पाठ – 7
कार्य, ऊर्जा एवं सरल मशीनें
In this post we have given the detailed notes of class 9 Science chapter 7 Work, Energy, and Simple Machines in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 9 board exams.
इस पोस्ट में कक्षा 9 के विज्ञान के पाठ 7 कार्य, ऊर्जा एवं सरल मशीनें के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 9 में है एवं विज्ञान विषय पढ़ रहे है।
| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT — Exploration / अन्वेषण (2026-27) |
| Class | Class 9 |
| Subject | Science |
| Chapter no. | Chapter 7 |
| Chapter Name | कार्य, ऊर्जा एवं सरल मशीनें (Work, Energy, and Simple Machines) |
| Category | Class 9 Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
पाठ 7, कार्य, ऊर्जा एवं सरल मशीनें
कार्य (Work)
कार्य की परिभाषा:
जब कोई नियत बल किसी वस्तु पर लगाया जाता है और वह वस्तु बल की दिशा में विस्थापित हो जाती है, तो कहा जाता है कि बल द्वारा वस्तु पर कार्य (Work) किया गया है। यदि किसी वस्तु पर लगने वाला नियत बल F हो और बल की दिशा में उसका विस्थापन s हो, तो बल द्वारा किया गया कार्य W होगा—
W = F × s
- कार्य का SI मात्रक जूल (Joule, J) है।
- बल का SI मात्रक न्यूटन (N) तथा विस्थापन का SI मात्रक मीटर (m) है।
- 1 जूल — जब 1 न्यूटन बल किसी वस्तु पर लगाकर उसे बल की दिशा में 1 मीटर विस्थापित कर दे तो किया गया कार्य 1 जूल कहलाता है। चूँकि 1 N = 1 kg m s−2, अतः 1 J = 1 kg m2 s−2 होता है।
- यदि बल-विस्थापन ग्राफ (Force–displacement graph) खींचा जाए तो किया गया कार्य ग्राफ के नीचे बने क्षेत्रफल के बराबर होता है। यह नियम तब भी लागू होता है जब बल नियत न हो।
- बल और विस्थापन दोनों सदिश (vector) राशियाँ हैं जिनमें परिमाण व दिशा दोनों होते हैं, परंतु कार्य एक अदिश (scalar) राशि है — इसे धनात्मक या ऋणात्मक चिह्न वाली संख्या के रूप में व्यक्त किया जाता है, इसकी कोई दिशा नहीं होती।
कार्य शून्य कब होता है?
- यदि वस्तु पर लगने वाला बल शून्य हो (F = 0), तो किया गया कार्य भी शून्य होगा।
- यदि वस्तु पर बल तो लगाया जाए किंतु उसका कोई विस्थापन न हो (s = 0), जैसे किसी दृढ़ दीवार को धकेलना, तो भी कार्य शून्य होता है। इस स्थिति में थकान का अनुभव शरीर की माँसपेशियों में आंतरिक ऊर्जा के व्यय होने के कारण होता है, न कि वैज्ञानिक अर्थ में किए गए कार्य के कारण।
- यदि बल, विस्थापन के लंबवत (perpendicular) दिशा में लगाया जाए, तो भी उस बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है, क्योंकि बल की दिशा में कोई विस्थापन नहीं होता (जैसे — बॉक्स को क्षैतिज दिशा में लेकर चलती लड़की द्वारा ऊर्ध्व दिशा में लगाया गया बल)।
धनात्मक और ऋणात्मक कार्य:
- धनात्मक कार्य (Positive work): जब विस्थापन उसी दिशा में हो जिस दिशा में बल लगाया गया हो, तो किया गया कार्य धनात्मक होता है (उदाहरण — पहिएदार कुर्सी को धकेलना)।
- ऋणात्मक कार्य (Negative work): जब बल की दिशा विस्थापन की दिशा के विपरीत हो, तो किया गया कार्य ऋणात्मक होता है (उदाहरण — गोलरक्षक द्वारा गेंद को रोकते समय गेंद की गति के विपरीत बल लगाना)।
उदाहरण 7.1: व्यायाम करती हुई एक लड़की डंबल को ऊपर उठाती है और फिर धीरे-धीरे नीचे लाती है। बताइए कि लड़की डंबल पर कब धनात्मक और कब ऋणात्मक कार्य करती है।
हल: डंबल को ऊपर उठाते समय बल और विस्थापन एक ही दिशा में होते हैं, अतः लड़की धनात्मक कार्य करती है। डंबल को नीचे लाते समय लगाया गया बल विस्थापन की विपरीत दिशा में होता है, अतः लड़की ऋणात्मक कार्य करती है।
उदाहरण 7.2: गोल बचाने के प्रयास में एक गोलरक्षक फुटबॉल पर उसकी गति की विपरीत दिशा में 200 N का बल लगाती है और फुटबॉल के रुकने तक उसका हाथ 15 cm पीछे हट जाता है। गोलरक्षक द्वारा फुटबॉल को रोकने में कितना कार्य किया गया?
