Skip to content
Criss Cross ClassesCriss Cross ClassesOur Content is Our Power
Menu
  • Home
  • CBSE
    • Hindi Medium
      • Class 9
      • Class 10
      • Class 11
      • Class 12
    • English Medium
      • Class 9
      • Class 10
      • Class 11
      • Class 12
  • State Board
    • UP Board (UPMSP)
      • Hindi Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
      • English Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
    • Bihar Board (BSEB)
      • Hindi Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
      • English Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
    • Chhattisgarh Board (CGBSE)
      • Hindi Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
      • English Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
    • Haryana Board (HBSE)
      • Hindi Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
      • English Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
    • Jharkhand Board (JAC)
      • Hindi Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
      • English Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
    • Uttarakhand Board (UBSE)
      • Hindi Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
      • English Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
    • Madhya Pradesh Board (MPBSE)
      • Hindi Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
      • English Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
    • Punjab Board (PSEB)
      • Hindi Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
      • English Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
    • Rajasthan Board (RBSE)
      • Hindi Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
      • English Medium
        • Class 9
        • Class 10
        • Class 11
        • Class 12
  • Contact us
  • About us
Menu
Class 9 Science Chapter 8 एक यात्रा — परमाणु के भीतर Notes in Hindi

एक यात्रा — परमाणु के भीतर Notes || Class 9 Science Chapter 8 in Hindi ||

Posted on August 17, 2026 by

पाठ – 8

एक यात्रा — परमाणु के भीतर

In this post we have given the detailed notes of class 9 Science chapter 8 Journey Inside the Atom in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.

इस पोस्ट में कक्षा 9 के विज्ञान के पाठ 8 एक यात्रा — परमाणु के भीतर  के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं विज्ञान विषय पढ़ रहे है।

BoardCBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board
TextbookNCERT — Exploration / अन्वेषण (2026-27)
ClassClass 9
SubjectScience
Chapter no.Chapter 8
Chapter Nameएक यात्रा — परमाणु के भीतर (Journey Inside the Atom)
CategoryClass 9 Science Notes in Hindi
MediumHindi
Class 9 Science Chapter 8 एक यात्रा — परमाणु के भीतर (Journey Inside the Atom) Notes in Hindi
Explore the topics
पाठ – 8
एक यात्रा — परमाणु के भीतर
पाठ 8, एक यात्रा — परमाणु के भीतर
परमाणु सिद्धांत की उत्पत्ति और डाल्टन का सिद्धांत
परमाणु मॉडलों की ऐतिहासिक यात्रा
इलेक्ट्रॉन की खोज (Discovery of Electron):
टॉमसन का परमाणु मॉडल — प्लम पुडिंग मॉडल (Thomson’s Model / Plum Pudding Model):
टॉमसन मॉडल का परीक्षण — स्वर्ण पर्णिका प्रयोग (Gold Foil Experiment):
रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल — नाभिकीय/ग्रहीय मॉडल (Rutherford’s Nuclear/Planetary Model):
रदरफोर्ड मॉडल की सीमाएँ (Limitations of Rutherford’s Model):
प्रोटॉन की खोज (Discovery of Proton):
बोर का परमाणु मॉडल (Bohr’s Model of Atom):
तीनों परमाणु मॉडलों की तुलना
न्यूट्रॉन की खोज और अवपरमाणुक कण
तीन अवपरमाणुक कणों की तुलना
तत्वों के प्रतीक
परमाणु क्रमांक और द्रव्यमान संख्या
परमाणु क्रमांक (Atomic Number):
द्रव्यमान संख्या (Mass Number):
इलेक्ट्रॉनों का विभिन्न ऊर्जा स्तरों में वितरण
संयोजकता (Valency)
समस्थानिक (Isotopes)
औसत परमाणु द्रव्यमान (Average Atomic Mass):
समभारिक (Isobars)
महत्वपूर्ण बिंदु (At a Glance)

पाठ 8, एक यात्रा — परमाणु के भीतर

परमाणु सिद्धांत की उत्पत्ति और डाल्टन का सिद्धांत

लगभग 2,000 वर्ष पूर्व प्राचीन भारत और प्राचीन ग्रीस के विचारकों ने इस प्रश्न पर चिंतन किया था कि पदार्थ अंततः किससे बना है।

