पाठ – 5
मैं हूँ गोल-गोल, ऊपर-नीचे
In this post we have given the detailed notes of class 9 Math chapter 5 I’m Up and Down, and Round and Round in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के गणित के पाठ 5 मैं हूँ गोल-गोल, ऊपर-नीचे के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं गणित विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Ganita Manjari (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Math |
| Chapter no. | Chapter 5 |
| Chapter Name | मैं हूँ गोल-गोल, ऊपर-नीचे (I’m Up and Down, and Round and Round) |
| Category | Class 9 Math Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 5, मैं हूँ गोल-गोल, ऊपर-नीचे
वृत्त की परिभाषाएँ (Definitions)
जब भी हम वृत्त, त्रिभुज या वर्ग जैसी ज्यामितीय आकृतियों की बात करते हैं तो हम मान लेते हैं कि ये आकृतियाँ एक द्वि-विमीय समतल (plane) पर बनी हैं।
वृत्त (Circle): किसी समतल पर उन सभी बिंदुओं का समूह जो उस समतल पर स्थित किसी दिए गए बिंदु से समदूरस्थ (equidistant) हों, वृत्त कहलाता है। बिंदुओं के इस समूह को उस प्रतिबंध का बिंदुपथ (locus) भी कहा जाता है। अतः वृत्त उन बिंदुओं का बिंदुपथ है जो एक दिए गए बिंदु से समान दूरी पर स्थित हों।
- केंद्र (Centre): वह दिया गया स्थिर बिंदु जिससे वृत्त के सभी बिंदु समान दूरी पर होते हैं।
- त्रिज्या (Radius): केंद्र से वृत्त पर स्थित किसी भी बिंदु तक की दूरी।
- जीवा (Chord): वृत्त पर स्थित किन्हीं दो बिंदुओं को मिलाने वाला रेखाखंड। यदि B और C वृत्त पर स्थित दो बिंदु हैं, तो रेखाखंड BC जीवा कहलाती है। जीवा BC द्वारा केंद्र A पर अंतरित कोण ∠BAC होता है।
- व्यास (Diameter): वह जीवा जो वृत्त के केंद्र से होकर गुजरती है। व्यास वृत्त की सबसे बड़ी जीवा होती है।
वृत्त की सममिति (Symmetries of a Circle)
वृत्त एक पूर्णतः सममित आकृति है, इसलिए यह इतनी आकर्षक लगती है।
घूर्णन सममिति (Rotational Symmetry):
यदि एक घूमते हुए पहिये को देखें, तो किसी भी क्षण उसका कोई-न-कोई बिंदु भूमि को स्पर्श करता दिखेगा, परंतु हम यह नहीं बता सकते कि दो अलग-अलग समय पर भूमि स्पर्श करने वाला बिंदु समान है या नहीं — क्योंकि घूमता हुआ पहिया हर समय एक-सा ही दिखाई देता है। इसी कारण वृत्त में पूर्ण घूर्णन सममिति (complete rotational symmetry) होती है — वृत्त को किसी भी कोण से घुमाने पर वह पहले जैसा ही दिखता है।
परावर्तन सममिति (Reflection Symmetry):
यदि कागज पर वृत्त बनाकर उसे काटा जाए और इस प्रकार मोड़ा जाए कि उसकी परिधि (सीमाएँ) परस्पर मिल जाएँ, तो जो मोड़-चिह्न (crease) बनता है वह वृत्त की परावर्तन सममिति की रेखा है। यह रेखा सदैव केंद्र से होकर गुजरती है, अर्थात यह वृत्त का एक व्यास होती है। इस प्रकार वृत्त के सभी व्यास परावर्तन सममिति की रेखाएँ हैं।
कितने वृत्त? (How Many Circles?)
