधिकांशतः बौद्ध धर्म को मानते हैं।
- तमिल भाषी: कुल जनसंख्या का 18%, जो दो उप-समूहों में बँटे हैं — श्रीलंकाई तमिल (13%), जिनके पूर्वज प्राचीन काल से श्रीलंका में रहते आए हैं, और भारतीय तमिल (5%), जिन्हें अंग्रेज़ उपनिवेशवादियों द्वारा भारत से बागानों (plantations) में मज़दूरी के लिए श्रीलंका लाया गया था।
- अधिकांश श्रीलंकाई तमिल हिंदू या ईसाई धर्म के अनुयायी हैं, जबकि अधिकांश सिंहली लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं।
स्वतंत्रता (1948) के बाद बहुसंख्यकवाद
बहुसंख्यकवाद (Majoritarianism): यह वह विचारधारा है जिसके अनुसार बहुसंख्यक समुदाय को अल्पसंख्यकों की इच्छाओं और आवश्यकताओं की अनदेखी करते हुए, अपनी मनचाही तरीके से देश पर शासन करने का अधिकार होना चाहिए। श्रीलंका 1948 में एक स्वतंत्र देश के रूप में उभरा। सिंहली समुदाय के नेता अपनी संख्यात्मक बहुसंख्या का लाभ उठाकर सरकारी नौकरियों, व्यापार और अन्य अवसरों पर अपना वर्चस्व सुनिश्चित करना चाहते थे, और उन्होंने इस नीति को आगे बढ़ाया।
सिंहली वर्चस्व स्थापित करने के लिए श्रीलंका सरकार द्वारा अनेक कदम उठाए गए —
- 1956 में एक अधिनियम पारित किया गया, जिसमें तमिल भाषा की अनदेखी करते हुए सिंहली को एकमात्र राजभाषा (आधिकारिक भाषा) घोषित किया गया।
- सरकारों ने विश्वविद्यालयों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में सिंहली आवेदकों को वरीयता देने वाली नीतियाँ अपनाईं।
- नए संविधान में यह प्रावधान किया गया कि राज्य बौद्ध धर्म की रक्षा और संवर्धन करेगा तथा उसे सर्वोच्च स्थान देगा।
तमिल समुदाय का अलगाव (Alienation)
सरकार के इन एक के बाद एक उठाए गए कदमों ने श्रीलंकाई तमिलों में धीरे-धीरे अलगाव की भावना को बढ़ावा दिया। उन्हें लगा कि बौद्ध सिंहली नेताओं के नेतृत्व वाला कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल उनकी भाषा और संस्कृति के प्रति संवेदनशील नहीं है। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि संविधान और सरकारी नीतियों ने उन्हें समान राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा, नौकरियों और अन्य अवसरों में उनके साथ भेदभाव किया, तथा उनके हितों की अनदेखी की। परिणामस्वरूप, समय के साथ सिंहली और तमिल समुदायों के बीच संबंध तनावपूर्ण होते गए।
गृह-युद्ध और तमिल ईलम की माँग
श्रीलंकाई तमिलों ने तमिल भाषा को राजभाषा के रूप में मान्यता, क्षेत्रीय स्वायत्तता (regional autonomy), तथा शिक्षा और नौकरियों में समान अवसरों की माँग को लेकर दल बनाए और संघर्ष चलाए। परंतु उनकी माँगें बार-बार अस्वीकार कर दी गईं। 1980 के दशक तक, श्रीलंका के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों में एक स्वतंत्र तमिल ईलम (Tamil Eelam) (या तमिल राज्य) की माँग करने वाले कई राजनीतिक संगठन बन गए। दोनों समुदायों के बीच अविश्वास धीरे-धीरे व्यापक संघर्ष में बदल गया, जो शीघ्र ही गृह-युद्ध (civil war) का रूप ले बैठा। इस गृह-युद्ध ने देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन को भयंकर आघात पहुँचाया, दोनों समुदायों के हज़ारों लोगों की जान गई, अनेक परिवारों को शरणार्थी बनकर देश छोड़ना पड़ा, और सामान्य जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ।
दोनों उदाहरणों की तुलना
बेल्जियम का सत्ता-साझेदारी का मॉडल श्रीलंका के मॉडल से बिल्कुल अलग है। ये दोनों मॉडल अपने-अपने ऐतिहासिक परिवेश और प्रक्रियाओं से उपजे हैं। ऐसा नहीं है कि बेल्जियम ने जो कुछ भी किया वह एक अच्छा विचार था और श्रीलंका को भी वैसा ही करना चाहिए था। लेकिन बेल्जियम का मॉडल सत्ता की साझेदारी का एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिसने क्षेत्रीय और सांस्कृतिक विविधताओं को समायोजित किया, जिससे राष्ट्रीय एकता मज़बूत हुई और हिंसक संघर्ष की संभावना कम हुई। श्रीलंका हमें इसके विपरीत एक उदाहरण दिखाता है — एक ऐसा देश जो अपने अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति अधिक समायोजनकारी (accommodative) दृष्टिकोण अपनाकर अपने जातीय संघर्ष से बच सकता था।
सत्ता की साझेदारी वांछनीय क्यों है?