  • आचार्य कणाद (भारत): इन्होंने बताया कि यदि पदार्थ (द्रव्य) को बार-बार विभाजित किया जाए तो अंततः ऐसे सूक्ष्मतम कण प्राप्त होंगे जिन्हें और विभाजित नहीं किया जा सकता। इन्होंने इन कणों को परमाणु (Parmanu) कहा। इनके विचार संस्कृत ग्रंथ वैशेषिक सूत्र में दर्ज हैं। दो परमाणुओं के समूह को द्वय और तीन परमाणुओं के समूह को त्रय कहा गया।
  • लियुसीपस और डेमोक्रिटस (ग्रीस): इन्होंने भी ऐसे ही अविभाज्य कणों को एटोमॉस (Atomos) नाम दिया, जिसका ग्रीक में अर्थ है — अविभाज्य।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि उस समय ‘परमाणु’ की अवधारणा एक काल्पनिक विचार थी, प्रायोगिक अवलोकन पर आधारित नहीं थी।

जॉन डाल्टन का परमाणु सिद्धांत (John Dalton’s Atomic Theory): वर्ष 1808 में डाल्टन ने वैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर अपना परमाणु सिद्धांत प्रस्तुत किया। इनके अनुसार सभी द्रव्य अविभाज्य सूक्ष्म कणों — परमाणुओं से बने हैं, जो पदार्थ के मूल निर्माण खंड हैं और जिन्हें और छोटे कणों में विभाजित नहीं किया जा सकता। यह द्रव्य की संरचना का प्रथम वैज्ञानिक विवरण था और आधुनिक परमाणु संरचना की समझ का प्रारंभिक बिंदु बना।

परमाणु मॉडलों की ऐतिहासिक यात्रा

19वीं शताब्दी के अंत तक परमाणु को पदार्थ की सबसे छोटी अविभाज्य इकाई माना जाता था। परंतु वैज्ञानिकों ने पाया कि कुछ तत्व अदृश्य ऊर्जा और कण उत्सर्जित करते हैं, जिसे रेडियोधर्मिता (Radioactivity) कहा गया। इससे सिद्ध हुआ कि परमाणु और भी सूक्ष्म कणों से मिलकर बना है, अर्थात वह अविभाज्य नहीं है।

इलेक्ट्रॉन की खोज (Discovery of Electron):

वर्ष 1897 में जे. जे. टॉमसन (J. J. Thomson) ने अति निम्न दाब पर गैसों में विद्युत धारा के चालन का अध्ययन किया। इन्होंने एक काँच की नली (कैथोड किरण नलिका) में दो इलेक्ट्रोड लगाकर उच्च वोल्टता प्रवाहित की और देखा कि किरणें कैथोड (ऋणावेशित इलेक्ट्रोड) से ऐनोड (धनावेशित इलेक्ट्रोड) की ओर गमन कर रही हैं। इन्हें कैथोड किरणें कहा गया। विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्र में इनके अध्ययन से टॉमसन इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ये ऋणावेशित कणों की धाराएँ हैं, जिनका द्रव्यमान परमाणु से बहुत कम है। इन कणों को इलेक्ट्रॉन (Electron) कहा गया। कैथोड किरणों की प्रकृति कैथोड के पदार्थ और नली में भरी गैस पर निर्भर नहीं करती — इससे सिद्ध हुआ कि इलेक्ट्रॉन सभी परमाणुओं का मूल घटक है। एक इलेक्ट्रॉन पर आवेश (−1.602 × 10⁻¹⁹ C) होता है, जिसे परिपाटी के अनुसार −1 माना जाता है। इस खोज के लिए टॉमसन को वर्ष 1906 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला।

टॉमसन का परमाणु मॉडल — प्लम पुडिंग मॉडल (Thomson’s Model / Plum Pudding Model):

इलेक्ट्रॉन की खोज के बाद टॉमसन के सामने एक पहेली थी — यदि परमाणु उदासीन (neutral) है, तो उसमें धनावेश कहाँ है? इसके समाधान हेतु टॉमसन ने प्रस्तावित किया कि परमाणु धनात्मक आवेश का एक गोला है, जिसमें इलेक्ट्रॉन समान रूप से वितरित होते हैं। इस मॉडल की तुलना पुडिंग में धँसे प्लम्स (सूखे मेवे) से की गई, इसलिए इसे प्लम पुडिंग मॉडल कहा गया। इसे तरबूज के उदाहरण से भी समझाया जाता है — जहाँ लाल गूदा धनावेश और बीज इलेक्ट्रॉनों को दर्शाते हैं। यह परमाणु में धन और ऋण आवेश के संतुलन को समझाने का प्रथम सार्थक प्रयास था।

टॉमसन मॉडल का परीक्षण — स्वर्ण पर्णिका प्रयोग (Gold Foil Experiment):