हल: बल विस्थापन के विपरीत दिशा में है, अतः विस्थापन ऋणात्मक लिया जाएगा।
कार्य = बल × बल की दिशा में विस्थापन = 200 N × (−0.15 m) = −30 J (ऋणात्मक कार्य)
कार्य-ऊर्जा प्रमेय (Work-Energy Theorem)
ऊर्जा (Energy): जब किसी वस्तु पर धनात्मक कार्य किया जाता है, तो उसे ऊर्जा प्राप्त होती है। कोई भी वस्तु जिसमें कार्य करने की क्षमता हो, उसे ऊर्जावान वस्तु कहा जाता है। किसी वस्तु पर किया गया कार्य उसकी ऊर्जा में परिवर्तन के रूप में प्रकट होता है — इस संबंध को कार्य-ऊर्जा प्रमेय कहते हैं।
वस्तु पर किया गया कार्य = वस्तु की ऊर्जा में परिवर्तन
- यह प्रमेय वस्तुओं के निकाय (system) के लिए भी लागू होता है और तब भी लागू होता है जब वस्तु पर लगाए गए बल नियत न हों।
- ऊर्जा का SI मात्रक भी कार्य के समान ही जूल (J) है।
उदाहरण 7.3: कैरम के खेल में एक खिलाड़ी स्ट्राइकर से प्रहार करके काली गोटी को सफेद गोटी के माध्यम से पॉकेट में डालता है। बताइए कि कौन कार्य करता है और ऊर्जा में क्या परिवर्तन होता है।
हल: गतिमान स्ट्राइकर सफेद गोटी पर धनात्मक कार्य करके उसकी ऊर्जा बढ़ाता है, जबकि न्यूटन के तीसरे नियम अनुसार सफेद गोटी स्ट्राइकर पर ऋणात्मक कार्य करके उसकी ऊर्जा घटाती है। इसी प्रकार सफेद गोटी काली गोटी पर धनात्मक कार्य करके उसकी ऊर्जा बढ़ाती है, जबकि काली गोटी सफेद गोटी पर ऋणात्मक कार्य करके उसकी ऊर्जा घटाती है।
ऊर्जा के रूप (Forms of Energy)
ऊर्जा कार्य करने की क्षमता है और यह अनेक रूपों में पाई जाती है। एक रूप की ऊर्जा को दूसरे रूप में बदला जा सकता है (जैसे बल्ब में विद्युत ऊर्जा का प्रकाश ऊर्जा में रूपांतरण)। ऊर्जा के मुख्य रूप निम्नलिखित हैं—
- यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical energy): वस्तुओं की स्थिति या गति के कारण होने वाली ऊर्जा।
- तापीय ऊर्जा (Thermal energy): वस्तुओं को गर्म या ठंडा करने वाली ऊर्जा।
- प्रकाश ऊर्जा (Light energy): जिसके कारण हम देख पाते हैं।
- ध्वनि ऊर्जा (Sound energy): वायु या अन्य माध्यमों के अणुओं के कंपन की ऊर्जा।
- विद्युत ऊर्जा (Electrical energy): आवेशों की स्थिति या गति से संबंधित ऊर्जा।
- नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear energy): परमाणुओं के नाभिक में संचित ऊर्जा।
- रासायनिक ऊर्जा (Chemical energy): ईंधन और खाद्य पदार्थों में परमाणुओं के रासायनिक बंधों के रूप में संचित ऊर्जा।