लोकतंत्र के लिए सत्ता की साझेदारी अच्छी क्यों है, इसके दो अलग-अलग परंतु परस्पर जुड़े हुए कारण हैं। इन्हें मोटे तौर पर दो श्रेणियों में रखा जा सकता है — विवेकसम्मत (prudential) कारण और नैतिक (moral) कारण।
1. विवेकसम्मत कारण (Prudential Reasons)
विवेकसम्मत (Prudential): इसका अर्थ है — विवेक पर आधारित, अर्थात किसी निर्णय के लाभ-हानि की सावधानीपूर्वक गणना पर आधारित।
- सत्ता की साझेदारी विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच संघर्ष की संभावना को कम करने में मदद करती है। चूँकि सामाजिक संघर्ष अक्सर हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता को जन्म देता है, इसलिए सत्ता की साझेदारी राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता सुनिश्चित करने का एक अच्छा उपाय है।
- बहुसंख्यक समुदाय की इच्छा को दूसरों पर थोपना अल्पकाल में आकर्षक लग सकता है, परंतु दीर्घकाल में इससे राष्ट्र की एकता कमज़ोर होती है।
- बहुसंख्यक समुदाय की इच्छाओं को दूसरों पर थोपने के प्रयास सामान्यतः अल्पसंख्यकों में गहरा असंतोष उत्पन्न करते हैं। राष्ट्रीय एकता के नाम पर ऐसी सभी माँगों को दबाने का प्रयास प्रायः ठीक इसके विपरीत परिणाम देता है — इससे देश में विघटन और फूट पैदा होती है।
- विवेक यही सुझाव देता है कि जो लोग किसी अलग क्षेत्र में रहते हैं या शेष जनसंख्या से भिन्न जातीय समूह से संबंध रखते हैं, उनकी इच्छाओं का सम्मान करना अधिक बुद्धिमानी है, ताकि लोकतंत्र स्थिर बना रहे और बहुसंख्यकों के निरंकुश शासन (tyranny of the majority) में न बदल जाए।
2. नैतिक कारण (Moral Reasons)
सत्ता की साझेदारी अपने आप में मूल्यवान है, इसके लाभों की गणना से परे।
- सत्ता को साझा करने का यह कार्य किसी भी एक समूह द्वारा निरंकुश शासन (tyranny) की संभावना को कम करता है, और यह विभिन्न समूहों के बीच समायोजन तथा पारस्परिक सम्मान की भावना को दर्शाता है।
- लोकतंत्र का सार यही है कि लोगों को उन पर प्रयोग की जाने वाली सत्ता के संबंध में परामर्श किए जाने का अधिकार है। एक वैध (legitimate) सरकार वह है जहाँ नागरिक भागीदारी के माध्यम से व्यवस्था में हिस्सेदारी प्राप्त करते हैं।
- लोगों और समुदायों को लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त हैं और वे उन निर्णयों में, जो उन्हें प्रभावित करते हैं, परामर्श किए जाने या अपनी बात रखने की अपेक्षा रखते हैं। यही लोकतंत्र की भावना है — सत्ता की साझेदारी किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का मूल आधार है।
ध्यान दें: सत्ता की साझेदारी के विवेकसम्मत और नैतिक कारण आपस में जुड़े हुए हैं। सत्ता-साझेदारी की व्यवस्थाओं को इन दोनों कारणों के आधार पर परखा जा सकता है।
सत्ता की साझेदारी के स्वरूप (Forms of Power Sharing)
आधुनिक लोकतंत्रों में सत्ता-साझेदारी की व्यवस्थाएँ अनेक रूप ले सकती हैं। लोकतंत्र मूलतः सत्ता की साझेदारी के सिद्धांत पर आधारित शासन-व्यवस्था है। सत्ता की साझेदारी के चार प्रमुख स्वरूप हैं।
1. सत्ता का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution of Power)
