पाठ – 4
ऐसी भी बातें होती हैं
In this post we have given the detailed notes of Class 9 Hindi chapter 4 ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार) These notes are useful for the students who are going to appear in Class 9 board exams
इस पोस्ट में कक्षा 9 के हिंदी के पाठ 4 ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं हिंदी विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Ganga (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Hindi (गंगा) |
| Chapter no. | Chapter 4 |
| Chapter Name | ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार) |
| Category | Class 9 Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 4, ऐसी भी बातें होती हैं
-यतींद्र मिश्र
सारांश
यह पाठ प्रसिद्ध लेखक यतींद्र मिश्र द्वारा भारत रत्न लता मंगेशकर से लिया गया एक साक्षात्कार है। इसमें लता जी अपने संगीत-जीवन, अपने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर से मिले संस्कारों, बचपन की यादों, त्योहारों और संगीत की असीम शक्ति के बारे में खुलकर बातें करती हैं। साक्षात्कार की शुरुआत में यतींद्र मिश्र उनके करोड़ों प्रशंसकों की ओर से उन्हें प्रणाम करते हुए प्रश्न पूछने की अनुमति माँगते हैं और लता जी बड़ी विनम्रता से कहती हैं कि वे अपने संगीत-जीवन में जो कुछ सीखा है, वह सब बताने को तैयार हैं तथा अपने प्रशंसकों के प्रेम के लिए आभार व्यक्त करती हैं।
पिता की स्मृतियाँ और उनसे मिले संस्कार
पूछे जाने पर कि पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर की कौन-सी स्मृतियाँ आज भी उन्हें सुख देती हैं, लता जी बताती हैं कि बचपन में जब वे सब शरारत करते थे तो पिताजी बिना कुछ कहे केवल गंभीरता से देखकर ही उन्हें एहसास करा देते थे कि गलती हुई है। पिताजी अपने नाटक और संगीत में सदा डूबे रहते थे। उनकी नाटक कंपनी के नाटक रात नौ बजे शुरू होकर देर रात दो-तीन बजे तक चलते थे, जिनमें लंबी रागदारी होती थी और पिताजी एक राग गाते-गाते ही उसमें सुर बदलकर नया राग बना देते थे। उन्होंने पहली बार मराठी रंगमंच पर कर्नाटक और पंजाब का संगीत लाकर एक नई परंपरा शुरू की थी। जिस दिन नाटक नहीं होता था, उस दिन घर में शास्त्रीय संगीत की सभा जमती थी। पिताजी से संगीत के अतिरिक्त लता जी ने स्वाभिमान से जीना सीखा — कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना और जो सही लगे उस पर डटे रहना। पिताजी के निधन के बाद कठिन दिनों में भी उनकी माँ ने यही संस्कार निभाया, और यही मूल्य आगे चलकर सभी भाई-बहनों के काम आए।
बचपन की शरारतें और फ़िल्मी दुनिया
लता जी हँसते हुए बताती हैं कि बचपन में वे और उनके भाई-बहन फ़िल्मों की नकल उतारते थे। ‘संत तुकाराम’ फ़िल्म देखकर वे घर में गद्दे-तकिये रखकर स्वर्ग बनाती थीं और गीत गाते हुए उस पर चढ़ जाती थीं, जबकि मीना, पंढरीनाथ और आशा नीचे खड़े होकर साथ ले चलने की गुहार लगाते थे। पिताजी केवल धार्मिक और देशभक्ति की फ़िल्में देखने की अनुमति देते थे, इसलिए यह सब चोरी-छिपे होता था। बचपन में उन्होंने छह-सात फ़िल्मों में अभिनय भी किया था, परंतु मेकअप और कैमरे के सामने अभिनय करना उन्हें कभी पसंद नहीं आया। बाद में ‘छत्रपति शिवाजी’ फ़िल्म में उन्होंने केवल अंत के गीत की दो पंक्तियाँ गाने के लिए अनुरोध किया, क्योंकि यह फ़िल्म उन्हें विशेष प्रिय थी।
संघर्ष के दिन और बचपन का सपना