इनमें से इस अध्याय में हम मुख्यतः यांत्रिक ऊर्जा पर ध्यान देंगे क्योंकि यह बल एवं गति की संकल्पनाओं से सीधे जुड़ी है।
यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical Energy)
वह ऊर्जा जो किसी वस्तु में उसकी गति अथवा स्थिति के कारण होती है, यांत्रिक ऊर्जा कहलाती है। इसके दो भाग हैं — गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा।
गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) — सूत्र व व्युत्पत्ति (derivation):
किसी वस्तु की गति के कारण उसमें जो ऊर्जा होती है उसे गतिज ऊर्जा कहते हैं। यदि वस्तु गतिशील नहीं है तो उसकी गतिज ऊर्जा शून्य मानी जाती है।
व्युत्पत्ति: मान लीजिए m द्रव्यमान की कोई वस्तु प्रारंभिक वेग u से चलती है और नियत बल F के प्रभाव में s विस्थापन करने के बाद अंतिम वेग v प्राप्त करती है। गति के समीकरणों से—
v2 = u2 + 2as ⇒ s = (v2 − u2) / (2a) … (7.4)
कार्य की परिभाषा W = F × s में न्यूटन के द्वितीय नियम F = ma तथा समीकरण (7.4) से s का मान रखने पर—
W = ma × (v2 − u2) / (2a) = ½ m (v2 − u2) … (7.5)
कार्य-ऊर्जा प्रमेय के अनुसार यही कार्य वस्तु की ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है। यदि प्रारंभिक वेग u = 0 हो, तो यह परिवर्तन ही वस्तु की अंतिम गतिज ऊर्जा K के बराबर होगा—
K = ½ m v2 … (7.6)
- गतिज ऊर्जा का SI मात्रक जूल (J) है और इसकी कोई दिशा नहीं होती।
- धनात्मक कार्य होने पर वेग व गतिज ऊर्जा दोनों बढ़ते हैं; ऋणात्मक कार्य होने पर दोनों घटते हैं; कार्य शून्य (W = 0) होने पर गतिज ऊर्जा नियत रहती है।
उदाहरण 7.4: यदि किसी वाहन के वेग का परिमाण दोगुना हो जाए तो उसकी गतिज ऊर्जा प्रारंभिक मान की तुलना में कितने गुना होगी?
हल: प्रारंभिक गतिज ऊर्जा = ½mv2। वेग 2v होने पर गतिज ऊर्जा = ½m(2v)2 = 4 × ½mv2। अतः गतिज ऊर्जा 4 गुना हो जाएगी।
उदाहरण 7.5: एक भारतीय गेंदबाज 0.2 kg द्रव्यमान की गेंद को 154.8 km h−1 (= 43 m s−1) के वेग से फेंकता है। गेंद की गतिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए।
हल: K = ½mv2 = ½ × 0.2 kg × (43 m s−1)2 = 184.9 J
उदाहरण 7.6: 15000 kg द्रव्यमान का एक जेट वायुयान विमान वाहक पोत पर उतरता है। एक तार वायुयान पर 367500 N का नियत बल पीछे की ओर लगाता है जिससे विमान 100 m चलकर रुक जाता है। तार में फँसने से ठीक पहले वायुयान का वेग क्या था?