वर्ष 1911 में गाइगर और मार्सडेन ने, जो अर्न्स्ट रदरफोर्ड (Ernest Rutherford) के निर्देशन में कार्य कर रहे थे, टॉमसन के मॉडल की जाँच के लिए एक प्रयोग किया, जो स्वर्ण पर्णिका प्रयोग (Gold Foil Experiment) के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसमें अत्यंत पतली स्वर्ण पर्णिका (gold foil) पर धनावेशित अल्फा (α) कणों — जो कि हीलियम परमाणु के नाभिक होते हैं, जिनमें दो प्रोटॉन और दो न्यूट्रॉन होते हैं — के संकीर्ण किरणपुंज की बौछार की गई।

टॉमसन के मॉडल के अनुसार परमाणु में धनावेश समान रूप से फैला होता है, अतः अपेक्षा थी कि अल्फा कण सीधे पार निकल जाएँगे या बहुत कम विक्षेपित होंगे। परंतु परिणाम आश्चर्यजनक थे —

  • अधिकांश अल्फा कण बिना विक्षेपित हुए पर्णिका के आर-पार निकल गए।
  • कुछ कण बड़े कोण पर विक्षेपित (deflect) हुए।
  • बहुत कम कण सीधे वापस लौट आए।

सीधे मार्ग से इस विक्षेपण को प्रकीर्णन (Scattering) कहा गया, इसलिए इस प्रयोग को α-किरण प्रकीर्णन प्रयोग भी कहते हैं। टॉमसन का मॉडल इन परिणामों की व्याख्या करने में पूरी तरह विफल रहा।

रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल — नाभिकीय/ग्रहीय मॉडल (Rutherford’s Nuclear/Planetary Model):

स्वर्ण पर्णिका प्रयोग के परिणामों से रदरफोर्ड ने निष्कर्ष निकाला कि परमाणु का धनावेश पूरे क्षेत्र में फैला नहीं होता बल्कि एक अत्यंत सूक्ष्म क्षेत्र में केंद्रित होता है, जिसे नाभिक (Nucleus) कहते हैं। इन्होंने प्रस्तावित किया कि —

  • परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त (खाली) स्थान है, क्योंकि अधिकतर अल्फा कण बिना विक्षेपित हुए पार निकल गए।
  • नाभिक सघन (dense) है, जिसमें संपूर्ण धनावेश और परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान विद्यमान होता है।
  • इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर उसी प्रकार घूमते हैं जैसे ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं — इसीलिए इसे ग्रहीय मॉडल (Planetary Model) भी कहा जाता है।

रदरफोर्ड ने परिकलन किया कि नाभिक, परमाणु से लगभग 10⁵ (एक लाख) गुना छोटा होता है। परमाणु का व्यास लगभग 10⁻¹⁰ m और नाभिक का व्यास लगभग 10⁻¹⁵ m होता है — जैसे यदि परमाणु एक क्रिकेट मैदान जितना बड़ा हो तो नाभिक उसके केंद्र में काली मिर्च के एक दाने जितना होगा।

रदरफोर्ड मॉडल की सीमाएँ (Limitations of Rutherford’s Model):

रदरफोर्ड का मॉडल स्वर्ण पर्णिका प्रयोग के परिणामों को टॉमसन के मॉडल से बेहतर समझा पाया, परंतु यह परमाणु के स्थायित्व (Stability) को नहीं समझा सका। जब कोई आवेशित कण वृत्ताकार पथ में गति करता है तो उसकी दिशा निरंतर बदलती रहती है, अर्थात वह त्वरित (accelerate) होता है। त्वरित होने वाला आवेशित कण ऊर्जा उत्सर्जित करता है। यदि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर त्वरित होता रहे तो उसे लगातार ऊर्जा खोनी चाहिए, जिससे वह सर्पिल पथ (spiral path) में घूमते हुए अंततः धनावेशित नाभिक में गिर जाना चाहिए। ऐसा होने पर परमाणु का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता, जबकि वास्तव में परमाणु स्थायी होते हैं। इसलिए इलेक्ट्रॉन नाभिक में बिना गिरे किस प्रकार गतिशील रहते हैं — इसकी नई व्याख्या आवश्यक थी।

प्रोटॉन की खोज (Discovery of Proton):

