पाठ – 3
वायुमंडल और जलवायु
In this post we have given the detailed notes of class 9 Social Science chapter 3 Atmosphere and Climate in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के सामाजिक विज्ञान के पाठ 3 वायुमंडल और जलवायु के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Understanding Society, India and Beyond Part I (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Social Science |
| Chapter no. | Chapter 3 |
| Chapter Name | वायुमंडल और जलवायु (Atmosphere and Climate) |
| Category | Class 9 Social Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 3, वायुमंडल और जलवायु
वायुमंडल का परिचय
जब हम आकाश की ओर देखते हैं तो हमें तैरते हुए बादल, धूप और हवा के झोंके महसूस होते हैं। यह सब कुछ पृथ्वी के चारों ओर फैले हवा के आवरण के कारण होता है, जिसे वायुमंडल (Atmosphere) कहते हैं। गुरुत्वाकर्षण (Gravity) के कारण यह पृथ्वी के चारों ओर टिका रहता है और विभिन्न अनुपातों में गैसों का मिश्रण है, जो पृथ्वी पर सभी जीवधारियों के जीवित रहने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
वायुमंडल हमें सूर्य से आने वाले हानिकारक विकिरण, जैसे पराबैंगनी विकिरण (Ultraviolet radiation), से बचाता है। यह सूर्य की कुछ ऊर्जा को रोककर पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करता है और उसे वापस अंतरिक्ष में जाने से रोकता है। वायुमंडल पृथ्वी के मौसम एवं जलवायु तंत्र का एक महत्वपूर्ण भाग है, जो तापमान, आर्द्रता और वायुदाब जैसे कारकों को प्रभावित करता है।
गुरुत्वाकर्षण (Gravity): यह द्रव्यमान या ऊर्जा रखने वाली वस्तुओं, जैसे सूर्य और पृथ्वी, के बीच आकर्षण का एक मौलिक भौतिक बल है। पृथ्वी की सतह पर या उसके निकट स्थित वस्तुओं पर पृथ्वी के द्रव्यमान द्वारा लगाए गए आकर्षण बल को पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण कहते हैं।
वायुमंडल का संघटन एवं संरचना
वायुमंडल का संघटन (Composition of the Atmosphere):
पृथ्वी का वायुमंडल विभिन्न गैसों के मिश्रण से बना है। नाइट्रोजन और ऑक्सीजन दो मुख्य और सबसे अधिक मात्रा में पाई जाने वाली गैसें हैं, जो पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक हैं। इनके अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड, आर्गन, हीलियम, नियॉन, क्रिप्टॉन, जीनॉन, ओज़ोन और हाइड्रोजन जैसी अन्य गैसें भी वायुमंडल में पाई जाती हैं, परंतु ये बहुत कम मात्रा में हैं। इनके अलावा वायुमंडल में जलवाष्प (Water vapour) और धूल के सूक्ष्म कण भी मौजूद रहते हैं।
वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा बदलती रहती है, परंतु सामान्यतः यह 0.1 प्रतिशत से 0.4 प्रतिशत के बीच रहती है। बादलों के निर्माण और वर्षण (Precipitation) में जलवाष्प की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऊँचाई के साथ वायुमंडल का संघटन भी बदलता रहता है।
वायुमंडल में गैसों का अनुपात इस प्रकार है :
- नाइट्रोजन (Nitrogen) — 78 प्रतिशत
- ऑक्सीजन (Oxygen) — 21 प्रतिशत
- आर्गन (Argon) — 0.93 प्रतिशत
- कार्बन डाइऑक्साइड (Carbon dioxide) — 0.04 प्रतिशत
- अन्य गैसें (हीलियम, नियॉन, क्रिप्टॉन, जीनॉन, ओज़ोन, हाइड्रोजन आदि) — लगभग 0.03 प्रतिशत