हल: प्रारंभिक गतिज ऊर्जा Ki = ½ × 15000 kg × v2; अंतिम गतिज ऊर्जा Kf = 0 J
तार द्वारा किया गया कार्य = F × s = 367500 N × (−100 m) (ऋणात्मक, क्योंकि बल व विस्थापन विपरीत दिशा में हैं)
कार्य-ऊर्जा प्रमेय से: 0 − ½ × 15000 × v2 = −(367500 × 100)
v2 = (36750 × 2 / 15) × 100 = 4900 m2 s−2
v = 70 m s−1 (= 252 km h−1) विमान वाहक पोत की ओर।
स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy):
किसी वस्तु में विरूपण (deformation) के कारण अथवा वस्तुओं के किसी निकाय में उनकी सापेक्ष स्थितियों (relative positions) के कारण जो ऊर्जा संचित होती है, उसे स्थितिज ऊर्जा कहते हैं। उदाहरण — तनी हुई रबड़ बैंड, खिंचा हुआ धनुष, संपीडित/विस्तारित स्प्रिंग, अलग किए गए चुंबक या विद्युत आवेश, और पृथ्वी से ऊपर उठाई गई गेंद — इन सभी में विरूपण या सापेक्ष स्थिति के कारण ऊर्जा संचित रहती है जो कार्य करने में समर्थ है।
गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा (Gravitational Potential Energy) — सूत्र व व्युत्पत्ति:
चूँकि पृथ्वी का द्रव्यमान गेंद की तुलना में बहुत अधिक होता है, पृथ्वी-गेंद निकाय की संचित ऊर्जा को सरल भाषा में गेंद की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा कहा जाता है। भूतल पर रखी m द्रव्यमान की किसी वस्तु की स्थितिज ऊर्जा को शून्य मान लिया जाता है। वस्तु को धीरे-धीरे h ऊँचाई तक ऊपर उठाने के लिए mg के बराबर बल की आवश्यकता होती है। इस बल द्वारा किया गया कार्य—
W = बल × विस्थापन = mg × h = mgh … (7.7)
कार्य-ऊर्जा प्रमेय के अनुसार यही कार्य वस्तु की स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन के रूप में प्रकट होता है। अतः h ऊँचाई पर वस्तु की स्थितिज ऊर्जा U—
U = mgh … (7.8)
स्थितिज ऊर्जा का मात्रक भी जूल (J) है। यह सूत्र केवल पृथ्वी की सतह के निकट की ऊँचाइयों के लिए ही मान्य है, क्योंकि सतह से दूर जाने पर गुरुत्वीय त्वरण g का मान घटता जाता है।
उदाहरण 7.7: एक क्षेत्ररक्षक ने गेंद पकड़ने के पश्चात 200 g द्रव्यमान की क्रिकेट गेंद को उत्साह में 10 m ऊँचा उछाल दिया। उच्चतम स्थिति में गेंद की स्थितिज ऊर्जा क्या होगी? (g = 10 m s−2)
हल: U = mgh = 0.2 kg × 10 m s−2 × 10 m = 20 J
यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण का नियम (Conservation of Mechanical Energy):
किसी वस्तु की गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा के योग को उसकी यांत्रिक ऊर्जा (mechanical energy) कहते हैं। मान लीजिए m द्रव्यमान की कोई वस्तु बिंदु A पर h ऊँचाई से (प्रारंभिक वेग शून्य) गिराई जाती है। बिंदु A पर—
स्थितिज ऊर्जा = mgh, गतिज ऊर्जा = 0, अतः यांत्रिक ऊर्जा = mgh … (7.9)
t समय बाद वस्तु h′ ऊँचाई वाले बिंदु B तक पहुँचती है और उसका वेग v = gt हो जाता है, तथा h′ = h − ½gt2। अतः बिंदु B पर—
स्थितिज ऊर्जा = mgh′ = mgh − ½mg2t2, गतिज ऊर्जा = ½mv2 = ½mg2t2
यांत्रिक ऊर्जा = (mgh − ½mg2t2) + ½mg2t2 = mgh … (7.10)
इससे स्पष्ट है कि जितनी स्थितिज ऊर्जा घटती है, उतनी ही गतिज ऊर्जा बढ़ती है, जबकि कुल यांत्रिक ऊर्जा mgh पर नियत बनी रहती है। जब कोई वस्तु गुरुत्वीय बल के कारण गति करती है और उस पर कोई अन्य बाह्य बल कार्य नहीं करता, तो उसकी यांत्रिक ऊर्जा संरक्षित रहती है — इसे ही यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण का नियम कहते हैं। सरल लोलक (simple pendulum) के प्रयोग में भी यही देखा जाता है — एक सिरे पर केवल स्थितिज ऊर्जा, निम्नतम बिंदु पर केवल गतिज ऊर्जा, तथा दूसरे सिरे पर पुनः केवल स्थितिज ऊर्जा प्राप्त होती है (व्यवहार में घर्षण व वायु प्रतिरोध के कारण लोलक धीमा होकर रुक जाता है)।
उदाहरण 7.8: h ऊँचाई की फिसलपट्टी (slide) के आधार तल पर पहुँचने पर बच्चे के वेग का परिमाण कितना होगा?
