पाठ – 2
पृथ्वी की सतह का निर्माण
In this post we have given the detailed notes of class 9 Social Science chapter 2 Shaping of the Earth’s Surface in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के सामाजिक विज्ञान के पाठ 2 पृथ्वी की सतह का निर्माण के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Understanding Society, India and Beyond Part I (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Social Science |
| Chapter no. | Chapter 2 |
| Chapter Name | पृथ्वी की सतह का निर्माण (Shaping of the Earth’s Surface) |
| Category | Class 9 Social Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 2, पृथ्वी की सतह का निर्माण
भूमिका
पृथ्वी की सतह हमेशा एक जैसी नहीं रहती। यह भीतर से और बाहर से काम करने वाली शक्तिशाली प्राकृतिक शक्तियों द्वारा लगातार बदलती रहती है। इन परिवर्तनों को समझाने वाला सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत ‘प्लेट विवर्तनिकी’ (Plate Tectonics) का सिद्धांत है, जो यह बताता है कि पृथ्वी की भूपर्पटी के बड़े-बड़े टुकड़े पिघले हुए मैंटल के ऊपर धीरे-धीरे कैसे खिसकते हैं। इन प्लेटों की गति से पर्वत, ज्वालामुखी, मैदान और घाटियों जैसी विभिन्न भू-आकृतियाँ (Landforms) बनती हैं। प्लेट विवर्तनिकी और भू-आकृतियों को समझने से हमें भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, तथा महाद्वीपों और महासागरों के निर्माण जैसी प्राकृतिक घटनाओं को समझने में मदद मिलती है।
भू-आकृति (Landform): भू-आकृति पृथ्वी की सतह पर पाई जाने वाली एक प्राकृतिक विशेषता है, जो अपक्षय, अपरदन, निक्षेपण (Deposition) तथा पृथ्वी की भूपर्पटी की गति जैसी प्रक्रियाओं से बनती है। पर्वत, घाटियाँ, पठार, मैदान, मरुस्थल और तटीय स्थलाकृतियाँ भू-आकृतियों के उदाहरण हैं।
इस पाठ में हम निम्नलिखित पाँच बड़े प्रश्नों के उत्तर खोजेंगे:
- पृथ्वी की सतह को क्या आकार देता है?
- प्लेट विवर्तनिकी क्या है? प्लेट गति के क्या प्रभाव होते हैं?
- भू-आकृतियाँ कैसे बनती हैं और उनका वर्गीकरण कैसे किया जाता है?
- मानव और अन्य जीव इन भू-आकृतियों से कैसे जुड़े हुए हैं?
- विभिन्न भू-आकृतियों से जुड़ी आपदाएँ मानव जीवन को कैसे प्रभावित करती हैं?
प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics)
प्लेट विवर्तनिकी भू-विज्ञान का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसे डब्ल्यू. जे. मॉर्गन (W.J. Morgan) ने प्रतिपादित किया था। यह सिद्धांत पृथ्वी की भूपर्पटी की गति की व्याख्या करता है। इस सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी की सबसे बाहरी परत एक ही टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह कई बड़े और छोटे टुकड़ों में विभाजित है, जिन्हें टेक्टोनिक प्लेट्स (Tectonic Plates) कहा जाता है। ये प्लेटें अपने नीचे स्थित अर्ध-पिघली हुई परत पर धीरे-धीरे खिसकती हैं और पर्वत, भूकंप तथा ज्वालामुखी जैसी प्रमुख भौतिक विशेषताओं और प्राकृतिक घटनाओं के लिए उत्तरदायी होती हैं।
पृथ्वी की आंतरिक संरचना:
पृथ्वी मुख्यतः तीन परतों से बनी है – भूपर्पटी (Crust), मैंटल (Mantle) और क्रोड/कोर (Core)। भूपर्पटी सबसे बाहरी परत है, जिस पर हम रहते हैं। भूपर्पटी के नीचे मैंटल स्थित है, जो बहुत मोटी और गर्म परत है। कोर सबसे भीतरी परत है और अत्यधिक गर्म तथा भारी है। भूपर्पटी और मैंटल के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमंडल (Lithosphere) बनता है। यह स्थलमंडल ही विभिन्न टेक्टोनिक प्लेटों में विभाजित है। स्थलमंडल के नीचे दुर्बलमंडल/एस्थेनोस्फीयर (Asthenosphere) स्थित है, जो अर्ध-पिघली हुई अवस्था में है और प्लेटों को खिसकने की अनुमति देती है।