रदरफोर्ड ने दर्शाया कि नाभिक में उपस्थित कण, जिन्हें प्रोटॉन (Proton) कहते हैं, धनावेश के लिए उत्तरदायी हैं। प्रोटॉन का द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन से बहुत अधिक होता है और इस पर इलेक्ट्रॉन के बराबर परंतु विपरीत आवेश होता है। किसी परमाणु के विद्युत उदासीन (neutral) होने के लिए उसमें प्रोटॉनों की संख्या इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होनी चाहिए — जैसे हीलियम परमाणु में 2 प्रोटॉन व 2 इलेक्ट्रॉन, और सोडियम परमाणु में 11 प्रोटॉन व 11 इलेक्ट्रॉन होते हैं।

बोर का परमाणु मॉडल (Bohr’s Model of Atom):

परमाणु के स्थायित्व को समझाने के लिए नील्स बोर (Niels Bohr) ने वर्ष 1913 में एक नया परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया। बोर के अनुसार —

  • इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर यादृच्छिक रूप से नहीं, बल्कि निश्चित वृत्ताकार पथों में गति करते हैं, जिन्हें स्थायी अवस्थाएँ, कक्षाएँ अथवा कोश (Shells) कहा जाता है। प्रत्येक कोश में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा निश्चित होती है, इसलिए इन्हें ऊर्जा स्तर (Energy Levels) भी कहते हैं।
  • इन कोशों को अक्षरों K, L, M, N … से अथवा संख्याओं n = 1, 2, 3, 4 … से प्रदर्शित किया जाता है।
  • इलेक्ट्रॉन केवल इन्हीं अनुमत कोशों में गति कर सकते हैं, कोशों के बीच में नहीं; इस निश्चित कोश में गति करते हुए इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का ह्रास नहीं करता।
  • K-कोश (n = 1) नाभिक के सबसे निकट होता है और इसकी ऊर्जा सबसे कम होती है। नाभिक से जितना दूर कोश होगा, उसकी ऊर्जा उतनी ही अधिक होगी।
  • इलेक्ट्रॉन दो कोशों की ऊर्जा के अंतर के बराबर निश्चित मात्रा में ऊर्जा अवशोषित या उत्सर्जित करके एक कोश से दूसरे कोश में जा सकता है।
  • प्रत्येक कोश में इलेक्ट्रॉनों की एक निश्चित अधिकतम संख्या ही समा सकती है।

बोर ने स्थायी अवस्थाओं (Stationary States) की अवधारणा को एक अभिगृहीत (postulate) के रूप में प्रस्तुत किया — इसके अनुसार स्थायी कक्षा में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा स्थिर रहती है, भले ही वह नाभिक के चारों ओर गति कर रहा हो। इसी कारण इलेक्ट्रॉन ऊर्जा खोए बिना नाभिक के चारों ओर गति करता रहता है और परमाणु स्थायी बना रहता है। इस मॉडल के लिए नील्स बोर को वर्ष 1922 में नोबेल पुरस्कार मिला। (कोशों को K अक्षर से नामकरण भौतिकशास्त्री चार्ल्स बार्कला के X-किरण प्रयोगों से जुड़ा है, जिन्होंने प्रथम रेखा को K नाम दिया था।)

बाद में बोर के मॉडल की भी सीमाएँ पाई गईं, जिसके बाद क्वांटम यांत्रिकीय मॉडल (Quantum Mechanical Model) प्रस्तावित किया गया — इसमें इलेक्ट्रॉन निश्चित पथ पर नहीं, बल्कि नाभिक के चारों ओर ‘इलेक्ट्रॉन अभ्र (Electron Cloud)’ के रूप में पाए जाते हैं, जिसकी विस्तृत जानकारी उच्च कक्षाओं में पढ़ाई जाती है।

तीनों परमाणु मॉडलों की तुलना

बिंदुटॉमसन का मॉडलरदरफोर्ड का मॉडलबोर का मॉडल
वर्ष190419111913
प्रस्तावनापरमाणु धनावेश का एक गोला है जिसमें इलेक्ट्रॉन समान रूप से धँसे हैं (प्लम पुडिंग मॉडल)धनावेश व अधिकांश द्रव्यमान अत्यंत सूक्ष्म नाभिक में केंद्रित; इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर परिक्रमा करते हैं (ग्रहीय मॉडल)इलेक्ट्रॉन निश्चित ऊर्जा वाले कोशों (K, L, M, N) में परिक्रमा करते हैं
आधारित प्रयोग/तथ्यकैथोड किरण नलिका द्वारा इलेक्ट्रॉन की खोजस्वर्ण पर्णिका (α-कण प्रकीर्णन) प्रयोगपरमाणु के स्थायित्व की व्याख्या हेतु स्थायी अवस्थाओं की अवधारणा
मुख्य कमीअल्फा कणों के बड़े कोण पर विक्षेपण को नहीं समझा सकापरमाणु के स्थायित्व को नहीं समझा सका (इलेक्ट्रॉन नाभिक में गिर जाना चाहिए था)बाद में यह भी पूर्णतः सही नहीं पाया गया; क्वांटम मॉडल की आवश्यकता पड़ी

