पाठ – 3
संवादहीन
In this post we have given the detailed notes of Class 9 Hindi chapter 3 संवादहीन These notes are useful for the students who are going to appear in Class 9 board exams
इस पोस्ट में कक्षा 9 के हिंदी के पाठ 3 संवादहीन के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं हिंदी विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Ganga (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Hindi (गंगा) |
| Chapter no. | Chapter 3 |
| Chapter Name | संवादहीन |
| Category | Class 9 Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 3, संवादहीन
-शेखर जोशी
सारांश
‘संवादहीन’ कहानी शेखर जोशी द्वारा लिखी गई एक मार्मिक कहानी है, जो गाँव में रहने वाली एक अकेली वृद्धा ताई और उनके पाले हुए तोते मिट्ठू के आपसी लगाव के माध्यम से अकेलेपन, पलायन और आदर्श तथा यथार्थ के द्वंद्व को उजागर करती है। कहानी के दो मुख्य पात्र ताई और मिट्ठू ही हैं। गाँव के बीच स्थित एक बड़े घर के सूने खंडहर में अब यही दोनों प्राणी एक-दूसरे का सहारा बनकर रह गए थे। ताई ने कभी अच्छे दिन देखे थे — भरा-पूरा परिवार, बहू-बेटे, नौकर-चाकर, गाय-ढोर, सब कुछ था। परंतु समय के साथ बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहरों के होकर रह गए, बेटियाँ अपनी गृहस्थी में रम गईं और धीरे-धीरे सारा कारोबार पराए हाथों में चला गया। अपने लिए ताई ठीक से खाना बनाने में भी आलस्य कर जातीं, पर घर का सूनापन उन्हें काटने को दौड़ता था।
ताई के इसी अकेलेपन को सहारा देने के लिए गनपत कहीं से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता ले आया। ताई की सारी ममता मिट्ठू पर बरस पड़ी। अब वे नियमपूर्वक मिट्ठू के लिए दाल-भात बनातीं, उसके लिए रोटी बचाकर रखतीं और यह भी जानने लगीं कि किसके खेत में हरी मिर्च तैयार है और किस पेड़ में अमरूद बचे हैं। मिट्ठू भी कुशाग्र बुद्धि का था — ताई का पढ़ाया पाठ याद रखता और सवालों के सटीक उत्तर देता। सूने घर में अब रौनक लौट आई थी, आस-पड़ोस की स्त्रियाँ भी बच्चों को लेकर मिट्ठू से मन बहलाने आ जुटतीं। सुबह मिट्ठू ‘हर हर गंगे, सीताराम बोल, मिट्ठू राम राम’ बोलकर ताई को जगाता, ताई आशीष देतीं और मिट्ठू ‘खुश रहो’ कहकर उत्तर देता। जब वृद्ध और थकी ताई पूछतीं, “मिट्ठू! अब कैसे कटेगी?” तो मिट्ठू दम-खम से कहता, “कटेगी! कटेगी!! कटेगी!!!” और ताई में मानो नए प्राण लौट आते। अलस दोपहरी में ताई मिट्ठू को अपने वैभवशाली अतीत की, जमींदार साहब के रोब-दाब की, ब्याह-शादियों और तीज-त्योहारों की कहानियाँ सुनातीं और मिट्ठू धैर्यवान श्रोता बना बीच-बीच में अपनी टिप्पणी भी करता। हालाँकि उनका यह संवाद सदा प्रेमपूर्ण ही नहीं रहता था — कभी-कभी मिट्ठू पिंजड़े में उपद्रव मचाता तो ताई खीझकर “मर जा!” कह उठतीं और मिट्ठू भी वैसी ही खीझ से जवाब देता, फिर मान-मनौवल से सब सामान्य हो जाता।