| परत | विवरण |
| भूपर्पटी (Crust) | महाद्वीपों के नीचे मोटाई 30–40 किमी तथा महासागरों के नीचे 5–7 किमी तक होती है। |
| स्थलमंडल (Lithosphere) | पृथ्वी की कठोर बाहरी परत, जिसमें भूपर्पटी और ऊपरी मैंटल शामिल हैं। |
| दुर्बलमंडल (Asthenosphere) | आंशिक रूप से पिघली चट्टानों की एक गर्म, गतिशील परत। |
| मैंटल (Mantle) | भूपर्पटी और पृथ्वी की बाहरी कोर के बीच स्थित अधिकांशतः ठोस परत। |
| बाह्य क्रोड (Outer Core) | मुख्यतः लोहे और निकल से बनी तरल परत। |
| आंतरिक क्रोड (Inner Core) | ठोस, अत्यंत गर्म और घूर्णन करने वाली धातु की गेंद, जो पृथ्वी का सबसे घना भाग है। |
टेक्टोनिक प्लेटों के प्रकार:
टेक्टोनिक प्लेटें ठोस चट्टान के विशाल खंड हैं, जो प्रतिवर्ष कुछ सेंटीमीटर की दर से बहुत धीमी गति से खिसकती हैं। टेक्टोनिक प्लेटों के तीन मुख्य प्रकार होते हैं:
- महाद्वीपीय प्लेटें (Continental Plates): जो महाद्वीपों को धारण करती हैं।
- महासागरीय प्लेटें (Oceanic Plates): जो महासागरीय तल को धारण करती हैं।
- मिश्रित प्लेटें (Mixed Plates): जो महाद्वीप और महासागर दोनों को धारण करती हैं।
विश्व की प्रमुख टेक्टोनिक प्लेटों में प्रशांत प्लेट (Pacific Plate), यूरेशियाई प्लेट (Eurasian Plate), अफ्रीकी प्लेट (African Plate), उत्तर अमेरिकी प्लेट, दक्षिण अमेरिकी प्लेट, भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट (Indo-Australian Plate) और अंटार्कटिक प्लेट शामिल हैं।
प्लेटों की गति का कारण:
टेक्टोनिक प्लेटों की गति मैंटल में होने वाली संवहन धाराओं (Convection Currents) के कारण होती है। पृथ्वी के क्रोड से निकलने वाली ऊष्मा के कारण मैंटल में पिघला हुआ पदार्थ ऊपर उठता है, जबकि ठंडा पदार्थ नीचे बैठता है। यह निरंतर गति संवहन धाराएँ बनाती है, जो टेक्टोनिक प्लेटों को अलग-अलग दिशाओं में धकेलती और खींचती हैं। ऊष्मा का स्थानांतरण संवहन (Convection), संचालन (Conduction) और अभिवहन (Advection) जैसी प्रक्रियाओं द्वारा होता है।
प्लेट सीमाएँ (Plate Boundaries):
जिन किनारों पर दो टेक्टोनिक प्लेटें मिलती हैं, उन्हें प्लेट सीमाएँ कहा जाता है। प्लेट सीमाओं के तीन मुख्य प्रकार होते हैं:
| प्रकार | प्रक्रिया | परिणाम/उदाहरण |
| अभिसारी सीमा (Convergent Boundary) | दो प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं। | महाद्वीपीय प्लेटों के टकराने से वलित पर्वत (Fold Mountains) जैसे हिमालय बनते हैं। जब महासागरीय प्लेट महाद्वीपीय प्लेट से टकराती है, तो महासागरीय प्लेट नीचे धँस जाती है, जिससे ज्वालामुखी क्रिया और भूकंप होते हैं। |
| अपसारी सीमा (Divergent Boundary) | प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती हैं। | नीचे से मैग्मा ऊपर उठकर नई भूपर्पटी बनाता है, जिससे मध्य-महासागरीय कटक (Mid-Ocean Ridges) जैसी विशेषताएँ बनती हैं। मध्य-अटलांटिक कटक (Mid-Atlantic Ridge) इसका एक अच्छा उदाहरण है। |
| रूपांतर सीमा (Transform Boundary) | प्लेटें बिना नई भूपर्पटी बनाए या नष्ट किए एक-दूसरे के समानांतर खिसकती हैं। | इस प्रकार की गति मुख्यतः भूकंप का कारण बनती है, जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका में सैन एंड्रियास भ्रंश (San Andreas Fault)। |