अपने संघर्ष के दिनों के विषय में लता जी कहती हैं कि वे परिस्थितियों के अच्छे-बुरे होने पर ध्यान नहीं देती थीं, बल्कि सुबह से रात तक एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो के चक्कर लगाकर मेहनत करती रहती थीं। उनका सारा ध्यान केवल इस बात पर रहता था कि वे परिवार की जरूरतें कैसे पूरी करें। बचपन के सपने के बारे में पूछे जाने पर वे बताती हैं कि अपने पिता और पंडित कुमार गंधर्व को कार्यक्रमों में मेडल पहनकर गाते देख उनके मन में यह इच्छा जगी थी कि बड़े होकर उन्हें भी ऐसे ही मेडल मिलें।
बदलते युग और संगीतकारों पर विचार
यतींद्र मिश्र जब काल्पनिक प्रश्न पूछते हैं कि अगर उस दौर में ए.आर. रहमान, जतिन-ललित या शंकर-एहसान-लॉय जैसे संगीतकार होते तो ‘आएगा आने वाला’ जैसे गीत कैसे बनते, तो लता जी कहती हैं कि इसका सही आकलन कर पाना कठिन है, पर शायद कुछ बहुत अच्छा या बिल्कुल अलग अंदाज़ में बनता। वे बताती हैं कि पुराने समय में तकनीक इतनी विकसित नहीं थी — रिकॉर्डिंग के लिए दूर से चलकर माइक तक आना पड़ता था — फिर भी अनिल विश्वास, श्याम सुंदर, सज्जाद हुसैन, सलिल चौधरी और सी. रामचंद्र जैसे संगीतकार नए-नए तरीके अपनाकर गीतों में विशेष प्रभाव पैदा करते थे।
त्योहार और परंपराएँ
रंगों से परहेज़ के संदर्भ में होली के बारे में पूछे जाने पर लता जी बताती हैं कि उनके घर में होली उस रूप में नहीं मनाई जाती थी जैसे आम तौर पर मनाई जाती है, बल्कि होलिका दहन में मिठाइयाँ और नारियल चढ़ाए जाते थे और अगले दिन राख से ‘गुड़वड़’ खेला जाता था। रंगपंचमी पर माता-पिता केसर छिड़कते थे। उनके घर में दशहरा-दीवाली और नवरात्रि का अधिक महत्व था — नवरात्रि के पहले दिन ‘गुड़ी पड़वा’ मनाया जाता है, जो भगवान राम के चौदह वर्ष बाद अयोध्या लौटने से जुड़ा है। दीवाली के अवसर पर वे कुछ वर्षों तक तड़के सुबह अपने वरिष्ठ संगीतकारों के घर मिठाई लेकर जाती थीं, जिसमें नौशाद साहब के घर सुबह साढ़े पाँच बजे पहुँचने की मज़ेदार घटना उन्होंने साझा की। महाराष्ट्र में विवाह के बाद ‘मंगलागौर’ नाम की परंपरा है, जिसमें औरतें ठेठ गँवई अंदाज़ में गीत गाती और नाचती हैं, पर यह परंपरा अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
कोरस गायिकाओं से संबंध
कोरस में गाने वाली लड़कियों के विषय में लता जी बताती हैं कि उस समय एक ही समूह की लड़कियाँ सभी संगीतकारों के यहाँ कोरस गाने जाती थीं और उनसे उनका बहुत आत्मीय संबंध था। कविता, गांधारी, कल्याणी, सुमन और रेखा जैसी गायिकाओं के साथ वे रिकॉर्डिंग के समय ज़मीन पर बैठकर बातें करती थीं। सन् 1980 के आसपास यह व्यवस्था बदल गई और कोरस का संगीत पहले से रिकॉर्ड होने लगा।
संगीत की असीम शक्ति
तानसेन के दीपक राग से दीये जलने और उनकी पुत्रियों तानरीरी के मेघ राग गाने से वर्षा होने जैसी लोककथाओं पर लता जी कहती हैं कि यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, परंतु संगीत में असीम शक्ति ज़रूर होती है। इसके प्रमाण के रूप में वे एक घटना सुनाती हैं — मुंबई में उस्ताद अली अकबर खाँ के मंत्रमुग्ध कर देने वाले वादन के दौरान उनके सरोद का तार टूट गया था, और जब लता जी ने अफ़सोस जताया तो अली अकबर भाई ने कहा, “बहन, जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है।” इस अनुभव से वे मानती हैं कि सच्चे सुर में तानसेन से भी ऐसा कुछ अवश्य घटा होगा।
अमरता पर विचार
अंत में जब यतींद्र मिश्र उन्हें अमर कहते हैं, तो लता जी विनम्रता से कहती हैं कि भगवान ने उन्हें बहुत कुछ दिया है और उन्हें कोई शिकायत नहीं। शरीर अमर नहीं होता, पर गाना अमर रहता है। वे मराठी कहावत ‘गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन’ का उल्लेख करती हैं, जिसका अर्थ है कि गाँव तो बह जाता है पर नाम रह जाता है। उन्हें सबसे बड़ा संतोष इस बात का है कि उन्होंने अपने पिता का नाम आगे बढ़ाया, और वे प्रार्थना करती हैं कि ईश्वर की कृपा हर कलाकार और नेक इंसान पर बनी रहे।
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