दो बिंदुओं से गुजरने वाले वृत्त:
यदि कोई वृत्त दो बिंदुओं A और B से होकर गुजरता है और उसका केंद्र O है, तो OA = OB होगा। ऐसे सभी बिंदु, जो A और B से समदूरस्थ हों, रेखाखंड AB के लंब समद्विभाजक (perpendicular bisector) पर स्थित होते हैं। अतः A और B से होकर जाने वाले सभी वृत्तों के केंद्र, AB के लंब समद्विभाजक पर स्थित होते हैं। इसका अर्थ है कि दो दिए गए बिंदुओं से होकर अनंत वृत्त गुजर सकते हैं — इनमें से सबसे छोटा वृत्त वह है जिसका व्यास स्वयं AB है।
तीन बिंदुओं से गुजरने वाला वृत्त:
यदि तीन बिंदु A, B, C संरेखीय (एक ही सीधी रेखा पर) हों, तो उनसे होकर कोई वृत्त नहीं जा सकता। परंतु यदि A, B, C असंरेखीय हों, तो निम्नलिखित प्रमेय सत्य है:
प्रमेय 1: तीन असंरेखीय बिंदुओं से होकर जाने वाला वृत्त अद्वितीय (unique) होता है।
उपपत्ति: यदि कोई वृत्त A, B, C से होकर जाता है तो उसका केंद्र O होगा, जहाँ OA = OB = OC है। चूँकि OA = OB है, इसलिए O अवश्य ही AB के लंब समद्विभाजक पर स्थित होगा। इसी प्रकार, OA = OC होने से O, AC के लंब समद्विभाजक पर भी स्थित होगा। चूँकि A, B, C संरेखीय नहीं हैं, इसलिए AB और AC के लंब समद्विभाजक केवल एक ही बिंदु पर प्रतिच्छेद करेंगे — यही बिंदु O है। O को केंद्र मानकर OA त्रिज्या का वृत्त खींचने पर वह A, B, C तीनों से होकर गुजरेगा। चूँकि प्रतिच्छेद बिंदु केवल एक ही है, अतः वृत्त भी केवल एक ही होगा।
तीन असंरेखीय बिंदु एक त्रिभुज भी बनाते हैं। इस वृत्त के केंद्र O को त्रिभुज ABC का परिकेंद्र (circumcentre) कहते हैं, और इस वृत्त को परिवृत्त (circumcircle) कहा जाता है। त्रिभुज को वृत्त के अंतर्गत त्रिभुज (inscribed triangle) कहा जाता है।
- न्यूनकोण त्रिभुज (acute-angled) में परिकेंद्र त्रिभुज के अंदर स्थित होता है।
- अधिककोण त्रिभुज (obtuse-angled) में परिकेंद्र त्रिभुज के बाहर स्थित होता है।
- समकोण त्रिभुज (right-angled) में परिकेंद्र कर्ण के मध्यबिंदु पर स्थित होता है।
जीवा और जीवा द्वारा अंतरित कोण
प्रमेय 2 (Theorem): वृत्त की समान जीवाएँ, वृत्त के केंद्र पर समान कोण अंतरित करती हैं।
दिया गया है: AB और DE, वृत्त की समान लंबाई की जीवाएँ हैं (AB = DE)। सिद्ध करना है: ∠ACB = ∠DCE, जहाँ C केंद्र है।
उपपत्ति: CA = CB = r (त्रिज्या), तथा CD = CE = r। अतः CA = CD और CB = CE है। साथ ही AB = DE (दिया गया है)। इस प्रकार SSS सर्वांगसमता प्रतिबंध द्वारा ΔCAB ≅ ΔCDE है, अतः ∠ACB = ∠DCE — अर्थात दोनों जीवाओं द्वारा केंद्र पर अंतरित कोण समान हैं।
प्रमेय 3 (Theorem): वृत्त के केंद्र पर समान कोण अंतरित करने वाली जीवाएँ परस्पर समान होती हैं। (यह प्रमेय 2 का विलोम है)
दिया गया है: ∠ACB = ∠DCE। सिद्ध करना है: AB = ED।