प्लेट विवर्तनिकी पृथ्वी की सतह को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्लेटों की गति से पर्वत, घाटियाँ, महासागरीय बेसिन, ज्वालामुखी और भूकंप बनते हैं। इससे महाद्वीपों और महासागरों के वितरण की भी व्याख्या होती है। अधिकांश भूकंप और ज्वालामुखी प्लेट सीमाओं के आसपास होते हैं, विशेष रूप से प्रशांत महासागर के चारों ओर के क्षेत्र में, जिसे ‘रिंग ऑफ फायर’ (Ring of Fire) कहा जाता है।
भारत में भी अतीत में कई बड़े भूकंप आ चुके हैं, जिनमें हज़ारों लोगों की मृत्यु हुई है – जैसे वर्ष 2001 में गुजरात में आया विनाशकारी भूकंप। सघन आबादी वाले देश में भूकंप जान-माल की भारी क्षति पहुँचा सकता है, इसलिए भूकंप-प्रवण क्षेत्रों की पहचान और आपदा प्रबंधन के लिए यह सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण है।
ज्ञातव्य है कि प्राचीन काल में भी भूकंप को ‘भूकंप’ (पृथ्वी का कंपन) कहा जाता था। बृहत्संहिता में वराहमिहिर ने भूकंप पर एक अलग अध्याय लिखा, जिसमें उन्होंने बताया कि हवा, वर्षा, बादल, पशुओं के व्यवहार और ग्रहों की स्थिति में परिवर्तन इसके संकेत हो सकते हैं। उन्होंने भूकंप का कारण चार तात्विक शक्तियों – वायु, अग्नि, इंद्र (आकाश/गर्जन) और वरुण (जल) को माना, जो इस बात का प्रमाण है कि भारत में प्राचीन काल से ही प्राकृतिक घटनाओं को वैज्ञानिक और ब्रह्मांडीय दृष्टि से समझने का प्रयास किया जाता रहा है।
भारत में अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के बारातांग द्वीप पर एक दुर्लभ मिट्टी का ज्वालामुखी (Mud Volcano) भी पाया जाता है। सामान्य ज्वालामुखियों के विपरीत, यहाँ भूमिगत गैसों और दबाव के कारण मिट्टी बुदबुदाती हुई बाहर निकलती है।
अपक्षय और अपरदन की प्रक्रिया (Weathering and Erosion)
अपक्षय और अपरदन भू-आकृतियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि ये पृथ्वी की सतह को लगातार तोड़ते और पुनः आकार देते रहते हैं। लंबे समय में, अपक्षय और अपरदन मिलकर पर्वतों को घिसते हैं, घाटियाँ बनाते हैं, मैदान बनाते हैं तथा गुफाओं, कगारों (Cliffs) और नदी डेल्टाओं जैसी विशेषताओं का निर्माण करते हैं, जिससे आज हम जो विविध भू-दृश्य देखते हैं वे धीरे-धीरे आकार लेते हैं।
अपक्षय (Weathering):
अपक्षय वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा पृथ्वी की सतह पर मौजूद चट्टानें विभिन्न प्रक्रियाओं के कारण छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटती हैं। इसमें टूटे हुए पदार्थ की गति (Movement) शामिल नहीं होती, केवल टूटना (Breaking Down) होता है। अपक्षय के तीन मुख्य प्रकार होते हैं:
- भौतिक अपक्षय (Physical Weathering): इसमें तापमान परिवर्तन, पाला (Frost) या हवा के कारण चट्टानें छोटे टुकड़ों में टूटती हैं।
- रासायनिक अपक्षय (Chemical Weathering): इसमें जल, वायु या अम्ल के साथ प्रतिक्रिया के कारण चट्टानों के खनिजों में परिवर्तन होकर नए पदार्थ बनते हैं।
- जैविक अपक्षय (Biological Weathering): यह पौधों, जानवरों या सूक्ष्मजीवों के कारण होता है, जैसे जब पौधों की जड़ें चट्टानों की दरारों में बढ़ती हैं और उन्हें अलग-अलग कर देती हैं।
अपक्षय पृथ्वी की सतह को आकार देने और मिट्टी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अपरदन (Erosion):