वायुमंडल की संरचना (Structure of the Atmosphere):
वायुमंडल की एक परतदार संरचना है। ये परतें बढ़ती हुई ऊँचाई (Altitude) के साथ तापमान और घनत्व में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर निर्धारित की जाती हैं। हवा का घनत्व पृथ्वी की सतह के पास सबसे अधिक होता है और ऊँचाई के साथ घटता जाता है। पृथ्वी की सतह से बाह्य अंतरिक्ष तक फैली मुख्य परतें इस प्रकार हैं — क्षोभमंडल, समताप मंडल, मध्यमंडल, आयनमंडल/तापमंडल और बहिर्मंडल।
ऊँचाई (Altitude): माध्य समुद्र तल (Mean sea level) से किसी स्थान की ऊँचाई को ऊँचाई कहते हैं, जिसे सामान्यतः मीटर या फुट में मापा जाता है। माध्य समुद्र तल को शून्य माना जाता है।
| परत (Layer) | ऊँचाई/विस्तार | मुख्य विशेषताएँ |
| क्षोभमंडल (Troposphere) | लगभग 12 किमी तक | वायुमंडल की सबसे महत्वपूर्ण परत। ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता है। जो हवा हम साँस में लेते हैं, अधिकांश जलवाष्प और बादल यहीं पाए जाते हैं। लगभग सभी मौसमी घटनाएँ (वर्षा, कोहरा, ओले) इसी परत में होती हैं। यह ट्रोपोपॉज़ (Tropopause) नामक संक्रमण क्षेत्र द्वारा समताप मंडल से अलग होती है। |
| समताप मंडल (Stratosphere) | लगभग 12 से 50 किमी तक | बादलों और मौसमी हलचल से मुक्त होने के कारण हवाई जहाज़ उड़ाने के लिए आदर्श परत। इसमें ओज़ोन गैस की एक परत होती है, जो सूर्य के हानिकारक पराबैंगनी विकिरण को छानकर हमारी रक्षा करती है। स्ट्रैटोपॉज़ (Stratopause) इसे मध्यमंडल से अलग करता है। |
| मध्यमंडल (Mesosphere) | लगभग 50 से 80 किमी तक | वायुमंडल की तीसरी परत। ऊँचाई बढ़ने के साथ यहाँ भी तापमान घटता है। अंतरिक्ष से आने वाली अधिकांश उल्काएँ (Meteorites) इसी परत में जलकर नष्ट हो जाती हैं। मेसोपॉज़ (Mesopause) इसकी ऊपरी सीमा है। |
| तापमंडल (Thermosphere) | लगभग 80 से 700 किमी तक | यहाँ ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान बहुत तेज़ी से बढ़ता है, क्योंकि इस परत के गैस अणु सूर्य की एक्स-रे और लघु-तरंग पराबैंगनी विकिरण को सोख लेते हैं। यह पृथ्वी से भेजी गई रेडियो तरंगों को परावर्तित कर रेडियो प्रसारण में सहायता करती है। आयनमंडल (Ionosphere) इसी का एक भाग है। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवीय ज्योति (Aurora) भी इसी परत में दिखाई देती है। |
| बहिर्मंडल (Exosphere) | 700 किमी से ऊपर | वायुमंडल की सबसे ऊपरी परत, जहाँ हवा बहुत विरल होती है। कमज़ोर गुरुत्वाकर्षण के कारण हीलियम और हाइड्रोजन जैसी हल्की गैसें यहाँ से अंतरिक्ष में उड़ जाती हैं। |
ध्यान रखें: तापमान केवल क्षोभमंडल और मध्यमंडल में ही ऊँचाई के साथ घटता है, बाकी परतों में यह प्रवृत्ति अलग होती है।
ऑरोरा (Aurora): ‘ऑरोरा’ शब्द लैटिन भाषा से आया है, जिसका अर्थ है ‘भोर’ या ‘सुबह की रोशनी’। इसका नाम रोमन देवी ऑरोरा (भोर की देवी) के नाम पर रखा गया है। सूर्य से निकलने वाले आवेशित कण (सौर पवन/Solar wind) जब पृथ्वी के वायुमंडल तक पहुँचते हैं तो चुंबकीय ध्रुवों की ओर आकर्षित हो जाते हैं। ये कण वायुमंडल की विभिन्न गैसों से टकराकर उन्हें अलग-अलग रंगों में चमका देते हैं। उत्तरी गोलार्ध में इसे अरोरा बोरियालिस (Aurora Borealis) और दक्षिणी गोलार्ध में अरोरा ऑस्ट्रेलिस (Aurora Australis) कहा जाता है।