उपपत्ति: AC = BC = त्रिज्या, तथा EC = DC = त्रिज्या। अतः AC = DC और BC = EC है। चूँकि ∠ACB = ∠DCE दिया गया है, इसलिए SAS सर्वांगसमता प्रतिबंध द्वारा ΔACB ≅ ΔDCE है। अतः AB = ED।
जीवाओं के मध्यबिंदु और लंब समद्विभाजक
प्रमेय 4 (Theorem): किसी वृत्त में केंद्र को जीवा के मध्यबिंदु से मिलाने वाली रेखा, उस जीवा पर लंब होती है।
दिया गया है: केंद्र C वाले वृत्त में AB जीवा है और M, AB का मध्यबिंदु है। सिद्ध करना है: CM ⊥ AB।
उपपत्ति: ΔCAB एक समद्विबाहु त्रिभुज है, जिसमें CA = CB (दोनों त्रिज्याएँ), अतः ∠A = ∠B। चूँकि M, AB का मध्यबिंदु है, इसलिए AM = BM। इस प्रकार SAS सर्वांगसमता प्रतिबंध द्वारा ΔCMA ≅ ΔCMB है, अतः ∠CMB = ∠CMA। परंतु ∠CMB + ∠CMA = 180° (रैखिक युग्म)। इसलिए दोनों कोण 90° के होंगे, अर्थात CM, AB पर लंब है।
प्रमेय 5 (Theorem): किसी वृत्त के केंद्र से जीवा पर खींचा गया लंब, उस जीवा को समद्विभाजित करता है। (यह प्रमेय 4 का विलोम है और ऊपर की उपपत्ति से ही सीधे सिद्ध हो जाता है — ∠CMA = ∠CMB = 90° तथा CA = CB होने से SAS/RHS द्वारा AM = BM सिद्ध होता है।)
जीवाओं की केंद्र से दूरी
प्रमेय 6 (Theorem): किसी वृत्त की समान लंबाई की जीवाएँ, वृत्त के केंद्र से समदूरस्थ होती हैं।
दिया गया है: केंद्र C वाले वृत्त में AB = FG हैं; E और H क्रमशः AB व FG के मध्यबिंदु हैं। सिद्ध करना है: CE = CH।
उपपत्ति (विधि 1): CA = CF और CB = CG (सभी त्रिज्याएँ), तथा AB = FG (दिया गया)। इसलिए SSS द्वारा ΔCAB ≅ ΔCFG है। सर्वांगसम त्रिभुजों की संगत ऊँचाइयाँ (altitudes) भी समान होती हैं, अतः CE = CH।
उपपत्ति (विधि 2): प्रमेय 5 के अनुसार E और H क्रमशः AB व FG के मध्यबिंदु हैं, इसलिए AE = FH। साथ ही ∠CEA = ∠CHF = 90° तथा CA = CF (त्रिज्याएँ)। अतः RHS सर्वांगसमता प्रतिबंध द्वारा ΔCEA ≅ ΔCHF है, जिससे CE = CH सिद्ध होता है।
प्रमेय 7 (Theorem): वृत्त के केंद्र से समदूरस्थ जीवाएँ समान लंबाई की होती हैं। (यह प्रमेय 6 का विलोम है)
दो असमान जीवाओं में से कौन-सी केंद्र से अधिक दूरी पर है?
प्रमेय 8 (Theorem): मान लीजिए AB और DE एक वृत्त की जीवाएँ हैं, जिसका केंद्र C है। यदि AB > DE है, तो C से AB की दूरी, C से DE की दूरी से कम होगी। अर्थात लंबी जीवा केंद्र के अधिक निकट होती है।
दिया गया है: AB > DE; CF ⊥ AB और CG ⊥ DE। सिद्ध करना है: CF < CG।
उपपत्ति: AC और CD दोनों त्रिज्याएँ हैं, इसलिए AC = CD। बौधायन-पाइथागोरस प्रमेय द्वारा CD2 = CG2 + GD2 तथा AC2 = CF2 + AF2। चूँकि AC = CD, इसलिए CF2 + AF2 = CG2 + GD2। अब AB > DE है, इसलिए AF > GD (क्योंकि F, G क्रमशः AB, DE के मध्यबिंदु हैं)। चूँकि AF2 > GD2, इसलिए CF2 < CG2, अर्थात CF < CG।