अपरदन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मिट्टी, चट्टानें और सतह के अन्य पदार्थ जल, वायु, बर्फ या लहरों जैसे प्राकृतिक कारकों द्वारा घिसकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाए जाते हैं। अपक्षय के विपरीत, जो केवल चट्टानों को तोड़ता है, अपरदन में टूटे हुए पदार्थ की गति (Movement) शामिल होती है। अपरदन के कई प्रकार होते हैं:
- जलीय अपरदन (Water Erosion): नदियों, वर्षा या समुद्री लहरों के कारण।
- वायु अपरदन (Wind Erosion): शुष्क और रेतीले क्षेत्रों में सामान्य।
- हिमानी अपरदन (Glacial Erosion): जहाँ चलती हुई बर्फ चट्टानों को घिसती और साथ ले जाती है।
- तटीय अपरदन (Coastal Erosion): जहाँ समुद्री लहरें किनारे की भूमि को घिसती हैं।
अपरदन भू-आकृतियों को आकार देता है और सतह पर विशेषताओं का निर्माण तथा विनाश दोनों कर सकता है।
अपरदन भूमि और मिट्टी को बदलकर कई मानवीय व्यवसायों को प्रभावित करता है। किसानों के लिए, अपरदन फसल उगाने के लिए आवश्यक उपजाऊ ऊपरी मिट्टी को हटा देता है, जिससे उपज कम होती है। नदियों और तटों के निकट रहने वाले लोगों के लिए, अपरदन भूमि, घरों और सड़कों को बहा सकता है, जिससे नुकसान और संपत्ति की हानि होती है। निर्माण और खनन में, अपरदन भूमि को अस्थिर बना देता है, जिससे सुरक्षा जोखिम पैदा होते हैं। पर्यटन और मत्स्यपालन जैसे उद्योग भी प्रभावित होते हैं, क्योंकि समुद्र तट, नदियाँ और उपजाऊ भूमि नष्ट हो सकती हैं।
प्राचीन सिंधु-सरस्वती सभ्यता ने जल प्रबंधन के लिए समोच्च रेखा जुताई (Contouring), बंधान (Bunding), सोपानीकरण (Terracing), बाँध और नहरों जैसी परिष्कृत तकनीकों का उपयोग किया था। वेद, कृषिपराशर, कौटिल्य का अर्थशास्त्र और वृक्षायुर्वेद जैसे ग्रंथों में इन तकनीकों का विस्तृत वर्णन मिलता है। नागालैंड की ‘जाबो प्रणाली’ (Zabo System) पहाड़ी ढलानों पर मिट्टी और जल संरक्षण के लिए मिट्टी के बंधों का उपयोग करने वाली एक एकीकृत कृषि पद्धति है।
- समोच्च खाई (Contouring): पहाड़ी की समोच्च रेखाओं के साथ खोदी गई खाइयाँ, जो वर्षा जल को धीमा, संचित और रिसाकर मिट्टी के अपरदन को रोकती हैं तथा भूजल को पुनर्भरित करती हैं।
- बंधान (Bunding): समोच्च रेखाओं के साथ बनाए गए मिट्टी के बाँध, जो सतही अपवाह को धीमा करते हैं, मिट्टी के अपरदन को कम करते हैं तथा जल के रिसाव और मिट्टी की नमी को बढ़ाते हैं।
- सोपानीकरण (Terracing): यह एक मृदा संरक्षण तकनीक है, जिसमें पहाड़ी ढलान पर सीढ़ीनुमा समतल या हल्की ढलान वाली सीढ़ियाँ बनाई जाती हैं, ताकि मिट्टी का अपरदन रोका जा सके।
निम्नीकरण के कारक (Agents of Gradation)
निम्नीकरण के कारक वे प्राकृतिक शक्तियाँ हैं, जो पृथ्वी की सतह पर पदार्थों को घिसती, परिवहित (Transport) और निक्षेपित (Deposit) करती हैं, जिससे समय के साथ सतह समतल या चिकनी हो जाती है। निम्नीकरण के मुख्य कारक हैं – बहता जल, हिमानी (Glaciers), पवन, लहरें और भूमिगत जल। बहता जल चट्टानों और मिट्टी का अपरदन करके घाटियाँ और मैदान बनाता है। हिमानी विशाल मात्रा में पदार्थ को घिसती और ले जाती है, जिससे U-आकार की घाटियाँ बनती हैं। पवन मरुस्थलों में रेत का अपरदन और निक्षेपण करके उन्हें आकार देती है। समुद्री लहरें तटरेखाओं का अपरदन करके कगार, समुद्र तट और खाड़ियाँ बनाती हैं। भूमिगत जल चूने के पत्थर जैसी चट्टानों को घोलकर गुफाएँ और डोलाइन (Sinkholes) बनाता है। मिलकर, ये सभी कारक लगातार भू-आकृतियों में परिवर्तन करते हैं, ऊँचे क्षेत्रों को घिसते हैं और निचले क्षेत्रों को भरते हैं।