- लोकतंत्र में सत्ता सरकार के विभिन्न अंगों — जैसे विधायिका (Legislature), कार्यपालिका (Executive) और न्यायपालिका (Judiciary) — के बीच साझा की जाती है। इसे सत्ता का क्षैतिज (horizontal) वितरण कहते हैं, क्योंकि यह सरकार के विभिन्न अंगों को, जो समान स्तर पर स्थित होते हैं, भिन्न-भिन्न शक्तियाँ प्रयोग करने की अनुमति देता है।
- इस व्यवस्था को नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली (system of checks and balances) भी कहा जाता है, क्योंकि यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी अंग असीमित शक्ति का प्रयोग न कर सके। प्रत्येक अंग दूसरे अंगों पर नियंत्रण रखता है; इससे विभिन्न संस्थाओं के बीच शक्ति का संतुलन बना रहता है।
- इस तरह का विभाजन विभिन्न संस्थाओं को एक-दूसरे की शक्ति पर नियंत्रण रखने की अनुमति भी देता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि सत्ता किसी एक स्थान पर केंद्रित न हो।
2. सत्ता का ऊर्ध्वाधर (क्षेत्रीय) वितरण (Vertical Distribution of Power)
- सत्ता को भिन्न-भिन्न स्तरों की सरकारों के बीच साझा किया जा सकता है — पूरे देश के लिए एक सामान्य (या संघीय/केंद्रीय) सरकार, तथा प्रांतीय या क्षेत्रीय स्तर की सरकारें।
- सत्ता-साझेदारी के इस स्वरूप को सत्ता का संघीय विभाजन (federal division of power) कहा जाता है। इसमें केंद्र सरकार और देश की विभिन्न घटक इकाइयों के बीच सत्ता का बँटवारा शामिल है — जैसे भारत में केंद्र, राज्य और स्थानीय (पंचायत/नगरपालिका) सरकारें।
- इस व्यवस्था में, सत्ता का स्रोत (अर्थात संविधान) केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को शक्ति प्रदान करता है, और सरकार का प्रत्येक स्तर दूसरे स्तर से स्वतंत्र रहते हुए अपनी सीमा में अपनी शक्ति का प्रयोग करता है।
- कभी-कभी सत्ता की साझेदारी राज्य स्तर से नीचे भी अनेक स्तरों पर विभाजित होती है, जैसा कि बेल्जियम की “समुदाय सरकार” के मामले में देखा जाता है।
3. विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता की साझेदारी
- सत्ता को विभिन्न सामाजिक समूहों, जैसे धार्मिक और भाषायी समूहों के बीच भी साझा किया जा सकता है। इस प्रकार की व्यवस्था का उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदायों को सत्ता में उचित हिस्सेदारी देना होता है।
- ऐसी व्यवस्थाएँ अल्पसंख्यक समुदायों को राजनीतिक सत्ता में उचित हिस्सेदारी देने के उद्देश्य से बनाई जाती हैं। इसी पद्धति का प्रयोग भारत में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) जैसे वंचित समुदायों को सामाजिक न्याय देने के लिए भी किया जाता है।
- बेल्जियम की “समुदाय सरकार” जैसी संस्थागत व्यवस्थाएँ इसका एक उदाहरण हैं। एक अन्य उदाहरण है — विधायिका में या सरकारी नौकरियों में जनसंख्या के किसी वर्ग के लिए एक निश्चित प्रतिशत सीटें आरक्षित करना।
4. राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और आंदोलनों के बीच सत्ता की साझेदारी
- सत्ता-साझेदारी की व्यवस्थाएँ उस तरीके में भी देखी जा सकती हैं जिससे राजनीतिक दल, दबाव समूह (pressure groups) और आंदोलन सत्ता का प्रयोग करने वालों को नियंत्रित या प्रभावित करते हैं।
- लोकतंत्र में नागरिकों को सत्ता के विभिन्न दावेदारों में से चुनने की स्वतंत्रता अवश्य होनी चाहिए। यह विभिन्न दलों के बीच प्रतिस्पर्धा (competition) के रूप में दिखाई देती है।