हल: शीर्ष पर स्थितिज ऊर्जा = mgh। घर्षण की उपेक्षा करते हुए यह पूरी ऊर्जा आधार तल पर गतिज ऊर्जा ½mv2 में बदल जाती है।
½mv2 = mgh ⇒ v = √(2gh)
चूँकि v केवल h पर निर्भर करता है, अतः फिसलपट्टी की आकृति या बच्चे के द्रव्यमान का इस वेग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
उदाहरण 7.9: बचाव ढलान (escape ramp) रेत/बजरी से भरे आनत पथ होते हैं जो ब्रेक फेल होने पर ट्रकों को रोकते हैं। 10000 kg द्रव्यमान का ट्रक 72 km h−1 (= 20 m s−1) की चाल से गति करते हुए 30° के कोण पर आनत ढलान पर चढ़ता है और रुक जाता है। रेत ट्रक पर 50000 N का बल विपरीत दिशा में लगाती है। ढलान की न्यूनतम लंबाई कितनी होगी? (g = 10 m s−2; संकेत — 30° ढलान पर हर 2 m चलने पर 1 m ऊँचाई बढ़ती है)
हल: प्रारंभिक गतिज ऊर्जा = ½ × 10000 × 202 = 2000000 J; प्रारंभिक स्थितिज ऊर्जा = 0
मान लीजिए ट्रक ढलान पर d दूरी चलता है, तो ऊँचाई में वृद्धि = d/2
अंतिम स्थितिज ऊर्जा = mg × d/2 = 10000 × 10 × d/2 = 50000 × d; अंतिम गतिज ऊर्जा = 0
रेत द्वारा किया गया कार्य = −50000 × d, जो कुल ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर है—
−50000d = (50000d) − 2000000 ⇒ 2000000 = 100000 × d ⇒ d = 20 m
शक्ति (Power)
शक्ति की परिभाषा: कार्य करने की दर (rate at which work is done) को शक्ति कहते हैं। यदि W कार्य t समय में किया जाए तो औसत शक्ति P—
P = W / t … (7.11)
- शक्ति का SI मात्रक वाट (Watt, W) है। 1 वाट शक्ति का अर्थ है 1 जूल कार्य प्रति सेकंड, अर्थात 1 W = 1 J s−1।
- व्यावसायिक मात्रक — बड़ी मात्रा में ऊर्जा को मापने के लिए किलोवाट-घंटा (kWh) का उपयोग किया जाता है (सामान्यतः बिजली के बिल में यह “यूनिट” कहलाता है)।
- एक अन्य प्रचलित मात्रक अश्वशक्ति (horsepower, hp) है, जिसका उपयोग कार के इंजन या पंपों के लिए किया जाता है। 1 अश्वशक्ति = 746 W के बराबर होती है।
उदाहरण 7.10: कोई भारोत्तोलक 5 सेकंड में 75 kg के द्रव्यमान को 2 m तक ऊपर उठाता है। इस कार्य के लिए आवश्यक शक्ति ज्ञात कीजिए।
हल: किया गया कार्य = mgh = 75 kg × 10 m s−2 × 2 m = 1500 J
शक्ति = 1500 J / 5 s = 300 W
उदाहरण 7.11: 1000 kg द्रव्यमान की एक कार विरामावस्था से गति प्रारंभ करके 72 km h−1 (= 20 m s−1) की चाल 10 सेकंड में प्राप्त कर लेती है। इंजन की शक्ति ज्ञात कीजिए।
हल: इंजन द्वारा किया गया कार्य = अंतिम गतिज ऊर्जा − प्रारंभिक गतिज ऊर्जा = ½ × 1000 × 202 − 0 = 200000 J
शक्ति = कार्य / समय = 200000 J / 10 s = 20000 W
सरल मशीनें (Simple Machines)