भू-आकृतियों ने मानव सभ्यताओं के इतिहास को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गंगा, नील, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियों के उपजाऊ मैदानों ने कृषि समाजों और प्रारंभिक नगरों को जन्म दिया। पर्वतों ने अवरोधक और रक्षक – दोनों की भूमिका निभाई; हिमालय ने भारत को आक्रमणों से बचाया, लेकिन खैबर दर्रे जैसे मार्गों से सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी संभव बनाया। थार जैसे मरुस्थलों ने बड़ी बस्तियों के विकास को सीमित किया, परन्तु रेशम मार्ग (Silk Route) जैसे व्यापार मार्गों को प्रोत्साहित किया। तट और बंदरगाहों ने व्यापार, यात्रा और सुदूर देशों के साथ सांस्कृतिक संपर्क को सहारा दिया, जिससे दक्षिण भारत के राज्यों को समृद्ध होने में मदद मिली।
बहता जल (Running Water):
नदियाँ अपरदन, परिवहन और निक्षेपण की प्रक्रियाओं द्वारा भूमि को आकार देती हैं, और अपने मार्ग में विभिन्न भू-आकृतियाँ बनाती हैं। ऊपरी मार्ग (Upper Course) में, तीव्र ढाल और शक्तिशाली अपरदनकारी शक्तियों के कारण नदियाँ प्रायः V-आकार की घाटियाँ, जलप्रपात (Waterfalls) और तीव्र धाराएँ (Rapids) बनाती हैं। मध्य मार्ग (Middle Course) में, नदी धीमी होकर मियांडर (घुमाव) बनाना शुरू करती है, जिससे गोखुर झीलें (Oxbow Lakes) और बाढ़ के मैदान (Floodplains) बनते हैं। निचले मार्ग (Lower Course) में, नदी और भी धीमी होकर बड़ी मात्रा में तलछट का निक्षेपण करती है, जिससे डेल्टा, तटबंध (Levees) और जलोढ़ पंख (Alluvial Fans) बनते हैं।
जलप्रपात (Waterfall): जलप्रपात वह भू-आकृति है, जहाँ नदी किसी तीव्र कगार या खड़ी ढाल से गिरती है। जलप्रपात नदी के ऊपरी मार्ग में बनते हैं, जहाँ कठोर चट्टानें अपरदन का विरोध करती हैं जबकि उनके नीचे की कोमल चट्टानें घिस जाती हैं, जिससे अचानक गिरावट बनती है। जलप्रपात पर्यटन के साथ-साथ जल-विद्युत उत्पादन (Hydroelectric Power) के लिए भी उपयोग किए जाते हैं, क्योंकि गिरते जल के बल से बिजली उत्पन्न की जा सकती है।
मियांडर (Meander): मियांडर नदी के मध्य या निचले मार्ग में तलछट के पार्श्विक अपरदन और निक्षेपण के कारण बनने वाला घुमावदार मोड़ है। जैसे-जैसे नदी बहती है, यह मोड़ों के बाहरी किनारों का अपरदन करती है और भीतरी किनारों पर तलछट का निक्षेपण करती है, जिससे धीरे-धीरे बड़े लूप बनते हैं। मियांडर मानव के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उनके किनारों पर जमा उपजाऊ मिट्टी कृषि के लिए आदर्श होती है। तमिलनाडु में स्थित ग्रांड एनीकट (कल्लनई) नदियों के सिंचाई हेतु उपयोग का एक उदाहरण है।
डेल्टा (Delta): डेल्टा वह भू-आकृति है, जो नदी के मुहाने पर बनती है, जहाँ वह किसी सागर, महासागर या झील में मिलती है और अपने साथ लाए गए तलछट का निक्षेपण करती है। समय के साथ यह निक्षेप पंखे के आकार या त्रिकोणीय भूमि के रूप में जमा हो जाता है। डेल्टा अपनी समृद्ध जलोढ़ मिट्टी के कारण अत्यधिक उपजाऊ होते हैं, जिससे चावल और जूट जैसी फसलों के लिए वे आदर्श होते हैं। ये मत्स्यपालन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ताज़े और खारे जल के मिश्रण से विविध जलीय जीवन बनता है। कई डेल्टा घनी मानव बस्तियों को सहारा देते हैं, परंतु वे बाढ़ के प्रति भी संवेदनशील हो सकते हैं। सुंदरबन डेल्टा इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण है।
लहरें और धाराएँ (Waves and Currents):