ध्यान रखें: हमारे ऊपर की हवा हमारे शरीर पर काफी दबाव डालती है, फिर भी हमें इसका अनुभव नहीं होता, क्योंकि हवा चारों ओर से समान रूप से दबाव डालती है और हमारा शरीर भी उतना ही प्रति-दबाव (Counter-pressure) उत्पन्न करता है।
मौसम और जलवायु
मौसम (Weather): वायुमंडल की घंटे-घंटे और दिन-प्रतिदिन की परिस्थितियों को मौसम कहते हैं। गर्म या उमस भरा मौसम व्यक्ति को चिड़चिड़ा बना सकता है, जबकि सुहावना या हवादार मौसम प्रसन्नचित्त बना देता है। मौसम में दिन-प्रतिदिन काफी परिवर्तन हो सकता है।
जलवायु (Climate): किसी स्थान की लंबी अवधि में औसत मौसमी परिस्थितियों को जलवायु कहा जाता है। जलवायु एक बड़े क्षेत्र में लंबे समय तक (सामान्यतः तीस वर्ष या उससे अधिक) की मौसमी परिस्थितियों और उनके बदलावों के कुल योग को दर्शाती है।
मौसम और जलवायु के तत्व (Elements of Weather and Climate):
वायुमंडल के जो तत्व पृथ्वी पर मानव जीवन को प्रभावित करते हैं, उनमें प्रमुख हैं — तापमान, वर्षण, आर्द्रता, पवन और वायुमंडलीय दाब। ये सभी तत्व बदलती परिस्थितियों के साथ स्वयं भी बदलते रहते हैं।
तापमान (Temperature): वायुमंडल का तापमान न केवल दिन और रात के बीच बल्कि विभिन्न ऋतुओं में भी बदलता रहता है, जैसे गर्मियाँ सर्दियों की तुलना में अधिक गर्म होती हैं। तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है सूर्यातप (Insolation)। सूर्यातप की मात्रा भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर घटती जाती है, इसलिए तापमान भी भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर घटता जाता है।
सूर्यातप (Insolation): सूर्य से आने वाली वह आगामी सौर ऊर्जा, जिसे पृथ्वी प्राप्त करती है, सूर्यातप कहलाती है।
आर्द्रता (Humidity): जब भूमि और विभिन्न जलाशयों से पानी वाष्पित होता है, तो वह जलवाष्प बन जाता है। जब हवा में जलवाष्प का स्तर अधिक होता है, तो उससे आर्द्रता उत्पन्न होती है। अतः आर्द्रता का अर्थ है हवा में जलवाष्प की उपस्थिति, जो नमी पैदा करती है। जैसे-जैसे हवा गर्म होती है, उसकी जलवाष्प धारण करने की क्षमता बढ़ती है, जिससे आर्द्रता का स्तर बढ़ जाता है। ऐसे दिन में कपड़े सूखने में अधिक समय लेते हैं और पसीना धीरे-धीरे वाष्पित होता है, जिससे हमें बहुत असहज महसूस होता है।
वर्षण (Precipitation): जब वायुमंडल का कोई भाग जलवाष्प से संतृप्त (Saturated) हो जाता है, तब वह संघनित होकर गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी पर गिरता है — इसे ही वर्षण कहते हैं। इसमें फुहार (Drizzle), वर्षा, हिम (Snow), सहित हिमकण (Sleet) और ओले (Hail) शामिल हैं। पवनों की दिशा, पर्वत और ऋतु — ये तीन प्रमुख कारक वर्षण को प्रभावित करते हैं। जब वर्षण द्रव रूप में पृथ्वी पर गिरता है, तो उसे वर्षा (Rain) कहा जाता है। वर्षा वर्षण का सबसे सामान्य रूप है और किसी स्थान का तापमान कम कर देती है। लंबे समय तक वर्षा न होने से शुष्क जलवायु (Dry climate) उत्पन्न होती है। अधिकांश भूजल वर्षा के जल से ही एकत्रित होता है।