न्यूट्रॉन की खोज और अवपरमाणुक कण

रदरफोर्ड के मॉडल के अनुसार परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान नाभिक में केंद्रित होता है, इलेक्ट्रॉन इतने हल्के होते हैं कि उनके द्रव्यमान की उपेक्षा की जा सकती है। परंतु एक समस्या थी — हाइड्रोजन परमाणु में एक प्रोटॉन होता है जबकि हीलियम परमाणु में दो प्रोटॉन होते हैं, फिर भी हीलियम का द्रव्यमान हाइड्रोजन से चार गुना अधिक है, दोगुना नहीं। इससे वैज्ञानिकों को संदेह हुआ कि नाभिक में प्रोटॉन के अतिरिक्त कोई और कण भी है, जो आवेश को प्रभावित किए बिना द्रव्यमान बढ़ाता है।

वर्ष 1932 में जेम्स चैडविक (James Chadwick), जो रदरफोर्ड के छात्र थे, ने इस समस्या को सुलझाया। इन्होंने एक नए अवपरमाणुक कण की खोज की, जिसका द्रव्यमान लगभग प्रोटॉन के बराबर था परंतु इस पर कोई आवेश नहीं था। इस उदासीन कण को न्यूट्रॉन (Neutron) कहा गया और इसे प्रतीक ‘n’ से दर्शाया जाता है। न्यूट्रॉन हाइड्रोजन को छोड़कर सभी परमाणुओं के नाभिक में पाए जाते हैं। इसी खोज के लिए चैडविक को वर्ष 1935 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। न्यूट्रॉन नाभिक के भीतर प्रोटॉनों के बीच की दूरी बढ़ाकर उनके पारस्परिक प्रतिकर्षण को कम करते हैं और नाभिकीय बल (Nuclear Force) को प्रबल बनाते हैं, जिससे भारी परमाणुओं में अधिक न्यूट्रॉनों की आवश्यकता होती है (जैसे आयरन में 26 प्रोटॉन व 30 न्यूट्रॉन, यूरेनियम में 92 प्रोटॉन व 146 न्यूट्रॉन)।

तीन अवपरमाणुक कणों की तुलना

अवपरमाणुक कणप्रतीकआपेक्षिक आवेशस्थान
इलेक्ट्रॉन (Electron)e⁻−1नाभिक के चारों ओर कोशों/ऊर्जा स्तरों में परिक्रमा करता है
प्रोटॉन (Proton)p⁺+1नाभिक के भीतर
न्यूट्रॉन (Neutron)n⁰0नाभिक के भीतर (हाइड्रोजन में अनुपस्थित)

तत्वों के प्रतीक

जॉन डाल्टन ने वर्ष 1803 में तत्वों को दर्शाने के लिए प्रथम चित्रात्मक प्रतीक बनाए। वर्ष 1813 में बर्जीलियस (Berzelius) ने सुझाव दिया कि तत्वों के प्रतीक उनके लैटिन नामों से लिए जाने चाहिए, जिससे अक्षरों वाले रासायनिक प्रतीकों का आरंभ हुआ। वर्तमान में IUPAC (International Union of Pure and Applied Chemistry) तत्वों के नामों और प्रतीकों की स्वीकृति देता है। कुछ नियम इस प्रकार हैं —

  • अनेक प्रतीक तत्व के नाम के प्रथम अक्षर अथवा प्रथम दो अक्षरों से बनते हैं।
  • प्रतीक का प्रथम अक्षर सदैव बड़ा (capital) और दूसरा अक्षर छोटा (small) लिखा जाता है — जैसे हाइड्रोजन (H), ऐलुमिनियम (Al), कोबाल्ट (Co)।
  • कुछ प्रतीक नाम के प्रथम अक्षर व किसी अन्य अक्षर से बनते हैं — जैसे क्लोरीन (Cl), जिंक (Zn)।
  • कुछ प्रतीक लैटिन, ग्रीक या जर्मन नामों से लिए गए हैं — जैसे आयरन का प्रतीक Fe (लैटिन: फेरम), मर्करी का Hg (ग्रीक: हाइड्रेगेईरोस), टंगस्टन का W (जर्मन: वोल्फ्राम)।