लहरें और धाराएँ महासागरीय सतह पर लगातार गतिशील रहती हैं। ये तटीय क्षेत्रों में कार्य करते हुए तटीय क्षेत्र की भूमि को पुनः आकार देती हैं। लहरों और धाराओं की क्रिया से तटरेखा पर समुद्र तट, बालू पट्टी (Sand Bars), समुद्री कगार, समुद्री गुफाएँ, मेहराब (Arches) और स्तंभ (Stacks) जैसी भू-आकृतियाँ बनती हैं।
समुद्र तट (Beach): यह रेत, कंकड़ या चट्टानों से बनी एक भू-आकृति है, जो किसी सागर, महासागर या झील के किनारे लहरों द्वारा तलछट के निक्षेपण से बनती है। समुद्र तट मानव के लिए विश्राम, तैराकी और मनोरंजन हेतु लोकप्रिय पर्यटन स्थल हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है। ये तटीय बस्तियों को शक्तिशाली लहरों और तटीय अपरदन से बचाने में प्राकृतिक अवरोध का काम भी करते हैं।
तटीय अपरदन (Coastal Erosion): यह तब होता है जब लहरें, ज्वार और धाराएँ तट के किनारे की भूमि को घिसती हैं, जिससे कई विशिष्ट भू-आकृतियाँ बनती हैं:
- कगार (Cliffs): लहरों द्वारा तट के आधार को काटने से बनने वाली खड़ी चट्टानी सतह।
- तरंग-कर्तित मंच (Wave-cut Platforms): कगारों के पीछे हटने के बाद बचा हुआ समतल क्षेत्र।
- गुफाएँ (Caves): जब लहरें चट्टान के कमज़ोर भागों का अपरदन करती हैं।
- मेहराब (Arches): जब किसी अंतरीप (Headland) के दोनों ओर की गुफाएँ आपस में मिल जाती हैं।
- स्तंभ (Stacks): मेहराब के गिरने के बाद खड़ी रह जाने वाली चट्टान के अलग-थलग स्तंभ।
हिमानी (Glaciers):
हिमानी अपरदन तब होता है जब हिमनद धीरे-धीरे भूमि के ऊपर खिसकते हैं, जिससे भू-दृश्य कटता और आकार लेता है। हिमानी अपरदन से बनने वाली सामान्य भू-आकृतियाँ हैं:
- U-आकार की घाटी (U-shaped Valley): हिमनद द्वारा नदी घाटियों को चौड़ा और गहरा करने से बनती है।
- सर्क (Cirque): हिमनद के शीर्ष पर बना कटोरे के आकार का गड्ढा।
- एरेट (Arete): घाटियों के बीच तीखी कटक।
- लटकती घाटी (Hanging Valley): जहाँ छोटे हिमनद बड़े हिमनद से मिलते हैं।
- फियोर्ड (Fjord): जब समुद्र हिमनद घाटियों में भर जाता है, तब बनने वाली गहरी, संकरी खाड़ी।
ये भू-आकृतियाँ मानव के लिए ट्रैकिंग, स्कीइंग और पर्वतारोहण जैसे पर्यटन आकर्षणों के रूप में उपयोगी हैं। फियोर्ड बंदरगाहों और मत्स्यपालन के लिए उपयोग किए जाते हैं, जबकि कुछ घाटियों में उपजाऊ हिमानी मिट्टी कृषि को सहारा देती है। इसके अतिरिक्त, हिमनद ताज़े जल के महत्वपूर्ण स्रोत हैं, जो नीचे की ओर बहने वाली नदियों को पोषित करते हैं।
हिमोढ़ (Moraines): हिमोढ़ ऐसी भू-आकृतियाँ हैं, जो हिमनद द्वारा साथ ले जाई गई और छोड़ी गई चट्टान, मिट्टी और मलबे (जिसे ‘टिल’ कहते हैं) के निक्षेपण से बनती हैं। हिमोढ़ के प्रकार हैं:
- पार्श्विक हिमोढ़ (Lateral Moraine): जो हिमनद के किनारों पर बनते हैं।
- अंतस्थ हिमोढ़ (Terminal Moraine): जो हिमनद के अंतिम छोर पर बनते हैं, और उसके सबसे आगे बढ़ने की सीमा को दर्शाते हैं।
- मध्यवर्ती हिमोढ़ (Medial Moraine): जब दो हिमनद मिलते हैं और उनके पार्श्विक हिमोढ़ बीच में जुड़ जाते हैं।
हिमोढ़ मानव के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये अक्सर कृषि हेतु उपजाऊ मिट्टी बनाते हैं और प्राकृतिक बाँध व झीलें भी बना सकते हैं, जो जल आपूर्ति, सिंचाई और कभी-कभी जल-विद्युत के लिए उपयोगी होती हैं।
पवन (Wind):
वायु अपरदन तब होता है जब तेज़ हवाएँ रेत और मिट्टी के ढीले कणों को उठाकर ले जाती हैं, जिससे भू-दृश्य धीरे-धीरे आकार लेता है। इस प्रक्रिया से कई विशिष्ट भू-आकृतियाँ बनती हैं:
- यारडांग (Yardangs): हवा द्वारा तराशी गई धारीदार चट्टानी कटक।
- वेंटीफैक्ट्स (Ventifacts): रेत के थपेड़ों (Sandblasting) से पॉलिश और आकार पाई गई चट्टानें।