एक बार गाँव के कई लोग कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे। ताई को भी साथ जाने का मन हुआ, पर मिट्ठू की चिंता उन्हें रोकती रही। अंत में जगन मास्टर की पत्नी (मास्टराइन) ने ताई के लौटने तक मिट्ठू को अपने पास रखने की जिम्मेदारी ली। रोते-बिलखते ताई मिट्ठू को दिलासा देकर कुंभ-स्नान के लिए चली गईं।
जगन मास्टर और मिट्ठू का उड़ जाना
जगन मास्टर स्वतंत्र विचारों के आदमी थे और दूसरों की स्वतंत्रता में बाधा डालना उन्हें पसंद नहीं था। पिंजरे में बंद मिट्ठू को देखकर उन्हें बेचैनी होती और वे अपनी पत्नी की बुद्धि पर तरस खाते हुए स्वयं को भी दोषी मानते। एक दिन उनसे यह यातना सही नहीं गई और उन्होंने कमरा बंद करके पिंजरे का दरवाजा खोल दिया ताकि मिट्ठू को थोड़ी देर खुली हवा मिल सके। मिट्ठू पिंजरे का इतना आदी हो चुका था कि पहले तो बाहर आने में हिचका, फिर दाना बिखेरने पर धीरे-धीरे बाहर आया और कुछ देर बाद उसे फिर पिंजरे में बंद कर दिया गया। यह क्रम कई दिन चलता रहा। एक दिन मिट्ठू की नजर ऊपर खुले रोशनदान पर पड़ गई और वह उड़कर वहाँ जा बैठा। जगन मास्टर का ध्यान गीता-रहस्य से हटकर उस पर गया, पर तब तक देर हो चुकी थी — मिट्ठू ने बाहर की दुनिया की ओर देखा और उड़ गया। जगन मास्टर धोती सँभालते हुए बाग में इधर-उधर ‘मिट्ठू आ! मिट्ठू आ!!’ पुकारते रहे, पर मिट्ठू एक डाल से दूसरी डाल पर उड़ान भरता रहा और अंततः सदा के लिए चला गया।
ताई के लौटने का दिन नजदीक आने लगा और गाँव में सबको इस बात की चिंता सताने लगी कि मिट्ठू को न पाकर ताई पर क्या बीतेगी। बहुत सोच-विचार के बाद गनपत ने सुझाव दिया कि मिट्ठू जैसा दिखने वाला एक दूसरा तोता ले आया जाए ताकि ताई को धोखे में रखा जा सके। दूसरे दिन वह एवजी तोता ले भी आया। जगन मास्टर अब उस नए तोते को ‘राम राम, सीताराम, हर गंगे’ रटाने में जुट गए, ताकि ताई लौटने पर फर्क न पहचान सकें। वे भोजन-पानी छोड़कर घंटों पिंजरे के सामने बैठकर पाठ दोहराते, पत्नी के टोकने पर झुँझला उठते और थककर “मर जा! मर जा!!” कह बैठते, जबकि नया तोता चुपचाप उन्हें टुकुर-टुकुर देखता रहता, मानो उनकी इस विवशता पर मन-ही-मन हँस रहा हो।
कुंभ-स्नान से लौटकर सब यात्री अपने-अपने घर चले गए, पर ताई सीधे जगन मास्टर के घर पहुँचीं। उन्हें विश्वास था कि उन्हें देखते ही मिट्ठू ‘राम राम सीताराम’ की रट लगाकर पिंजड़े में उछल-कूद मचा देगा। परंतु वहाँ बैठा एवजी मिट्ठू उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं करता, बस इधर-उधर ताकता रहता। ताई अपने मिट्ठू को बार-बार पुकारकर थक गईं, पर उनके सूनेपन का असली साथी न जाने किन अमराइयों में स्वतंत्र होकर विचरण कर रहा होगा — इसी अनुत्तरित प्रतीक्षा के साथ कहानी समाप्त होती है, जो मनुष्य और पशु-पक्षी के बीच के अनकहे संवाद, स्नेह और अंततः उपजे मौन को गहराई से व्यक्त करती है।
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