परमाणु क्रमांक और द्रव्यमान संख्या

परमाणु क्रमांक (Atomic Number):

किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या उसका परमाणु क्रमांक कहलाती है, इसे संकेत Z से दर्शाया जाता है। चूँकि परमाणु उदासीन होता है, इसलिए इसमें प्रोटॉनों की संख्या इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है। उदाहरण — हाइड्रोजन का परमाणु क्रमांक 1 (1 प्रोटॉन, 1 इलेक्ट्रॉन), हीलियम का 2 (2 प्रोटॉन, 2 इलेक्ट्रॉन)। परमाणु क्रमांक ही किसी तत्व की विशिष्ट पहचान और उसका रासायनिक व्यवहार निर्धारित करता है।

द्रव्यमान संख्या (Mass Number):

परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों की कुल संख्या को द्रव्यमान संख्या कहते हैं, इसे संकेत A से दर्शाया जाता है। प्रोटॉन और न्यूट्रॉन को सम्मिलित रूप से न्यूक्लिऑन (Nucleons) कहा जाता है।

द्रव्यमान संख्या (A) = प्रोटॉनों की संख्या + न्यूट्रॉनों की संख्या

इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान नगण्य होने के कारण गणना में इसे उपेक्षित किया जाता है। मानक संकेतन में तत्व को इस प्रकार लिखा जाता है — द्रव्यमान संख्या ऊपर व परमाणु क्रमांक नीचे, संकेत के साथ। उदाहरण — कार्बन को ¹²₆C लिखा जाता है, जहाँ परमाणु क्रमांक 6 और द्रव्यमान संख्या 12 है।

तत्वप्रोटॉन (p⁺)न्यूट्रॉन (n⁰)द्रव्यमान संख्या (A)
हाइड्रोजन101
हीलियम224
लीथियम347

इलेक्ट्रॉनों का विभिन्न ऊर्जा स्तरों में वितरण

बोर और बरी (Bohr and Bury) ने इलेक्ट्रॉन वितरण के लिए निम्नलिखित नियम सुझाए —

  • किसी कोश में समा सकने वाले इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या सूत्र 2n² से दी जाती है, जहाँ n कोश की संख्या है। अतः K-कोश (n=1) में 2, L-कोश (n=2) में 8, तथा M-कोश (n=3) में 18 इलेक्ट्रॉन समा सकते हैं।
  • सबसे बाह्यतम कोश में अधिकतम 8 इलेक्ट्रॉन ही समा सकते हैं (प्रथम कोश में अधिकतम 2)।
  • इलेक्ट्रॉन क्रमबद्ध रूप से नाभिक के निकटतम कोश से आरंभ करके बाहर की ओर भरे जाते हैं, अर्थात K, L, M, N … के क्रम में — जब तक भीतरी कोश पूर्ण न हो जाए, अगला कोश नहीं भरा जाता।

विभिन्न कोशों में इलेक्ट्रॉनों के इस वितरण को परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configuration) कहते हैं। नीचे पहले अठारह तत्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास दिया गया है —

तत्वप्रतीकपरमाणु क्रमांकKLM
हाइड्रोजनH11––
हीलियमHe22––
लीथियमLi321–
बेरिलियमBe422–
बोरॉनB523–
कार्बनC624–
नाइट्रोजनN725–
ऑक्सीजनO826–
फ्लुओरीनF927–
निऑनNe1028–
सोडियमNa11281
मैग्नीशियमMg12282
ऐलुमिनियमAl13283
सिलिकॉनSi14284
फॉस्फोरसP15285
सल्फरS16286
क्लोरीनCl17287
आर्गनAr18288

संयोजकता (Valency)

हाइड्रोजन या क्लोरीन के उन परमाणुओं की संख्या, जिनके साथ किसी तत्व का एक परमाणु संयोजित होकर यौगिक बना सकता है, उसे उस तत्व की संयोजन क्षमता कहते हैं। उदाहरण — H₂O (जल) में ऑक्सीजन दो हाइड्रोजन परमाणुओं से जुड़ता है, अतः ऑक्सीजन की संयोजन क्षमता 2 है।