- अपवाहन गर्त/ब्लोआउट (Deflation Hollows/Blowouts): ढीले पदार्थ के हटने से बनने वाले उथले गड्ढे।
- मरुस्थलीय पेवमेंट (Desert Pavements): महीन कणों के उड़ जाने के बाद बचने वाली समतल सतह।
बालुका स्तूप/टीले (Dunes): ये मरुस्थलीय क्षेत्रों या रेतीले तटों पर हवा द्वारा बनाई गई रेत की पहाड़ियाँ या कटक हैं। टिब्बों के कई प्रकार हैं:
- बरखान टीले (Barchan Dunes): अर्धचंद्राकार, जो सीमित रेत और एकल पवन दिशा वाले क्षेत्रों में बनते हैं।
- अनुदैर्ध्य टीले (Longitudinal Dunes): प्रचलित पवन के समानांतर बनी लंबी कटकें।
- तारा टीले (Star Dunes): जिनकी कई भुजाएँ होती हैं और जो विभिन्न दिशाओं से आने वाली हवाओं से बनते हैं।
- परवलयिक टीले (Parabolic Dunes): U-आकार के टीले, जो प्रायः वनस्पति द्वारा स्थिर हो जाते हैं।
मानव के लिए टीले मरुस्थलीकरण और वायु अपरदन के विरुद्ध प्राकृतिक अवरोध का काम करते हैं, तथा पर्यटन एवं साहसिक खेलों के लिए क्षेत्र प्रदान करते हैं। कुछ तटीय क्षेत्रों में ये बस्तियों को तेज़ समुद्री हवाओं और लहरों से बचाते हैं।
भूमिगत जल (Underground Water):
चूने के पत्थर (Limestone) या घुलनशील चट्टानों वाले क्षेत्रों में भूमिगत जल, रासायनिक अपक्षय और अपरदन के माध्यम से कार्स्ट स्थलाकृति (Karst Topography) नामक अनोखी भू-आकृतियाँ बनाता है। भूमिगत जल से बनने वाली सामान्य भू-आकृतियाँ हैं:
- गुफाएँ (Caves): अम्लीय जल द्वारा चट्टान घुलने से बनने वाले खोखले स्थान।
- स्टैलेक्टाइट (Stalactites): गुफाओं की छत से लटकते हुए हिमलंब-आकार के निर्माण।
- स्टैलेग्माइट (Stalagmites): गुफाओं के फर्श से ऊपर उठने वाले निर्माण।
- डोलाइन/सिंकहोल (Sinkholes): जब भूमि भूमिगत गुहा में धँस जाती है, तब बनने वाला गड्ढा।
- भूमिगत नदियाँ (Underground Rivers): जो गुफा प्रणालियों से होकर बहती हैं।
ये भू-आकृतियाँ मानव के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि गुफाएँ और भूमिगत नदियाँ ताज़े जल के स्रोत, पर्यटन के अवसर, तथा कुछ मामलों में सांस्कृतिक या धार्मिक महत्व प्रदान करती हैं। स्टैलेग्माइट और स्टैलेक्टाइट भूवैज्ञानिकों और साहसिक यात्रियों को भी आकर्षित करते हैं।
भू-आकृतियाँ और आपदाएँ (Landforms and Disasters)
हमारे आसपास विभिन्न भू-आकृतियों से जुड़ी कई आपदाएँ सामान्यतः होती रहती हैं। इस पाठ में चार प्रमुख आपदाओं के बारे में बताया गया है:
भूस्खलन (Landslides):
भूस्खलन प्राकृतिक और मानवीय कारकों के संयोजन से होते हैं, जो ढलानों को अस्थिर बनाते हैं। भारी और लगातार वर्षा एक प्रमुख प्राकृतिक कारण है, क्योंकि जल मिट्टी और चट्टानों में रिसकर उनका भार बढ़ाता है और घर्षण को कम करता है। भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट भी भूमि को हिलाकर और ढलानों को कमज़ोर करके भूस्खलन को जन्म दे सकते हैं। तीव्र ढाल तथा ढीली या अपक्षयित चट्टानों की उपस्थिति जोखिम को और बढ़ा देती है। वनोन्मूलन (Deforestation), खनन, सड़क निर्माण और पहाड़ी ढलानों पर अनियोजित निर्माण जैसी मानवीय गतिविधियाँ ढलानों के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ देती हैं। खराब जल निकासी और अनुचित भूमि उपयोग भी अतिरिक्त जल के जमा होने से भूस्खलन में योगदान करते हैं।
हिमस्खलन (Avalanches):