टिप्पणी: केंद्र से सबसे निकट जीवा वह होती है जो स्वयं केंद्र से होकर गुजरे — इसकी केंद्र से दूरी शून्य होती है, इसलिए व्यास वृत्त की सबसे बड़ी जीवा होता है। इसके विपरीत यदि जीवा को केंद्र से दूर धकेला जाता रहे, तो अंततः वह एक बिंदु के समान हो जाती है, जिसकी लंबाई शून्य और केंद्र से दूरी त्रिज्या के बराबर होती है।
ध्यान दें: यदि जीवा की केंद्र से लंबवत दूरी d हो और त्रिज्या r हो, तो जीवा की लंबाई = 2√(r2 − d2) होती है।
वृत्त के चाप द्वारा अंतरित कोण
चाप (Arc): वृत्त का एक संबद्ध भाग जो वृत्त पर दो बिंदुओं (अंत्य बिंदुओं) और उन्हें परिधि के अनुदिश जोड़ने वाले वक्र से बनता है। दो बिंदुओं A, B के बीच दो मार्ग होते हैं — बड़ा मार्ग दीर्घ चाप (major arc) और छोटा मार्ग लघु चाप (minor arc) कहलाता है।
चाप AB द्वारा केंद्र पर अंतरित कोण, ∠AOB की उस माप के बराबर होता है जो हमें चाप के अनुदिश OA से OB तक बढ़ने पर मिलती है। लघु चाप, ∠AOB (180° से कम) अंतरित करता है, जबकि दीर्घ चाप, 180° से अधिक का प्रतिवर्ती कोण (reflex angle) अंतरित करता है।
चाप द्वारा वृत्त के बाहरी बिंदु पर अंतरित कोण:
‘चाप AXB द्वारा वृत्त की परिधि के किसी बिंदु C (जो चाप AXB के बाहर हो) पर अंतरित कोण’ से तात्पर्य ∠ACB से है। यह उल्लेखनीय है कि इस कोण की माप इस बात पर निर्भर नहीं करती कि हम बिंदु C को कौन-सा विशेष बिंदु चुनते हैं, बशर्ते वह चाप के बाहर वृत्त पर ही स्थित हो।
प्रमेय 9 (Theorem): वृत्त के किसी चाप द्वारा केंद्र पर अंतरित कोण, उस चाप के बाहर वृत्त के शेष भाग के किसी भी बिंदु पर अंतरित कोण का दोगुना होता है।
दिया गया है: AFB एक चाप है; ∠ACB इस चाप द्वारा केंद्र C पर अंतरित कोण है; D, चाप AFB के बाहर वृत्त पर स्थित एक बिंदु है। सिद्ध करना है: ∠BCA = 2∠BDA।
उपपत्ति (स्थिति 1 — DC को बढ़ाने पर वह चाप AFB के अंदर बिंदु E पर मिलता है): D को C से मिलाकर DC को आगे बढ़ाइए ताकि यह चाप AFB को बिंदु E पर काटे। ΔDCB समद्विबाहु है (CB = CD), अतः ∠CBD = ∠CDB। बहिष्कोण प्रमेय (exterior angle theorem) से, ∠BCE (ΔBCD का बहिष्कोण) = ∠CBD + ∠CDB = 2∠BDC। इसी प्रकार ΔADC भी समद्विबाहु है (CA = CD), इसलिए ∠CAD = ∠CDA, और ∠ACE = ∠CAD + ∠CDA = 2∠CDA। अब चूँकि ∠BCA = ∠BCE + ∠ECA और ∠BDA = ∠BDC + ∠CDA, इसलिए ∠BCA = 2(∠BDC + ∠CDA) = 2∠BDA।
उपपत्ति (स्थिति 2 — DC को बढ़ाने पर वह चाप AFB के बाहर बिंदु E पर मिलता है): इस स्थिति में फिर से समद्विबाहु त्रिभुजों के गुणों का उपयोग होता है। ∠ACE = ∠ADC + ∠CAD = 2∠ADC (क्योंकि CA = CD)। इसी प्रकार ∠BCE = ∠BDC + ∠CBD = 2∠BDC। अब ∠ACB = ∠ACE − ∠BCE और ∠ADB = ∠ADC − ∠BDC है, इसलिए घटाने पर ∠ACB = 2∠ADB प्राप्त होता है। इस प्रकार दोनों ही स्थितियों में प्रमेय सिद्ध होता है।
इस प्रमेय से एक बहुत रोचक तथ्य निकलता है — चाप AB के बाहर वृत्त पर स्थित किसी भी बिंदु D पर ∠ADB का मान समान रहता है, चाहे D कहीं भी हो। अर्थात एक ही चाप के बाहर स्थित सभी बिंदुओं पर ∠AEB = ∠ADB = ∠AFB = ½∠ACB।