परमाणु के बाह्यतम कोश को संयोजकता कोश (Valence Shell) कहते हैं और इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉनों को संयोजकता इलेक्ट्रॉन (Valence Electrons) कहा जाता है। यदि बाह्यतम कोश में 8 इलेक्ट्रॉन हों, तो इसे अष्टक (Octet) कहते हैं। पूर्ण अष्टक वाले तत्व (या हीलियम की भाँति 2 इलेक्ट्रॉन वाले) स्थायी और अधिकांशतः अक्रियाशील होते हैं। अपूर्ण अष्टक वाले तत्व अष्टक पूर्ण करने के लिए इलेक्ट्रॉन त्यागते, ग्रहण करते अथवा साझा करते हैं।

अष्टक पूर्ण करने हेतु त्यागे, ग्रहण किए अथवा साझा किए गए इलेक्ट्रॉनों की संख्या को उस तत्व की संयोजकता (Valency) कहते हैं। यदि संयोजकता कोश में 4 से कम इलेक्ट्रॉन हों तो तत्व इलेक्ट्रॉन त्यागता है; यदि 4 से अधिक हों तो तत्व इलेक्ट्रॉन ग्रहण करता है। उदाहरण के लिए — सोडियम (2, 8, 1) एक इलेक्ट्रॉन त्यागकर स्थायी होता है, अतः इसकी संयोजकता 1 है; ऑक्सीजन (2, 6) दो इलेक्ट्रॉन ग्रहण करता है, अतः इसकी संयोजकता 2 है; कार्बन (2, 4) चार इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी करता है, अतः इसकी संयोजकता 4 है।

समस्थानिक (Isotopes)

डाल्टन ने माना था कि किसी तत्व के सभी परमाणु समान और समान द्रव्यमान वाले होते हैं। परंतु बाद में पता चला कि एक ही तत्व के कुछ परमाणुओं में प्रोटॉनों की संख्या (परमाणु क्रमांक Z) तो समान होती है, परंतु न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न होती है, जिसके कारण उनकी द्रव्यमान संख्या भी भिन्न होती है। ऐसे ‘युग्म परमाणु’, जिनका परमाणु क्रमांक समान परंतु द्रव्यमान संख्या भिन्न होती है, समस्थानिक कहलाते हैं।

उदाहरण — हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक होते हैं: प्रोटियम (¹₁H, ~99.98%), ड्यूटीरियम (²₁H, ~0.015%), और ट्राइटियम (³₁H, अल्प मात्रा में)। तीनों में एक-एक प्रोटॉन होता है, परंतु ड्यूटीरियम में एक और ट्राइटियम में दो न्यूट्रॉन होते हैं। इसी प्रकार कार्बन के तीन समस्थानिक हैं — ¹²₆C, ¹³₆C और ¹⁴₆C, जिनमें से ¹²₆C सर्वाधिक पाया जाता है।

समस्थानिकों के रासायनिक गुण समान होते हैं क्योंकि उनमें इलेक्ट्रॉनों की संख्या और इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होता है, परंतु भौतिक गुण (जैसे क्वथनांक व गलनांक) भिन्न होते हैं। समस्थानिकों के कुछ उपयोग — यूरेनियम-235 (²³⁵₉₂U) नाभिकीय संयंत्र में ईंधन के रूप में, कोबाल्ट-60 (⁶⁰₂₇Co) कैंसर की रेडियोथेरेपी में, आयोडीन-131 (¹³¹₅₃I) घेंघा और थायरॉइड कैंसर के उपचार में, तथा कार्बन-14 (¹⁴₆C) पुरातत्व में प्राचीन जीवाश्मों की आयु ज्ञात करने में उपयोग होता है।

औसत परमाणु द्रव्यमान (Average Atomic Mass):

क्लोरीन प्रकृति में दो समस्थानिकों के रूप में पाई जाती है — एक का द्रव्यमान 35 u (लगभग 75% प्रचुरता) और दूसरे का 37 u (लगभग 25% प्रचुरता), जो 3:1 अनुपात में मिलते हैं। साधारण औसत (35+37)/2 = 36 u होगा, परंतु यह प्रकृति को सही रूप से नहीं दर्शाता क्योंकि यह प्रचुरता को ध्यान में नहीं रखता। इसलिए भारित औसत परमाणु द्रव्यमान (Weighted Average Atomic Mass) निकाला जाता है —

औसत परमाणु द्रव्यमान = (35 × 75/100) + (37 × 25/100) = 105/4 + 37/4 = 142/4 = 35.5 u

अर्थात यदि 10 लाख क्लोरीन परमाणु लिए जाएँ, तो उनमें लगभग 7.5 लाख ³⁵Cl और 2.5 लाख ³⁷Cl परमाणु होंगे, जिनका भारित औसत द्रव्यमान 35.5 u होगा।