हिमस्खलन खड़ी पर्वतीय ढलानों पर बर्फ की अचानक अस्थिरता के कारण होते हैं। कम समय में भारी हिमपात हिमराशि पर अतिरिक्त भार डालता है, जिससे यह अस्थिर हो जाती है, विशेष रूप से जब यह कमज़ोर या ढीली परतों पर टिकी हो। तापमान में अचानक वृद्धि से आंशिक पिघलाव हो सकता है, जो बर्फ को जोड़े रखने वाले घर्षण को कम कर देता है। तेज़ हवाएँ भी बर्फ को असमान रूप से जमा कर सकती हैं, जिससे कमज़ोर परतें बनती हैं। भूकंप और कंपन जैसी प्राकृतिक हलचलें, साथ ही स्कीइंग, ट्रैकिंग या पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण जैसी मानवीय गतिविधियाँ भी बर्फ से ढकी ढलानों के संतुलन को बिगाड़कर हिमस्खलन को ट्रिगर कर सकती हैं।
हिमानी झील प्रस्फुटन बाढ़ (GLOFs – Glacial Lake Outburst Floods):
हिमानी झील प्रस्फुटन बाढ़ (GLOF) प्राकृतिक और जलवायु संबंधी कारकों के कारण हिमानी झीलों से बड़ी मात्रा में जल के अचानक निकलने से होती है। बढ़ते तापमान के कारण हिमनदों का तेज़ी से पिघलना हिमानी झीलों के आकार और जल स्तर को बढ़ाता है, जिससे बर्फ या ढीले हिमोढ़ों से बने उनके प्राकृतिक बाँधों पर दबाव पड़ता है। भारी वर्षा या तीव्र हिमपात इन झीलों में अतिरिक्त जल जोड़ सकता है। भूकंप, हिमस्खलन या भूस्खलन झील पर प्रहार कर सकते हैं या बाँध को कमज़ोर कर सकते हैं, जिससे उसका अचानक टूटना होता है। परिणामस्वरूप, संग्रहित जल अचानक निकलता है, जिससे निचले क्षेत्रों में विनाशकारी बाढ़ आती है।
धूल भरी आंधी (Dust Storms):
धूल भरी आंधियाँ तेज़ हवाओं द्वारा ढीली, सूखी मिट्टी और रेत की बड़ी मात्रा को हवा में उठाने से होती हैं। लंबे समय तक सूखा और कम वर्षा मिट्टी को सुखा देती है, जिससे हवा के लिए महीन कणों को उठाना आसान हो जाता है। धूल भरी आंधियाँ मरुस्थलीय और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में सामान्य हैं, जहाँ मिट्टी ढीली और सूखी होती है। विरल वनस्पति आवरण, जो अक्सर वनोन्मूलन, अत्यधिक चराई या खराब कृषि पद्धतियों के कारण होता है, भूमि को उजागर छोड़ देता है। जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक मौसमी परिस्थितियाँ धूल भरी आंधियों की आवृत्ति और तीव्रता को और बढ़ा सकती हैं।
निष्कर्ष एवं महत्वपूर्ण बिंदु
पृथ्वी की सतह ग्रह के भीतर और बाहर काम करने वाली शक्तिशाली शक्तियों के कारण लगातार बदलती रहती है। भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, वलन (Folding) और भ्रंशन (Faulting) जैसी आंतरिक शक्तियाँ पर्वत, घाटियाँ और महासागरीय बेसिन बनाती हैं, जबकि अपक्षय, अपरदन और निक्षेपण जैसी बाह्य शक्तियाँ धीरे-धीरे उन्हें घिसती और पुनः आकार देती हैं। मिलकर, ये प्राकृतिक प्रक्रियाएँ आज हम जो विविध भू-आकृतियाँ देखते हैं – सबसे ऊँची चोटियों से लेकर सबसे गहरे महासागरीय तल तक – उन्हें जन्म देती हैं। मानव जीवन भी इन भू-आकृतियों से गहराई से जुड़ा है, क्योंकि यह हमारी जलवायु, संसाधनों, बस्तियों और संस्कृतियों को प्रभावित करता है।
- पृथ्वी विभिन्न परतों – भूपर्पटी, मैंटल और क्रोड – से बनी है।
- पृथ्वी की आंतरिक शक्तियाँ (भूकंप, ज्वालामुखी, वलन और भ्रंशन) भूपर्पटी की गति के लिए उत्तरदायी हैं।
- अपक्षय और अपरदन जैसी बाह्य शक्तियाँ पृथ्वी की सतह पर छोटी भू-आकृतियों को तराशती हैं, जो मानव जीवन को कई तरीकों से प्रभावित करती हैं।
- पृथ्वी की सतह बहते जल, लहरों और ज्वार, हिमानी, पवन तथा भूमिगत जल जैसे निम्नीकरण के कारकों द्वारा तराशी जाती है।
- भूस्खलन, हिमस्खलन, हिमानी झील प्रस्फुटन बाढ़ और धूल भरी आंधी जैसी आपदाएँ विशिष्ट भू-आकृतियों से जुड़ी होती हैं।
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