उपप्रमेय (Corollary): व्यास द्वारा वृत्त के किसी भी बिंदु पर अंतरित कोण 90° होता है।
उपपत्ति: मान लीजिए AB एक व्यास है और D वृत्त पर स्थित कोई बिंदु है (जो चाप पर नहीं है)। A से B तक D को छोड़कर बचे हुए चाप द्वारा केंद्र C पर अंतरित कोण ∠ACB एक ऋजु कोण (straight angle), अर्थात 180°, होता है (क्योंकि AB व्यास है)। प्रमेय 9 के अनुसार ∠ADB = ½ × 180° = 90°।
यही तथ्य कि एक ही चाप (या वृत्तखंड) में बने सभी कोण समान होते हैं, वृत्त को अन्य सभी आकृतियों से अलग करने वाला एक विशिष्ट गुण है।
बिंदुओं की संवृत्तीयता (Concyclicity)
जो बिंदु एक ही वृत्त पर स्थित होते हैं, उन्हें संवृत्तीय (concyclic) बिंदु कहते हैं।
प्रमेय 10 (Theorem): यदि दो बिंदुओं A व B को जोड़ने वाला रेखाखंड AB, उसी रेखा के एक ही ओर स्थित दो अन्य बिंदुओं C व D पर समान कोण अंतरित करता है (∠ACB = ∠ADB), तो चारों बिंदु A, B, C, D एक ही वृत्त पर स्थित होते हैं।
उपपत्ति (संक्षेप में): चूँकि A, B, C असंरेखीय हैं, प्रमेय 1 के अनुसार इनसे होकर एक वृत्त गुजरता है। यदि D इस वृत्त पर न हो, तो वह या तो वृत्त के अंदर होगा या बाहर। दोनों ही स्थितियों में, AD को बढ़ाने पर वह वृत्त को E पर काटता है, और चूँकि C, E एक ही वृत्तखंड में हैं, इसलिए ∠ACB = ∠AEB। यदि D बाहर है तो ∠AEB, ΔBED का बहिष्कोण होने से ∠AEB > ∠ADB होगा, जिससे ∠ACB > ∠ADB मिलता है — परंतु यह दिए गए ∠ACB = ∠ADB का खंडन करता है। इसी प्रकार D को अंदर मानने पर भी विरोधाभास मिलता है। अतः D अवश्य ही वृत्त पर स्थित होगा, अर्थात A, B, C, D संवृत्तीय हैं।
जब किसी चतुर्भुज के शीर्ष संवृत्तीय होते हैं, तो उसे चक्रीय चतुर्भुज (cyclic quadrilateral) कहते हैं।
प्रमेय 11 (Theorem): चक्रीय चतुर्भुज के सम्मुख (opposite) कोणों का योगफल 180° होता है।
दिया गया है: A, B, C, D एक चक्रीय चतुर्भुज के शीर्ष हैं, जिसका केंद्र O है। सिद्ध करना है: ∠BAD + ∠BCD = 180°।
उपपत्ति: चाप BCD पर विचार करें — बिंदु A इस चाप के बाहर है, इसलिए प्रमेय 9 के अनुसार ∠BAD, चाप BCD द्वारा केंद्र पर अंतरित कोण (प्रतिवर्ती कोण BOD) का आधा है, अर्थात ∠BAD = ½ (प्रतिवर्ती ∠BOD)। इसी प्रकार ∠BCD, चाप BAD द्वारा केंद्र पर अंतरित कोण ∠BOD का आधा है, अर्थात ∠BCD = ½∠BOD। दोनों को जोड़ने पर, ∠BAD + ∠BCD = ½ × (केंद्र O पर संपूर्ण कोण) = ½ × 360° = 180°। इस प्रमेय का विलोम भी सत्य है।
प्रमेय 12 (Theorem): यदि किसी चतुर्भुज के सम्मुख कोणों का एक युग्म 180° का हो, तो उसके शीर्ष संवृत्तीय होते हैं, अर्थात वह चतुर्भुज चक्रीय होता है। (यह प्रमेय 11 का विलोम है)