- ऐसी प्रतिस्पर्धा यह सुनिश्चित करती है कि सत्ता एक ही हाथ में केंद्रित न रहे; दीर्घकाल में, सत्ता विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच साझा होती है, जो अलग-अलग विचारधाराओं और सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- कभी-कभी, सत्ता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन सरकार (coalition government) के रूप में साझा की जाती है, जिसमें सरकार चलाने के लिए कई दल एक साथ आते हैं।
- व्यापारियों, उद्योगपतियों, किसानों या मज़दूरों जैसे विभिन्न दबाव समूह भी, प्रत्यक्ष भागीदारी के माध्यम से या सत्ता का प्रयोग करने वालों को प्रभावित करके, सरकारी सत्ता के प्रयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
महत्वपूर्ण शब्दावली (Key Terms)
- सत्ता की साझेदारी (Power Sharing): सरकार के विभिन्न अंगों या स्तरों के बीच, अथवा विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता का बँटवारा, ताकि संघर्ष कम हो और स्थिरता सुनिश्चित हो।
- बहुसंख्यकवाद (Majoritarianism): यह विचारधारा कि बहुसंख्यक समुदाय को अल्पसंख्यकों की इच्छाओं और ज़रूरतों की अनदेखी करते हुए अपनी मनचाही तरीके से देश पर शासन करने का अधिकार होना चाहिए।
- विवेकसम्मत (Prudential): विवेक पर आधारित, अर्थात लाभ-हानि की सावधानीपूर्वक गणना पर आधारित।
- निरंकुश शासन (Tyranny): प्रभुत्व का कोई भी कठोर रूप; इस संदर्भ में, अल्पसंख्यकों की इच्छाओं और हितों की अनदेखी करते हुए बहुसंख्यकों का शासन।
- गठबंधन सरकार (Coalition Government): कई राजनीतिक दलों के मिलकर बनाई गई सरकार, प्रायः इसलिए क्योंकि किसी एक दल को अकेले स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता।
मुख्य बिंदु (Key Points to Remember)
- बेल्जियम ने 1970–1993 के संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से क्षेत्रीय और भाषायी विविधता को समायोजित किया, जिससे समुदाय सरकार और ब्रसेल्स में समान प्रतिनिधित्व वाली एक संघीय व्यवस्था बनी।
- श्रीलंका की 1956 की “केवल सिंहली” नीति तथा अन्य बहुसंख्यकवादी उपायों ने तमिल अल्पसंख्यकों को अलग-थलग कर दिया, जिसके कारण गृह-युद्ध हुआ और अलग तमिल ईलम की माँग उठी।
- सत्ता की साझेदारी विवेकसम्मत कारणों (संघर्ष कम करती है, स्थिरता सुनिश्चित करती है, बहुसंख्यकों के निरंकुश शासन से बचाती है) और नैतिक कारणों (यह लोकतंत्र की मूल भावना है) — दोनों के लिए वांछनीय है।
- क्षैतिज सत्ता-साझेदारी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच नियंत्रण व संतुलन के माध्यम से होती है।
- ऊर्ध्वाधर सत्ता-साझेदारी केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के बीच होती है — यही सत्ता का संघीय विभाजन है।
- सामाजिक समूहों के बीच सत्ता-साझेदारी बेल्जियम की समुदाय सरकार तथा आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों/सीटों जैसी व्यवस्थाओं से प्राप्त की जाती है।
- राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और आंदोलनों के बीच सत्ता-साझेदारी दलीय प्रतिस्पर्धा और गठबंधन सरकारों के माध्यम से होती है।
- यह पाठ अगले पाठ “संघवाद” (Chapter 2: Federalism) की अवधारणात्मक नींव तैयार करता है।
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