दैनिक जीवन में भारी वस्तुओं को उठाने या गति देने के लिए गुरुत्वीय बल या अन्य बलों के विरुद्ध कार्य करना पड़ता है। किसी कार्य के लिए आवश्यक कुल ऊर्जा को कम नहीं किया जा सकता, किंतु लगाए जाने वाले बल के परिमाण या दिशा को बदलकर कार्य को सरल बनाया जा सकता है। इसमें सहायता करने वाले उपकरणों को सरल मशीन कहते हैं।
महत्वपूर्ण परिभाषाएँ:
- आयास (Effort): मशीन पर हमारे द्वारा लगाया गया बल।
- भार (Load): वह बल जिसके विरुद्ध मशीन कार्य करती है।
- यांत्रिक लाभ (Mechanical Advantage): भार तथा आयास का अनुपात।
यांत्रिक लाभ = भार / आयास … (7.12)
घिरनी (Pulley):
घिरनी एक खाँचेदार पहिया है जो रस्सी को दिशा देती है। एक स्थिर घिरनी (fixed pulley) बल के परिमाण में कोई परिवर्तन नहीं करती, वह केवल उसकी दिशा बदलती है — नीचे की ओर खींचना ऊपर की ओर उठाने से आसान लगता है। चूँकि आयास और भार परिमाण में बराबर होते हैं, स्थिर घिरनी का यांत्रिक लाभ 1 होता है। इसके विपरीत, चल घिरनी (movable pulley) या घिरनियों के निकाय का यांत्रिक लाभ 1 से अधिक हो सकता है, जिससे बहुत कम आयास से भारी वस्तुओं को उठाया जा सकता है (जैसे एलिवेटर और क्रेन में)।
आनत तल (Inclined Plane) — सूत्र व व्युत्पत्ति:
आनत तल एक सरल मशीन है जो भारी वस्तु को ऊपर चढ़ाने या नीचे उतारने में सहायता करती है। मान लीजिए किसी m द्रव्यमान की वस्तु का भार mg है और उसे h ऊँचाई तक उठाने के लिए L लंबाई के आनत तल पर आवश्यक आयास F′ है। वस्तु को नियत चाल से ऊपर ले जाने पर—
कुल कार्य = F′ × L; अर्जित स्थितिज ऊर्जा = mgh
कार्य-ऊर्जा प्रमेय से (घर्षण की उपेक्षा करते हुए): F′ × L = mgh, अर्थात mg / F′ = L / h। अतः यांत्रिक लाभ—
यांत्रिक लाभ = भार / आयास = mg / F′ = L / h … (7.13)
चूँकि L सदैव h से अधिक होती है, आयास F′ भार mg से कम होता है और आनत तल का यांत्रिक लाभ 1 से अधिक होता है। तल की लंबाई बढ़ाकर (ढाल को कम कर) आयास और भी कम किया जा सकता है। यही कारण है कि पहाड़ी सड़कें सीधी न बनाकर घुमावदार और कम ढलान वाली बनाई जाती हैं।
उदाहरण 7.12: कोई व्यक्ति किसी वस्तु को 30 cm ऊँचाई तक उठाने के लिए आनत तल का उपयोग करता है, जिसकी चौड़ाई 40 cm है। रैंप का यांत्रिक लाभ ज्ञात कीजिए।
हल: समकोण त्रिभुज गुण से, ऊँचाई (AB) = 30 cm, चौड़ाई (BC) = 40 cm, अतः लंबाई (AC) = 50 cm।
यांत्रिक लाभ = L/h = 50 cm / 30 cm = 1.67
उत्तोलक (Lever) — सूत्र व व्युत्पत्ति:
उत्तोलक एक दृढ़ छड़ है जो किसी स्थिर बिंदु पर घूम सकती है। इसके तीन मुख्य भाग होते हैं—
- आलंब (Fulcrum): वह स्थिर बिंदु जिस पर उत्तोलक घूमता है।
- भार (Load): वह बल जिसके विरुद्ध उत्तोलक कार्य करता है, और आलंब से भार की दूरी को भार भुजा (load arm) कहते हैं।