समभारिक (Isobars)

कैल्सियम (परमाणु क्रमांक 20), पोटैशियम (परमाणु क्रमांक 19) और आर्गन (परमाणु क्रमांक 18) — इन तीनों तत्वों में प्रोटॉनों की संख्या भिन्न-भिन्न है, परंतु तीनों की द्रव्यमान संख्या 40 है। जब विभिन्न तत्वों के परमाणुओं की द्रव्यमान संख्या समान हो परंतु परमाणु क्रमांक भिन्न हों, तो उन्हें समभारिक (Isobars) कहा जाता है।

महत्वपूर्ण बिंदु (At a Glance)

  • परमाणु द्रव्य के निर्माण खंड (Building Blocks) होते हैं।
  • जे. जे. टॉमसन ने प्रस्तावित किया कि परमाणु में इलेक्ट्रॉन एक धनावेशित गोले में धँसे होते हैं (प्लम पुडिंग मॉडल)।
  • रदरफोर्ड के मॉडल के अनुसार परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त स्थान है, केंद्र में सघन धनावेशित नाभिक होता है और इलेक्ट्रॉन उसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं।
  • नील्स बोर के मॉडल के अनुसार इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर निश्चित ऊर्जा स्तरों (कोशों) में गति करते हैं।
  • परमाणु के कोशों को K, L, M, N आदि नाम दिए गए हैं।
  • जेम्स चैडविक ने न्यूट्रॉन की खोज की।
  • परमाणु के तीन अवपरमाणुक कण — इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन हैं।
  • बाह्यतम कोश में अष्टक (या हीलियम में 2 इलेक्ट्रॉन) होने पर परमाणु स्थायी व अक्रियाशील होता है।
  • संयोजकता किसी परमाणु की संयोजन क्षमता है — यह ग्रहण, त्याग या साझा किए गए इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है।
  • परमाणु क्रमांक = नाभिक में प्रोटॉनों की संख्या; द्रव्यमान संख्या = प्रोटॉन + न्यूट्रॉन की कुल संख्या।
  • समस्थानिक — समान परमाणु क्रमांक परंतु भिन्न द्रव्यमान संख्या वाले परमाणु। समभारिक — भिन्न परमाणु क्रमांक परंतु समान द्रव्यमान संख्या वाले परमाणु।

We hope that class 9 Science Chapter 8 एक यात्रा — परमाणु के भीतर (Journey Inside the Atom) Notes in Hindi helped you. If you have any queries about class 9 Science Chapter 8 एक यात्रा — परमाणु के भीतर (Journey Inside the Atom) Notes in Hindi or about any other Notes of class 9 Science in Hindi, so you can comment below. We will reach you as soon as possible…

Category: Class 9 Science Notes in Hindi

Post navigation

← कार्य, ऊर्जा एवं सरल मशीनें Notes || Class 9 Science Chapter 7 in Hindi ||
द्रव्य का परमाण्विक आधार Notes || Class 9 Science Chapter 9 in Hindi || →

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Download our App Now - Criss Cross Classes

Free WhatsApp Group

Free Telegram Group

Our Application

Ask Your Doubts

MORE NOTES

  • Class 10 Hindi (42)
  • Class 10 Math Notes in Hindi (15)
  • Class 10 Science Notes in Hindi (16)
  • Class 10 SST Notes in Hindi (22)
  • Class 11 Economics Notes in Hindi (14)
  • Class 11 Geography Notes in Hindi (23)
  • Class 11 Hindi (23)
  • Class 11 History Notes in Hindi (11)
  • Class 11 Physical Education Notes in Hindi (10)
  • Class 11 Political Science Notes in Hindi (20)
  • Class 11 Sociology Notes in Hindi (10)
  • Class 12 Economics Notes in Hindi (20)
  • Class 12 Geography Notes in Hindi (23)
  • Class 12 Hindi (51)
  • Class 12 History Notes in Hindi (16)
  • Class 12 Home Science Notes in Hindi (16)
  • Class 12 Notes (21)
  • Class 12 Physical Education Notes in Hindi (10)
  • Class 12 Political Science Notes in Hindi (19)
  • Class 12 Sociology Notes in Hindi (16)
  • Class 9 Hindi (53)
  • Class 9 Math Notes in Hindi (23)
  • Class 9 Science Notes in Hindi (28)
  • Class 9 Social Science Notes in Hindi (29)
  • Physical Education CUET (8)
  • Uncategorized (1)
© 2026 Criss Cross Classes | Powered by Minimalist Blog WordPress Theme