उपपत्ति (संक्षेप में): मान लीजिए ABCD चक्रीय नहीं है। चूँकि A, D, B असंरेखीय हैं, इनसे होकर एक वृत्त गुजरता है। यदि यह वृत्त C से होकर न गुजरे, तो मान लें कि CD, वृत्त को E पर मिलता है। तब ABED चक्रीय होने से प्रमेय 11 द्वारा ∠BAD + ∠BED = 180°। परंतु दिया गया है कि ∠BAD + ∠DCB = 180° भी है, इसलिए ∠BCD = ∠BED होगा। किंतु यह असंभव है क्योंकि ∠BED, ΔBEC का बहिष्कोण होने से ∠BCE (अर्थात ∠BCD) से बड़ा होना चाहिए। अतः यह मान लेना गलत था कि वृत्त C से नहीं गुजरता — इसलिए A, B, C, D सभी एक ही वृत्त पर स्थित हैं।
सभी प्रमेयों का सारांश
| प्रमेय 1 | तीन असंरेखीय बिंदुओं से होकर जाने वाला वृत्त अद्वितीय होता है (परिवृत्त)। |
| प्रमेय 2 | समान जीवाएँ केंद्र पर समान कोण अंतरित करती हैं। |
| प्रमेय 3 | केंद्र पर समान कोण अंतरित करने वाली जीवाएँ समान होती हैं (विलोम)। |
| प्रमेय 4 | केंद्र से जीवा के मध्यबिंदु तक की रेखा, जीवा पर लंब होती है। |
| प्रमेय 5 | केंद्र से जीवा पर खींचा गया लंब, जीवा को समद्विभाजित करता है (विलोम)। |
| प्रमेय 6 | समान लंबाई की जीवाएँ केंद्र से समदूरस्थ होती हैं। |
| प्रमेय 7 | केंद्र से समदूरस्थ जीवाएँ समान लंबाई की होती हैं (विलोम)। |
| प्रमेय 8 | दो असमान जीवाओं में लंबी जीवा केंद्र के अधिक निकट होती है। |
| प्रमेय 9 | चाप द्वारा केंद्र पर अंतरित कोण, शेष वृत्त के किसी बिंदु पर अंतरित कोण का दोगुना होता है। |
| उपप्रमेय | व्यास द्वारा वृत्त पर किसी बिंदु पर अंतरित कोण 90° होता है। |
| प्रमेय 10 | समान कोण अंतरित करने वाले चार बिंदु संवृत्तीय होते हैं। |
| प्रमेय 11 | चक्रीय चतुर्भुज के सम्मुख कोणों का योग 180° होता है। |
| प्रमेय 12 | सम्मुख कोणों का योग 180° होने पर चतुर्भुज चक्रीय होता है (विलोम)। |
महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Revision)
- वृत्त = समतल पर किसी स्थिर बिंदु (केंद्र) से समान दूरी (त्रिज्या) पर स्थित सभी बिंदुओं का समूह।
- वृत्त में केंद्र के सापेक्ष हर कोण पर पूर्ण घूर्णन सममिति होती है, और हर व्यास परावर्तन सममिति की रेखा होती है।
- दो बिंदुओं से अनंत वृत्त गुजर सकते हैं (केंद्र लंब समद्विभाजक पर); तीन असंरेखीय बिंदुओं से केवल एक ही वृत्त (परिवृत्त) गुजरता है।
- व्यास वृत्त की सबसे बड़ी जीवा है; जीवा की केंद्र से दूरी d और त्रिज्या r हो तो जीवा की लंबाई = 2√(r2 − d2)।
- लघु चाप केंद्र पर 180° से कम कोण अंतरित करता है, दीर्घ चाप 180° से अधिक।
- चाप द्वारा केंद्र पर अंतरित कोण = 2 × (उसी चाप द्वारा वृत्त के बाहरी बिंदु पर अंतरित कोण)।
- अर्धवृत्त (व्यास) में बना कोण सदैव 90° होता है।
- चक्रीय चतुर्भुज में सम्मुख कोणों का योग सदैव 180° होता है, और यह प्रतिबंध ही चतुर्भुज के चक्रीय होने की पहचान भी है।
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