वायुमंडलीय दाब (Atmospheric Pressure): पृथ्वी की सतह पर हवा के भार द्वारा डाला गया दबाव वायुदाब कहलाता है। जैसे-जैसे हम वायुमंडल में ऊपर जाते हैं, दाब तेज़ी से घटता है। यह समुद्र तल पर सबसे अधिक होता है और ऊँचाई के साथ घटता जाता है। किसी स्थान के तापमान के अनुसार वायुदाब का क्षैतिज वितरण भी प्रभावित होता है। अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में हवा गर्म होकर ऊपर उठती है, जिससे निम्न वायुदाब क्षेत्र (Low-pressure area) बनता है। निम्न दाब बादलों और गीले मौसम से जुड़ा होता है। कम तापमान वाले क्षेत्रों में ठंडी और भारी हवा नीचे बैठती है, जिससे उच्च वायुदाब क्षेत्र (High-pressure area) बनता है। उच्च दाब साफ और धूप वाले आकाश से जुड़ा होता है। हवा सदैव उच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर बहती है।
पवन (Wind): उच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर हवा के प्रवाह को पवन कहते हैं। यह हल्की भी हो सकती है और तेज़ भी। पवन की दिशा उसी दिशा के नाम पर रखी जाती है, जहाँ से वह चलती है — जैसे पश्चिम से चलने वाली पवन को पछुआ पवन (Westerly) कहते हैं।
| पवन का प्रकार | गति (किमी/घंटा) | सामान्य प्रभाव |
| शांत (Calm) | 0–1 | बिल्कुल शांत, धुआँ सीधा ऊपर उठता है। |
| हल्की बयार (Light breeze) | 6–11 | चेहरे पर हवा महसूस होती है, पत्तियाँ सरसराती हैं, साधारण वेदर-वेन (वात-सूचक) घूमने लगता है। |
| तेज़ बयार (Strong breeze) | 39–49 | बड़ी शाखाएँ हिलने लगती हैं, छाता संभालना कठिन हो जाता है। |
| तूफान (Storm) | 103–117 | बहुत कम अनुभव होता है, आमतौर पर व्यापक क्षति के साथ आता है। |
स्थानीय पवनें — स्थल समीर और सागरीय समीर (Local Winds — Land Breeze and Sea Breeze):
स्थल समीर (Land breeze) और सागरीय समीर (Sea breeze) जैसी स्थानीय पवनें भी किसी स्थान के मौसम और जलवायु को प्रभावित करती हैं। तटीय क्षेत्रों में सम जलवायु (Moderate climate) बनाए रखने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
सागरीय समीर (Sea Breeze): यह एक स्थानीय पवन है, जो दिन में, विशेषकर दोपहर बाद, समुद्र से स्थल की ओर चलती है, जब स्थल समुद्र की तुलना में अधिक गर्म हो जाता है। इससे स्थल के ऊपर निम्न दाब क्षेत्र बनता है, इसलिए हवा समुद्र से स्थल की ओर बहने लगती है।
स्थल समीर (Land Breeze): यह एक स्थानीय पवन है, जो रात में स्थल से समुद्र की ओर चलती है। यह स्थल और समुद्र के बीच असमान सतही शीतलन के कारण होती है। रात में स्थल समुद्र की तुलना में तेज़ी से ठंडा होता है। चूँकि समुद्र और स्थल के बीच तापमान और वायुदाब का अंतर कम होता है, इसलिए इस पवन की गति भी धीमी होती है।
मौसम की परिस्थितियाँ प्रायः एक ही दिन के भीतर भी बदलती रहती हैं, परंतु सामान्यीकृत मासिक वायुमंडलीय परिस्थितियों अथवा कुछ सप्ताहों या महीनों के सामान्य प्रारूप — जैसे दिन ठंडे या गर्म, हवादार या शांत, बादलदार या स्वच्छ, गीले या सूखे होना — के आधार पर वर्ष को ऋतुओं में बाँटा जाता है।
भारत में ऋतुएँ
भारत की जलवायु को व्यापक रूप से उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु (Tropical monsoon climate) कहा जा सकता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (Indian Meteorological Department — IMD) ने भारत में चार अलग-अलग ऋतुओं को मान्यता दी है :
शीत ऋतु (Winter):