- आयास (Effort): भार को उठाने के लिए लगाया गया बल, और आलंब से आयास की दूरी को आयास भुजा (effort arm) कहते हैं।
उत्तोलक के जिस सिरे पर कम बल F1 लगाया जाता है वह अधिक दूरी d1 तय करता है, जबकि जिस सिरे पर अधिक बल F2 लगता है वह कम दूरी d2 तय करता है। एक सिरे पर किया गया कार्य दूसरे सिरे को स्थानांतरित होता है—
F1 × d1 = F2 × d2 … (7.14)
इसी सिद्धांत से (जैसा दंड-तुला की क्रियाकलाप से सिद्ध होता है)—
आयास × आयास भुजा = भार × भार भुजा … (7.15)
यांत्रिक लाभ = भार / आयास = आयास भुजा / भार भुजा … (7.16)
आयास भुजा बढ़ाने पर उत्तोलक भार पर आयास F1 की तुलना में अधिक बल F2 लगाता है। ध्यान रहे कि उत्तोलक किसी कार्य के लिए आवश्यक बल को तो कम करता है, परंतु किए गए कुल कार्य के परिमाण को नहीं बदलता — आयास को अधिक दूरी तक स्थानांतरित करना पड़ता है ताकि कुल कार्य समान बना रहे।
उदाहरण 7.13: एक सी-सॉ प्रकार के झूले में चार कुर्सियाँ A, B, D, E तथा आलंबन बिंदु C है, जहाँ AC = EC = 2 m और BC = DC = 1 m है। झूले को संतुलित करने के लिए 15 kg और 30 kg द्रव्यमान वाले बच्चों को किन कुर्सियों पर बैठना चाहिए?
हल: मान लीजिए 15 kg का बच्चा कुर्सी A (दूरी 2 m) पर बैठा है और दूसरा बच्चा आलंब से L दूरी पर बैठता है।
15 kg × 2 m = 30 kg × L ⇒ L = 1 m
अतः दूसरे (30 kg वाले) बच्चे को कुर्सी D पर बैठना चाहिए।
उत्तोलकों के वर्ग (Classes of Levers):
आयास, आलंब एवं भार की सापेक्ष स्थितियों के अनुसार उत्तोलक तीन प्रकार के होते हैं—
| वर्ग (Class) | व्यवस्था | उदाहरण |
| प्रथम श्रेणी (Class I) | आलंब बीच में (आयास और भार के मध्य) | संडासी, कैंची, सब्बल (crowbar), प्लास, दंड-तुला, सी-सॉ प्रकार का झूला |
| द्वितीय श्रेणी (Class II) | भार बीच में (आलंब और आयास के मध्य) | नींबू निष्कर्षणी (lemon squeezer), ठेला (wheelbarrow), बोतल खोलने की मशीन |
| तृतीय श्रेणी (Class III) | आयास बीच में (आलंब और भार के मध्य) | चिमटा, चिमटी, झाड़ू, हथौड़ी, चप्पू (oar) |
दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली अनेक मशीनें दो या अधिक सरल मशीनों (घिरनी, आनत तल, उत्तोलक) से मिलकर बनी होती हैं। सभी प्रकरणों में यांत्रिक ऊर्जा का संरक्षण होता है — घर्षण की उपेक्षा करने पर आयास द्वारा किया गया कार्य भार द्वारा किए गए उपयोगी कार्य के बराबर होता है। मशीनें ऊर्जा का सृजन नहीं करतीं, वे केवल इसे अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग करने में हमारी सहायता करती हैं।
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