शीत ऋतु सामान्यतः दिसंबर से अप्रैल के प्रारंभ तक रहती है। वर्ष के सबसे ठंडे महीने दिसंबर और जनवरी होते हैं, जब उत्तर-पश्चिम में औसत तापमान लगभग 10–15°C रहता है। भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर तापमान बढ़ता है और मुख्य भूमि भारत के दक्षिण-पूर्व में यह लगभग 20–25°C तक पहुँच जाता है।
ग्रीष्म या मानसून-पूर्व ऋतु (Summer or Pre-monsoon):
ग्रीष्म या मानसून-पूर्व ऋतु अप्रैल से जून तक और उत्तर-पश्चिम भारत में जुलाई तक फैली रहती है। पश्चिमी और दक्षिणी क्षेत्रों में सबसे गर्म महीना अप्रैल है, जबकि उत्तरी क्षेत्रों में यह मई होता है। भारत के अधिकांश आंतरिक भागों में औसत तापमान 32–40°C के बीच रहता है।
मानसून या वर्षा ऋतु — अग्रगामी मानसून (Monsoon or Rainy — Advancing Monsoon):
मानसून ऋतु सामान्यतः जून से सितंबर तक रहती है। इस ऋतु पर आर्द्र दक्षिण-पश्चिम ग्रीष्मकालीन मानसून का प्रभुत्व रहता है, जो मई के अंत या जून के प्रारंभ में धीरे-धीरे पूरे देश में फैल जाता है। अक्टूबर के प्रारंभ में उत्तर भारत से मानसून की वर्षा वापस लौटने लगती है, और इस दौरान दक्षिण भारत में सामान्यतः अधिक वर्षा होती है।
मानसून-पश्चात ऋतु — निवर्तमान मानसून (Post-monsoon — Retreating Monsoon):
मानसून-पश्चात ऋतु अक्टूबर से दिसंबर तक रहती है। उत्तर-पश्चिम भारत में अक्टूबर और नवंबर के महीने सामान्यतः बादल रहित होते हैं। हिमालयी राज्यों की जलवायु अधिक शीतोष्ण (Temperate) होने के कारण वहाँ दो अतिरिक्त ऋतुएँ — शरद (Autumn) और वसंत (Spring) — भी अनुभव की जाती हैं।
ध्यान रखें: परंपरागत रूप से भारत में छह ऋतुएँ मानी जाती हैं, जिनमें से प्रत्येक लगभग दो महीने की होती है — वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर। ये ऋतुएँ 12 महीनों के छह भागों में खगोलीय विभाजन पर आधारित हैं। पारंपरिक भारतीय पंचांग भी महीनों की अपनी व्यवस्था के माध्यम से इन्हीं ऋतुओं को दर्शाता है।
| ऋतु | भारतीय पंचांग के अनुसार महीने | ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार महीने |
| वसंत | चैत्र–वैशाख | मार्च–अप्रैल |
| ग्रीष्म | ज्येष्ठ–आषाढ़ | मई–जून |
| वर्षा | श्रावण–भाद्रपद | जुलाई–अगस्त |
| शरद | अश्विन–कार्तिक | सितंबर–अक्टूबर |
| हेमंत | मार्गशीर्ष–पौष | नवंबर–दिसंबर |
| शिशिर | माघ–फाल्गुन | जनवरी–फरवरी |
जानने योग्य तथ्य: कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्षा के वैज्ञानिक मापन और देश के राजस्व व राहत कार्यों के प्रबंधन में उनके व्यावहारिक उपयोग के अभिलेख मिलते हैं। कृषिपराशर और वराहमिहिर की बृहत्संहिता में भी सूर्य-चंद्र की स्थिति एवं नक्षत्रों के आधार पर वर्षा का अनुमान लगाने की प्राचीन पद्धतियाँ वर्णित हैं, जिन पर आज भी भारत में कई कृषि पद्धतियाँ आधारित हैं।
मानसून (Monsoon)
भारत की जलवायु मानसूनी पवनों से गहराई से प्रभावित है। प्राचीन काल में भारत आने वाले नाविक मानसून की परिघटना को पहचानने वालों में सबसे पहले थे। वे पाल के जहाज़ों से यात्रा करते समय पवन-तंत्र में होने वाले उलटफेर का लाभ उठाते थे। व्यापारी के रूप में भारत आए अरबों ने पवन-तंत्र के इस मौसमी उलटफेर को ‘मानसून’ नाम दिया, जो अरबी शब्द ‘मौसिम’ (mausim) से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘ऋतु’।
मानसून (Monsoon): वर्ष के दौरान पवन की दिशा में होने वाले मौसमी उलटफेर को मानसून कहते हैं।
मानसूनी पवनें मौसमी पवनें हैं। इन्हें दो भागों में बाँटा जाता है — दक्षिण-पश्चिम मानसून और उत्तर-पूर्व मानसून।
दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon):
ग्रीष्मकालीन मानसून के नाम से भी जाना जाने वाला दक्षिण-पश्चिम मानसून जून से सितंबर के बीच हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के पार समुद्र से स्थल की ओर चलने वाली पवनों की विशेषता रखता है। यह मुख्यतः स्थल और समुद्र के असमान तापन (Unequal heating) के कारण होता है। ग्रीष्म ऋतु में भारत की स्थल राशि आसपास के महासागरों की तुलना में तेज़ी से गर्म हो जाती है। इससे भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर निम्न वायुदाब क्षेत्र बनता है, जबकि हिंद महासागर अपेक्षाकृत ठंडा रहता है और वहाँ उच्च वायुदाब बना रहता है। चूँकि हवा सदैव उच्च दाब से निम्न दाब क्षेत्र की ओर बहती है, इसलिए समुद्र से स्थल की ओर आर्द्र पवनें बहती हैं, जो वर्षा लाती हैं। यही पवनें वर्षभर देश में होने वाली अधिकांश वर्षा के लिए ज़िम्मेदार हैं।
उत्तर-पूर्व मानसून (North-East Monsoon):
शीतकालीन मानसून के नाम से भी जाना जाने वाला उत्तर-पूर्व मानसून भारत में अक्टूबर से फरवरी के बीच सक्रिय रहता है। इस ऋतु में भारतीय स्थल राशि आसपास के महासागरों की तुलना में तेज़ी से ठंडी होती है, जिससे स्थल के ऊपर उच्च वायुदाब और समुद्र के ऊपर निम्न वायुदाब बनता है। परिणामस्वरूप ठंडी और शुष्क पवनें स्थल से समुद्र की ओर बहती हैं। ये पवनें सामान्यतः भारत के अधिकांश भागों में वर्षा नहीं लातीं। किंतु जब उत्तर-पूर्वी मानसूनी पवनें बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुज़रती हैं, तो नमी सोखकर भारत के पूर्वी तट, विशेषकर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में वर्षा करती हैं। इस प्रकार शीतकालीन मानसून भारत के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों में होने वाली वर्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
भारतीय जीवन में मानसून का महत्व:
मानसून भारत के लोगों के जीवन में एक अहम भूमिका निभाता है। भारत की अधिकांश कृषि मानसून की वर्षा पर निर्भर करती है, क्योंकि किसान बुवाई और फसल उगाने के लिए वर्षा पर भरोसा करते हैं। अच्छा मानसून पर्याप्त खाद्य उत्पादन तथा नदियों, जलाशयों और कुओं में पर्याप्त जल आपूर्ति सुनिश्चित करता है। मानसून दैनिक जीवन, परिवहन, त्योहारों और विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार को भी प्रभावित करता है। हालाँकि अत्यधिक वर्षा बाढ़ का कारण बन सकती है, जबकि कमज़ोर मानसून सूखे की स्थिति उत्पन्न कर सकता है। इस प्रकार मानसून भारत के लोगों की अर्थव्यवस्था, जीवनशैली और आजीविका को बहुत अधिक प्रभावित करता है।
जानने योग्य तथ्य: लगभग 5वीं शताब्दी ईस्वी में रचित कालिदास के ‘मेघदूतम्’ में मध्य भारत में मानसून के आगमन की तिथि और मानसूनी बादलों के मार्ग का उल्लेख मिलता है। भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय मानसून मिशन (National Monsoon Mission — NMM) ने भारत के लिए मानसून पूर्वानुमान को बेहतर बनाने के लिए अत्याधुनिक मौसम और जलवायु पूर्वानुमान मॉडल विकसित किए हैं। ‘मिशन मौसम’ का उद्देश्य भारत को मौसम और जलवायु विज्ञान में वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनाना तथा देश को ‘मौसम के लिए तैयार’ (Weather Ready) और ‘जलवायु के प्रति सजग’ (Climate Smart) बनाना है।
जलवायु परिवर्तन (Climate Change)
आज पृथ्वी के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक जलवायु परिवर्तन है। इसका अर्थ है तापमान, वर्षा और पवन जैसे मौसमी प्रारूपों में होने वाला दीर्घकालिक परिवर्तन, जो मुख्यतः मानवीय गतिविधियों — जैसे जीवाश्म ईंधन (Fossil fuels) जलाना, वनोन्मूलन (Deforestation) और औद्योगिक प्रदूषण, जिससे वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें छोड़ी जाती हैं — के कारण होता है। इन गतिविधियों से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और जलवाष्प जैसी ग्रीनहाउस गैसें (Greenhouse gases) बढ़ती हैं, जो ऊष्मा को रोककर वैश्विक तापमान को बढ़ाती हैं। परिणामस्वरूप हम अधिक बार बाढ़, सूखा, हिमनदों का पिघलना, समुद्र स्तर का बढ़ना और जैव विविधता की क्षति देख रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन न केवल पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के लिए खतरा है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य, कृषि और आजीविका को भी प्रभावित करता है। इसका महिलाओं और बच्चों सहित जनसंख्या के लगभग सभी वर्गों पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। इस समस्या से निपटने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है — जैसे कार्बन पदचिह्न (Carbon footprint) घटाना, नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable energy) का उपयोग करना, वनों की रक्षा करना और सतत जीवनशैली (Sustainable lifestyle) अपनाना। प्रत्येक छोटा कदम मायने रखता है, और हर व्यक्ति एक स्वस्थ व हरित भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कार्बन पदचिह्न (Carbon Footprint): ऊर्जा उपयोग, परिवहन, या वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन जैसी मानवीय गतिविधियों के परिणामस्वरूप वायुमंडल में छोड़ी गई ग्रीनहाउस गैसों की कुल मात्रा को कार्बन पदचिह्न कहते हैं। यातायात के साधन, बिजली का उपयोग, पानी का उपयोग तथा प्लास्टिक व कचरे के निपटान की आदतों में परिवर्तन लाकर हर विद्यार्थी अपने कार्बन पदचिह्न को कम कर सकता है — जैसे पैदल चलना या साइकिल का उपयोग, बिजली के उपकरण बंद रखना, पानी का किफ़ायती उपयोग और एकल-उपयोग प्लास्टिक (Single-use plastic) से बचना।
केस स्टडी : पंजाब की बाढ़ 2025
वर्ष 2025 में पंजाब में भारी मानसूनी वर्षा और सतलुज, ब्यास तथा रावी नदियों के लगातार उफनने के कारण गंभीर बाढ़ आई। इस बाढ़ से राज्य के गाँव, कृषि भूमि, घर और सड़कों तथा पुलों जैसे महत्वपूर्ण अवसंरचना (Infrastructure) सहित बड़े क्षेत्र क्षतिग्रस्त हुए। कुछ स्थानों पर पानी उतरना शुरू हुआ और राहत कार्य चलाए गए, लेकिन इसका समग्र प्रभाव विनाशकारी रहा। राज्य को भारी आर्थिक क्षति, सामाजिक व्यवधान और पर्यावरणीय क्षति का सामना करना पड़ा, जिसने बेहतर बाढ़ प्रबंधन और तैयारियों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित किया।
कारण (Causes):
पंजाब की बाढ़ प्राकृतिक और मानव-निर्मित दोनों प्रकार के कारकों का परिणाम थी।
- प्राकृतिक कारण: वर्ष 2025 में पंजाब में बहुत भारी मानसूनी वर्षा हुई, जिसे पश्चिमी विक्षोभ (Western disturbances) ने और तीव्र कर दिया, जिससे और अधिक नमी व वर्षा आई। यह वर्षा केवल पंजाब में ही नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में भी हुई। पंजाब की प्रमुख नदियाँ — सतलुज, ब्यास, रावी और घग्घर — भारी वर्षा शुरू होने से पहले ही उफान पर थीं। अतिरिक्त वर्षा होने पर पहाड़ों से आया पानी और स्थानीय वर्षा मिलकर नदियों को उफना गई, जिससे पंजाब के कई भागों में गंभीर बाढ़ आई।
- मानव-निर्मित कारण: कमज़ोर और पुराने नदी तटबंधों (धूसी बांध) के कारण बाढ़ और भी गंभीर हो गई, क्योंकि वे भारी मानसूनी वर्षा के दौरान बढ़ते जल को रोक नहीं सके। लोगों ने नदियों के बहुत निकट घर और खेत बना लिए थे, जिससे बाढ़ के पानी के सुरक्षित रूप से फैलने के लिए प्राकृतिक स्थान कम हो गया। समय के साथ नदियों और बांधों में गाद व मिट्टी जमा हो गई, जिससे उनकी जल धारण व प्रवाह क्षमता घट गई। कुछ क्षेत्रों में बाढ़ की चेतावनियाँ देर से आईं या स्पष्ट रूप से नहीं दी गईं, जिससे लोग तैयार नहीं थे। इन सभी कारकों ने मिलकर बाढ़ से हुई क्षति को और बढ़ा दिया।
प्रभाव (Effects):
- बाढ़ में कई लोगों की जान चली गई।
- हज़ारों लोगों को सुरक्षा के लिए अपने घर छोड़कर राहत शिविरों में जाना पड़ा।
- कृषि भूमि के बड़े हिस्से पानी में डूब गए, और धान जैसी फसलों को गंभीर नुकसान पहुँचा।
- मुर्गीपालन और डेयरी फार्म क्षतिग्रस्त व नष्ट हो गए। गाय, भैंस और मुर्गियों सहित कई पशु बीमार हुए या मर गए।
- सड़कें, पुल, सीमा बाड़ और कुछ सार्वजनिक भवन भी क्षतिग्रस्त हुए।
- गंदे खड़े पानी के कारण जल-जनित बीमारियों (Waterborne diseases) का प्रसार और स्वच्छता संबंधी समस्याएँ पैदा हुईं।
मुख्य बिंदु (सारांश)
- पृथ्वी का वायुमंडल विभिन्न गैसों से बना है, जिनमें मुख्यतः नाइट्रोजन और ऑक्सीजन हैं, साथ ही जलवाष्प और धूल जैसी अन्य गैसें भी थोड़ी मात्रा में मौजूद हैं, जो जीवन का समर्थन करती हैं तथा बादल व वर्षा बनाने में सहायक हैं।
- वायुमंडल विभिन्न परतों से मिलकर बना है — क्षोभमंडल, समताप मंडल, मध्यमंडल, तापमंडल और बहिर्मंडल — जो पृथ्वी की सतह से ऊपर जाने पर तापमान और वायु घनत्व में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर विभाजित हैं।
- मौसम किसी स्थान की दैनिक वायुमंडलीय परिस्थितियों को दर्शाता है, जबकि जलवायु लंबे समय की औसत मौसमी परिस्थितियाँ हैं।
- भारत की उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु है, और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) वर्ष को चार मुख्य ऋतुओं — शीत, ग्रीष्म, मानसून और मानसून-पश्चात — में बाँटता है।
- जलवायु परिवर्तन मुख्यतः ईंधन जलाने और वृक्षों की कटाई जैसी मानवीय गतिविधियों के कारण होने वाला मौसम में दीर्घकालिक परिवर्तन है, जो वैश्विक तापन (Global warming) और चरम मौसमी परिस्थितियों को जन्म देता है।
- ऊर्जा की बचत, नवीकरणीय स्रोतों का उपयोग, वृक्षारोपण और अधिक पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाकर हम अपने कार्बन पदचिह्न को घटा सकते हैं।
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